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उफ़्फ़ ये गर्मी! क्यों बढ़ता ही जा रहा है पृथ्वी का पारा?

पृथ्वी का तापमान 1850-1900 के "पूर्व-औद्योगिक" औसत की तुलना में 1.5 और 2 डिग्री सेल्सियस की सीमा को पार करना शुरू कर रहा है। इससे लोगों को गर्मी से जुड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। तस्वीर-योगेंद्र सिंह/Pexels।

पृथ्वी का तापमान 1850-1900 के "पूर्व-औद्योगिक" औसत की तुलना में 1.5 और 2 डिग्री सेल्सियस की सीमा को पार करना शुरू कर रहा है। इससे लोगों को गर्मी से जुड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। तस्वीर-योगेंद्र सिंह/Pexels।

  • साल 2023 अब तक का सबसे गर्म साल रिकॉर्ड किया गया है। पिछला साल औद्योगिक क्रांति से पहले (1850-1900) के औसत से 1.48 डिग्री सेल्सियस ज्यादा गर्म रहा। यही नहीं, 2024 के जनवरी महीने को सबसे गर्म रिकॉर्ड किया गया है।
  • वैज्ञानिकों का कहना है कि इंसानी गतिविधियों से दुनिया भर में गर्मी बढ़ रही है। हालांकि अल-नीनो ने इसमें आग में घी डालने जैसा काम किया है जिसे इस रिकॉर्ड तोड़ गर्मी की बड़ी वजह माना जा रहा है।
  • इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) की विशेष रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर तापमान में 1.5 डिग्री सेल्सियस से ज़्यादा बढ़ोतरी होती है, तो अत्यधिक व तेज बारिश, सूखा और लू जैसे गंभीर नतीजे भुगतने पड़ सकते हैं।

वैज्ञानिक शायराना अंदाज में कहते हैं, “धरती को बुखार हो गया है।” इसका मतलब यह है कि तापमान 1850-1900  के “औद्योगिक क्रांति से पहले” के औसत की तुलना में 1.5 और 2 डिग्री सेल्सियस की सीमा को पार करने के करीब है। यह लोगों को गर्मी से होने वाली मुश्किलें जैसे जलवायु परिवर्तन के खतरों की तरफ धकेल रहा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि बढ़ते तापमान के लिए इंसानी गतिविधियों से मौसम में हो रहा बदलाव जिम्मेदार है जिसे अस्थायी तौर पर अल नीनो (उष्णकटिबंधीय पूर्वी प्रशांत के मौसमी गर्म मौसम का प्राकृतिक बढ़ाव जो हर दो से सात साल में होता है) हवा दे रहा है।

साल 2023 में बढ़ती गर्मी के संकेत पूरी तरह सामने और स्पष्ट थे – भूमध्यसागरीय क्षेत्र और संयुक्त राज्य अमेरिका में लू चलना। कनाडा, ग्रीस, ऑस्ट्रेलिया और इंडोनेशिया में जंगलों में आग लगना। अफ्रीका के हॉर्न में लंबे समय तक सूखे के बाद बाढ़

दुनिया भर में साल 1850 से तापमान का डेटा रखना शुरू हुआ था। इसके बाद से 2023 अब तक का सबसे गर्म साल है। वहीं सबसे गर्म जनवरी महीना भी दर्ज किया गया। विश्व मौसम विज्ञान संगठन का कहना है, 1980 के दशक के बाद से हर दशक पिछले दशक की तुलना में ज्यादा गर्म रहा है। पिछले नौ साल रिकॉर्ड पर सबसे गर्म रहे हैं। यूके के मौसम कार्यालय का अनुमान है कि मोजूदा साल, पिछले साल के मुकाबले ज्यादा गर्म हो सकता है।

भारत में हालात बहुत बेहतर नहीं हैं। केरल समेत भारत में अन्य जगहों के लिए लू चलने की चेतावनी दी गई है। तिरुवनंतपुरम में मछुआरों ने कहा कि वे बेतहाशा गर्मी के बीच पीने के पानी के अतिरिक्त डिब्बे समुद्र में ले जा रहे हैं, ताकि उनके शरीर में पानी की कमी ना हो।

