- पूरे देश में न्यूनतम समर्थन मूल्य पर लघु वनोपज संग्रह का मॉडल कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ में पिछले पांच सालों में सरकारी वनोपज खऱीदी में 94 फीसदी की गिरावट आई है।
- आदिवासियों का कहना है कि सरकारी खरीदी नहीं होने से उन्हें औने-पौने भाव में लघु वनोपज खुले बाज़ार में बेचना पड़ रहा है। वहीं सरकारी दावा है कि वनोपज का वैल्यू एडिशन करके आदिवासियों को अधिक लाभ देने की कोशिश की जा रही है।
- आदिवासियों की आय बढ़ाने के लिए खोले गए लघु वनोपज आधारित वनधन विकास केंद्र की हालत भी खराब है और हालत ये है कि मॉडल के तौर पर शुरु किए गए केंद्र में ही ताला लग चुका है।
छत्तीसगढ़ के बलरामपुर ज़िले के रामचंद्रपुर की रहने वाली चैतिन बाई इस बात से दुखी हैं कि पिछले कुछ सालों से उनके इलाके में समर्थन मूल्य पर महुआ की खरीदी लगभग बंद है। केंद्र सरकार ने महुआ की कीमत 30 रुपए प्रति किलो निर्धारित की है, जिस पर छत्तीसगढ़ सरकार 3 रुपए का बोनस देती है। चैतिन बाई सरगुजिया बोली में कहती हैं, “खरीदी बंद होने से हम आदिवासियों को अब महुआ औने-पौने भाव में बेचना पड़ता है। कभी 20 रुपए किलो तो कभी 25 रुपए किलो। हमें पता है कि ज़िला मुख्यालय में इसकी अच्छी कीमत मिलेगी लेकिन आने-जाने का किराया और फिर इस पूरी प्रक्रिया में लगने वाला समय, इन सबको देख कर लगता है कि भले कीमत थोड़ी कम मिले लेकिन बेच-बाच कर मुक्ति पाएं।”
चैतिन बाई अकेली नहीं हैं। छत्तीसगढ़ के बलरामपुर-रामानुजगंज से लेकर राज्य के दूसरे छोर सुकमा ज़िले तक ऐसे लोगों की बड़ी संख्या है, जो वनोपज तो अब भी एकत्र करते हैं लेकिन सरकार ने उनकी तरफ से मुंह फेर लिया है।
पिछले पाँच वर्षों में छत्तीसगढ़ में वनधन योजना के तहत लघु वनोपज की सरकारी खरीद में भारी गिरावट दर्ज की गई है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2020-21 में जहाँ 6,27,470.50 क्विंटल वनोपज समर्थन मूल्य पर खरीदी गई थी, वहीं 2024-25 में यह घटकर 35,002.85 क्विंटल रह गई।
इसी अवधि में कुल मूल्य भी 15,691.01 लाख रुपए से घटकर 1,558.11 लाख रुपए पर आ गया। मतलब ये कि पिछले पाँच सालों में छत्तीसगढ़ में वनधन योजना में लघु वनोपज की खरीदी मात्रा में लगभग 94 प्रतिशत की गिरावट आई है, वहीं कुल मूल्य में लगभग 90% की गिरावट दर्ज की गई है।

लघु वनोपज यानी जंगल से मिलने वाले गैर-काष्ठ उत्पाद, जैसे महुआ, इमली, साल बीज, हर्रा, चिरौंजी, लाख और तेंदूपत्ता, जिन्हें आदिवासी और वनाश्रित समुदाय इकट्ठा करते हैं। केंद्र सरकार इन उत्पादों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करती है, जबकि राज्य सरकारें सहकारी समितियों, स्व-सहायता समूहों और वनधन केंद्रों के माध्यम से इनकी खरीद और प्रसंस्करण की व्यवस्था करती हैं।
