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		<description>प्रकृति से प्रेरित समाचार</description>
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	<title>हरियाणा गुरुग्राम पानीपत अम्बाला यमुनानगर रोहतक हिसार करनाल सोनीपत</title>
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					<title>अरावली की परिभाषा पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई आज, अधर में लटका है पहाड़ियों का भविष्य</title>
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					<pubDate>29 दिसम्बर 2025 06:17:05 +0000</pubDate>
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							<![CDATA[खनन, जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, प्राकृतिक संसाधन, भूजल, लोग, वन्य जीव एवं जैव विविधता, और वायु प्रदूषण]]>
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												<description>
								<![CDATA[- सर्वोच्च न्यायालय ने अरावली पर्वतमाला के लिए एक एकीकृत परिभाषा अपनाई है, जिसके बारे में भूवैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं का कहना है कि यह पर्वतमाला की भूवैज्ञानिक विशेषताओं और पारिस्थितिक महत्व की अनदेखी करती है।<br />- उच्चतम न्यायालय ने इस मामले का स्वतः संज्ञान लेते हुए सोमवार को इसकी सुनवाई निर्धारित की है।<br />- आलोचकों का कहना है कि नई परिभाषा से अरावली की निचली पर्वतमालाओं को पुराने निर्णयों में दिए गए कानूनी संरक्षण से वंचित होने का खतरा है।<br />- न्यायालय ने खनन और संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए टिकाऊ खनन प्रबंधन योजना तैयार करने का भी आदेश दिया।<br />]]>
							</description>
																						<content:encoded>
							<![CDATA[भारत की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखला की नई परिभाषा ने इसके अस्तित्व पर एक बहुत बड़ा प्रश्न चिन्ह लगा दिया है। इस साल 20 नवंबर को, सर्वोच्च न्यायालय ने अरावली की पहाड़ियों की एक नई परिभाषा को मंजूरी दी। दिल्ली से गुजरात तक फैली दो अरब साल पुरानी पर्वत श्रृंखला को मिली इस परिभाषा ने भूवैज्ञानिकों को हैरान कर दिया है। इस घटना से देश के कई हिस्सों में विरोध प्रदर्शन शुरू हुए और साथ ही सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी और विपक्षी पार्टी कांग्रेस के एक बीच राजनीतिक जंग छिड़ गई। हालाँकि, उच्चतम न्यायालय ने इस मामले का स्वतः संज्ञान लेते हुए सोमवार को इसकी सुनवाई निर्धारित की है। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता में जस्टिस जेके माहेश्वरी और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की तीन जजों वाली बेंच इस मामले की सुनवाई करेगी। सरकार के नेतृत्व वाली एक समिति ने सुझाव दिया था कि अरावली पहाड़ियों को &#8220;स्थानीय भू-स्तर&#8221; से कम से कम 100 मीटर की ऊंचाई वाले भू-आकृतियों के रूप में परिभाषित किया जाए, और एक पर्वत श्रृंखला में ऐसी दो या दो से अधिक पहाड़ियाँ शामिल हों जो एक दूसरे से 500 मीटर की दूरी के भीतर आती हों। सुप्रीम कोर्ट ने इस समिति से सहमति जताई। समिति के सुझाव में आगे कहा गया है, &#8220;वर्णित इन पहाड़ियों की सबसे निचली समोच्च रेखाओं के बीच आने वाली भू-आकृतियों का संपूर्ण क्षेत्र, साथ ही पहाड़ियों, टीलों, ढलानों आदि जैसी संबंधित विशेषताओं को भी अरावली पर्वत श्रृंखला के भाग के रूप में शामिल किया जाएगा।&#8221; हालाँकि, कई विशेषज्ञों का&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2025/12/29/aravalli-hills-new-definition-supreme-court-mining-conservation/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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						<item>
					<title>हाइवे के लिए खोदी खेती लायक जमीन, उपज प्रभावित</title>
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					<pubDate>27 दिसम्बर 2023 05:44:58 +0000</pubDate>
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							<![CDATA[Sat Singh]]>
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						<![CDATA[Shailesh Shrivastava]]>
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		<category><![CDATA[Highway]]></category>
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		<category><![CDATA[Top Soil]]></category>
		<category><![CDATA[ऊपरी मिट्टी]]></category>
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		<category><![CDATA[हाइवे]]></category>
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							<![CDATA[हरियाणा]]>
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							<![CDATA[कृषि और .गाँव]]>
						</topic-tags>
					
					
												<description>
								<![CDATA[- हरियाणा के कई किसानों ने अपने पैतृक खेतों की मिट्टी को सड़क का निर्माण कर रहे ठेकेदारों को बेच दिया है।<br />- खेतों की ऊपरी सतह की खुदाई करने से जमीन की उर्वरता प्रभावित होती है और किसानों की आजीविका प्रभावित होती है।<br />- केंद्र सरकार ने राज्यों को चिट्ठियां लिखी हैं कि हाइवे के निर्माण में फ्लाई ऐश का इस्तेमाल किया जाए। इसके अलावा, तालाबों और अन्य जगहों से मिट्टी लेकर उनका इस्तेमाल किया जाए।<br />]]>
							</description>
																						<content:encoded>
							<![CDATA[किसी भी खेत की ऊपरी मिट्टी बताती है कि उसमें होने वाली फसल कितनी प्रचुर मात्रा में होगी। हरियाणा के किसानों ने अपने इस अहम संसाधन को सरकारों को बेच दिया है ताकि हाइवे प्रोजेक्ट का निर्माण किया जा सके। इसमें 227 किलोमीटर लंबा ट्रांस-हरियाणा एक्सप्रेसवे भी शामिल है जो अंबाला और नारनौल को जोड़ता है और इसे अगस्त 2022 में जनता के लिए खोल दिया गया था। इस प्रोजेक्ट में काम करने वाले इंजीनियरों ने मोंगाबे-इंडिया से बातचीत में कहा कि हरियाणा में सड़क बनाते समय इसे और अन्य हाइवे को थोड़ी ऊंचाई देने के लिए जो मिट्टी इस्तेमाल की गई वह किसानों के खेत की मिट्टी ही थी। अपना नाम ना छापे जाने की शर्त पर वह बताते हैं कि केंद्र या राज्य सरकारें स्थानीय ठेकेदारों की मदद से मिट्टी की खुदाई करवाती हैं जो इसका इंतजाम कर देते हैं। वहीं, त्वरित लाभ को देखते हुए किसान अपने खेत की ऊपरी मिट्टी प्राइवेट ठेकेदारों को बेच देते हैं। अब वही किसान अपने इस फैसले के दुष्परिणाम भुगत रहे हैं। किसानों का कहना है कि वे ऐसे परिणामों के बारे में अनजान थे। पिछले पांच सालों में हरियाणा में 19 हाइवे का निर्माण या विस्तार हुआ है। हरियाणा के मुख्यमंत्री ने हाल ही में कहा था कि संभवत: हरियाणा इकलौता ऐसा राज्य है जिसके हर जिले के मुख्यालय नेशनल हाइवे से जुड़ गए हैं। कई अन्य प्रोजेक्ट भी अभी पाइपलाइन में हैं। हरियाणा में प्रगति पर है हाइवे निर्माण का काम। हरियाणा में ट्रांस-हरियाणा एक्सप्रेसवे प्रोजेक्ट में काम करने&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2023/12/27/excavating-farmlands-for-highways/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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					<title>[वीडियो] जंगली बिल्ली ने गुरुग्राम के खेतों को बनाया अपना घर</title>
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					<pubDate>03 सितम्बर 2023 06:12:02 +0000</pubDate>
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							<![CDATA[Shatabdi Chakrabarti]]>
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						<![CDATA[Manish Chandra Mishra]]>
