- कर्नाटका के एक नए विधेयक में सभी जलाशयों के लिए तय 30 मीटर के बफर जोन के नियम को बदलकर, उनके आकार के आधार पर अलग-अलग बफर जोन बनाने का प्रस्ताव दिया गया है।
- प्रस्तावित विधेयक में कहा गया है कि सरकार बफर जोन के भीतर के क्षेत्र का इस्तेमाल जन-सुविधाओं जैसे सड़कों, पुलों, बिजली की लाइनों, पानी की पाइपलाइन, या पंप हाउस और सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) के निर्माण के लिए कर सकती है।
- बेंगलुरु के नागरिक समूह और पर्यावरणविद इस विधेयक की कड़ी आलोचना कर रहे हैं। उनका कहना है कि झीलों के पास किसी भी तरह के निर्माण से पानी की गुणवत्ता, भूजल और वहां की जैव विविधता पर असर पड़ सकता है।
कर्नाटका सरकार द्वारा झीलों के संरक्षण से जुड़े नियमों में बदलाव के प्रस्ताव ने राज्य में एक नई बहस छेड़ दी है। अगस्त 2025 में सरकार ने ‘कर्नाटक टैंक संरक्षण और विकास प्राधिकरण (संशोधन) विधेयक, 2025’ पेश किया, जिसका उद्देश्य जलाशयों के आसपास के तय 30 मीटर बफर ज़ोन के दायरे को कम करना है। यह विधेयक कर्नाटका विधानसभा के मानसून सत्र में पारित हो चुका है, लेकिन बेंगलुरु के नागरिक समूह और पर्यावरणविद इसकी कड़ी आलोचना कर रहे हैं।
इस विधेयक के जरिए सरकार 2014 के पुराने अधिनियम (केटीसीडीए) में बदलाव करना चाहती है, ताकि झीलों के आकार के हिसाब से बफर जोन का दायरा तय किया जा सके। इससे झीलों के पास सड़क, पुल, बिजली की लाइन और पानी की सप्लाई जैसी सार्वजनिक सुविधाओं के निर्माण की अनुमति मिल जाएगी।
बफर ज़ोन झीलों और स्टॉर्म वाटर के किनारे वाले वे क्षेत्र होते हैं जहां किसी भी तरह के निर्माण या विकास कार्य की अनुमति नहीं होती। पानी के मामलों की सलाहकार शुभा रामचंद्रन कहती हैं, “ये क्षेत्र जमीन और पानी के बीच एक ऐसी सीमा बनाते हैं जहां पेड़-पौधे और जीव-जंतु सुरक्षित रूप से पनप सकते हैं, जो इन क्षेत्रों के बिना संभव नहीं होता।”
उन्होंने आगे बताया कि बफर ज़ोन झील के आसपास उन जगहों को बढ़ाते हैं जहां से पानी जमीन के अंदर रिस सकता है। वह कहती हैं, “अगर कहीं कचरा फेंका जाता है, तो बफर जोन उस कचरे को झील में पहुंचने से पहले ही छानने या रोकने के लिए जगह देता है। बफर जोन जितना चौड़ा होगा, उतना ही बेहतर होगा।” इसके अलावा, शहरी इलाकों में बफर ज़ोन होने का मतलब है, लोगों के टहलने और मनोरंजन के लिए खुली जगह का होना।
अभी लागू कानून (केटीसीडीए की धारा 12) के मुताबिक, किसी भी जलाशय की बाहरी सीमा से 30 मीटर के दायरे में किसी भी तरह के अनधिकृत निर्माण पर रोक है। इस दायरे में किसी भी तरह के व्यावसायिक, औद्योगिक या आवासीय इमारत का निर्माण या औद्योगिक गतिविधियां नहीं की जा सकती हैं।
लेकिन, नए संशोधन विधेयक में जलाशयों के आकार के आधार पर अलग-अलग बफर ज़ोन बनाने का प्रस्ताव दिया गया है। इसके तहत, 0.05 एकड़ तक के जलाशयों के लिए किसी बफर जोन की आवश्यकता नहीं होगी, जबकि 0.05 से 0.10 एकड़ के बीच के जलाशयों के लिए एक मीटर और 0.10 से 1 एकड़ तक के जलाशयों के लिए तीन मीटर का बफर जोन अनिवार्य किया गया है। इसी तरह, 1 से 10 एकड़ तक के जलाशयों के लिए छह मीटर का बफर जोन तय किया गया है। सिर्फ 100 एकड़ या उससे अधिक बड़े जलाशयों के लिए ही 30 मीटर का पुराना नियम लागू रहेगा।

