मैडागास्कर के जंगल में लगी आग। फोटो- रेट ए. बटलर 

जब मैं हाई स्कूल में था तो मुझे मलेशिया के बोर्नियो के अद्भुत वर्षा-वन या कहें रेनफॉरेस्ट घूमने का मौका मिला। उस यात्रा से जुड़ी यादें मेरे दिल के बहुत करीब हैं जिसे मैं हमेशा सहेजकर रखूंगा।

अपनी यात्रा से कैलीफ़ोर्निया वापस लौटने के बाद भी मैं वहां के लोगों के संपर्क में रहा जिनमें कुछ जीव वैज्ञानिक भी थे।वहां से लौटने के बाद अभी कुछ ही महीने बीते थे जब खबर आयी कि उस सुंदर वन को काट दिया जाएगा।

उस दूर देश के जंगल को इस तरह बर्बाद किये जाने की खबर ने मुझे गहरे प्रभावित किया। उदासी तो हुई ही पर साथ में मुझे कुछ सकारात्मक परिवर्तन के लिए काम करने की प्रेरणा भी मिली। जब कॉलेज में मेरा दाख़िला हुआ, उन्हीं दिनों मैंने तय किया कि वर्षा-वनों की इस दुर्गति, वन्य जीव और वहां रहने वाले लोग जो इन सब को सहेजने में अहम भूमिका अदा करते हैं, उनको लेकर एक किताब लिखूंगा। ताकि बाकी दुनिया को इन सबसे अवगत कराया जा सके।

हालांकि, मेरे अकादमिक कोर्स में संरक्षण या पर्यावरण से जुड़ा कुछ भी नहीं था पर मैं, वर्षा-वन को समझने के लिए लाइब्रेरी में पढ़ते हुए या इस विषय के विशेषज्ञों से बात करते हुए, घंटों गुजार देता। मैंने अपना खर्च भी कम करना शुरू कर दिया ताकि कुछ पैसे बच जाएं और इन पैसों से मैं मैडागास्कर और लैटिन अमेरिका के वर्षा वन देखने जा सकूं।

अपनी किताब पूरी करने के बाद मुझे एक प्रकाशक तो मिल गया पर उसके पास इतने पैसे नहीं थे कि वह किताब में तस्वीरें प्रकाशित कर सके। बिना इन तस्वीरों के मैं वर्षा वन की सुंदरता का बयान कैसे करता? मैंने यह किताब पैसे के लिए तो लिखी नहीं थी। मेरी इच्छा थी कि इसे अधिक से अधिक लोगों तक उपलब्ध कराया जा सके।  अधिक से अधिक लोग इसे पढ़ें और इन वर्षा-वनों की वस्तु-स्थिति से अवगत हो सकें। फिर मैंने तय किया कि मैं इस किताब को ऑनलाइन प्रकाशित करुंगा जहां लोग मुफ़्त में इसे पढ़ सकेंगे। मैंने उस साइट का नाम मैडागास्कर के सुंदर द्वीप के नाम पर मोंगाबे रखा।

मैं सिलिकॉन वैली में एक टेक स्टार्टअप में नौकरी करते हुए मोंगाबे वेबसाइट के लिए काम करता रहा। दिन में नौकरी करने के बाद रात में या सप्ताह के अंत में मिलने वाली छुट्टियों में, मैं मोंगाबे के लिए काम करता था।  आश्चर्यजनक रूप से कुछ ही समय में मोंगाबे को, अच्छी तादाद में लोग जानने लगे।  कुछ ही समय में इस वेबसाइट को ऐसी चर्चा मिली कि मैंने अच्छे-खासे पैकेज वाली नौकरी छोड़ने का निर्णय ले लिया। तब मेरी उम्र महज 26 वर्ष थी और मैं पूरे जुनून के साथ अपना सारा समय मोंगाबे को देने लगा। अपने शुरुआती दिनों में मैंने बच्चों के लिए एक सेक्शन बनाया जिसकी काफी चर्चा हुई। करीब 40 विभिन्न भाषाओं में इसका अनुवाद भी हुआ।

मैंने समाचार का भी एक सेक्शन शुरू किया। मेरा उद्देश्य था कि संरक्षण से जुड़े उन मुद्दों को प्रकाशित करूं जिन्हें मुख्यधारा की मीडिया में जगह नहीं मिलती। मैंने इतनी ख़बरें लिखीं कि लोगों को लगने लगा कि कई लोग मिलकर मोंगाबे चला रहे हैं। पर मैं अकेला ही किसी सकारात्मक बदलाव और अपनी सुंदर सी पृथ्वी को बचाने के जुनून में ये ख़बरें लिखे जा रहा था।