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							<category><![CDATA[वन्य जीव एवं जैव विविधता]]></category>
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							<![CDATA[कृषि, प्राकृतिक संसाधन, और वन्य जीव एवं जैव विविधता]]>
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												<description>
								<![CDATA[- जंगली बिल्ली भारत की दस छोटी जंगली बिल्ली प्रजातियों में से एक है। 
यह बिल्ली झाड़ियों, घास के मैदानों, वेटलैंड्स और घने वनस्पति वाले स्थानों पर रहती है।<br />- घटते प्राकृतिक आवासों की वजह से जंगली बिल्ली ने खेती और कृत्रिम परिदृश्यों में रहने के लिए अनुकूलित किया है। इन स्थानों पर बिल्ली के खाने के लिए शिकार भी उपलब्ध है।<br />- हालाँकि, इंसानी गतिविधि वाले कृषि क्षेत्रों में मशीनीकृत खेती, कीटों को मारने वाली दवाईयों, वाहन से टकराव और जंगली कुत्तों की उपस्थिति से जंगल बिल्ली के अस्तित्व के लिए खतरा पैदा होता है।<br />- वन्यजीव विशेषज्ञ संरक्षित क्षेत्रों से परे बिल्ली के व्यवहार और पारिस्थितिकी को समझने के लिए और अधिक अध्ययन की आवश्यकता पर प्रकाश डालते हैं।<br />]]>
							</description>
																						<content:encoded>
							<![CDATA[जंगली बिल्ली भारत की दस छोटी जंगली बिल्ली प्रजातियों में से एक है। इसे सबसे आम बिल्ली भी माना जाता है। यह हिमालय की ऊंची चोटियों और रेगिस्तान को छोड़कर पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में व्यापक रूप से देखी जा सकती है। &#8216;जंगल कैट&#8217; नाम भ्रम हो सकता है कि ये जंगलों पर रहती होंगी। लेकिन असल में ये बिल्लियां घने जंगलों से नहीं बल्कि झाड़ियों, घास के मैदान, वेटलैंड्स और घने वनस्पति वाले स्थानों पर रहना पसंद करती हैं। इसका रेतीला भूरा, लाल या भूरा रंग इसे इन स्थानों में छिपने में मदद करता है। यू-ट्यूब पर हमारे वीडियोज देखने के लिए यहां क्लिक कर चैनल सब्सक्राइब करें। घटते प्राकृतिक आवासों की वजह से जंगली बिल्ली ने खेती और कृत्रिम परिदृश्यों में रहना सीख लिया है। इन स्थानों पर अन्य छोटी बिल्लियों की तुलना में अधिक आसानी से अनुकूलन किया है। ये बिल्लियां एक कुदरती कीट प्रबंधक है। एक बिल्ली सालाना लगभग 1,500 चूहों का शिकार करती है। हालाँकि, लगातार अशांत मानव-प्रधान कृषि परिदृश्य में, मनुष्यों के साथ संघर्ष की आशंका अधिक है। मशीनीकृत खेती, जंगली कुत्तों की उपस्थिति और सड़क पर बढ़ते हादसों से बिल्लियों की आबादी को ख़तरा है। किसान फसलों की सुरक्षा के लिए जिन कीटनाशकों का प्रयोग करते हैं इससे इनके शिकार की संख्या में भी कमी आ रही है। और पढ़ेंः दिल्ली-हरियाणा का अरावली जंगल है जैव-विविधतता का केंद्र, संरक्षण की जरूरत छोटी बिल्लियां, जैसे जंगली बिल्ली, की एक बड़ी आबादी भारत के अभयारण्यों और राष्ट्रीय उद्यानों के बाहर रहती है। इनके के निवास स्थान&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2023/09/03/video-jungle-cats-adapt-to-life-on-a-farm/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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						<item>
					<title>[वीडियो] तमाम सरकारी ‘समाधानों’ के बावजूद उत्तर भारत में क्यों लौट रहा है पराली संकट</title>
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					<pubDate>25 अक्टूबर 2022 09:37:25 +0000</pubDate>
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							<![CDATA[Vivek Gupta]]>
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						<![CDATA[Shailesh Shrivastava]]>
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							<category><![CDATA[जलवायु परिवर्तन]]></category>
		<category><![CDATA[Energy]]></category>
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							<![CDATA[उत्तर प्रदेश, पंजाब, भारत, और हरियाणा]]>
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							<![CDATA[ऊर्जा, कृषि, जलवायु परिवर्तन, और समाधान]]>
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												<description>
								<![CDATA[- पराली जलाने की समस्या अब सालाना हो चली है। अधिकारियों का दावा है कि वे इस बार संकट से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार हैं, लेकिन अब तक दर्ज किए गए पराली जलाने के मामले पिछले साल की तुलना में बहुत अधिक हैं।<br />- इस समस्या के समाधान के तौर पर जो तरकीब अपनाई जा रही है वह चिंता का विषय है। इन तरीकों से पहले भी किसानों को पराली जलाने से नहीं रोका जा सका है।<br />- कई लोग किसानों को नकद मुआवजा और फसल विविधीकरण को अधिक व्यवहार्य समाधान के रूप में पेश करते हैं लेकिन सरकारी कार्रवाई एक अलग दिशा में जा रही है।<br />]]>
							</description>
																						<content:encoded>
							<![CDATA[देश में पराली जलाने यानी धान के अवशेष को खेतों में जलाने की समस्या साल-दर-साल बढ़ती जा रही है। पराली जलाने की समस्या सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक बड़ा संकट है। इससे निपटने की तैयारी के तमाम वादे और दावे किए जा रहे हैं, लेकिन जमीनी स्थिति देखकर नीति निर्माताओं और सरकारी अधिकारियों की चिंता बढ़ रही है।  पराली जलाने की प्रथा बीते कुछ वर्षों में प्रचलन में आई हैं। भारत में गंगा के मैदानी इलाकों में सर्दियों की शुरुआत से पहले धान के खेत में बचे हुए पुआल को आग के हवाले कर दिया जाता है। यह उत्तर भारत में राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) और अन्य हिस्सों में वायु प्रदूषण के प्रमुख कारणों में से एक रहा है।  पंजाब प्रदूषण नियंत्रण विभाग के नवीनतम आंकड़ों से पता चला है कि इस साल 15 सितंबर से 6 अक्टूबर के बीच खेत में आग लगने की कुल 650 घटनाएं हुईं, जो पिछले साल इस दौरान दर्ज किए गए मामलों (320) से दोगुने से अधिक हैं। इस साल, अमृतसर के सीमावर्ती जिले में 419 मामले और तरण तारण में 109 मामले दर्ज किए गए। हरियाणा में भी पिछले साल 24 के मुकाबले अब तक खेत में आग लगने के 48 मामले सामने आए हैं। पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सदस्य सचिव कुनेश गर्ग ने मोंगाबे-इंडिया को बताया कि ये शुरुआती मामले उन क्षेत्रों से थे जहां धान की शुरुआती किस्में उगाई जाती हैं। लेकिन पंजाब में शुरुआती बर्निंग डेटा ने पिछले वर्षों की तरह ही रुझान दिखाया। वर्ष 2021 में नवंबर के&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2022/10/25/stubble-burning-is-back-smothering-north-india-with-concerns-for-the-upcoming-winter/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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					<title>अरावली की तबाही का सबब बन सकता है एनसीआर ड्राफ्ट प्लान-2041</title>
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					<pubDate>20 सितम्बर 2022 08:01:37 +0000</pubDate>
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							<![CDATA[Aayush Goel]]>
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						<![CDATA[Kundan Pandey]]>
					</author>
							<category><![CDATA[प्राकृतिक संसाधन]]></category>
		<category><![CDATA[Aravali]]></category>
		<category><![CDATA[अरावली]]></category>
		<category><![CDATA[एनसीआर]]></category>
		<category><![CDATA[एनसीआर ड्राफ्ट प्लान 2041]]></category>
		<category><![CDATA[राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र]]></category>