तापमान का कौन-सा रिकॉर्ड टूटा

दुनिया भर में साल 2023 में औसत तापमान 14.98 डिग्री सेल्सियस था। यह 1850-1900 के औसत से 1.48 डिग्री सेल्सियस ज्याद था। यही नहीं, पिछले सबसे गर्म साल 2016 की तुलना में 0.17 डिग्री सेल्सियस ज्यादा था। दरअसल, पेरिस जलवायु समझौते में धरती के तापमान में बढ़ोतरी को 1.5 डिग्री के अंदर रखने पर सहमति बनी थी। लेकिन यूके के मौसम कार्यालय को लगता है कि इस साल पहली बार 1.5 डिग्री सेल्सियस बढ़ोतरी की सीमा टूटने से इनकार नहीं किया जा सकता है। 

जनवरी 2024 में महीने के आधार पर अब तक का सबसे ज्यादा वैश्विक सतही तापमान दर्ज किया गया। यह पिछली सदी के औसत 12.2 डिग्री सेल्सियस से 1.27 डिग्री सेल्सियस ज्यादा है। यह लगातार 8वें महीने में सबसे ज्यादा है, क्योंकि पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में अल नीनो की स्थिति बनी हुई है। एनओएए के जलवायु पूर्वानुमान केंद्र के अनुसार ये स्थितियां अप्रैल-जून 2024 तक रहेंगी। यह परिस्थिति इसे अब तक का सबसे गर्म जनवरी महीना बनाती है, जो रिकॉर्ड गर्मी का लगातार आठवां महीना है। यह सबसे ज्यादा बारिश वाली दूसरी जनवरी भी थी।

जनवरी 2024 की सबसे अहम जलवायु घटनाओं को ध्यान में रखते हुए दुनिया का नक्शा तैयार किया गया। तस्वीर - एनओएए एनसीईआई।
जनवरी 2024 की सबसे अहम जलवायु घटनाओं को ध्यान में रखते हुए दुनिया का नक्शा तैयार किया गया। तस्वीर – एनओएए एनसीईआई।

साल 2023 में कई रिकॉर्ड टूट गए। कॉपरनिकस क्लाइमेट चेंज सर्विस (सी3एस) की रिपोर्ट के अनुसार, इससे पहले कभी भी साल के हर दिन का तापमान 1850-1900 के स्तर से 1 डिग्री सेल्सियस ऊपर दर्ज नहीं किया गया था। लगभग आधे दिन 1.5° सेल्सियस ज्यादा गर्म थे। साल की दूसरी छमाही में हर महीना पिछले किसी भी साल के उस महीने की तुलना में ज्यादा गर्म था। इसके अलावा, 2023 में जुलाई में पूरी तरह और नवंबर में वार्षिक चक्र के सापेक्ष रिकॉर्ड तापमान था। यही नहीं, 9 जून से लगभग सभी दिन ईआरए 5 (ERA 5) डेटा रिकॉर्ड पर सबसे ज्यादा गर्म थे। नवंबर 2023 में दो दिन सेल्सियस से ज्यादा गर्म थे।

साल 2023 में दुनिया भर में सतह और समुद्री क्षेत्रों में औसत से ज्यादा तापमान दर्ज किया गया। यूरोप और उत्तरी अमेरिका के बड़े क्षेत्रों और अन्य जगहों पर, ,सालाना तापमान 1991-2020 के औसत से 1 डिग्री सेल्सियस ज्यादा था।

दुनिया के ध्रुवों को भी जलवायु परिवर्तन का खामियाजा भुगतना पड़ा है। एनओएए के राष्ट्रीय पर्यावरण सूचना केंद्र (एनसीईआई) के आंकड़ों के अनुसार, जनवरी में अंटार्कटिक समुद्री बर्फ का दायरा घटकर पांचवें सबसे निचले स्तर पर आ गया। आर्कटिक का तापमान औसत से ऊपर रहा। दुनिया भर में समुद्री बर्फ का विस्तार 6.90 मिलियन वर्ग मील था। यह 1991-2020 के औसत से 4,40,000 वर्ग मील कम है। एनसीईआई ने बताया कि जहां आर्कटिक समुद्री बर्फ का विस्तार औसत से थोड़ा कम था, वहीं अंटार्कटिक समुद्री बर्फ का विस्तार औसत से 4,20,000 वर्ग मील कम था। हालांकि, गर्म होने की गति आम तौर पर महासागरों की तुलना में सतही क्षेत्रों पर ज्यादा होती है।

इनसे बढ़ा रहा तापमान?

