- ज़्यादातर इलाकों में हाथियों को रोकने के लिए बाड़ लगाने और खाई खोदने जैसे तरीकों को अपनाये जाते हैं।
- कम बारिश और छोटी जोत वाले इलाकों में इन तरीकों को अपनाने की संभावना ज्यादा होती है।
- इस स्टडी के अनुसार, पानी की जगह के पास और बड़े खेतों वाले इलाकों में लागत की वजह से इन उपायों को अपनाना मुश्किल होता है।
इंसानों और हाथियों के बीच बढ़ते टकराव के चलते देशभर में इंसानों और हाथियों की मौतों में लगातार इजाफा हो रहा है। हालांकि, इन हालातों के कारणों का पता लगाने और उनसे निपटने के लिए पूरे देश में लगातार अध्ययन किये जा रहे हैं। लेकिन, सेंटर फॉर वाइल्डलाइफ स्टडीज (CWS) की एक नई स्टडी कुछ ऐसे कारणों पर प्रकाश डालती है जो स्थानीय समुदायों द्वारा उनके नुकसान को कम करने के उपायों पर असर डालते हैं।
कर्नाटका और केरला के 507 ग्रामीण घरों के एक सर्वे में पाया गया कि हाथियों को रोकने के लिए बाड़ लगाने और खाई खोदने जैसे तरीकों को अपनाने का फैसला तीन वजहों से होता है: बारिश, ज़मीन का रकबा, और पानी की जगहों से दूरी। इस सर्वे में कहा गया कि कम बारिश (1000–2333 mm के बीच) वाले इलाकों और छोटी जोत वाले इलाकों में रहने वाले लोगों में इस टकराव को कम करने के तरीके अपनाने की संभावना 68% ज़्यादा थी।
वहीं दूसरी तरफ इसके विपरीत, जो घर पानी वाली जगहों के पास थे, जिनके पास ज़्यादा ज़मीन थी, और जहां ज्यादा बारिश (2334 mm से ज़्यादा) होती थी, उनमें नुकसान कम करने के तरीके अपनाने की संभावना सिर्फ़ 7% ज़्यादा थी। इस पेपर में कहा गया है, “पानी के पास होने से मुश्किलें आ सकती हैं, या नुकसान कम करने के तरीके को मुश्किल बनाया जा सकता है,” और यह भी कहा गया है कि “तुलनात्मक रूप से सूखे इलाकों और कम जमीन वाले इलाकों में, नुकसान कम करने के तरीकों को अपनाने की जरूरत ज्यादा होती है।”

वर्ल्ड वाइड फंड फॉर नेचर (WWF इंडिया) के अनुसार, भारत में हाथियों के कारण लगभग 500 लोग मारे जाते हैं, और लगभग 100 हाथियों की जान बिजली के झटके, ज़हर, ट्रेन दुर्घटना और अवैध शिकार के कारण चली जाती है। CWS के सर्वे में कर्नाटका में बंदीपुर और नागरहोले टाइगर रिजर्व, और पालक्काड और मन्नारक्कड़ टेरिटोरियल फॉरेस्ट डिवीज़न के पास के घर शामिल थे, इन दोनों राज्यों में प्रति किलोमीटर इंसानों और हाथियों की संख्या ज्यादा है।
इन जगहों पर रहने वाले समुदायों के बीच नुकसान कम करने के उपायों को इस्तेमाल करने की स्टडी के अलावा, इस स्टडी में हाथियों पर इस्तेमाल किये गए इन उपायों के दुष्परिणामों को भी देखा गया। सर्वे में शामिल लोगों ने 47 हाथियों की मौतों का जिक्र किया जिसमें से 25% मौतें कर्नाटका में सोलर फेंस की वजह से हुई थीं और लगभग 38% मौतें केरला में इलेक्ट्रिक फेंस की वजह से हुईं। कर्नाटका में हाथियों के घायल होने के पीछे का मुख्य कारण खाइयां थीं।
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इस अध्ययन की मुख्य लेखिका सिमरन प्रसाद ने कहा, “रोकथाम (टकराव की) के लिए ऐसे उपाय ज़रूरी हैं जो जान न लें, समुदायों को शामिल करें और साथ ही हाथियों की सुरक्षा करें। इनमें शुरुआती चेतावनी देने वाले सिस्टम, रीजेनरेटिव खेती और टिकाऊ खेती के तरीके शामिल हो सकते हैं जो आर्थिक रूप से फायदेमंद होने के ज़रिए समुदायों को बेहतर बनाएं, और हाथियों के रहने की जगह को बेहतर बनाएं।”
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 13 अक्टूबर, 2025 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: एशियाई हाथी की प्रतीकात्मक तस्वीर। तस्वीर – माइक प्रिंस, विकिमीडिया कॉमन्स (CC BY-SA 2.0)