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							<![CDATA[खनन, जल प्रदूषण, जल संरक्षण, जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक संसाधन, और वन्य जीव एवं जैव विविधता]]>
						</topic-tags>
					
					
												<description>
								<![CDATA[- दिल्ली, एनसीआर में साल 2005 से लागू एनसीआर रीजनल प्लान-2021  की जगह एनसीआर रीजनल प्लान-2041 लागू करने का प्रस्ताव लाया गया है। इस मसौदे को  नेशनल कैपिटल रीजन प्लानिग बोर्ड (एनसीआरपीबी) द्वारा तैयार किया गया है।<br />- चार राज्यों के 25 जिलों में फैले वन क्षेत्र और जंगली जीवों के आवास, वायु गुणवत्ता, और ग्राउंड-वाटर रिचार्ज पर पड़ने वाले वाले नकारत्मक असर और खतरे के मद्देनजर इस मसौदे की आलोचना की जा रही है।<br />- इस मसौदे की योजना को राज्य सरकारों से मिले सुझावों के बाद संशोधित किया गया है। इसके तहत प्राकृतिक संरक्षण क्षेत्र को प्राकृतिक क्षेत्र कहे जाने का प्रस्ताव रखा गया है। नामकरण में अन्य बदलावों के कारण एनसीआर के कुछ संवेदनशील इलाकों में खतरे की आशंका हैं।<br />- यह योजना राज्य सरकारों को प्राकृतिक संसाधनों के बारे में निर्णय लेने का अधिकार देती है।<br />]]>
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							<![CDATA[साल 2005 से लागू एनसीआर क्षेत्रीय योजना- 2021 को आगे बढ़ाने के लिए एनसीआर मसौदे की क्षेत्रीय योजना- 2041 को प्रस्ताव लाया गया है। इस ड्राफ्ट प्लान को एनसीआर में शामिल राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के अलावा हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान राज्यों के कुछ जिलों के विकास के लिए एक दीर्घकालिक योजना के रूप में तैयार किया गया है। इन क्षेत्रों को नागरिक केंद्रित बुनियादी ढांचे के साथ वैश्विक सतत विकास लक्ष्यों के अनुरूप विकसित करने का लक्ष्य रखा गया है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र योजना बोर्ड (एनसीआरपीबी) द्वारा तैयार किए गए इस ड्राफ्ट को 2021 के अंत में जारी किया गया था। इस साल की शुरुआत तक इस मसौदे पर आम लोगों की राय और सुझाव मांगे गए थे। चार राज्यों के 25 जिलों में फैले वन क्षेत्र और जंगली जीवों के आवास, वायु गुणवत्ता, और ग्राउंड-वाटर रिचार्ज पर पड़ने वाले प्रतिकूल असर और खतरे को देखते हुए पर्यावरण से जुड़े लोग इसकी आलोचना कर रहे हैं।  हालांकि यह योजना पारिस्थितिकी को संतुलित करते हुए इस क्षेत्र के विकास करने का वादा करती है, लेकिन इसे दशकों से अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही अरावली पर्वत श्रृंखला के संरक्षण के लिए खतरा माना जा रहा है। प्रतिबंध के बावजूद अवैध खनन की वजह से अरावली की बर्बादी जारी है। तस्वीर- अरावली बचाओ नागरिक आंदोलन योजना के 2041 संस्करण में, &#8216;प्राकृतिक क्षेत्र&#8217; शब्द अब भौगोलिक विशेषताओं जैसे पहाड़ों, पहाड़ियों, नदियों, जल निकायों और जंगलों के लिए प्रयोग किया जाएगा। ‘प्राकृतिक क्षेत्र’ को केंद्रीय या राज्य कानूनों के तहत संरक्षित किया&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2022/09/20/with-ncr-draft-plan-2041-the-sensitive-aravalis-remain-vulnerable/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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					<title>वूली नेक्ड स्टॉर्क और  हैरान करती हरियाणा में इनकी बढ़ती तादाद</title>
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					<pubDate>26 अगस्त 2022 06:35:08 +0000</pubDate>
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							<![CDATA[Sneha Mahale]]>
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					</author>
							<category><![CDATA[वन्य जीव एवं जैव विविधता]]></category>
		<category><![CDATA[Conservation]]></category>
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		<category><![CDATA[Wolly-necked stork]]></category>
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		<category><![CDATA[पक्षी]]></category>
		<category><![CDATA[वूली नेक्ड स्टॉर्क]]></category>
		<category><![CDATA[सितकंठ]]></category>
		<category><![CDATA[हाजी लक]]></category>
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							<![CDATA[पक्षी और .वन्य जीव एवं जैव विविधता]]>
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								<![CDATA[- जब दुनिया में चारों तरफ पक्षी और अन्य वन्य जीवों के संरक्षण पर जोर देने की बात हो रही है तो हरियाणा से एक ऐसी खबर आ रही है जो पक्षी-प्रेमियों को काफी पसंद आएगी।<br />- पेड़ों पर घोंसले बनाने वाले वूली नेक्ड स्टॉर्क जिसे सितकंठ या हाजी लक लक भी कहा जाता है कि संख्या हरियाणा में बढ़ती दिख रही है।<br />- इस पक्षी का खेत के साथ नाजुक रिश्ता होता है, और उनके जिंदा रहने में खेतों के बीच खड़े पेड़ों की अहम भूमिका होती है। इस पक्षी के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण, शिकार और खेती के बदलते तरीकों से इस जीव के अस्तित्व पर खतरा मंडराने लगा था।<br />]]>
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																						<content:encoded>
							<![CDATA[भले ही पूरी दुनिया में पक्षियों की आबादी लगातार गिर रही है, लेकिन एक ऐसा भी पक्षी है जिसकी संख्या बढ़ रही है। इसे अंग्रेजी में वूली नेक्ड स्टॉर्क कहते हैं। हिन्दी में इसे सितकंठ या हाजी लक लक के नाम से बुलाया जाता है। इस पक्षी की संख्या हरियाणा में लगातार बढ़ रही है। हाल ही में हुए एक अध्ययन  में इसका खुलासा हुआ है। इस पक्षी को दिल्ली से सटे राज्य हरियाणा के कुछ इलाकों में घनी आबादी वाले गांवों और कस्बों में आसानी से देखा जा सकता है। हरियाणा मुख्य रूप से खेती-किसानी वाला प्रदेश है। इस नई जानकारी से सितकंठ के अस्तित्व को लेकर चिंतित लोगों को थोड़ी राहत होगी। यह पक्षी आईयूसीएन (IUCN) रेड लिस्ट के &#8216;असुरक्षित&#8217; वाली श्रेणी में दर्ज है। अब इस नई जानकारी के आने से संभावना बनती है कि इसे पुरानी श्रेणी से बाहर निकालकर &#8216;खतरे&#8217; वाली श्रेणी में डाल दिया जाए।  पेड़ पर घोंसला बनाकर रहने वाले सितकंठ (सिसोनिया एपिस्कोपस) का जीवन खेतों पर निर्भर करता है। खेतों के आस-पास लगे पेड़ों पर ये अपना घोंसला बनाते हैं। उत्तरी अमेरिका जैसी जगहों पर, इस पक्षी को इंसानी रहवासों में एक समस्या के रूप में देखा जाता है, जिन्हें &#8216;हटाने&#8217; की जरूरत होती है। इसके लिए इन पक्षियों का शिकार भी किया जाता है और उन वनों की कटाई और आर्द्रभूमि (वेटलैंड) को हटाया जाता है जहां इनके घोंसला बनाने की संभावना होती है। यही वजह है कि इस पक्षी के रहवास का दायरा सिमट गया है। अब ये सितकंठ, वेटलैंड&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2022/08/26/the-curious-case-of-the-woolly-necked-stork-and-its-rising-numbers-in-haryana/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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					<title>हरियाणा में आवारा कुत्तों के हमले से काले हिरण को खतरा</title>
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					<pubDate>23 अगस्त 2022 05:33:43 +0000</pubDate>
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							<![CDATA[Sneha Mahale]]>
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						<![CDATA[Kundan Pandey]]>
					</author>
							<category><![CDATA[वन्य जीव एवं जैव विविधता]]></category>
