- ब्रिसल कृमि (कड़े बालों या कांटों जैसा शरीर) के नाम से पहचाने जाने वाले यानी पॉलीकीट कृमि लगभग सभी समुद्री आवासों में पाए जाते हैं। इनमें से कुछ कम लवणता वाले और अंतर्देशीय जल के अनुकूल भी हो गए हैं।
- वे जैविक पदार्थों का अपघटन, ऑक्सीजन का परिवहन और उसके पुनर्वितरण सहित पारिस्थितिकी तंत्र में कई तरह से अपनी भूमिकाएं निभाते हैं।
- पिछले कुछ सालों में तेजी से बढ़ते झींगा पालन उद्योग के कारण पॉलीकीट कीटों का बड़े पैमाने पर संग्रहण होने लगा है।
- सिर्फ भारत के पूर्वी तट पर स्थित हैचरियों को ब्रूडस्टॉक (प्रजनक स्टॉक) के लिए जीवित आहार के रूप में हर रोज लगभग चार सौ किलो पॉलीकीट कीटों की जरूरत होती है।
पॉलीकीट कृमि पृथ्वी पर पाए जाने वाले समुद्री अकशेरुकी (बिना मेरुदंड वाले) जीवों के सबसे विविध समूहों में से एक हैं। वर्ल्ड रजिस्टर ऑफ मरीन स्पीशीज के अनुसार वर्तमान में पॉलीकीट की लगभग 13,148 मान्य प्रजातियां पहचानी गई हैं। कुछ शोधकर्ताओं का अनुमान है कि इस सदी के आखिर तक यह तादाद बढ़कर 16,700 तक पहुंच सकती है।
विशाखापत्तनम में राष्ट्रीय तटीय अनुसंधान केंद्र (NCCR) की वैज्ञानिक E और समुद्र-तल पारिस्थितिकी की विशेषज्ञ सनिथा शिवदास ने कहा “ये (पॉलीकीट कृमि) लगभग सभी समुद्री आवासों में पाए जाते हैं जिनमें मुहने, मैंग्रोव, रेतीले तट, प्रवाल भित्तियां और समुद्री घास के मैदान से लेकर महाद्वीपीय शेल्फ और गहरे जल तक शामिल हैं।” शिवदास आगे बताती हैं, “पॉलीकीट की कुछ प्रजातियां कम लवणता वाले और अंतर्देशीय जल के वातावरण के अनुकूल भी हो गई हैं।”
ग्रीक में पॉलीकीटा का मतलब “बहुत अधिक बाल वाला” होता है। यह उनके शरीर पर मांसल, पैर जैसी उभरी हुई संरचनाओं पर मौजूद बालनुमा चीजों के बारे में बताता है, जिससे उन्हें उनका दूसरा नाम ब्रिसल वर्म भी मिला है। इन कृमियों की लंबाई कुछ मिलीमीटर से लेकर एक मीटर से ज्यादा तक होती है और इनके रंग फीके भूरे से लेकर चमकीले पीले और नारंगी-लाल तक होते हैं।
भारत में अपनी विशाल विविधता के बावजूद पॉलीकीट कृमियों पर अभी भी बहुत कम अध्ययन हुए हैं। मोंगाबे-इंडिया ने हमारे समुद्रों में पाए जाने वाले चमकीले रंगों और बालनुमा संरचनाओं वाले इन कृमियों के बारे में ज्यादा जानने के लिए पॉलीकीट विशेषज्ञों और टैक्सोनॉमिस्ट से बात की।
भारत की कम आंकी गई विविधता
शिवदास ने कहा कि भारत में लंबे समुद्र तट और विविध तटीय एवं समुद्री आवासों के कारण पॉलीकीट कृमियों की व्यापक विविधता पाई जाती है। उन्होंने आगे कहा, “[लेकिन] फिलहाल भारतीय जलक्षेत्र में दर्ज पॉलीकीट विविधता असल विविधता का महज एक हिस्सा है।”
पियरे फॉवेल ने भारत के पॉलीकीट जीवों के दस्तावेजीकरण की नींव रखी। प्रसिद्ध फ्रांसीसी पॉलीकीट विशेषज्ञ के 1953 के काम में भारतीय उपमहाद्वीप से 304 प्रजातियों का उल्लेख किया गया था। इसके बाद से पॉलीकीट के बारे में जानकारी सिर्फ बिखरे हुए अध्ययनों के माध्यम से ही जुटाई गई है। शिवदास के अनुसार, 2001 से 2019 के बीच शोधकर्ताओं ने पॉलीकीट की सिर्फ आठ नई प्रजातियों को दर्ज किया है।