यह तब है, जब पिछले कुछ सालों तक लघु वनोपज ख़रीदी के मामले में छत्तीसगढ़ राज्य को, पूरे देश में मॉडल की तरह प्रस्तुत किया जाता था। पूरे देश में केंद्र सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदी गई वनोपज में छत्तीसगढ़ की भागीदारी लगभग 70 प्रतिशत होती थी। कुछ साल पहले तक देश भर में लघु वनोपज खरीदी के 6,873 केंद्रों में से 4,969 खरीदी केंद्र अकेले छत्तीसगढ़ में थे। लेकिन वनोपज खरीदी में गिरावट के ताज़ा आंकड़े बताते हैं कि न्यूनतम समर्थन मूल्य पर वनोपज की खरीदी ढ़ांचा पूरी तरह से चरमरा गया है। यह गिरावट केवल खरीदी कम होने का मामला नहीं है; यह उस मॉडल के कमजोर पड़ने का संकेत है, जिसे कभी आदिवासी आजीविका, सहकारिता और समावेशी विकास का उदाहरण माना जाता था।

देश में लड़खड़ाई वनोपज खरीदी
भारत में 87 तरह की लघु वनोपज खरीदी के लिए भारत सरकार का जनजातीय मामलों का मंत्रालय, नोडल एजेंसी है और भारतीय जनजातीय सहकारी विपणन विकास महासंघ, देश के अलग-अलग राज्यों और जिलों से समन्वय करता है। राज्य सरकार सहकारी समितियों, महिला समितियों, स्व-सहायता समूहों के माध्यम से लघु वनोपज की खरीदी करती है।
छत्तीसगढ़ में लघु वनोपज खरीदी की नोडल एजेंसी आदिम जाति विकास विभाग के मंत्री रामविचार नेताम का मानना है कि पहले की तरह जंगलों में अब पेड़ कम बचे हैं। यही कारण है कि वनोपज कम हो रही है। ऐसे में इसकी खरीदी में भी गिरावट आई है।
उनका कहना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण भी उपज कम हुई है। उन्होंने मोंगाबे-हिंदी से कहा, “पुराने पेड़ खत्म हो रहे हैं। ज्यादा वनोपज लेने के चक्कर में पेड़ों की कटाई तक कर दी जा रही है। हालाँकि, हमारी कोशिश है कि हम वनोपज से आदिवासियों को अधिक से अधिक लाभ के लिए प्रेरित करें और इसके लिए सरकार कई योजनाएं भी चला रही है। हमारी कोशिश है कि वैल्यू एडिशन कर के वनोपज को बाज़ार तक पहुंचाया जाए।”
लेकिन, दिलचस्प ये है कि पूरे देश में लघु वनोपज खरीदी का लगभग यही हाल है। संसद में पेश किए गए जनजातीय कार्य मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि न्यूनतम समर्थन मूल्य पर 2022-23 में देशभर में करीब 26,744 मीट्रिक टन लघु वनोपज की खरीदी हुई थी, जिसकी कुल कीमत लगभग 9,423 लाख रुपए थी। अगले साल यानी 2023-24 में खरीदी बढ़कर 51,477 मीट्रिक टन तक पहुंच गई और इसका मूल्य 12,438 लाख रुपए रहा।
लेकिन इसके ठीक बाद 2024-25 में खरीदी अचानक धड़ाम से गिरकर सिर्फ 3,920 मीट्रिक टन रह गई। इसकी कुल कीमत भी घटकर सिर्फ 1,668 लाख रुपए रह गई। यानि सिर्फ एक साल के भीतर सरकारी खरीदी में लगभग 92 प्रतिशत की गिरावट आ गई।


आजीविका के सवाल
भारत में लघु वनोपज जैसे महुआ, तेंदूपत्ता, साल बीज, हर्रा, इमली, चिरौंजी, लाख सिर्फ वन उत्पाद नहीं हैं, बल्कि करोड़ों वनाश्रित एवं आदिवासी समुदायों की आजीविका, खाद्य-सुरक्षा और स्थानीय अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण आधार हैं। विशेष रूप से मध्य भारत के वन क्षेत्रों जैसे छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश में रहने वाले आदिवासी समुदायों के लिए लघु वनोपज नकद आय का सबसे सुलभ स्रोत माने जाते हैं।