		<category><![CDATA[dogs]]></category>
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		<category><![CDATA[कुत्ते]]></category>
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		<category><![CDATA[शिकारी कुत्ते]]></category>
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							<![CDATA[हरियाणा]]>
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							<![CDATA[वन्य जीव एवं जैव विविधता]]>
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								<![CDATA[- हरियाणा के फतेहाबाद ज़िला के बडोपाल क्षेत्र और हिसार ज़िला के मंगली-रावतखेड़ा क्षेत्र में आवारा कुत्तों की वजह से स्थानीय नीलगाय और काले हिरण की आबादी ख़तरे में है।<br />- यदि इस पर तुरंत ध्यान नहीं दिया गया, तो इससे भविष्य में कुत्तों और वन्यजीवों के बीच संघर्ष बढ़ सकता है। इस क्षेत्र में जूनोटिक रोगों (प्राणीजन्य रोग) के फैलने का भी ख़तरा है।<br />- शोधकर्ताओं ने कुत्तों और वन्यजीवों के संघर्ष को कम करने के लिए पालतू जानवरों को छोड़ने के खिलाफ सख़्त कानून और बेहतर नसबंदी, टीकाकरण और पुनर्वास व्यवस्था जैसे ऑपरेशन चलाने का सुझाव दिया है।<br />]]>
							</description>
																						<content:encoded>
							<![CDATA[हरियाणा राज्य के फतेहाबाद ज़िले में बडोपाल क्षेत्र और हिसार ज़िले के मंगली-रावतखेड़ा क्षेत्र में आवारा कुत्तों की वजह से स्थानीय नीलगाय और काले हिरण की आबादी ख़तरे में है। इन दो संरक्षण रहित वन्यजीवों को बिश्नोई समुदाय के घर पर आश्रय मिलता है। बिश्नोई समुदाय काले हिरण से प्यार करते हैं। अध्ययन में पाया गया कि आवारा कुत्तों ने वन्यजीवों पर गिरोह बना कर हमला किया। हमले की वारदात और इन वन्य-जीवों के हताहत होने की घटना प्रजनन के मौसम में अधिक देखने को मिली, क्योंकि मादाएं अपने बच्चों पर हमले के प्रति अधिक संवेदनशील होती हैं। हरियाणा राज्य वन विभाग के अनुसार जनवरी 2016 से मई 2020 तक अकेले हिसार संभाग में 361 काले हिरण, 1641 नीलगाय, 25 मोर, 29 चिंकारा और 35 बंदरों को कुत्तों ने मार दिया। जीव विज्ञान विषय में पश्चिमी हरियाणा में काले हिरन के व्यवहार और आनुवंशिकी पर पीएचडी करने वाले और शोध पत्र के सह-लेखक विक्रम डेलू कहते हैं, “कुत्तों के मालिक जब उन्हें अपने यहां नहीं रहने देते हैं, या यदि वे सड़कों पर पैदा होते हैं, तब वे भटक जाते हैं। नतीजतन, वे आवारा होकर घूमने लगते हैं और अधिकाधिक प्रजनन करते हैं और कुत्तों की स्थानीय आबादी को बढ़ाते हैं। अब इंसानी रिहायस से घिरे वन्यजीव-बहुल क्षेत्रों में ये आवारा कुत्ते चिंता का एक प्रमुख कारण बन गए हैं।” आवारा कुत्तों के हमलों में हताहत वन्यजीवों की संख्या के बारे में राज्य के वन विभाग ने आंकड़ों के माध्यम से इस क्षेत्र में आवारा कुत्तों को ही एकमात्र शिकारी&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2022/08/23/attacks-by-dogs-a-serious-concern-for-the-revered-blackbuck-in-haryana/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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					<title>हरियाणा में कुंडली इलाके के लोग दूषित पानी से बेहाल</title>
					<link>https://hindi.mongabay.com/2022/07/28/industrial-water-pollution-threatens-residents-in-haryanas-kundli-area/</link>
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					<pubDate>28 जुलाई 2022 06:16:16 +0000</pubDate>
											<dc:creator>
							<![CDATA[Sat Singh]]>
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										<author>
						<![CDATA[Kundan Pandey]]>
					</author>
							<category><![CDATA[प्राकृतिक संसाधन]]></category>
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		<category><![CDATA[Water]]></category>
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		<category><![CDATA[कुंडली]]></category>
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							<![CDATA[जल प्रदूषण]]>
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								<![CDATA[- दिल्ली के बाहरी इलाके में हरियाणा का कुंडली एक प्रमुख औद्योगिक क्षेत्र है। स्थानीय लोगों के अनुसार यहां पर अनियंत्रित रूप से दूषित पानी को जमीन में डालना उनके स्वास्थ्य के लिए खतरा पैदा कर रहा है।<br />- स्थानीय लोग यह शिकायत करते हैं कि दूषित भूजल के कारण उन्हें त्वचा रोगों और पेट संबंधी बीमारियां हो रही हैं। कई लोग अब स्वच्छ पेयजल खरीदने के लिए मजबूर हैं। जबकि वे प्रदूषित भूजल का उपयोग कपड़े धोने जैसे कामों के लिए करते हैं।<br />- औद्योगिक कारखानों द्वारा छोड़े गए प्रदूषित जल को प्रदूषण मुक्त करने के लिए 10 एमएलडी (मिलियन लीटर प्रति दिन) क्षमता के एक सामान्य अपशिष्ट उपचार संयंत्र की आवश्यकता होती है। लेकिन प्लांट की मौजूदा क्षमता केवल चार  एमएलडी है। विभिन्न स्थानीय अधिकारियों से बार-बार शिकायत करने के बावजूद क्षेत्र की स्थिति लगातार खराब हो रही है।<br />]]>
							</description>
																						<content:encoded>
							<![CDATA[हरियाणा के सोनीपत जिले के कुंडली क्षेत्र में औद्योगिक क्षेत्र ने पिछले 40 वर्षों में कई लोगों को रोजी-रोटी दी है। एक गुमनाम गांव से कुंडली एक प्रमुख-औद्योगिक क्षेत्र में बदल गया। लेकिन इसके लिए इस क्षेत्र के लोगों को भारी कीमत चुकानी पड़ रही है। अनियंत्रित रूप से उद्योगों के बढ़ने से वायु और जल प्रदूषण बढ़ा है जिससे स्थानीय लोगों के स्वास्थ्य संबंधी मुश्किलों को सामना करना पड़ रहा है।  स्थानीय लोगों का आरोप है कि उद्योगों द्वारा भूजल को दूषित किया गया क्योंकि उन पर कोई जांच नहीं हुई। नतीजतन उन्हें स्वच्छ पानी के निजी स्रोतों पर निर्भर होना पड़ रहा है। विडंबना यह है कि स्वच्छ पानी की आवश्यकता से निपटने के लिए भी क्षेत्र में स्वच्छ पानी का उत्पादन करने के लिए और अधिक उद्योग स्थापित किए गए। स्थानीय लोगों ने यह ध्यान दिया कि ये यहां की इंडस्ट्रीज 10 लीटर पानी की दैनिक आपूर्ति के लिए प्रति माह 300 रुपये लेती है। पानी को रिवर्स ऑस्मोसिस के माध्यम से साफ किया जाता है। सात बड़े और मध्यम स्तर के पानी साफ करने के संयंत्र हैं जो क्षेत्र में सक्रिय हैं और स्थानीय लोगों को पीने के पानी की आपूर्ति करते हैं, क्योंकि भूजल दूषित है और पीने के लिए ठीक नहीं है। क्षेत्र के दौरे के दौरान, मोंगाबे-इंडिया ने पाया कि गांव की सड़कें सीवेज से भरी हुई थीं और कई जगहों पर, नालों से असहनीय दुर्गंध आ रही थी । केमिकल वाला पानी अनियंत्रित रूप से बह रहा था। कुंडली रिहायशी इलाके में&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2022/07/28/industrial-water-pollution-threatens-residents-in-haryanas-kundli-area/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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						<item>
					<title>[वीडियो] बंधवारी लैंडफिलः कचरे के लगातार ऊंचा होते पहाड़ के बीच जीवन</title>
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					<pubDate>06 जुलाई 2022 05:41:46 +0000</pubDate>
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							<![CDATA[Shaz Syed]]>
						</dc:creator>
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					</author>
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		<category><![CDATA[bandhwari. gurugram]]></category>
		<category><![CDATA[faridabad]]></category>
		<category><![CDATA[Garbage]]></category>
