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		<description>प्रकृति से प्रेरित समाचार</description>
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	<title>ग्लेशियर Archives - Mongabay हिन्दी</title>
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					<title>झींगा उद्योग की बढ़ती मांग बदल रही पॉलीकीट कृमियों की दुनिया</title>
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					<pubDate>23 सितम्बर 2026 11:06:43 +0000</pubDate>
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							<![CDATA[<p>पॉलीकीट कृमि पृथ्वी पर पाए जाने वाले समुद्री अकशेरुकी (बिना मेरुदंड वाले) जीवों के सबसे विविध समूहों में से एक हैं। वर्ल्ड रजिस्टर ऑफ मरीन स्पीशीज के अनुसार वर्तमान में पॉलीकीट की लगभग 13,148 मान्य प्रजातियां पहचानी गई हैं। कुछ शोधकर्ताओं का अनुमान है कि इस सदी के आखिर तक यह तादाद बढ़कर 16,700 तक [&#8230;]</p>
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							<![CDATA[पॉलीकीट कृमि पृथ्वी पर पाए जाने वाले समुद्री अकशेरुकी (बिना मेरुदंड वाले) जीवों के सबसे विविध समूहों में से एक हैं। वर्ल्ड रजिस्टर ऑफ मरीन स्पीशीज के अनुसार वर्तमान में पॉलीकीट की लगभग 13,148 मान्य प्रजातियां पहचानी गई हैं। कुछ शोधकर्ताओं का अनुमान है कि इस सदी के आखिर तक यह तादाद बढ़कर 16,700 तक पहुंच सकती है। विशाखापत्तनम में राष्ट्रीय तटीय अनुसंधान केंद्र (NCCR) की वैज्ञानिक E और समुद्र-तल पारिस्थितिकी की विशेषज्ञ सनिथा शिवदास ने कहा “ये (पॉलीकीट कृमि) लगभग सभी समुद्री आवासों में पाए जाते हैं जिनमें मुहने, मैंग्रोव, रेतीले तट, प्रवाल भित्तियां और समुद्री घास के मैदान से लेकर महाद्वीपीय शेल्फ और गहरे जल तक शामिल हैं।” शिवदास आगे बताती हैं, “पॉलीकीट की कुछ प्रजातियां कम लवणता वाले और अंतर्देशीय जल के वातावरण के अनुकूल भी हो गई हैं।” ग्रीक में पॉलीकीटा का मतलब “बहुत अधिक बाल वाला” होता है। यह उनके शरीर पर मांसल, पैर जैसी उभरी हुई संरचनाओं पर मौजूद बालनुमा चीजों के बारे में बताता है, जिससे उन्हें उनका दूसरा नाम ब्रिसल वर्म भी मिला है। इन कृमियों की लंबाई कुछ मिलीमीटर से लेकर एक मीटर से ज्यादा तक होती है और इनके रंग फीके भूरे से लेकर चमकीले पीले और नारंगी-लाल तक होते हैं। भारत में अपनी विशाल विविधता के बावजूद पॉलीकीट कृमियों पर अभी भी बहुत कम अध्ययन हुए हैं। मोंगाबे-इंडिया ने हमारे समुद्रों में पाए जाने वाले चमकीले रंगों और बालनुमा संरचनाओं वाले इन कृमियों के बारे में ज्यादा जानने के लिए पॉलीकीट विशेषज्ञों और टैक्सोनॉमिस्ट से बात की। भारत की&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/09/23/polychaete-worms-shrimp-hatcheries-india/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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					<title>हॉर्नबिल के जीनोम ने खोले अतीत के राज, हिम युग में घटी थी आबादी</title>
					<link>https://hindi.mongabay.com/2026/09/21/asian-hornbill-genome-population-conservation/</link>
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					<pubDate>21 सितम्बर 2026 05:52:00 +0000</pubDate>
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							<![CDATA[Nikhil Sreekandan]]>