कर्नाटका सरकार ने प्रेस विज्ञप्ति में कहा कि बफर जोन की दूरी में बदलाव “वैज्ञानिक दृष्टिकोण के आधार” पर किया गया है, ताकि अलग-अलग आकार की झीलों में पानी का प्राकृतिक प्रवाह बेहतर हो सके। हालांकि, नागरिक समूहों, झील समितियों, पर्यावरणविदों और विशेषज्ञों ने इस संशोधन से जलाशयों पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर गहरी चिंता जताई है।
नवम्बर के महीने में, नागरिक समूह बेंगलुरु टाउन हॉल (बीटीएस) की आपत्तियों के बाद, कर्नाटका के राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने राज्य सरकार से स्पष्टीकरण मांगते हुए इस विधेयक को वापस भेज दिया है।
विधेयक को लेकर कार्यकर्ताओं और पर्यावरण विशेषज्ञों की प्रमुख चिंताओं में से एक झील के आसपास के भूजल पर पड़ने वाला असर है। वेल लैब्स के वरिष्ठ जलविज्ञानी शशांक पालुर कहते हैं, “अभी, झील के किनारे से लगभग 30 मीटर तक हिस्सा बफर जोन है। इससे झील के पास हरियाली के लिए जगह मिल जाती है, जो बेंगलुरु जैसे शहर के लिए बहुत ज़रूरी है जहां सिर्फ 4% हिस्सा ही हरा-भरा है। यह खाली जगह भूजल को रिचार्ज करने में मदद करती है, इसलिए ऐसे क्षेत्रों को कम नहीं बल्कि और अधिक किया जाना चाहिए।”
इसके अलावा, प्रस्तावित विधेयक में कहा गया है कि सरकार बफर जोन के भीतर के क्षेत्र का इस्तेमाल जन-सुविधाओं जैसे सड़कों, पुलों, बिजली की लाइनों, पानी की पाइपलाइन, या पंप हाउस और सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) के निर्माण के लिए कर सकती है। बेंगलुरु टाउन हॉल समूह के संयोजक संदीप अनिरुद्धन इस पर सवाल उठाते हैं। उनका कहना है कि बफर जोन को एक नो-डेवलपमेंट जोन ही रहना चाहिए, जहां सिर्फ पेड़-पौधे और घनी हरियाली हो। सड़कों या किसी भी अन्य तरह के निर्माण की अनुमति यहां नहीं दी जानी चाहिए।
पालूर ने कहा, “बफर जोन की भूमिका झील या तालाब के पानी की गुणवत्ता और उसके पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा करना है। इसलिए, सरकार द्वारा तय किए गए नए बफर जोन में सिर्फ उन्हीं गतिविधियों की अनुमति दी जानी चाहिए जो इन उद्देश्यों को पूरा करती हों।”
बफर जोन कम करने के पीछे की मंशा
विशेषज्ञों और कार्यकर्ताओं ने बताया है कि यह विधेयक रियल एस्टेट की योजनाओं को रास्ता देने का एक तरीका हो सकता है। बेंगलुरु में जमीन एक बहुत ही कीमती संसाधन है। पलूर कहते हैं, “यह पूरी तरह से रियल एस्टेट के नज़रिए से विकास को बढ़ावा देने की कोशिश लगती है।”
हालांकि, लघु सिंचाई मंत्री एन.एस. बोसेराजू इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हैं। उन्होंने मोंगाबे-इंडिया को बताया कि यहां कोई भी निजी रियल एस्टेट गतिविधि नहीं होगी। उन्होंने कहा, “हम केवल सुधार के लिए सरकारी कार्य करेंगे, जैसे सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट बनाना, जिससे वहां की जैव विविधता पर कोई असर नहीं पड़ेगा।”

मंत्री ने आगे स्पष्ट किया कि बफर जोन के नियमों में बदलाव इसलिए किया जा रहा है क्योंकि 30 मीटर का पुराना नियम छोटे जलाशयों पर भी एक समान लागू होता है, जो व्यावहारिक नहीं है। उन्होंने कहा, “मंगलुरु, उडुपी और राज्य के अन्य हिस्सों में कुछ तालाब तो महज आधा एकड़ के ही हैं, जो अपने बफर जोन के दायरे से भी छोटे हैं।” उन्होंने आगे बताया कि वहां के ग्रामीणों ने छोटे जलाशयों के लिए बफर जोन कम करने की मांग की है, क्योंकि मौजूदा नियमों के कारण उस क्षेत्र में बने उनके घरों तक को ‘अतिक्रमण’ माना जा रहा है।