शिवदास और उनके साथी लेखक रसेल कार्वाल्हो ने अपनी 2020 की चेकलिस्ट में बिखरी हुई सभी जानकारियों को इकट्ठा किया और पॉलीकीट के दर्ज रिकॉर्ड के वर्गीकरण संबंधी स्थिति का गहराई से मूल्यांकन किया। उन्होंने कहा, “हमने समुद्री एनेलिड (annelid) प्रजातियों की 727 सूची तैयार की। लेकिन उपलब्ध जानकारी और वर्गीकरण में हुए बदलावों के आधार पर दर्ज किए गए रिकॉर्ड में से लगभग 25% (183) को संदिग्ध माना गया।”
शिवदास ने कहा कि टैक्सोनॉमी में पुनर्मूल्यांकन लगातार चलने वाली प्रक्रिया है, क्योंकि नए रूपात्मक, आणविक और अन्य सबूत उपलब्ध होते रहते हैं। 2025 में NCCR के एक अध्ययन में उत्तरी हिंद महासागर में तमिलनाडु के तट से दूर रेतीले तलछट में पॉलीकीट की एक नई प्रजाति के बारे में बताया गया। शिवदास इस शोधपत्र की लेखकों में से एक थीं। उन्होंने कहा, “जिन क्षेत्रों का पहले भी अध्ययन किया जा चुका है, वहां भी ऐसी प्रजातियां मिल सकती हैं, जिन्हें पहले नजरअंदाज कर दिया गया हो या गलत तरीके से पहचाना गया हो।”
पारिस्थितिकी में भूमिका
शिवदास के अनुसार, पॉलीकीट कृमि समुद्री एनेलिड का एक विविध समूह हैं, जो कई तरह की पारिस्थितिकी भूमिकाएं निभाते हैं। पॉलीकीट कृमि डिपॉजिट फीडर हो सकते हैं, जो मृत पौधों और जंतुओं के पदार्थ को खाने के लिए तलछट का सेवन करते हैं; फिल्टर फीडर पानी से प्लवक जैसे सूक्ष्म जीवों को छानकर खाते हैं; ग्रेजर शैवाल और अन्य वनस्पति पदार्थों को खाते हैं या शिकारी जीवित शिकार का पीछा कर उसे खाते हैं।
गुजरात के भावनगर स्थित CSIR-केंद्रीय नमक एवं समुद्री रसायन अनुसंधान संस्थान में पीएचडी शोधार्थी मौमिता भौमिक ने कहा, “डिट्राइटस से पोषक तत्व प्राप्त करने वाले डिट्रिटिवोर (मृत चीजों को खाने वाले) के रूप में पॉलीकीट कृमि जैविक पदार्थों के अपघटन, ऑक्सीजन के परिवहन और उसके पुनर्वितरण में अहम भूमिका निभाते हैं।” उन्होंने आगे कहा कि पॉलीकीट कृमि अन्य समुद्र-तल वाले और पेलाजिक जीवों के लिए भोजन का मुख्य स्रोत भी हैं और इसलिए समुद्री जीव-जंतुओं की आबादी को नियंत्रित करने में परोक्ष भूमिका निभाते हैं।
शिवदास ने कहा कि पारिस्थितिकी से हिसाब से उनकी बेजोड़ अनुकूलन क्षमता और पर्यावरणीय दबावों के प्रति संवेदनशीलता पॉलीकीट को पारिस्थितिक स्वास्थ्य के अच्छे जैव-संकेतक भी बनाती है। उन्होंने कहा, “उनकी संख्या और समुदाय की संरचना में बदलाव तलछट की गुणवत्ता और अन्य पर्यावरणीय दबावों में होने वाले बदलावों को दिखा सकती हैं।”
भौमिक अपनी पीएचडी के लिए खंभात की खाड़ी के कीचड़युक्त तटीय क्षेत्रों में पॉलीकीट की पारिस्थितिकी का अध्ययन कर रही हैं, जो बहुत ज्यादा प्रदूषित और पारिस्थितिकी रूप से प्रभावित आवास है। उन्होंने कहा, “मैं नेरिडिड्स (पॉलीकीट कृमियों का खास समूह) पर ध्यान केंद्रित कर रही हूं और दबाव वाले आवासों में उनके अनुकूलन की क्षमता का अध्ययन कर रही हूं।”
भौमिक के अनुसार, पॉलीकीट कृमि प्रदूषण के कारण होने वाले दबाव के प्रति पारिस्थितिकी अनुकूलन का अध्ययन करने के लिए आदर्श मॉडल प्रणाली हैं। उन्होंने आगे कहा कि ये नुकसानदायक रसायनों का अपघटन कर सकते हैं और उनसे कार्बन स्रोतों का इस्तेमाल कर सकते हैं, जिससे भविष्य में ये प्रदूषण कम करने की रणनीतियों में अहम हो सकते हैं।

