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लद्दाख: आम नागरिकों की पहल से कारगर हो रहा वन्यजीव संरक्षण

नुब्रा वैली में सी बकथ्रॉन की झाड़ियों के बीच एक यूरेशियाई लिंक्स। तस्वीर- स्टैनज़िन चंबा।

नुब्रा वैली में सी बकथ्रॉन की झाड़ियों के बीच एक यूरेशियाई लिंक्स। तस्वीर- स्टैनज़िन चंबा।

  • लद्दाख साहसिक पर्यटन करने वाले लोगों की पसंदीदा जगह है। जहां प्रकृति की खूबसूरती में वन्यजीव चार चांद लगाते हैं, लेकिन बढ़ते पर्यटन और इंसानों के साथ टकराव की वजह से वन्यजीवों को नुकसान हो रहा है।
  • वन्यजीव संरक्षण के लिए लद्दाख में आम लोगों का एक स्थानीय समूह ‘वाइल्डलाइफ कंजर्वेशन एंड बर्ड्स क्लब लद्दाख’ कई तरह के प्रयास कर रहा है। इसकी वजह से वन्यजीवों के संरक्षण की तरफ लोगों की ध्यान गया है, खासकर छोटी बिल्लियों के मामले में।
  • संस्था से लद्दाख के स्थानीय वन्यजीव प्रेमी जुड़े हुए हैं और वह यात्राओं के दौरान यहां के वन्यजीवों के बारे में जानकारियां इकट्ठा करते हैं। लद्दाख के सुदूर इलाकों में पाए जाने वाले दुर्लभ वन्यजीवों के बारे में लोगों को पता चल रहा है।
  • संस्था की पत्रिका ‘जंगवा’ में हाल के अंकों में पलासेस कैट और लिंक्स जैसी छोटी बिल्लियों की प्रजातियों के बारे में लेख प्रकाशित हुए हैं। इन प्रजातियों पर भारत में काफी कम वैज्ञानिक शोध हुए हैं। इन लेखों के जरिए उनके बारे में महत्वपूर्ण जानकारियां सामने आई है।

लेह में रहने वाले 35 वर्षीय स्टैनज़िन चंबा प्रकृति की खोज में लद्दाख के नुब्रा घाटी में बीते पांच साल से जा रहे हैं। लेह शहर से लगभग 160 किलोमीटर दूर नुब्रा में उन्होंने कई प्रकार के वन्य जीव देखे लेकिन जो जीव उन्हें सबसे अधिक आकर्षित करता है वह है यूरेशियाई लिंक्स। लिंक्स को स्थानीय भाषा में ‘ई’ कहते हैं।

“लद्दाख में ज्यादातर लोगों ‘ई’ का नाम सुना है लेकिन इस नायाब जीव को कम ही लोग देख पाते हैं। मैंने पिछले तीन साल में आठ दफा यूरेशियाई लिंक्स देखा है। सबसे पहले मैंने लकजंग में इसे देखा था,” चंबा ने बताया।

चंबा ने यूरेशियाई लिंक्स को देखने की कहानी एक स्थानीय पत्रिका ‘जंगवा’ में प्रकाशित की। लद्दाख के वन्यजीव प्रेमियों का समूह वाइल्डलाइफ कंजर्वेशन एंड बर्ड्स क्लब इस पत्रिका का प्रकाशन करता है।

चंबा के लेख में लिंक्स के बारे में कुछ ऐसे तथ्य सामने आए हैं जो वन्यजीवों पर शोध में काफी मददगार साबित हो सकते हैं।

चंबा ने सुमूर गांव में स्थानीय चरवाहों से बातचीत कर इस जीव के व्यवहार के बारे में जानकारियां इकट्ठा की। उन्होंने पाया कि लिंक्स लद्दाख के स्थानीय झाड़ी सी बकथॉर्न की बेरियां खाता है। सी बकथॉर्न का पौधा ऊंची हिमालय की चोटियों पर पाया जाता है।

चंबा पेशे से वन्यजीव गाइड हैं और पर्यटकों को वन्यजीवों के बारे में बताते हैं। तस्वीरः स्टैनज़िन चंबा।
चंबा पेशे से वन्यजीव गाइड हैं और पर्यटकों को वन्यजीवों के बारे में बताते हैं। तस्वीरः स्टैनज़िन चंबा।