धरती के गर्म होने के कारणों में इंसानी गतिविधियों के साथ-साथ प्राकृतिक वजहें भी शामिलहैं। इसे चलाने वाला प्राथमिक कारक जलवायु परिवर्तन है। 2023 अल नीनो वाला साल था जो जलवायु में कुदरती तरीके से बदलाव लाता है। इसमें तापमान और बारिश जैसे जलवायु पर असर डालने वाले घटकों में औसत से अंतर आ जाता है। नासा अर्थ ऑब्जर्वेटरी ने तापमान बढ़ाने वाले तीन अन्य कारकों के बारे में भी बताया है- महासागर का गर्म होना, एरोसोल में कमी और 2022 में दक्षिण प्रशांत में समुद्र के नीचे टोंगा में ज्वालामुखी विस्फोट

पृथ्वी की सतह के पास वायु का औसत तापमान बढ़ रहा है। इस बदलाव का बड़ा कारण कोयला, गैस और तेल जैसे जीवाश्म ईंधन के जलने से निकलने वाली अतिरिक्त कार्बन डाइऑक्साइड गैस है जो हमारे घरों, व्यवसायों और शहरों को रोशन करते हैं और हमें आवाजाही में मदद करते हैं। खेती और डेयरी पालन, भूमि के इस्तेमाल में आ रहे बदलाव, निर्माण, कचरा प्रबंधन और औद्योगिक प्रक्रियाएं मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड और अलग-अलग तरह के कृत्रिम रसायनों का उत्सर्जन करती हैं। ये गैसें पृथ्वी के चारों ओर गर्मी को ढकती और रोकती हैं।

जलवायु में बदलाव के चलते बढ़ने वाली गर्मी जलवायु परिवर्तन के असर को बढ़ाती है। अल नीनो वायुमंडलीय प्रवाह को इतना बदल देता है कि दुनिया के कई हिस्सों में 6 से 12 महीनों के लिए स्थानीय मौसम बदल जाता है। दक्षिणी दोलन नामक मौसमी घटना के साथ यह जुड़ा हुआ है जो ताहिती द्वीप और ऑस्ट्रेलिया के डार्विन के बीच दक्षिणी प्रशांत महासागर में समुद्र स्तर के वायु दबाव पैटर्न में बदलाव को दिखाता है। अल नीनो की स्थिति बनने पर, ताहिती की तुलना में डार्विन में औसत वायु दबाव ज्यादा होता है और ला नीना नामक वैकल्पिक ठंडे चरण के दौरान ठीक इसके उलटा होता है। अल नीनो साउथर ऑसिलेशन (ENSO) कहलाने वाली, प्राकृतिक जलवायु में बदलाव की यह घटना दुनिया के दूरदराज के हिस्सों में स्थानीय मौसम के पैटर्न को प्रभावित करती है। अल नीनो वाले साल में, भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून दब जाता है। समुद्र का अस्थायी तापन प्रशांत जेट स्ट्रीम को दक्षिण की ओर धकेलता है, जिससे उत्तरी अमेरिका और कनाडा के हिस्से गर्म और शुष्क हो जाते हैं।

उष्णकटिबंधीय महासागरों में तापमान से जुड़ी विसंगतियां 2022 में नकारात्मक से 2023 में सकारात्मक में स्थानांतरित हो गईं। यह जो प्रशांत महासागर पर ला नीना के अल नीनो में परिवर्तित होने और गर्म अटलांटिक और हिंद महासागरों से प्रभावित होने के मुताबिक है, जो सभी महासागरों में सबसे गर्म है।