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							<![CDATA[क्लाईमेट चेंज, ग्लेशियर, जलवायु परिवर्तन, नई प्रजातियां, और विलुप्त होती प्रजातियां]]>
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							<![CDATA[<p>वैज्ञानिकों ने चार संकटग्रस्त एशियाई हॉर्नबिल प्रजातियों के लिए संदर्भ जीनोम यानी आनुवंशिक संरचना का मॉडल तैयार किया है। मैसूर स्थित नेचर कंजर्वेशन फाउंडेशन और हैदराबाद के सीएसआईआर-सेंटर फॉर सेल्युलर एंड मॉलिक्यूलर बायोलॉजी (सीसीएमबी) के शोधकर्ताओं ने ग्रेट हॉर्नबिल (बड़ा धनेश), रुफस-नेक्ड हॉर्नबिल (लाल-गर्दन धनेश), मालाबार-पाइड हॉर्नबिल (मालाबार धनेश) और रीथेड हॉर्नबिल (मुकुटधारी धनेश) के अच्छी गुणवत्ता वाले जीनोम असेंबली तैयार किए हैं। शोधपत्र की लेखिका पूजा पवार कहती हैं, “मेरी [&#8230;]</p>
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							<![CDATA[वैज्ञानिकों ने चार संकटग्रस्त एशियाई हॉर्नबिल प्रजातियों के लिए संदर्भ जीनोम यानी आनुवंशिक संरचना का मॉडल तैयार किया है। मैसूर स्थित नेचर कंजर्वेशन फाउंडेशन और हैदराबाद के सीएसआईआर-सेंटर फॉर सेल्युलर एंड मॉलिक्यूलर बायोलॉजी (सीसीएमबी) के शोधकर्ताओं ने ग्रेट हॉर्नबिल (बड़ा धनेश), रुफस-नेक्ड हॉर्नबिल (लाल-गर्दन धनेश), मालाबार-पाइड हॉर्नबिल (मालाबार धनेश) और रीथेड हॉर्नबिल (मुकुटधारी धनेश) के अच्छी गुणवत्ता वाले जीनोम असेंबली तैयार किए हैं। शोधपत्र की लेखिका पूजा पवार कहती हैं, “मेरी शोध दिलचस्पी यह समझने में है कि वन्यजीव अपने बदलते पर्यावरण में किस तरह खुद को बचाए रखते हैं।” पवार ने संरक्षित क्षेत्रों और कॉफी के बागानों में ग्रेट हॉर्नबिल (ब्यूसेरॉस बिकॉर्निस\Buceros bicornis) का अध्ययन किया है। अपनी मास्टर डिग्री के शोध प्रबंध के लिए पवार ने अनामलाई पहाड़ियों के संरक्षित क्षेत्रों और तमिलनाडु के वलपराई में इंसानी दबाव से परिवर्तित इलाकों में इन बड़े, शानदार पक्षियों के व्यवहार और प्रजनन जीव-विज्ञान की तुलना की। इसके बाद नेचर कंजर्वेशन फाउंडेशन और मणिपाल एकेडमी ऑफ हायर एजुकेशन में अपनी पीएचडी के दौरान पवार ने अपने शोध का दायरा बढ़ाते हुए जलवायु, भौगोलिक और मानवजनित कारकों से अलग-अलग क्षेत्रों और भू-वैज्ञानिक युगों में हॉर्नबिल की आबादी पर हुए असर का पता लगाने की कोशिश की। इन सवालों के जवाब खोजने में मदद के लिए, व्यवहार जीव-विज्ञानी ने जीनोमिक्स का रुख किया जो किसी जीव की संपूर्ण आनुवंशिक संरचना का अध्ययन है। पवार कहती हैं, “जीनोमिक्स ने मुझे इन सवालों को बहुत बड़े कालखंडों और भौगोलिक क्षेत्रों के पैमाने पर समझने का अवसर दिया। मैं समय में पीछे जाकर यह पता लगा सकती थी कि प्रजाति की उत्पत्ति कब हुई या वह अपनी नजदीकी प्रजाति से कब अलग हुई। इस तरह, उन्हें अपने शोध को सिर्फ पश्चिमी घाट या पूर्वोत्तर भारत तक सीमित रखने की जरूरत नहीं थी।” हालांकि, ऐसा करने से पहले पवार को सबसे पहले एशियाई हॉर्नबिल प्रजातियों के लिए आधारभूत जीनोमिक डेटा तैयार करना था। लेकिन, संरक्षण के लिहाज से अहम प्रजाति होने के बावजूद इसकी काफी कमी थी। 32 एशियाई हॉर्नबिल प्रजातियों में से सिर्फ दो, ग्रेट हॉर्नबिल और राइनोसिरस हॉर्नबिल, के लिए ही&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/09/21/asian-hornbill-genome-population-conservation/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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					<title>नेपाल आपदा: तबाही की पूरी तस्वीर अब भी बाकी, विनाशकारी बाढ़ से कैसे बचे बिहार और यूपी</title>
