- 2021 में उत्तराखंड के चमोली में हुए भूस्खलन में 200 से अधिक की जान गई, बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचा, और कई गाँवों में बिजली और संपर्क सेवाएं प्रभावित हुईं।
- एक नए अध्ययन में इस आपदा की तुलना स्विट्जरलैंड में 2025 में हुए ब्लैटन हिमस्खलन से की गई है। ब्लैटन में शुरुआती चेतावनी, तेज संचार और समय पर कार्रवाई से लोगों को सुरक्षित निकाल लिया गया।
- अध्ययन के लेखकों ने जोखिम वाली ढलानों की पहचान, जमीन पर निगरानी, चेतावनी के स्पष्ट मानक और मजबूत संचार प्रणाली विकसित करने की सिफारिश की है।
वर्ष 2021 में उत्तराखंड में आई बाढ़, जिसे चमोली आपदा के नाम से जाना जाता है, को अब पाँच साल बीत गए हैं। इस आपदा में 200 से अधिक लोगों की मौत हुई थी। इ्स साल प्रकाशित हुए एक नए अध्ययन ने चमोली आपदा की तुलना स्विट्जरलैंड में 2025 में हुए ब्लैटन हिमस्खलन से करते हुए हिमालय में आपदा से निपटने की तैयारी की पड़ताल की है। ब्लैटन में बर्फ और चट्टानों का बड़ा हिमस्खलन हुआ था, जिसमें गाँव का ज्यादातर हिस्सा दब गया था। हालाँकि, लोगों को पहले ही सुरक्षित निकाल लिया गया था, इसलिए इस घटना में सिर्फ एक व्यक्ति की मौत हुई। अध्ययन में बताया गया है कि स्विट्जरलैंड की शुरुआती चेतावनी प्रणाली, खासकर निगरानी, संचार और समुदाय से जुड़ी प्रतिक्रिया व्यवस्था को हिमालय की परिस्थितियों के अनुसार कैसे अपनाया जा सकता है।
अध्ययन में कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियर सिकुड़ रहे हैं, पर्माफ्रॉस्ट पिघल रहा है और अत्यधिक बारिश की घटनाएं बढ़ रही हैं। ऐसे में आपदा के जोखिम को कम करने के लिए प्रभावी उपाय जरूरी हैं।
कम्युनिकेशंस अर्थ एंड एनवायरनमेंट जर्नल में प्रकाशित यह अध्ययन चमोली आपदा को गर्मी बढ़ने से जुड़े पहाड़ी खतरों के बड़े पैटर्न से जोड़कर देखता है। अध्ययन में कहा गया है कि ऐसी घटनाएं अलग-थलग नहीं हैं। जोखिम प्रबंधन और आपदा से जुड़ी तैयारी में इन्हें ज्यादा स्पष्ट रूप से पहचानने की जरूरत है। अध्ययन में कहा गया है, “शुरुआती चेतावनी प्रणालियों को छोटे पायलट प्रोजेक्ट से आगे बढ़ाकर राष्ट्रीय आपदा तैयारी का अहम हिस्सा बनाया जाना चाहिए।”
चमोली और ब्लैटन की तुलना
भारत के राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण, एनडीएमए, की उत्तराखंड आपदा पर विस्तृत रिपोर्ट के अनुसार, यह घटना 7 फरवरी 2021 को सुबह लगभग 10:08 बजे शुरू हुई। उस समय गढ़वाल हिमालय के ऊपरी हिस्से में चट्टान का एक बड़ा हिस्सा छोटे ग्लेशियर के साथ टूटकर गिरा। इससे हवा का तेज दबाव बना और रौंथी गधेरा, ऋषिगंगा और धौलीगंगा घाटियों में भारी मात्रा में मलबा बहने लगा।
इस आपदा में रैणी और तपोवन की जलविद्युत परियोजनाओं के साथ सड़कें और पुल भी क्षतिग्रस्त हुए। इस घटना में 204 लोगों की मौत हुई और 13 गांवों में बिजली, पानी की आपूर्ति और संपर्क सेवाएं प्रभावित हुईं। रिपोर्ट में कहा गया है कि यह आपदा ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड, यानी हिमनद झील फटने से आई बाढ़, के कारण नहीं हुई थी। इसकी वजह चट्टान टूटने और छोटे ग्लेशियर की बर्फ के साथ आया हिमस्खलन था।