हवा के तापमान से जुड़ी विसंगतियां समुद्र की सतह के तापमान की विसंगतियों से बहुत करीब से जुड़ी हुई हैं। कोई विसंगति रेफरेंस के लिए लिए गए डेटा या दीर्घकालिक औसत से विचलन को दिखाती है। इस मामले में, सकारात्मक या नकारात्मक विसंगति रेफरेंस के लिए लिए गए डेटा की तुलना में गर्म या ठंडे तापमान को इंगित करती है। महासागर के ऊपरी हिस्से में जमा गर्मी (समुद्र के सबसे ऊपर 2,000 मीटर में संग्रहीत गर्मी की मात्रा) और समुद्र की सतह के तापमान ने 2023 में नए रिकॉर्ड बनाए। महासागर में जमा गर्मी प्रमुख जलवायु संकेतक है, क्योंकि महासागर पृथ्वी की 90% अतिरिक्त गर्मी को संग्रहीत करते हैं और दुनिया भर के महासागरों में, यह 2023 में अब तक के सबसे बड़े अंतर से बढ़ा है।

हवा में मौजूद छोटे कण जैसे धुआं, कालिख, ज्वालामुख की राख और समुद्री स्प्रे जिन्हें एरोसोल कहा जाता है, सूर्य के प्रकाश को अवशोषित या प्रतिबिंबित कर सकते हैं और हवा को क्रमशः थोड़ा गर्म या ठंडा कर सकते हैं। गहरे एरोसोल आम तौर पर गर्मी को अवशोषित करते हैं और हल्के एरोसोल इसे प्रतिबिंबित करते हैं। उनका अक्सर ठंडा करने वाला असर होता है। हालांकि, यह असर न्यूनतम और सीमित निश्चितता और मौसम के पैटर्न पर जटिल प्रभाव के साथ होता है। जैसा कि दुनिया भर में नए सरकारी मानदंडों ने वायु प्रदूषण में कटौती की है और हवा को साफ किया है, दुनिया भर में एरोसोल की सांद्रता कम हो रही है, जिससे संभवतः एक छोटा-सा गर्मी बढ़ाने वाला असर हो रहा है जिसे वैज्ञानिक बेहतर ढंग से समझने की कोशिश कर रहे हैं।

कोच्चि में वायु प्रदूषण। तस्वीर - Nvssafu photography /विकिमीडिया कॉमन्स।
कोच्चि में वायु प्रदूषण। तस्वीर – Nvssafu photography /विकिमीडिया कॉमन्स।

बहुत ज्यादा गर्मी के संभावित असर क्या हैं?

हाल ही में जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र अंतर सरकारी पैनल (आईपीसीसी) की विशेष रिपोर्ट में तापमान के 1.5 डिग्री सेल्सियस के पार होने पर सामने आने वाले गंभीर असर का अनुमान लगाया गया है। इनमें ज्यादा और तेज बारिश, सूखा और लू शामिल है। एक हालिया अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि 2 डिग्री सेल्सियस की “महत्वपूर्ण सीमा” को पार करने से हमें जलवायु परिवर्तन जैसे वायु तापमान, वर्षा (बारिश, बर्फ आदि), सापेक्ष आर्द्रता, सौर विकिरण और हवा की गति जैसे मिले-जुले असर का सामना करना पड़ सकता है।  उनका कहना है कि बदली हुई जलवायु में गर्मी का तनाव और आग लगने का खतरा ज्यादा होगा।

आईपीसीसी के डेटा पर आधारित एक रिपोर्ट के अनुसार, भीषण लू और सूखा दो सबसे स्पष्ट प्रभाव हैं जो 1.5 डिग्री सेल्सियस गर्म होने पर हर पांच साल में कम से कम एक बार लगभग 14 प्रतिशत लोगों को प्रभावित करते हैं। वहीं 2 डिग्री गर्म होने पर 37 प्रतिशत लोगों को प्रभावित करते हैं।