साल 2004 में प्रस्तुत भूरिया समिति की रिपोर्ट के अनुसार विभिन्न अध्ययनों और संस्थागत आकलनों से संकेत मिलता है कि आदिवासी परिवारों की आजीविका में लघु वनोपज की हिस्सेदारी कई क्षेत्रों में 80 प्रतिशत तक है। समिति ने अपनी रिपोर्ट में उल्लेख किया था कि जंगलों में या उनके आसपास रहने वाले लगभग 40 करोड़ लोग प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से वन संसाधनों पर निर्भर हैं। हालांकि, आदिवासी समुदायों के लिए जंगल केवल संसाधन नहीं, बल्कि भोजन, औषधि, आश्रय और स्थानीय अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार हैं। इसी प्रकार, 2009 में प्रस्तुत मुंगेकर समिति की रिपोर्ट में कहा गया कि अनेक क्षेत्रों में आदिवासी परिवारों की कुल आय का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा लघु वनोपज से प्राप्त होता है।
छत्तीसगढ़ सरकार के आंकड़े बताते हैं कि लगभग तीन करोड़ की आबादी वाले छत्तीसगढ़ में 54 लाख की आबादी यानी 13.50 लाख परिवार लघु वनोपज संग्रहण से आय प्राप्त करते हैं, जिसमें से अधिकांश गरीब एवं आदिवासी हैं। राज्य में लगभग 4800 महिला स्व सहायता समूहों द्वारा स्थानीय स्तर पर 67 प्रकार के लघु वनोपज प्रजातियों की खरीदी होती थी।
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन द्वारा वर्ष 2019-20 में किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार, छत्तीसगढ़ में लघु वनोपज संग्राहकों का बड़ा हिस्सा अपनी उपज सरकारी खरीद केंद्रों के माध्यम से बेचता था। सर्वेक्षण में पाया गया था कि लगभग 89.4 प्रतिशत संग्राहक लघु वनोपज की बिक्री सरकार द्वारा संचालित वनोपज केंद्रों में करते थे, जबकि 9.6 प्रतिशत निजी व्यापारियों और लगभग 1 प्रतिशत कमिशन एजेंटों को बेचते थे। सर्वेक्षण के अनुसार लगभग 92.6 प्रतिशत संग्राहक लघु वनोपज का मुख्यतः व्यावसायिक उपयोग करते हुए उसे बाजार में बेचते थे, जबकि 7.4 प्रतिशत ऐसे परिवार हैं, जो बिक्री के साथ-साथ उसका घरेलू उपयोग भी करते हैं।
लेकिन वनधन योजना में लघु वनोपज की खरीदी के ताज़ा आंकड़ों ने, इस तरह के सारे सर्वेक्षणों और अध्ययनों के निष्कर्षों को बदल कर रख दिया है।
कांकेर ज़िले की सामाजिक कार्यकर्ता मानसी मंडावी कहती हैं, “लघु वनोपजों का महत्व केवल आर्थिक नहीं है, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक भी है। महुआ, साल बीज या इमली जैसे उत्पाद आदिवासी समुदायों के पारंपरिक जीवन, भोजन, स्थानीय विनिमय प्रणाली और सामुदायिक संबंधों से गहराई से जुड़े हुए हैं। इन उत्पादों के संग्रहण में महिलाओं की भागीदारी विशेष रूप से अधिक होती है, इसलिए लघु वनोपज आधारित अर्थव्यवस्था ग्रामीण महिलाओं की आय और आर्थिक स्वायत्तता से भी प्रत्यक्ष रूप से जुड़ी हुई है। लेकिन अब यह स्वायत्तता ख़तरे में है।”