सारवाक मलेसिया में रेट ए. बटलर
सारवाक मलेशिया में रेट ए. बटलर

मैं मोंगाबे के लिए ऐसे भौगोलिक क्षेत्र और उन विषयों को तरजीह देता था जहां कम संसाधन में भी अधिकतम हस्तक्षेप किया जा सके। अपने अगाध जैव-विविधता और उसी अनुपात में खतरे को झेल रहे कटिबन्ध के क्षेत्र मेरी प्राथमिकता में आते गए। 

इन खबरों पर काम करते हुए ही मुझे बड़े फलक पर सार्थक हस्तक्षेप के मौके दिखने लगे। हालांकि, इसके लिए मुझे अपनी महत्वाकांक्षा को विस्तार देने की जरूरत थी। वेबसाइट को चलाने के तौर-तरीके में भी बदलाव की जरूरत थी। यह मेरे लिए बड़ा कदम था पर मोंगाबे को विस्तार देने के लिए जरूरी भी था। इस तरह मोंगाबे में मेरी भूमिका भी बदल गई।

बड़ा बदलाव

मोंगाबे के लिए एक बड़ा मोड़ तब आया जब 2011 में हमें लगा कि इंडोनेशिया के स्थानीय भाषा में पर्यावरण से जुड़ी वेबसाइट अच्छा-खासा हस्तक्षेप कर सकती है। इसका कारण था वहां प्राकृतिक संसाधनों के क्षेत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार। इसकी वजह से दशकों से वहां पर्यावरण में ह्रास देखा जा रहा था। ऐसा लगा कि अगर इन मुद्दों को केंद्र में रखकर पत्रकारिता से पारदर्शिता लाने की कोशिश की जाए तो बदलाव की गुंजाईश है। ऐसी पत्रकारिता जिससे जवाबदेही तय हो तथा इस क्षेत्र से जुड़े विभिन्न पेशेवर लोगों के लिए सुगम वातावरण बने। पेशेवर लोगों से तात्पर्य स्वयंसेवी संस्थान, स्थानीय लोग और ऐसे उद्यमियों से है जो संरक्षण को ध्यान में रखकर काम करते हैं।       

अभी मोंगाबे-इंडोनेशिया की शुरुआत को तीन महीने भी नहीं हुए थे जब यह वहां के स्थानीय भाषा में सबसे अधिक पढ़ा जाने वाला पर्यावरण से जुड़ा समाचार वेबसाइट बनकर उभरा। बहुत जल्द ही मोंगाबे-इंडोनेशिया को पढ़ने वालों में उस देश के बड़े अधिकारी और संरक्षण तथा आदिवासियों पर काम करने वाले लोग शामिल हो चुके थे। इसकी शुरुआत के तीन साल के अंदर ही मोंगाबे न्यूज़ इसके साथ जुड़ गया। इससे हमें दुनिया भर के पत्रकारों के साथ जुड़ने  और इनका एक नेटवर्क बनाने में मदद मिली।

 वर्तमान में, 16 देशों में हमारे स्टाफ और 80 देशों में करीब 700 पत्रकार हमसे जुड़े हैं। फिलहाल, मोंगाबे नौ भाषाओं में प्रकाशित होता है। कई स्थानीय, क्षेत्रीय, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थान मोंगाबे की खबरों को पुनः प्रकाशित करते हैं। इनमें नेशनल ज्योग्राफिक, द गार्जियन जैसे अंतरराष्ट्रीय संस्थान शामिल हैं। आज हमारे ब्यूरो इंडोनेशिया, भारत, अमेरिका, स्पैनिश बोलने वाले लैटिन-अमेरिका और ब्राज़ील में सक्रिय हैं।

मोंगाबे हिंदी में आपका स्वागत है

हमारी इस यात्रा के अगले कदम के तौर पर मोंगाबे हिन्दी की घोषणा करते हुए मैं बहुत ही रोमांचित हूं। इस समाचार प्लेटफॉर्म पर भारत में सबसे अधिक लोगों द्वारा बोले जाने वाली भाषा में आपको उच्च स्तर की सामग्री पढ़ने को मिलेगी।

 मैं हिन्दी पाठकों का मोंगाबे की रिपोर्टिंग की तरफ से स्वागत करता हूं। मुझे उम्मीद है कि आपको यहां प्रेरणादायी और ठोस जानकारियां मिलेंगी जिससे वर्तमान की सबसे बड़ी वैश्विक चुनौती को समझने में आपको मदद मिलेगी।

बैनर तस्वीर- चंबल नदी के किनारे घड़ियाल का बच्चा अपनी मां की पीठ पर खेलता हुआ। चंबल का यह इलाका घरियालों के संरक्षण के लिए काफी महत्वपूर्ण है। फोटो- गुडफ्रेंड 19/विकिमीडिया कॉमन्स

Article published by Manish Chandra Mishra