					<link>https://hindi.mongabay.com/2026/08/31/epal-landslide-glacier-flood-threat-to-india/</link>
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					<pubDate>31 अगस्त 2026 12:55:53 +0000</pubDate>
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							<![CDATA[Pushyamitra]]>
						</dc:creator>
										<author>
						<![CDATA[Shailesh Shrivastava]]>
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							<![CDATA[क्लाइमेट चेंज मिटिगेशन, ग्लेशियर, ग्लोबल वार्मिंग, और बाढ़]]>
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							<![CDATA[<p>नेपाल के राजबिराज के रहनेवाले श्याम सुंदर यादव अपने भाई अजय कुमार यादव की तलाश में नुआकोट के बत्तार में पिछले चार दिन से रुके हैं। अजय वहां से 15 किमी दूर बेत्रावती बाजार के नीलकंठ माध्यमिक विद्यालय, उत्तरी गया में कंप्यूटर पढ़ाते थे। नेपाल में 26 अगस्त को आई  भीषण बाढ़ के बाद से [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/08/31/epal-landslide-glacier-flood-threat-to-india/" data-wpel-link="internal">नेपाल आपदा: तबाही की पूरी तस्वीर अब भी बाकी, विनाशकारी बाढ़ से कैसे बचे बिहार और यूपी</a> appeared first on <a href="https://hindi.mongabay.com" data-wpel-link="internal">Mongabay हिन्दी</a>.</p>
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							<![CDATA[नेपाल के राजबिराज के रहनेवाले श्याम सुंदर यादव अपने भाई अजय कुमार यादव की तलाश में नुआकोट के बत्तार में पिछले चार दिन से रुके हैं। अजय वहां से 15 किमी दूर बेत्रावती बाजार के नीलकंठ माध्यमिक विद्यालय, उत्तरी गया में कंप्यूटर पढ़ाते थे। नेपाल में 26 अगस्त को आई  भीषण बाढ़ के बाद से उनसे संपर्क नहीं हो पा रहा है। मगर श्याम चाहकर भी बत्तार से आगे नहीं बढ़ पा रहे, क्योंकि आगे कीचड़ और मलबे की नदी है। रास्ता दलदली है। इसी बत्तार में नेपाली सेना का बेस कैंप भी है, जहां से हेलिकॉप्टर के जरिये वे बचाव अभियान चला रहे हैं। कीचड़ और मलबे की इस नदी का फैलाव उत्तर दिशा में लगभग 54 किमी दूर चीन की सीमा पर स्थित रसुआगड़ी के इमिग्रेशन सेंटर तक है। सेना हेलिकॉप्टर के जरिये पूरे इलाके का सर्वे करती है, अगर कहीं कोई जिंदा दिखता है तो उसे बचाने की कोशिश करती है। श्याम सुंदर जो पेशे से पत्रकार हैं, कहते हैं, “अभी नेपाल सरकार की प्राथमिकताओं में शव निकालना नहीं है। अभी वे सिर्फ जिंदा लोगों को बचाने की कोशिश कर रहे हैं। यह सही भी है। वैसे भी कीचड़ के नीचे दबे हजारों शवों को निकालना आसान काम नहीं है। सिर्फ मेरे भाई के स्कूल के 200 से अधिक बच्चे और चार शिक्षकों के इस मलबे में दबे होने की आशंका है। यहां से बार्डर तक कई बस्तियां हैं। उनमें जो खुशकिस्मत थे वही बच पाये हैं।” बत्तार में श्याम सुंदर जैसे कई लोग तीन-चार दिन से&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/08/31/epal-landslide-glacier-flood-threat-to-india/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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					<title>बेमौसम बर्फबारी से जम्मू-कश्मीर के प्रवासी पशुपालकों की राह मुश्किल</title>
					<link>https://hindi.mongabay.com/2026/06/29/unseasonal-snowfall-pastoralists-jammu-kashmir/</link>