“मुझे सुमूर में चरवाहा और इलाके के जानकार अज़हांग टुंडुप त्सेवांग ने लिंक्स की शिकार रणनीति के बारे में बताया। वे सी बकथॉर्न झाड़ी पर चढ़कर उसे जोर-जोर से हिलाते हैं ताकि पत्तियां नीचे गिर जाए। खरगोश जैसे छोटे जीव उन पत्तियों को खाने आते हैं तो लिंक्स उनका शिकार कर लेते हैं,” चंबा ने लेख में लिखा।

मोंगाबे-हिन्दी के साथ बातचीत में स्टैनज़िन चंबा ने कहा, “फिलहाल मैं एक वन्यजीव गाइड हूं और पर्यटकों को वन्यजीव देखने में मदद करता हूं।” चंबा ने आगे कहा, “पहले यह मेरा शौक था और धीरे-धीरे यह मेरा पेशा बन गया। मैं डब्ल्यूसीबीसीएल का एक सक्रिय सदस्य हूं। एक बार जब आप इस क्षेत्र में आ जाते हैं तो संरक्षण इसका हिस्सा बन जाता है।” 

“अपना अधिकांश खाली समय प्रकृति में बिताने से मुझे पक्षियों और वन्यजीवों के जीवन को देखने में अत्यधिक खुशी मिलती है,” चंबा ने कहा। 

चंबा की कहानी उन दर्जनों कहानियों में से एक है जिसे लद्दाख के वन्यजीव प्रेमी कई माध्यमों से लोगों के सामने ला रहे हैं।

कैडिसफ्लाई नुब्रा घाटी में जल स्रोतों में पाया जाता है। तस्वीर- ब्रूस मार्लिन/विकिमीडिया कॉमन्स
कैडिसफ्लाई नुब्रा घाटी में जल स्रोतों में पाया जाता है। तस्वीर– ब्रूस मार्लिन/विकिमीडिया कॉमन्स
कैडिसफ्लाई लार्वा नदी के भीतर कंकड़, पत्थरों और पौधों की पत्तियों का उपयोग करके जटिल संरचनाएं बनाते हैं। तस्वीर- मारिजा गाजिक/विकिमीडिया कॉमन्स
कैडिसफ्लाई लार्वा नदी के भीतर कंकड़, पत्थरों और पौधों की पत्तियों का उपयोग करके जटिल संरचनाएं बनाते हैं। तस्वीर– मारिजा गाजिक/विकिमीडिया कॉमन्स

ऐसे ही एक दुर्लभ जीव की कहानी डॉ. नॉर्डन ओट्ज़र ने साझा की। वह एक अनोखे कीट कैडिसफ्लाई के बारे में लिखते हैं। नुब्रा वैली में साफ पानी के स्रोतों में यह पतंगा पाया जाता है जिसका लार्वा नदी के अंदर पानी में कंकड़-पत्थर व पौधों की पत्तियों से एक ढांचा बनाता है। इसके लिए यह अपने रेशम से इसे बांधकर खूबसूरत आकार देता है। 

डॉ. ओट्जर पेशे से कान, नाक और गले के डॉक्टर हैं, लेकिन वन्यजीवों के प्रति इनका स्नेह इन्हें ऐसे दिलचस्प किस्से लिखने को प्रेरित करता है।

जैव-विविधता से समृद्ध लद्दाख में जागरूकता जरूरी

हिमालय की ऊंचाई पर स्थित कम तापमान और कम बारिश वाले लद्दाख की जैव-विविधता काफी अनोखी है। यहां के कठिन परिवेश में लगभग 318 पक्षियों और 31 स्तनपायी प्रजातियां पाई जाती हैं। साल-दर-साल यहां पर्यटकों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। ऐसे में लोगों को जागरूक करने के लिए नागरिक पहल काफी जरूरी हो जाती है।

“यह संगठन लद्दाख के स्थानीय लोगों के द्वारा शुरू की गई एक पहल है जिसके तहत हम लद्दाख के वन्यजीवों की रक्षा कर रहे हैं। हम सदस्यों की मदद से लद्दाख के पक्षियों, पशुओं आदि की तस्वीरें, डेटा और जरूरी जानकारी इकट्ठा करते हैं जिससे लोगों को इनके बारे में पता चलेगा और इनका संरक्षण हो सकेगा,” वाइल्डलाइफ कंजर्वेशन एंड बर्ड्स क्लब लद्दाख (डब्ल्यूसीबीसीएल) के संस्थापकों में से एक और वर्तमान अध्यक्ष लोब्जांग विशुद्धा ने मोंगाबे-हिन्दी से बातचीत में संगठन के बारे में बताया।