बरसों वनोपज खरीदी से जुड़े रहे वन विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने अपना नाम सार्वजनिक नहीं किए जाने की शर्त पर कहा कि लघु वनोपज के भंडारण, परिवहन और विपणन अवसंरचना की कमी ने खरीदी को सीमित कर दिया है। यदि एजेंसियाँ खरीदे गए उत्पादों को सुरक्षित रूप से संग्रहित या बेच नहीं पातीं, तो वे नई खरीद में स्वाभाविक रूप से दिलचस्पी नहीं लेतीं। वे इसका उदाहरण देते हुए बताते हैं कि छत्तीसगढ़ के अलग-अलग गोदामों में पिछले 6 सालों के वन उत्पाद पड़े हुए हैं और इस साल फिर से उनकी नीलामी की कोशिश की जा रही है।
उनका कहना है कि कई क्षेत्रों में निजी व्यापारी अधिक सक्रिय हैं और तत्काल नकद भुगतान की सुविधा देते हैं। कई जगह कीमत भी अधिक मिलती है। इसके विपरीत, सरकारी खरीद प्रक्रिया अपेक्षाकृत धीमी और जटिल होती है, जिससे संग्राहकों के लिए निजी बाजार अधिक आकर्षक बन जाता है।
उन्होंने कहा, “सरकारी खरीदी की बात करें तो मांग और बाजार संरचना इस गिरावट में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। उत्पादों की बाजार मांग एक चुनौती रही है। जब खरीदी गई वनोपज का समय पर निपटान नहीं हो पाता, तो स्टॉक जमा हो जाता है और फिर नई खरीदी नहीं हो पाती।”
बंद पड़े वन धन विकास केंद्र
हालाँकि, राज्य के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के पास अपने तर्क हैं। वे कहते हैं, “हम वनोपज की खरीदी भी कर रहे हैं और वैल्यू एडिशन भी कर रहे हैं। मैं जिस क्षेत्र से आता हूं, जशपुर, वहां पर महुआ होता है। पहले वहां के लोग खाली उसका रस का उपयोग करते थे। लेकिन वहां के महिला स्व-सहायता समूह की हमारी माताएं-बहने, अब उसका लड्डू बना रही हैं और वह जशपुर लड्डू के नाम पर खूब बिक रहा है। उसका अचार और कैंडी बना रही हैं। पूरे प्रदेश में हम लोग जो सैकड़ों तरह के फॉरेस्ट प्रोड्यूस हैं, उसका वैल्यू एडिशन करा कर हम अपने भाई-बंधुओं को सबको विकास से जोड़ेंगे।”
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय इसके लिए वन धन विकास केंद्र का हवाला देते हैं। उनका दावा है कि वन धन केंद्र में लघु वनोपज की खरीदी होती है और फिर उसका वैल्यू एडिशन कर के उसकी बिक्री की जाती है।
असल में 2019 से देश भर में लघु वनोपज की खरीदी और मूल्य श्रृंखला के विकास के लिए प्रधानमंत्री जनजातीय विकास मिशन के तहत देश भर में 4,125 वनधन विकास केंद्र खोले गए थे। योजना ये थी कि एक केंद्र 15 आदिवासी स्व सहायता केंद्र का गठन करेगा, जिसमें प्रत्येक में लघु वनोपज इकट्ठा करने और फिर उसका प्रसंस्करण करने वाले 20 लोग होंगे। यानी एक केंद्र से लगभग 300 आदिवासी लाभान्वित होंगे।
सरकार का दावा है कि छत्तीसगढ़ में ऐसे 139 केंद्र खोले गए, जिसका लाभ 41,700 आदिवासियों को मिल रहा है। इसके अलावा पीएम जनमन योजना के तहत भी 16 ऐसे केंद्र खोले गए, जिसका लाभ 2,395 लोगों को मिल रहा है।