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							<![CDATA[दिल्ली, भारत, और हरियाणा]]>
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							<![CDATA[कचरा प्रबंधन]]>
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								<![CDATA[- दिल्ली और हरियाणा सीमा के पास स्थित बंधवारी लैंडफिल अब कचरे का पहाड़ बनता जा रहा है। यहां रोजाना लगभग 2000 टन कचरा फेंका जाता है जिस वजह से कचरे का पहाड़ लगभग 40 मीटर लंबा हो गया है।<br />- लैंडफिल के कचरे की वजह से स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं पैदा हो रही हैं। इससे भूजल प्रदूषण, दुर्गंध की समस्या के साथ मवेशियों का स्वास्थ्य भी खराब हो रहा है। बंधवारी के निवासी और पर्यावरण कार्यकर्ता इस लैंडफिल का विरोध करते रहे हैं।<br />- हालांकि, इस लैंडफिल से कुछ स्थानीय लोगों को रोजगार भी मिलता है।  इस तरह वे इस  प्रदूषण फैलाने वाली जगह पर आर्थिक रूप से निर्भर हो गए हैं।<br />- इस वीडियो में विशेषज्ञ बता रहे हैं कि कैसे लैंडफिल साइट पर नियमों का पालन नहीं हो रहा है। इस अनुचित कचरा प्रबंधन के कारण सामाजिक-आर्थिक नुकसान हो रहा है।<br />]]>
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																						<content:encoded>
							<![CDATA[दिल्ली से सटे पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील अरावली के जंगल में स्थित लैंडफिल कचरे का पहाड़ बनता जा रहा है। यह स्थान कभी बंधवारी गांव की सीमा में आता था, इसलिए इसे बंधवारी लैंडफिल के नाम से भी जानते हैं। गुरुग्राम और फरीदाबाद से रोजाना 2,000 टन कचरा यहां फेंका जाता है। कचरे का पहाड़ बढ़ते-बढ़ते अब 40 मीटर से अधिक ऊंचा हो गया है।  यहां कचरे की उचित छंटाई नहीं होती है। यहां गीले कचरे के साथ-साथ प्लास्टिक कचरा और खतरनाक और इलेक्ट्रॉनिक कचरे को भी डंप किया जाता है। इस लैंडफिल के आसपास पानी रिसता रहता है और यह पानी मिट्टी और भूजल को तेजी से दूषित कर रहा है। वर्षों से लैंडफिल का विरोध कर रही एक सामाजिक कार्यकर्ता और गुरुग्राम निवासी वैशाली राणा का कहना है कि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने लैंडफिल और उसके आसपास के 14 स्थानों पर परीक्षण किया और पाया कि यहां का पानी दूषित है। सीपीसीबी की रिपोर्ट में कहा गया है कि बंधवारी में भूजल &#8216;पीने के लिए उपयुक्त नहीं है&#8216;। यह बताते हुए कि कैसे बंधवारी लैंडफिल, दिल्ली और दिल्ली एनसीआर क्षेत्रों में तीन अन्य लैंडफिल से अलग है, राणा कहती हैं, “यह एक वन क्षेत्र है। यह अरावली है जिसे भारत के सर्वोच्च न्यायालय से संरक्षण प्राप्त है। इसमें एक और बात है &#8211; लैंडफिल अधिक ऊंचाई पर है और बाकी गांव थोड़े नीचे हैं।” बंधवारी निवासी धर्मवीर हर्सना बताते हैं कि किसी भी निवासी ने क्षेत्र में लैंडफिल की अनुमति नहीं दी। &#8220;जब नगर निगम ने&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2022/07/06/living-in-the-shadows-of-a-waste-mountain/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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						<item>
					<title>[वीडियो] हीटवेव की मार से उत्तर भारत में गेहूं के दाने हुए खराब</title>
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					<pubDate>13 जून 2022 08:10:09 +0000</pubDate>
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							<![CDATA[Kapil Kajal]]>
						</dc:creator>
										<author>
						<![CDATA[Kundan Pandey]]>
					</author>
							<category><![CDATA[जलवायु परिवर्तन]]></category>
		<category><![CDATA[agriculture]]></category>
		<category><![CDATA[farmer]]></category>
		<category><![CDATA[farming]]></category>
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		<category><![CDATA[हीटवेव]]></category>
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							<![CDATA[पंजाब, भारत, और हरियाणा]]>
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											<topic-tags>
							<![CDATA[जलवायु परिवर्तन]]>
						</topic-tags>
					
					
												<description>
								<![CDATA[- लू की वजह से पंजाब में इस साल गेहूं की पैदावार और फसल की गुणवत्ता प्रभावित हुई है।<br />- इस साल पंजाब में गेंहू की उपज घटकर 43 क्विंटल प्रति हेक्टेयर हो गयी। वर्ष 2000 के बाद से इस साल, सबसे कम उपज हुई है।<br />- इस साल लू का मौसम जल्दी शुरू हो गया और इस कारण पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में फसल की पैदावार में अनुमानित रूप से 10-35 प्रतिशत की कमी आई है।<br />]]>
							</description>
																						<content:encoded>
							<![CDATA[36 वर्षीय हरदीप कौर और उनके 39 वर्षीय पति चमकौर सिंह के पास उत्तर भारतीय राज्य पंजाब के बठिंडा जिले में दो एकड़ कृषि भूमि है। मार्च और अप्रैल में भीषण गर्मी की वजह से उनकी जमीन पर गेहूं की पैदावार कम हो गई। उस समय दंपत्ति पर आठ लाख रुपये का कर्ज था। उन्हें उम्मीद थी कि अच्छी फसल होगी तो कर्ज चुका देंगे। इधर फसल ने नाउम्मीद किया और उधर ऋण चुकाने का दबाव बढ़ता रहा। कौर और सिंह की अप्रैल 2022 में आत्महत्या से मृत्यु हो गई। किसान संगठन भारतीय किसान यूनियन (बीकेयू) के बठिंडा चैप्टर के महासचिव सरूप सिंह सिद्धू ने मोंगाबे-हिन्दी को बताया कि इस साल मार्च के मध्य से बठिंडा में नौ किसानों की आत्महत्या से मौत हो चुकी है।  राज्य के दूसरे जिले मनसा में भी इसी तरह सात किसानों की मौत हुई थी। सरूप सिंह सिद्धू इन मौतों की वजह हीटवेव की वजह से गेहूं के कम उत्पादन से उपजे तनाव को मानते हैं।  पंजाब में इस सीजन में बठिंडा और मनसा जिलों में गेहूं की पैदावार में सबसे ज्यादा गिरावट दर्ज की गई है। यह कहना है कृषि पत्रिका इंडियन सोसाइटी फॉर एग्रीकल्चरल डेवलपमेंट एंड पॉलिसी के प्रमुख एम.एस. सिद्धू का। उन्होंने कहा, &#8220;पंजाब में इस साल दो दशकों में सबसे कम गेहूं की उपज हुई है।” &#8220;1980 के दशक में, पंजाब में गेहूं की उपज 27 क्विंटल प्रति हेक्टेयर हुआ करती थी जो 1990 के दशक में बढ़कर 35 क्विंटल हो गई और वर्ष 2000 में 45 क्विंटल प्रति हेक्टेयर&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2022/06/13/heatwave-takes-a-toll-on-north-indias-wheat-yield/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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					<title>जलभराव की वजह से खेत बेचने को मजबूर हरियाणा के किसान, किसानी छोड़ने को मजबूर</title>
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					<pubDate>31 मई 2022 08:02:28 +0000</pubDate>
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							<![CDATA[Sat Singh]]>
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										<author>
						<![CDATA[Kundan Pandey]]>
					</author>
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								<![CDATA[- चरखी दादरी के कृषि क्षेत्रों में सालभर जलभराव की वजह से जमीन खेती लायक नहीं रह गई है। किसान वैकल्पिक व्यवसाय अपना रहे हैं, या खेती जारी रखने के लिए दूसरे गांवों में पट्टे पर जमीन ले रहे हैं।<br />- उत्तर भारत के कई हिस्सों में भूजल की कमी एक समस्या है। जबकि इसके विपरीत हरियाणा के 319 गांवों में भूजल के उच्च स्तर के कारण जलभराव की समस्या बनी रहती है।<br />- चरखी-दादरी में सरकार के हस्तक्षेप, खारे पानी की निकासी के प्रयास और फसल विविधीकरण के लिए सब्सिडी, खेती पर अस्थायी प्रतिबंध जैसे उपायों को इस मुद्दे का संभावित समाधान माना जा रहा है।<br />]]>