उन्होंने आगे कहा, “हमारे संरक्षण कार्यक्रम में उन स्थानीय समुदाय के लोगों को वन्यजीवों के प्रति जागरूक करना है जिनका रोजमर्रा की जिंदगी में वन्यजीवों से सामना होता है।”

वन्यजीवों के रेस्क्यू में प्रशासन की मदद

चंबा ने पिंचिमिक में एक हिमालयी हिम मुर्गे (हिमालयन स्नोकॉक) को बचाया। नुब्रा में जंगली कुत्तों ने उसपर हमला कर दिया था। वे पक्षी को घर ले गए और सुरक्षित स्थान पर खाने और पीने की व्यवस्था की। एक दिन में ही वह पक्षी ठीक होकर उड़ने लायक हो गया।

साल 2021 में इसी तरह फांजिला वानला में बिजली के झटके से चार लाल लोमड़ियों और एक तिब्बती भेड़िये की मौत हो गई। 

सी बकथ्रॉन झाड़ी में एक लिंक्स। चंबा ने आठ अलग-अलग मौकों पर यूरेशियन लिंक्स को देखा और कई तस्वीरें खींचीं। तस्वीर- स्टैनज़िन चंबा
सी बकथ्रॉन झाड़ी में एक लिंक्स। चंबा ने आठ अलग-अलग मौकों पर यूरेशियन लिंक्स को देखा और कई तस्वीरें खींचीं। तस्वीर- स्टैनज़िन चंबा

इस घटना की पड़ताल करते हुए डब्ल्यूसीबीसीएल के सदस्यों ने पाया कि वहां जमीन पर बिजली का खुला तार है। यह जानकारी प्रशासन को दी गई और उस स्थान पर बिजली के तार की मरम्मत की गई।

संस्था के सदस्य पूरे लद्दाख में वन्यजीवों के संरक्षण में सक्रिय भूमिका निभाते हैं।

“लद्दाख 50 से 60 हजार वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है और वन विभाग के पास लगभग 50 कर्मचारी होंगे। ऐसे में स्थानीय लोगों का काम महत्वपूर्ण हो जाता है। हम न सिर्फ वन्यजीवों को बचाने की कोशिश करते हैं बल्कि विभाग को नियम तोड़ने वालों की सूचना भी देते हैं,” विशुद्धा ने बताया।

स्थानीय लोगों को संरक्षण के प्रयासों में शामिल करने को लेकर लद्दाख के वन्य जीव संरक्षक पंकज रैना ने कहा कि वन्यजीव संरक्षण विभाग भी स्थानीय एनजीओ, टूर ऑपरेटर और टैक्सी ऑपरेटर के साथ मिलकर वन्यजीव संरक्षण के प्रयास कर रहे हैं। 


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उन्होंने मोंगाबे-हिन्दी के साथ बातचीत में बताया, “लद्दाख का इलाका काफी बड़ा है और वन, पारिस्थितिकी एवं पर्यावरण विभाग, लद्दाख के कर्मचारी इतने बड़े इलाके में बिना स्थानीय लोगों के मदद के कारगर तरीके से काम नहीं कर पाएंगे। इस बात को ध्यान में रखते हुए स्थानीय लोगों को जागरूक करने का प्रयास चल रहा है। समाज अगर आगे बढ़कर अपना योगदान देगी तो वन्यजीव संरक्षण कारगर हो सकेगा।”

वन्यजीवों के बारे में जागरूकता के लिए क्लब ने कई जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए। इसके तहत क्लब से जुड़े फोटोग्राफर्स ने लेह में कई फोटो प्रदर्शनियों का भी आयोजन किया, जिसमें लद्दाख में पाए जाने वाले प्राणियों की तस्वीरें प्रदर्शित की गई। इसके अलावा आवारा कुत्तों की गणना कर वन्य जीवों पर इसके प्रभावों को लोगों के सामने लेकर आए। समय-समय पर लद्दाख में पक्षियों की गणना भी की गई जिसमें कई नई प्रजातियों के लद्दाख में होने का पता चला।

 

इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें। 

बैनर तस्वीरः नुब्रा वैली में सी बकथ्रॉन की झाड़ियों के बीच एक यूरेशियाई लिंक्स। तस्वीर- स्टैनज़िन चंबा।

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