मंत्री बोसेराजू ने आगे कहा, “राज्य में हमारे पास 41,800 से अधिक जलाशय हैं, जिनमें से 22,000 से अधिक पंचायत व्यवस्था के अंतर्गत आते हैं। ये सभी छोटे गांवों में स्थित एक से पांच एकड़ के जलाशय हैं। यही वे जगहें हैं जहां लोग 30 मीटर के मानक नियम के बजाय छोटा बफर जोन चाहते हैं।” उन्होंने इसकी तुलना बेंगलुरु जैसे शहरों से की, जहां जलाशय काफी बड़े हैं और वहां 30 मीटर का बफर जोन जरूरी है। बोसेराजू कहते हैं, “बेंगलुरु में ज्यादातर झीलें 100 एकड़ की हैं और कुछ 50 एकड़ में फैली हैं, इसलिए उन पर इस बदलाव का कोई खास असर नहीं पड़ेगा।”
पलूर उनके आंकड़ों पर सवाल उठाते हैं। उनका अनुमान है कि बेंगलुरु नगर निगम क्षेत्र में केवल 35 झीलें ही ऐसी हैं जो 100 एकड़ या उससे बड़ी हैं। लेकिन सरकार इस बारे में अलग आंकड़े पेश कर रही है।
बोसेराजू ने यह भी बताया कि इस विधेयक को तैयार करने से पहले सरकार ने 15 अन्य राज्यों के बफर जोन नियमों का अध्ययन किया है। उन्होंने कहा, “तमिलनाडु में जलाशयों के लिए बफर जोन केवल तीन मीटर है और तेलंगाना में यह लगभग 10 मीटर है।”
पलूर आगाह करते हैं कि अलग-अलग राज्यों के बफर जोन की इस तरह तुलना करना भ्रामक हो सकता है क्योंकि हर जगह की भौगोलिक स्थिति और जरूरतें अलग होती हैं। वह कहते हैं, “उदाहरण के लिए, तेलंगाना में छोटी झीलों के लिए बफर जोन की जरूरत कर्नाटका के नए प्रस्ताव से कहीं ज्यादा है।” उन्होंने समझाते हुए कहा, उत्तर भारत में झीलों के नीचे की मिट्टी रीचार्ज करने के लिए काफी अनुकूल है, इसलिए वहां जमीन के अंदर पानी पहुंचाने के लिए बहुत बड़े बफर जोन की शायद जरूरत न पड़े। लेकिन दक्षिण भारत में जलाशयों की सतह पर चिकनी मिट्टी की परत होती है जहां पानी बहुत धीरे-धीरे रिसता है, इसलिए यहां भूजल स्तर बढ़ाने के लिए ज़्यादा खुली जगह की आवश्यकता होती है।
पर्यावरण और लोगों पर प्रभाव
बफर जोन के लिए आकार-आधारित नए नियमों ने राज्य के पर्यावरण पर पड़ने वाले असर को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। राज्यपाल को दिए गए ज्ञापन में बीटीएच समूह ने अपने परिशिष्ट में कहा है कि अगर यह विधेयक कानून बन जाता है, तो इससे राज्य की “45,000 झीलों के पारिस्थितिकी तंत्र को ऐसा नुकसान होगा जिसकी भरपाई कभी नहीं की जा सकेगी” और पूरे राज्य में “करोड़ों पेड़ काट दिए जाएंगे।”
अनिरुद्धन समझाते हैं कि इसका सीधा असर इन संसाधनों पर निर्भर प्रणालियों, विशेष रूप से खेती पर पड़ेगा, जिससे भोजन और पानी की सुरक्षा का संकट पैदा हो सकता है। वह कहते हैं, “सिंचाई के लिए किसान इन झीलों पर निर्भर हैं, जो बारिश के पानी को जमा करती हैं। अगर आप उनके बफर जोन को छोटा कर देंगे, तो झीलों में पहुंचने वाले साफ पानी की मात्रा कम हो जाएगी। अगर झीलों की सेहत खराब हुई, तो राज्य का खाद्य उत्पादन भी प्रभावित होगा, जिससे लाखों किसान प्रभावित होंगे।”

शहरी विकास विभाग की हाल में जारी की गई अधिसूचना के अनुसार, झीलों के आसपास के बफर जोन के अलावा, राजकालुवे या स्टॉर्म वाटर निकासी के आसपास के बफर जोन को भी नए सिरे से परिभाषित किया जाएगा। प्रस्ताव के अनुसार, प्राथमिक (बड़े) नालों के लिए बफर जोन को मौजूदा 30 मीटर से घटाकर 15 मीटर कर दिया जाएगा। द्वितीयक नालों (मध्यम) के लिए 15 मीटर से घटाकर 10 मीटर और तृतीयक (छोटे) नालों के लिए 10 मीटर से घटाकर 5 मीटर कर दिया जाएगा।