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							<![CDATA[हरियाणा के चरखी दादरी जिले के इमलोटा गांव के रहने वाले 42 वर्षीय किसान सोनू कलकल अपनी जमीन पर खेती कर खुशहाल जीवन जी रहे थे। उनके खेत में बंपर पैदावार होती थी। पर अब ये भूमिहीन हो गए हैं। ऐसा नहीं कि उन्होंने जमीन बेच दी या किसी ने हड़प लिया। बल्कि उनके खेत में जरूरत से अधिक पानी रहने लगा और जलजमाव की स्थिति बन गई। इससे खेती करने का उनका विकल्प खत्म हो गया।  कृषि क्षेत्रों में जल स्तर में वृद्धि से उपजाऊ भूमि भी किसी लायक नहीं रहती। शायद यही वजह है कि हरियाणा के इस हिस्से में कलकल और कई किसानों को अपनी खेती की जमीन बेचनी पड़ी। &#8220;अब नुकसान सहने की क्षमता मुझमें नहीं है। मुझ पर लाखों का कर्ज चल रहा था और उस पर चक्रवृद्धि ब्याज देना पड़ता था। मेरी खेती की जमीन कभी सोना उगलती थी, लेकिन अब यह एक बोझ में बदल गई थी,” चिंतित कलकल कहते हैं। आखिरकार, उन्हें अपनी पांच एकड़ जमीन बेचनी पड़ी।  &#8220;डेढ़ दशक हो गए हैं। जैसे-जैसे जल स्तर बढ़ रहा था, इलाके में किसानों की जमीन का भाव उसी गति से गिर रहा था,” उन्होंने कहा। जब यहां खेतों में पानी नहीं जमता था तब गांव में लोगों का मुख्य व्यवसाय खेती ही था। वे अब गुरुग्राम में कारखानों में मोटरसाइकिल मैकेनिक, छोटे दुकानदार या मजदूर के रूप में काम करते हैं। दादरी स्थित जनता डिग्री कॉलेज से स्नातक मनोज कलकल ने कहा कि 1,700 एकड़ कृषि भूमि में से 1,200 एकड़ इस मौसम में&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2022/05/31/waterlogging-pushes-haryana-farmers-to-sell-agricultural-land/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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					<title>अवैध खनन से विनाश की तरफ अरावली के अरण्य, हरियाणा सरकार मूकदर्शक</title>
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					<pubDate>07 मार्च 2022 08:15:23 +0000</pubDate>
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							<![CDATA[Kapil Kajal]]>
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							<![CDATA[खनन और .प्राकृतिक संसाधन]]>
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								<![CDATA[- इस साल जनवरी में हरियाणा के भिवानी जिले में एक खनन साइट पर पहाड़ दरकने से पांच लोगों की मौत हो गई। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में प्रस्तुत कई रिपोर्ट के अनुसार, साइट अवैध और अवैज्ञानिक थी लेकिन जुर्माना भरने के बाद यहां फिर से खनन की अनुमति दे दी गई।<br />- अरावली के जंगलों में 250 मीटर अंदर तक खुदाई हो रही है जबकि स्वीकार्य सीमा महज 78 मीटर है। यही नहीं खनन कंपनियों ने हाई-पावर मोटर का इस्तेमाल कर जमीन के नीचे से पूरा पानी निकाल लिया है।<br />- साल 2009 में सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा में पारिस्थितिकी को हुए नुकसान का विश्लेषण करने के बाद राज्य में खनन पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया था। लेकिन साल 2011 में हरियाणा सरकार ने अरावली से सटी कई खदानों के लिए नीलामी नोटिस जारी कर दिया।<br />]]>
							</description>
																						<content:encoded>
							<![CDATA[हरियाणा में खनन के दौरान पांच लोगों की मौत ने अरावली पर्वतमाला में अवैध खनन को फिर चर्चा में ला दिया है। इस साल जनवरी में भिवानी जिले के तोशाम तहसील में स्थित डाडम पत्थर खनन क्षेत्र में यह घटना पहाड़ दरकने से हुई। जाहिर है नियमों को ताक पर रखकर हो रहे खनन से स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र पर खतरा गहराता जा रहा है। जहां पर यह घटना हुई, वह जगह अरावली की पहाड़ियों से घिरी है और 48 हेक्टेयर में फैली है। इस जगह का मालिकाना हक गोवर्धन माइन्स एंड मिनरल्स (जीएमएम) के पास है। आधिकारिक दस्तावेजों के मुताबिक, पट्टे वाले इस खनन क्षेत्र के 10 किलोमीटर की परिधि में तीन आरक्षित और तीन संरक्षित जंगल हैं। यही नहीं, सतह वाली संरचनाओं के 100 मीटर के दायरे में ब्लास्टिंग की अनुमति नहीं है। इलाके में जल स्तर की गहराई मानसून से पहले 80 मीटर लेकर मानसून के बाद 78 मीटर सतह से नीचे तक है। लेकिन गांव वालों का आरोप है कि यहां वन क्षेत्र में भी खनन बदस्तूर जारी है और वह भी 78 मीटर की स्वीकार्य सीमा से अधिक नीचे तक। राज्य में सत्तासीन भारतीय जनता पार्टी के नेता और भिवानी से सांसद धर्मवीर सिंह ने मोंगाबे-हिन्दी के साथ बातचीत में बड़ा आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि अरावली की वन भूमि में 78 मीटर गहराई तक ही खुदाई करने की अनुमति है लेकिन ये काम 250 मीटर अंदर तक हो रहा है। बीजेपी सांसद ने कहा, “ठेकेदार ने हाई-पावर मोटर का इस्तेमाल कर जमीन के नीचे का&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2022/03/07/the-ignorance-of-the-haryana-government-has-cost-the-aravallis-dearly/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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					<title>हरियाणा में गंभीर हो चला है भूजल का गिरता स्तर</title>
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					<pubDate>22 नवम्बर 2021 05:09:23 +0000</pubDate>
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							<![CDATA[Vivek Gupta]]>
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							<![CDATA[कृषि और .प्राकृतिक संसाधन]]>
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								<![CDATA[- हरियाणा में भूजल निकासी की क्षमता से 137 फीसदी अधिक निकाला जा रहा है। इस राज्य के 141 प्रखंडों में से 85 प्रखंड लाल श्रेणी में पहुंच गए हैं। इन क्षेत्रों में भूजल संकट गंभीर होता जा रहा है।<br />- यहां भूजल निकासी की सबसे बड़ी वजह धान की खेती है। धान की खेती में पानी की खपत अधिक होती है।<br />- हरियाणा सरकार इस संकट से निपटने के लिए धान की खेती का रकबा कम करने की कोशिश में है। सरकार ने धान के रकबे को दो लाख एकड़ तक कम करने का लक्ष्य रखा है। हालांकि यह लक्ष्य हासिल करना आसान नहीं है।<br />]]>
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																						<content:encoded>
							<![CDATA[भूजल के खपत के मामले में भारत, विश्व के शीर्ष देशों में आता है। यहां 80 फीसदी से अधिक घरेलू जल आपूर्ति, भूजल से ही होती है। हर साल देश के अलग-अलग हिस्सों से भूजल स्तर के गिरने की खबर आती रहती है। हरियाणा भी इस तरह की खबरों से अछूता नहीं है। इस समस्या को लेकर राज्य में जल संसाधन के संरक्षण, प्रबंधन और विनियमन के लिए गठित एक कमेटी ने जुलाई 2021 की शुरुआत में अपनी पहली बैठक की। केंद्रीय भूजल प्राधिकरण के ताजा आंकड़े बैठक के दौरान पेश किए गए। इसमें खुलासा हुआ कि हरियाणा के कुल 141 ब्लॉकों में से 85 ब्लॉक भूजल दोहन के कारण रेड कैटेगरी में पहुंच गए हैं। यह 85 ब्लॉक राज्य के भौगोलिक क्षेत्र के 60 फीसदी हिस्से को दर्शाते हैं। इस कमिटी के आंकड़ों से ही पता चलता है कि वर्ष 2004 में 55 ब्लॉक रेड कैटेगरी में थे। यानी डेढ़ दशक में 30 और ब्लॉक इसमें जुड़ गए हैं। “हरियाणा के 22 में से 14 जिलों में जलस्तर में गिरावट चिंता का विषय है। अंबाला, कुरुक्षेत्र, जींद, करनाल और पानीपत सबसे ज्यादा प्रभावित हैं,” हरियाणा जल संसाधन प्राधिकरण की अध्यक्ष केशनी आनंद ने मोंगाबे-हिन्दी को बताया। उन्होंने कहा कि मुख्य रूप से धान की फसलों के कारण खेती के लिए अधिक मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है। यह भूजल के गिरते स्तर की बड़ी वजह है। आनंद ने कहा कि एक ब्लॉक को लाल श्रेणी में तब शामिल किया जाता है, जब भूजल की निकासी उसके रिचार्ज होने&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2021/11/22/groundwater-depletion-in-haryana-a-cause-of-serious-concern/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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					<title>[वीडियो] देश की राजधानी से सटा ऐसा जंगल जिसे सैकड़ों साल से बचा रहे स्थानीय लोग</title>