आवास में बदलाव
शिवदास के 2016 के एक अध्ययन में पाया गया कि भारत के पूर्वी और पश्चिमी तटों पर पॉलीकीट, गैस्ट्रोपोड और बाइवॉल्व की वितरण-प्रक्रिया सिर्फ भौगोलिक स्थिति के बजाय पर्यावरणीय परिस्थितियों, आवासों और समुद्र विज्ञान संबंधी प्रक्रियाओं के मिले-जुले प्रभाव से तय होती है।
शिवदास ने कहा, “चूंकि ज्यादातर पॉलीकीट छोटे होते हैं और उनके बारे में बहुत कम जानकारी उपलब्ध है, इसलिए उनका संरक्षण उनके आवासों को बचाने और समुद्र-तल पारिस्थितिकी तंत्र को स्वस्थ को बनाए रखने से पूरी तरह जुड़ा हुआ है।” उन्होंने आगे कहा कि जलवायु संबंधी बदलाव अतिरिक्त दबाव डाल रहे हैं।
हालांकि, भौमिक का शोध उनकी अनुकूलन क्षमता को सामने लाता है, जो पॉलीकीट कृमियों को प्रदूषित, प्रतिकूल और हाइपोक्सिक (कम ऑक्सीजन वाले) तलछट में भी जीवित रहने में मदद करता है। उन्होंने बताया कि जिन क्षेत्रों में आवास में बहुत ज्यादा दबाव होता है, वहां पॉलीकीट कृमियों के कोई निशान नहीं मिलते।
भौमिक ने कहा, “तलछट के कणों का आकार, ज्वार-भाटा वाले क्षेत्रों में ज्वारीय संपर्क और भौतिक रुकावट जैसे कई कारकों का मिला-जुला असर उनके आवास की उपयुक्तता तय करने में अहम भूमिका निभाता है।” उन्होंने आगे कहा कि ड्रेजिंग (तलछट से गाद निकालना) और तटरेखा में बदलाव लाने वाली अन्य मानवीय गतिविधियां पॉलीकीट के पारिस्थितिकी खासियत और उनके कुल वितरण को प्रभावित कर सकती हैं।
पॉलीकीट संग्रहण की कीमत
हालिया सालों में, पूरे भारत में झींगा हैचरियों के तेजी से विस्तार ने पॉलीकीट कृमियों के संग्रहण को बड़ी चिंता बना दिया है।
तमिलनाडु के परंगिपेट्टई स्थित अन्नामलाई विश्वविद्यालय के सेंटर ऑफ एडवांस्ड स्टडी इन मरीन बायोलॉजी के एसोसिएट प्रोफेसर पेरुमल मुरुगेसन के अनुसार, अकेले पूर्वी तट पर दो सौ से ज्यादा झींगा हैचरियां अब तटीय कृषि प्राधिकरण में पंजीकृत हैं।
मुरुगेसन ने कहा, “हैचरी में आम तौर पर बेकार की मछलियां, केकड़े का मांस और यहां तक कि गाय के यकृत जैसे जीवित आहार आमतौर पर इस्तेमाल किए जाते हैं। हालांकि, हैचरी संचालक पॉलीकीट कृमियों को उनके ज्यादा पॉलीअनसैचुरेटेड फैटी एसिड (PUFA) की मात्रा के कारण प्राथमिकता देते हैं।” उन्होंने आगे कहा कि वैज्ञानिक रूप से यह साबित हो चुका है कि PUFA मादा झींगा में अंडे देने की दर और उत्पादन बढ़ाते हैं।

मुरुगेसन के अनुसार, एक झींगा हैचरी को हर रोज़ औसतन दो किलो पॉलीकीट कृमियों की जरूरत होती है। इसके चलते अकेले भारत के पूर्वी तट पर स्थित हैचरियों की प्रतिदिन की मांग 400 किलोग्राम है।
मुरुगेसन ने कहा कि पिछले कुछ सालों के दौरन इस बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए बड़ा नेटवर्क विकसित हो गया है। उन्होंने कहा, “दुर्भाग्य से, इन पॉलीकीट कृमियों को इकट्ठा करने वाले तमिलनाडु के तट पर रहने वाले इरुलर आदिवासी मछुआरा समुदाय को महज 500-800 रुपये प्रति किलो मिलते हैं। [लेकिन] हैचरी तक पहुंचते-पहुंचते इन्हें गुणवत्ता के आधार पर लगभग 3,500-4,000 रुपये प्रति किलो में बेचा जाता है।”