लेकिन इन वन धन विकास केंद्रों की हालत ये है कि इनमें से अधिकांश केंद्र बंद हो चुके हैं। बस्तर ज़िले का सबसे बड़ा वन धन केंद्र धुरागांव में बनाया गया था। इस केंद्र में महुआ के बीज से तेल निकालने और इमली से चटनी बनाने का काम होता था।

इस केंद्र में काम करने वाली जै तेलहिन माता स्वसहायता समूह की अध्यक्ष आदिवासी समाज की शांति कश्यप के अनुसार 2021 से 2024 तक इस केंद्र में कामकाज हुआ लेकिन केंद्र में 50 से अधिक महिलाओं को काम नहीं मिला। उत्पाद की बिक्री की व्यवस्था नहीं हो पाने के कारण 2024 में केंद्र में ताला लग गया।
शांति कश्यप कहती हैं, “महिलाओं का तीन समूह का तीन लाख रुपए का भुगतान आज तक नहीं हुआ। 80 हजार रुपए के बकाया के कारण केंद्र की बिजली काट दी गई है और पिछले सवा साल से केंद्र में ताला बंद हो गया है।”
जिला वनोपज सहकारी संघ के प्रबंध संचालक और उप वन मंडलाधिकारी गुलशन कुमार साहू मानते हैं कि पिछले दो वर्षों से वन धन केंद्र का काम प्रभावित हुआ है। लेकिन कोशिश है कि उन वन धन केंद्रों को फिर से शुरु कर दिया जाए।
और पढ़ेंः लघु वनोपज संग्रहण का मॉडल राज्य छत्तीसगढ़ में कितनी सुधरी आदिवासियों की स्थिति?
लेकिन, वन संसाधन और आदिवासी अधिकारों के लिए पिछले कई सालों से राज्य में काम कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता विजेंद्र अजनबी का मानना है कि अनुमानतः 70 प्रतिशत वनोपज की खरीदी आज भी निजी हाथों में है। तेरह साल पहले लागू हुई लघु वनोपज की खरीदी की योजना से भी जंगलों में फैले व्यापारी-दलालों के जाल को काटा नहीं जा सका है। आज भी वनों पर निर्भर समुदाय उधार और नगदी की ज़रुरत के लिए इन्हीं पर निर्भर हैं। यही कारण है कि समर्थन मूल्य पर खरीदी या वन धन विकास केंद्र जैसे मॉडल असफल हो चुके हैं।
विजेंद्र कहते हैं, “अगर आजीविका मिशन के तहत महिला समूहों को पूंजी उपलब्ध कराई जाए और वनाधिकार कानून के तहत ग्राम सभाओं को वनोपजों का स्वामित्व देते हुए, उन्हें नीलामी या सामूहिक बिक्री में सक्षम बनाया जाए तो हालात बदल सकते हैं।”
आज जब जलवायु परिवर्तन, जंगलों के क्षरण और ग्रामीण बेरोज़गारी जैसे संकट एक साथ गहराते जा रहे हैं, तब लघु वनोपज की घटती सरकारी खरीदी कई बड़े सवाल खड़े करती है। जंगलों में महुआ अब भी गिरता है, साल के बीज अब भी गिरते हैं लेकिन उन्हें बीनने वालों की ज़िंदगी पहले से ज्यादा कठिन हो गई है। सरकारी खरीदी के सिकुड़ते दायरे के बीच आदिवासी समुदाय एक बार फिर उस दौर की ओर लौटते दिख रहे हैं, जहां जंगल तो उनके हैं, लेकिन जंगल की उपज का बाज़ार अब भी उनके हाथों में नहीं है।
बैनर तस्वीरः छत्तीसगढ़ के वन क्षेत्र में महिलाएं लघु वनोपज इकट्ठा करती हुईं। राज्य में महुआ, इमली, साल बीज, हर्रा और बहेड़ा जैसी वनोपज कई आदिवासी परिवारों की नकद आय का अहम स्रोत हैं। तस्वीर: आलोक प्रकाश पुतुल।