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					<pubDate>06 सितम्बर 2021 06:44:38 +0000</pubDate>
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							<![CDATA[Manon VerchotSanshey Biswas]]>
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							<![CDATA[खनन और .वन]]>
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								<![CDATA[- देश की राजधानी दिल्ली से सटे इलाके में ग्रामीण कई पीढ़ियों से अपने पवित्र वनों को खनन और रियल एस्टेट की नजर से बचाते आ रहे हैं।<br />- जैवविविधता के केंद्र होने के बावजूद इन स्थानों को वन संरक्षण अधिनियम के तहत संरक्षित स्थान का दर्जा अभी तक नहीं मिल सका है।<br />- जानकारों को उम्मीद है कि इस स्थान पर नए पुरातत्विक खोज के बाद इसके संरक्षण के लिए समुदाय को अब कानून की मदद भी मिलेगी।<br />]]>
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																						<content:encoded>
							<![CDATA[अरावली की पहाड़ियों में बसा हरियाणा का मांगर गांव इन दिनों चर्चा में है। चर्चा यहां के कंदराओं में मिले पाषाणकालीन पेंटिंग की हो रही है जिसे हाल ही में राज्य के पुरातत्व विभाग ने खोज निकाला है। दिल्ली और फरीदाबाद जैसे दो बड़े शहरों के बीच बसा यह जंगल का इलाका आसपास भीषण निर्माण के बावजूद भी अपना अस्तित्व बचाने में सफल रहा है। इसके पीछे यहां के स्थानीय लोगों का अथक प्रयास है, जिन्होंने विकास की विभिषिका से अपना जंगल बचाए रखा है। मांगर गांव के  रहने वाले सुनील हर्षना कहते हैं कि उन्हें इन चित्रों की जानकारी पहले से थी। किशोरावस्था में सुनील मवेशी चराने के दौरान गर्मी से राहत पाने के लिए इन कंदराओं में आराम करते थे। हालांकि उस समय उन्हें अंदाजा नहीं था कि पत्थरों पर उकेरे ये चित्र इतने महत्वपूर्ण हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक पुरातत्व विभाग के उप निदेशक इस स्थान को पाषाणकाल का एक बड़ा स्थान मानते हैं। अब चर्चा इस स्थान को पुरातत्विक और ऐतिहासिक महत्व का मानकर संरक्षण करने की चलने लगी है। मांगर गांव के पास कंदराओं में मिले शैलचित्र। तस्वीर- सुनील हर्षना नई दिल्ली के पास स्थित मांगर बनी का पवित्र वन। जंगल का यह छोटा सा इलाका स्थानीय लोगों के प्रयासों की वजह से बचा हुआ है। तस्वीर- गूगल मैप मांगर गांव, हिमालय से भी पुराने अरावली पहाड़ श्रृंखला के बीच स्थित है। अरावली के पहाड़ शृंखला भारत के 700 किलोमीटर में फैला हुआ है। यह गांव नई दिल्ली, गुरुग्राम और फरीदाबाद के बीच स्थित है&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2021/09/06/next-to-indias-capital-a-village-looks-to-the-past-for-its-forests-future/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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					<title>पंजाब और हरियाणा की लेटलतीफी से असुरक्षित है चंडीगढ़ का सुखना वन्यजीव अभयारण्य</title>
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					<pubDate>01 सितम्बर 2021 06:16:55 +0000</pubDate>
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							<![CDATA[Vivek Gupta]]>
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							<category><![CDATA[प्राकृतिक संसाधन]]></category>
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		<category><![CDATA[सुखना झील]]></category>
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							<![CDATA[पंजाब, भारत, और हरियाणा]]>
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							<![CDATA[प्राकृतिक संसाधन]]>
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								<![CDATA[- चंडीगढ़ देश का पहला योजनाबद्ध तरीके से बसाया गया शहर है। यहां स्थित सुखना झील को बचाया जाना जरूरी है। वजह, सुखना वन्यजीव अभयारण्य के संरक्षण के लिहाज से इसका महत्व। इसके लिए एक प्रभावी सुरक्षा कवच यानी इसे इको सेंसेटिव जोन (पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्र) घोषित किया जाना जरूरी है।<br />- अभयारण्य के आसपास तेजी से हो रहे शहरीकरण की वजह से बेलगाम निर्माण कार्य चल रहा है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बावजूद भी हरियाणा और पंजाब की सरकारों ने इको सेंसेटिव जोन बनाने संबंधित अधिसूचना जारी नहीं की है।<br />- अभयारण्य का अधिकांश हिस्सा पंजाब और हरियाणा में पड़ता है। बावजूद इसके, पंजाब 100 मीटर से अधिक इको सेंसेटिव जोन बनाने के पक्ष में नहीं है। हरियाणा ने भी इस मुद्दे को अधिक तरजीह नहीं दी है।<br />]]>
							</description>
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							<![CDATA[चंडीगढ़ को देश के पहला सुनियोजित तरीके से बसाये गए शहर का खिताब हासिल है। इस शहर की बाहरी सीमा में सुखमा वन्यजीव अभयारण्य बसा है जो कई दुर्लभ वनस्पतियों और जीवों की वजह से आकर्षण का केंद्र है। पर इस आकर्षण पर खतरा मंडरा रहा है। इसकी सुरक्षा के लिहाज से हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने इको सेंसेटिव जोन घोषित करने का स्पष्ट आदेश दिया हुआ है। बावजूद इसके पंजाब और हरियाणा की सरकारें इसे संवेदनशील क्षेत्र घोषित करने में देरी लगा रही हैं। सुखना वन्यजीव अभयारण्य मार्च 1988 में वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत अस्तित्व में आया था। इसका मकसद था चंडीगढ़ की सुंदरता में चार चाँद लगाने वाले सुखना झील और उसके कैचमैंट इलाके को सुरक्षित करना। इस कैचमेंट इलाके में मौजूद घने जंगल में दुर्लभ वनस्पतियों और जीव-जंतुओं का बसेरा है। यह अभयारण्य शिवालिक पर्वत के तलहटी इलाके में 2,600 हेक्टेयर में फैला हुआ है। यहां बड़ी संख्या में जलप्रपात हैं जो कि वर्षाजल को झील तक लेकर आते हैं। गर्मियों में झील का जलस्तर तेजी से कम होता है और मानसून के बाद इसकी स्थिति ठीक हो जाती है। यह जलस्रोत प्रवासी पक्षियों के लिए भी जीवनरेखा है। सुखना वन्यजीव अभयारण्य का अधिकतर किनारा पंजाब और हरियाणा से मिलता है। मानचित्र- चंडीगढ़ प्रशासन की अधिकारिक वेबसाइट इन सब के बावजूद इस अभयारण्य को बचाना चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है। वजह है तेजी से हो रहा शहरीकरण और साथ में अभयारण्य के संरक्षण को लेकर सरकारों में बेरुखी। देश के तमाम अभयारण्य के किनारों&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2021/09/01/chandigarhs-sukhna-wildlife-sanctuary-remains-unprotected-as-punjab-haryana-delay-on-eco-sensitive-zone/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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					<title>एसएमएस से मौसम की जानकारी किसानों के लिए कितनी है कारगर?</title>
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					<pubDate>25 अगस्त 2021 06:32:01 +0000</pubDate>
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							<![CDATA[Varsha Singh]]>