मुरुगेसन चिंता जताते हैं कि अगर हम इसी तरह खुले में पाए जाने वाले पॉलीकीट कीड़ों को इकट्ठा करते रहे, तो जल्द ही इनका “कुदरती स्टॉक” खत्म हो सकता है। लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि इरुला जनजाति जैसे समुदायों के लिए यह उनकी आजीविका का सवाल है। यह समुदाय समुद्र के किनारे की कीचड़ वाली जगहों और मैंग्रोव के बैकवॉटर से इन कृमि को खोदकर और हाथ से चुनकर निकालते हैं। उन्होंने कहा, “हमें यह पक्का करना होगा कि प्राकृतिक पर्यावरण सुरक्षित रहे और उनकी आजीविका भी सुरक्षित रहे। यह दोनों के लिए फायदेमंद स्थिति होनी चाहिए।”
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पश्चिमी तट पर 2022 के एक अध्ययन में मुंबई के ज्वार-भाटा वाले क्षेत्रों से पॉलीकीट कृमियों के संग्रहण का आकलन किया गया। इसमें लेखकों ने तर्क दिया कि पॉलीकीट के संग्रहण की बेहतर निगरानी और नियमन के साथ-साथ, भारत को अपने बढ़ते झींगा उद्योग की मांग को पूरा करने के लिए पॉलीकीट की कृत्रिम खेती विकसित करने की जरूरत है।
मुरुगेसन और उनकी टीम ने देशी पेरिनेरिस नुंटिया (समुद्री केंचुआ) की नियंत्रित जलीय कृषि के लिए एक तकनीक विकसित और पेटेंट की है। वे वर्तमान में झींगा के लिए पर्यावरण हितैषी जीवित आहार के रूप में इसकी संभावनाओं को आजमाने के लिए हैचरियों के साथ काम कर रहे हैं।
भावी शोध
शिवदास ने कहा कि अगर भारत में समुद्री अकशेरुकी जैव-विविधता पर शोध को आगे बढ़ाना है, तो टैक्सोनॉमिस्ट के लिए ज्यादा अवसर पैदा करने और उन्हें अधिक मान्यता देनी होगी। उन्होंने कहा, “टैक्सोनॉमी जैव-विविधता अनुसंधान की नींव है, लेकिन अपेक्षाकृत कम युवा शोधकर्ता इसे करियर के रूप में चुन रहे हैं। हमें ऐसा माहौल बनाने की जरूरत है, जो उन्हें इस क्षेत्र को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करे और मदद दे।”
शिवदास को कम अध्ययन किए गए क्षेत्रों और आवासों की बेहतर खोज की भी उम्मीद है। भौमिक को हाल ही में ओशन सेंसस स्पीशीज डिस्कवरी कमेटी से फंडिंग मिली है। वह खंभात और कच्छ की खाड़ी में पॉलीकीट प्रजातियों का क्षेत्रीय डेटाबेस तैयार करके इसी दिशा में काम करना चाहती हैं। भौमिक ने पॉलीकीट टैक्सोनॉमिस्ट के लिए संग्रहालयों में मौजूद संग्रह तक बेहतर पहुंच की भी मांग की। उन्होंने बताया कि कोलकाता स्थित इंडियन म्यूजियम में वर्तमान में पॉलीकीट का सबसे व्यापक संग्रह मौजूद है।
शिवदास जोर देकर कहती हैं कि उद्देश्य सिर्फ ज्यादा प्रजातियों के नाम जोड़ना नहीं होना चाहिए, बल्कि उनके वितरण और बदलते पर्यावरण के प्रति उनकी प्रतिक्रिया को समझना भी होना चाहिए। उन्होंने कहा, “तभी हम समझ सकते हैं कि भविष्य में हमारी समुद्री जैव-विविधता के साथ क्या हो सकता है।”
यह खबर मोंगाबे-इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 1 सितंबर, 2026 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: एम्फिनोमिडी (Amphinomidae) प्रजाति की ब्रिसल कृमि। तस्वीर: मौमिता भौमिक।