हालांकि, शहर की झीलों में पानी के बाहर बहने या बाढ़ आने की समस्या शायद उतनी बड़ी न हो, लेकिन बफर ज़ोन कम करने का असर ‘राजकलुवे’ (बरसाती नालों) पर जरूर पड़ेगा। पलूर का कहना है कि बेंगलुरु की ज्यादातर झीलें कृत्रिम हैं और वे एक-दूसरे से एक कड़ी की तरह जुड़ी हुई हैं। जब एक झील भर जाती है, तो पानी बहकर अगली झील में चला जाता है। लेकिन प्राकृतिक जलाशयों के मामलों में पानी अक्सर ओवरफ्लो होकर बहने लगता है, जो यहां की कृत्रिम झीलों के सिस्टम में नहीं होता है।
वहीं, ‘राजकलुवे’ या स्टॉर्मवाटर ड्रेन के साथ सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे अक्सर उफान पर आ जाते हैं। शुभा समझाती हैं, “वे अपने आस-पास के इलाकों को जलमग्न कर देते हैं। इसका मतलब यह है कि राजकलुवे के जितने करीब निर्माण कार्य होगा, आप वहां रहने वाले लोगों को उतने ही बड़े जोखिम में डाल रहे होंगे, अब चाहे वह बीमारियों का खतरा हो, जान का हो या आजीविका का।”
आगे की राह
नागरिक समूहों और विशेषज्ञों के लिए इस फैसले से पहले जनता की राय नहीं लेना एक बड़ा मुद्दा है। अनिरुद्धन इस बात पर जोर देते हैं कि इतने बड़े और महत्वपूर्ण मुद्दों पर सरकार को सैद्धांतिक रूप से विशेषज्ञों से सलाह और आम जनता की राय जाननी चाहिए थी। वह कहते हैं, “लेकिन हमें ऐसी किसी भी चर्चा या परामर्श की कोई जानकारी नहीं है।”
शुभा रामचंद्रन का मानना है कि सभी झीलों के लिए 30 मीटर के पुराना नियम और अधिक से अधिक बफर जोन सुनिश्चित करना बेहतर है। वह आगे कहती हैं, “लेकिन अगर किसी विशेष झील के लिए इसमें बदलाव करने की जरूरत है, तो इसका कारण और पर्यावरण और प्रभाव को ठीक से समझने के लिए एक उचित व्यवस्था होनी चाहिए।”
बफर जोन कम करने के पीछे की मंशा भी मायने रखती है। वे समझाती हैं, “उदाहरण के तौर पर, अगर किसी खास झील के बफर जोन को थोड़ा कम करने से उस क्षेत्र की ट्रैफिक समस्या कम हो सकती है, तो उस पर विचार किया जा सकता है। इसलिए, बफर जोन के नियमों को एक ही चश्मे से देखने के बजाय हर मामले के आधार पर अलग-अलग परखने की जरूरत है।”
पलूर के अनुसार, जलाशयों के जल-विज्ञान, भू-तकनीक और पारिस्थितिक पहलुओं पर विचार करना चाहिए और विशेषज्ञों की सलाह लेनी चाहिए। उन्होंने विस्तार से बताया, “इसके लिए बुनियादी अध्ययन करने की जरूरत है कि बफर जोन कम करने से जलाशयों के आसपास की जैव विविधता और यहां तक कि हवा की गुणवत्ता पर क्या असर पड़ेगा।”
वहीं, शुभा इस विधेयक के संबंध में अधिक पारदर्शिता बरतने और इसमें जनता व विशेषज्ञों को शामिल करने की मांग करती हैं। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि इस तरह के निर्णय “पूरी ईमानदारी, सामूहिक राय और सबकी भागीदारी” के साथ लिए जाने चाहिए।
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 2 दिसंबर 2025 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: बेंगलुरु की केम्पांबुधि झील। प्रस्तावित विधेयक में कहा गया है कि सरकार बफर जोन का उपयोग सार्वजनिक सुविधाओं जैसे सड़क, पुल, बिजली की लाइनें, पानी की पाइपलाइन, पंप हाउस और सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट के निर्माण के लिए कर सकती है। तस्वीर- जीपीकेपी, विकिमीडिया कॉमन्स (CC BY-SA 4.0)।