औद्योगिक क्रांति से पहले के स्तरों की तुलना में अनुमानित परिवर्तन, 1.5 डिग्री सेल्सियस ग्लोबल वार्मिंग (बाएं) और 2 डिग्री सेल्सियस ग्लोबल वार्मिंग (दाएं) के साथ सालाना सबसे गर्म दिन (ऊपर) और वार्षिक सबसे ठंडी रात (नीचे) का औसत तापमान। आईपीसीसी की विशेष रिपोर्ट से तस्वीर।
औद्योगिक क्रांति से पहले के स्तरों की तुलना में अनुमानित परिवर्तन, 1.5 डिग्री सेल्सियस ग्लोबल वार्मिंग (बाएं) और 2 डिग्री सेल्सियस ग्लोबल वार्मिंग (दाएं) के साथ सालाना सबसे गर्म दिन (ऊपर) और वार्षिक सबसे ठंडी रात (नीचे) का औसत तापमान। आईपीसीसी की विशेष रिपोर्ट से तस्वीर

लू का मतलब किसी बड़े क्षेत्र में हवा का स्पष्ट रूप से बहुत ज्यादा गर्म होना या ऐसी हवा का आना है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) के मुताबिक इसमें साल की गर्म अवधि के दौरान लगातार कम से कम दो दिनों तक असामान्य रूप से मौसम गर्म होता है जो स्थानीय सीमाओं से ज्यादा होता है। आबादी का पांचवां हिस्सा पहले से ही कम से कम एक सीज़न में तापमान में 1.5°C से ज्यादा बढ़ोतरी का अनुभव कर रहा है। वैज्ञानिक बताते हैं, “2 डिग्री सेल्सियस तापमान पर, 2015 में भारत और पाकिस्तान में देखी गई घातक लू हर साल आ सकती हैं।”

अप्रैल-जून 2015 में भारत-पाकिस्तान में चली लू ने 3,600 लोगों को हमसे छीन लिया। भारत मौसम विज्ञान विभाग लू की घोषणा तब करता है जब सतही हवा का तापमान मैदानी इलाकों के लिए रोजाना के सामान्य अधिकतम तापमान 40 डिग्री सेल्सियस या उससे 4.5-6.4 डिग्री सेल्सियस ज्यादा बढ़ जाता है। वहीं पहाड़ी क्षेत्रों के लिए यह सीमा 30 डिग्री सेल्सियस या उससे ज्यादा है। जब बढ़ोतरी ज्यादा होती है तो इसे भीषण लू कहा जाता है। जैसा कि भारत में 2003 में किए गए अध्ययन से पता चला है भीषण लू से लोगों को स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ता है। साथ ही, भोजन की कमी और मौत का जोखिम बढ़ जाता है।

अगर दुनिया भर का तापमान 2 डिग्री सेल्सियस बढ़ता है, तो 1.5 डिग्री ज्यादा गर्म दुनिया की तुलना में शहरों में लगभग 60 करोड़ से ज्यादा लोग गंभीर सूखे की चपेट में आ जाएंगे। हालांकि, जैसा कि आईपीसीसी ने कहा है, तापमान बढ़ने को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने से सूखे और पानी जैसी मुश्किलों को कम किया जा सकता है।

गर्म होती दुनिया के दूसरे बड़े असर में ठंड के मौसम का गर्म होना और ठंडे दिन और रातों की संख्या कम होना शामिल है। जैसे कि ध्रुवों के आसपास, तापमान में 1.5 डिग्री बढ़ोतरी होने पर सबसे ठंडी रातें 4.5 डिग्री सेल्सियस ज्यादा गर्म होंगी।

साल 2024 के लिए यूके मौसम कार्यालय का पूर्वानुमान हर दशक तापमान में 0.2 डिग्री सेल्सियस की मौजूदा बढ़ोतरी की प्रवृत्ति के हिसाब से है। जैसा कि अध्ययन की अगुवाई करने वाले निक डनस्टोन ने कहा, एक साल में तापमान में अस्थायी रूप से 1.5 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा की बढ़ोतरी की “उचित संभावना” है।

 

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बैनर तस्वीर: पृथ्वी का तापमान 1850-1900 के “पूर्व-औद्योगिक” औसत की तुलना में 1.5 और 2 डिग्री सेल्सियस की सीमा को पार करना शुरू कर रहा है। इससे लोगों को गर्मी से जुड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। तस्वीर-योगेंद्र सिंह/Pexels

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