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					<pubDate>29 जून 2026 06:36:32 +0000</pubDate>
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							<![CDATA[Farzana Nisar]]>
						</dc:creator>
										<author>
						<![CDATA[Manish Chandra Mishra]]>
					</author>
							<category><![CDATA[Uncategorized]]></category>
		<category><![CDATA[climate change]]></category>
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							<![CDATA[जम्मू और कश्मीर और .जम्मू कश्मीर]]>
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							<![CDATA[आदिवासी, क्लाइमेट चेंज मिटिगेशन, क्लाईमेट चेंज, क्लाईमेट चेंज एडैप्टेशन, ग्लेशियर, ग्लोबल वार्मिंग, और जलवायु परिवर्तन]]>
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							<![CDATA[<p>मई में जम्मू-कश्मीर के राजौरी जिले का एक गुज्जर परिवार अपने मवेशियों के झुंड के साथ कई दिनों से यात्रा कर रहा था और कश्मीर के ऊंचे इलाकों में मौजूद चारागाहों की ओर बढ़ रहा था। जब परिवार अपने गंतव्य शोपियां से लगभग 50 किलोमीटर दूर &#8216;पीर की गली&#8217; पहुंचा, तो ताजा बर्फबारी के कारण [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/06/29/unseasonal-snowfall-pastoralists-jammu-kashmir/" data-wpel-link="internal">बेमौसम बर्फबारी से जम्मू-कश्मीर के प्रवासी पशुपालकों की राह मुश्किल</a> appeared first on <a href="https://hindi.mongabay.com" data-wpel-link="internal">Mongabay हिन्दी</a>.</p>
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						</description>
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							<![CDATA[मई में जम्मू-कश्मीर के राजौरी जिले का एक गुज्जर परिवार अपने मवेशियों के झुंड के साथ कई दिनों से यात्रा कर रहा था और कश्मीर के ऊंचे इलाकों में मौजूद चारागाहों की ओर बढ़ रहा था। जब परिवार अपने गंतव्य शोपियां से लगभग 50 किलोमीटर दूर &#8216;पीर की गली&#8217; पहुंचा, तो ताजा बर्फबारी के कारण उन्हें अपना सफर रोकना पड़ा। अधिकारियों ने मुगल रोड पर ट्रैफिक रोक दिया था। यह सड़क शोपियां को राजौरी और पुंछ जैसे कम ऊंचाई वाले जिलों से जोड़ती है। इस वजह से परिवार को सड़क के किनारे रुकना पड़ा। इस ठंडे मौसम में उनके सिर पर छत भी नहीं थी। उन्हें यह भी नहीं पता था कि वे अपना सफर वापस कब शुरू कर पाएंगे। इससे पहले उन्हें मई के आखिर में इस रास्ते पर बर्फबारी का सामना कभी नहीं करना पड़ा था। जिन समुदायों का जीवन प्रवास पर निर्भर है, उनके लिए अब चुनौती सिर्फ मुश्किल मौसम नहीं, बल्कि मौसम को लेकर बढ़ती अनिश्चितता भी है। वसंत के मौसम में अर्ध-घुमंतू जनजातियां गुज्जर और बकरवाल अपने मवेशियों के साथ कश्मीर और चिनाब घाटी के ऊपरी इलाकों की ओर यह मौसमी प्रवास करती हैं। एक महीने से भी अधिक समय तक चलने वाली यह यात्रा उन रास्तों से आगे बढ़ती है जो पीढ़ियों से बर्फबारी के पैटर्न, चरागाहों के चक्र और पारंपरिक पारिस्थितिकी ज्ञान के आधार पर तय होते आए हैं। लेकिन, अब यह क्रम टूटने लगा है। पीर पंजाल दर्रे के पास मुगल रोड पर दुर्गम हिमालयी भूभाग में अपनी भेड़ों के झुंड को&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/06/29/unseasonal-snowfall-pastoralists-jammu-kashmir/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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