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						<![CDATA[Kundan Pandey]]>
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							<category><![CDATA[जलवायु परिवर्तन]]></category>
		<category><![CDATA[agriculture]]></category>
		<category><![CDATA[Agromet Advisory]]></category>
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		<category><![CDATA[एसएमएस]]></category>
		<category><![CDATA[किसान]]></category>
		<category><![CDATA[कृषि]]></category>
		<category><![CDATA[मौसम की जानकारी]]></category>
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							<![CDATA[भारत और .हरियाणा]]>
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							<![CDATA[कृषि]]>
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								<![CDATA[- किसानों को एसएमएस के ज़रिये मौसम और कृषि से जुड़ी सलाह दी जाती है। जिससे खेती से जुड़े रोजमर्रा के कार्यों में किसानों को मदद मिल सके। देशभर में 200 ज़िला एग्रोमेट यूनिट हैं जो ब्लॉक स्तर पर मौसम के लिहाज से एडवाइजरी जारी करने का दावा करती हैं।<br />- आईआईटी दिल्ली के शोधार्थियों ने वर्ष 2016 से 2019 के बीच इस एडवाइजरी को लेकर अध्ययन किया। इस अध्ययन का मकसद ये समझना था कि क्या किसान मौसम-कृषि आधारित सलाह की मदद ले रहे हैं।<br />- इस अध्ययन में सामने आया कि जहां किसानों को लागत लगानी है वहां तो वे इस जानकारी का फायदा उठा रहे हैं पर जहां लागत नहीं लगनी है जैसे नहर से सिंचाई इत्यादि, वहां निर्णय उपलबद्धता पर निर्भर है। ऐसी जानकारी मिलने से किसानों की उपज पर कोई खास असर नहीं पड़ रहा पर लागत में कमी जरूर आई है।<br />]]>
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							<![CDATA[एक तरफ टिहरी के किसान भागचंद रमोला हैं। रुआंसे होकर अपने अनुभव बताते हैं कि इस साल साफ़ मौसम और खिली धूप देखकर उन्होंने सब्जियों की नर्सरी पर लगी नेट हटा दी थी। ताकि पौधों को खुली हवा और धूप मिल जाए। ये अप्रैल का तीसरा हफ़्ता था। उम्मीद से उलट मौसम बदल गया। उसी रात तेज़ बारिश के साथ ओले गिरे। उनकी तकरीबन दो महीने की मेहनत पर पानी फिर गया। बारिश थमने के बाद उन्होंने दोबारा नर्सरी तैयार करनी शुरू की। देश के अधिकतर किसानों की लगभग यही कहानी है। यहां मौसम, खेती, उपज और किसानों की आमदनी का सीधा नाता है और मौसम की अनिश्चितता जगजाहिर है। दूसरी तरफ हैं हिसार के हांसी तहसील के सिसाय गांव के किसान राजकुमार सिंह। वह बताते हैं “मौसम में कोई विशेष परिवर्तन होता है तो हिसार कृषि विश्वविद्यालय की ओर से हमें एसएमएस मिलता है। जिसमें अगले 48 घंटों में बारिश या आंधी जैसी सूचना दी जाती है। इन एसएमएस से मुझे मदद तो मिलती है।” इसके फायदे गिनाते हुए राजकुमार सिंह कहते हैं, “अगर हमें 48 घंटे पहले बारिश की सूचना मिल गई है, तो मैं ट्यूबवेल चलाकर खेत में पानी नहीं डालता। इससे मेरा डीज़ल और बिजली का खर्च बच जाता है। लेकिन अगर नहर का पानी मिल रहा होगा। जो कि हमारे लिए 40 दिन में एक हफ्ते भर के लिए ही खुलती है, तो बारिश की सूचना मिलने के बाद भी मैं उस पानी को नहीं छोड़ूंगा।” राजकुमार सिंह को यह एसएमएस एक सरकारी योजना के&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2021/08/25/how-effective-is-govt-agromet-advisory/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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					<title>दिल्ली-हरियाणा का अरावली जंगल है जैव-विविधतता का केंद्र, संरक्षण की जरूरत</title>
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					<pubDate>11 मार्च 2021 08:32:16 +0000</pubDate>
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							<![CDATA[Neha Jain]]>
						</dc:creator>
										<author>
						<![CDATA[Kundan Pandey]]>
					</author>
							<category><![CDATA[वन्य जीव एवं जैव विविधता]]></category>
		<category><![CDATA[Aravali]]></category>
		<category><![CDATA[Human Wildlife Conflict]]></category>
		<category><![CDATA[National Capital Region]]></category>
		<category><![CDATA[अरावली]]></category>
		<category><![CDATA[गुरुग्राम]]></category>
		<category><![CDATA[नैशनल कैपिटल रीजन]]></category>
		<category><![CDATA[वन्यजीव]]></category>
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							<![CDATA[दिल्ली और .हरियाणा]]>
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							<![CDATA[पक्षी, प्राकृतिक संसाधन, वन, और वन्य जीव एवं जैव विविधता]]>
						</topic-tags>
					
					
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								<![CDATA[- दिल्ली के आसपास गुरुग्राम और फरीदाबाद तक घनी इंसानी आबादी के बावजूद इस क्षेत्र में कई तरह के वन्यजीवों का बसेरा है।<br />- हाल ही में हुए एक सर्वेक्षण में सामने आया है कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के जंगल में 15 विभिन्न प्रकार के स्तनपायी जानवर पाए जाते हैं। संरक्षण क्षेत्र के बाहर इन जानवरों की अधिक संख्या पाई गई है। इनमें बिज्जू, लोमड़ी, जंगली बिल्ली और सूर्ख नेवला शामिल हैं।<br />- यहां आस-पास के जंगलों में इंसान और तेंदुए के बीच टकराव के कई मामले सामने आये हैं। इसे रोकने के लिए बेहतर प्रबंधन की जरूरत है।<br />- दिल्ली-हरियाणा की सीमा से लगा मांगर बनी धार्मिक वजहों से चर्चित है। पर जैव-विविधता के हिसाब से भी काफी महत्वपूर्ण है। इस जंगल में तेंदुए और अन्य जीव घूमते पाए जाते हैं। जानकार इन स्थानों पर वन और जीव दोनों के संरक्षण की सिफारिश करते हैं।<br />]]>
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							<![CDATA[दिल्ली की भागदौड़ भरी जिंदगी और  ट्रैफिक की भीड़भाड़ के बीच जंगल और जंगली जीव की उपस्थिति के बारे में शायद ही कोई सोच सकता है, लेकिन हाल में आए एक सर्वे के नतीजे चौंकाने वाले हैं। इस सर्वे में सामने आया है कि गुरुग्राम, फरीदाबाद और दिल्ली से सटे अरावली के जंगल में वन्यजीवों की अच्छी-खासी आबादी है। वर्ष 2019 में किया गया सर्वे कहता है कि दिल्ली के आसपास वन्य क्षेत्र में जैवविविधता समृद्ध है।  वह भी संरक्षण क्षेत्र से बाहर। यहां वन्यजीवों की खासी संख्या देखी गई। गुरुग्राम और फरीदाबाद से सटा मांगर बनी का जंगल जानवरों की आवाजाही के लिए एक तरह से कॉरिडोर का काम करता है। जानकार मानते हैं कि ऐसे वनों के संरक्षण पर ध्यान देने की जरूरत है। देश की राजधानी के इतने नजदीक होने के बावजूद भी हरियाणा के अरावली की गिनती देश के कुछेक सबसे खराब स्थिति वाले वनों में होती है। बीते सालों में यहां अंधाधुंध पेड़ों की कटाई हुई है। जंगलों की स्थिति इतनी खराब है कि यहां तेंदुए और इंसानों के बीच आए दिन संघर्ष की खबर आती रहती है। डब्लूडब्लूएफ इंडिया के सौजन्य से आए एक रिपोर्ट में बताया गया है कि बेहतर प्रबंधन से इस इलाके में वन्यजीव और इंसान के बीच संघर्ष को कम किया जा सकता है। हालांकि हालिया सर्वे के बाद वन्यजीवों पर काम करने वाले काफी उत्साहित हैं।  “यह काफी सुखद और चकित करने वाला हैं। अरावली जैसे जंगल में भी भांति-भाति के स्तनपायी जीव मिले हैं। खासकर बिज्जू, लकड़बग्धा, लोमड़ी,&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2021/03/11/delhi-and-haryanas-aravallis-support-rich-biodiversity-and-need-protection/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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