वहीं, ब्लैटन के मामले में स्थानीय लोगों ने ढलान पर असामान्य गतिविधि की सूचना दी थी। इसके बाद कैंटन और संघीय स्तर के विशेषज्ञों ने राडार इंटरफेरोमेट्री, जीपीएस स्टेशन और थर्मल व ऑप्टिकल कैमरे लगाए। इनसे ढलान में तेजी से हो रहे बदलाव की पुष्टि हुई। इसके बाद 19 मई 2025 को लोगों को सुरक्षित स्थानों पर ले जाने का आदेश दिया गया। मुख्य हिमस्खलन 28 मई 2025 को हुआ, उससे पहले लगभग 300 लोगों और उनके पशुओं को वहां से निकाल लिया गया था। अध्ययन में कहा गया है कि यह प्रतिक्रिया आसानी से उपलब्ध जोखिम की जानकारी (रिस्क कम्यूनिकेशन), अलग-अलग स्तरों पर समन्वय और स्पष्ट जिम्मेदारियों को दिखाती है।
अध्ययन के लेखकों में शामिल रईस अहमद ने कहा कि चमोली और ब्लैटन की तुलना से पता चलता है कि आपदा के नतीजों को जितना खतरे की गंभीरता प्रभावित करती है, उतना ही प्रभाव आपदा से निपटने की तैयारी भी डालती है। अहमद भारतीय विज्ञान संस्थान के दिवेचा सेंटर फॉर क्लाइमेट चेंज में प्रोजेक्ट साइंटिस्ट हैं। उन्होंने मोंगाबे-इंडिया को ईमेल से दिए जवाब में कहा, “चमोली आपदा और ब्लैटन हिमस्खलन की तुलना से सबसे अहम सबक यह है कि आपदा के नतीजे सिर्फ खतरे के आकार से तय नहीं होते, तैयारी भी उन्हें तय करती है। दोनों ही बड़े बर्फ-चट्टान हिमस्खलन थे, लेकिन उनके प्रभाव बहुत अलग रहे। ब्लैटन में ढलान की अस्थिरता का पता शुरुआत में लगने, तेज संचार और समय पर लोगों को निकाले जाने से इस घटना में मौतों का आंकड़ा एक तक सीमित किया जा सका। वहीं चमोली में निगरानी और समन्वय के अभाव में 200 से अधिक लोगों की मौत हुई।”
उन्होंने कहा कि यह तुलना ध्यान को खतरे से हटाकर इस बात पर ले जाती है कि समाज चेतावनियों पर कैसी प्रतिक्रिया देता है। उन्होंने कहा, “इससे पता चलता है कि ऐसी आपदाएं अक्सर पूरी तरह अप्रत्याशित नहीं होतीं, बल्कि उनके लिए पर्याप्त तैयारी नहीं होती।”
अध्ययन में कहा गया है, “तबाही और बचाव के बीच का फर्क किस्मत नहीं, बल्कि तैयारी, निगरानी और तेज प्रतिक्रिया थी।”
अध्ययन के सह-लेखक और ग्लेशियोलॉजिस्ट वान ट्रिख्ट के अनुसार, स्विट्जरलैंड का उदाहरण बताता है कि निगरानी तकनीक जितनी जरूरी थी, उतनी ही अहम शासन-व्यवस्था और तैयारी भी थी। वान ट्रिख्ट व्रीजे यूनिवर्सिटाइट ब्रसेल्स में पोस्टडॉक्टरल शोधकर्ता हैं और ईटीएच ज्यूरिख में ग्लेशियोलॉजी प्रोफेसरशिप से जुड़े हैं। उन्होंने ईमेल से दिए जवाब में कहा, “ब्लैटन में लोगों को सफलतापूर्वक सुरक्षित निकालने में तकनीक से ज्यादा शासन-व्यवस्था और तैयारी की भूमिका रही। स्थानीय लोगों की शुरुआती टिप्पणियों को गंभीरता से लिया गया और उन्हें तेजी से एक मजबूत आपदा प्रबंधन ढांचे में साझा किया गया, जहां स्थानीय और राष्ट्रीय स्तरों पर भूमिकाएं और जिम्मेदारियां स्पष्ट रूप से तय थीं।”

कमतर आंका जानेवाला जोखिम
अध्ययन में कहा गया है कि हिमालय में बर्फ और चट्टानों के हिमस्खलन को नीतियों और जोखिम के आकलन में अब भी कम समझा और दर्ज किया गया है। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि ऐसी घटनाएं कम होती हैं। इन्हें अक्सर भूस्खलन या हिमनद से जुड़े खतरों की व्यापक श्रेणी में रख दिया जाता है। इससे इनके अलग कारण, टूटने की प्रक्रिया और मलबे के तेज बहाव की क्षमता स्पष्ट नहीं हो पाती।
अहमद ने कहा कि वर्गीकरण की यह कमी विज्ञान और तैयारी, दोनों को प्रभावित करती है।
उन्होंने यह भी कहा कि इस खतरे का अध्ययन करना अपने-आप में कठिन है। उन्होंने कहा, “वैज्ञानिक रूप से इनमें पर्माफ्रॉस्ट के कमजोर पड़ने, ग्लेशियरों के सिकुड़ने और तापमान में बदलाव से ढलानों के कमजोर होने जैसे जटिल कारण शामिल होते हैं। ये घटनाएं ठोस चट्टान या बर्फ के टूटने से शुरू होकर तेजी से बहने वाले मलबे के प्रवाह में बदल सकती हैं। बाढ़ या जीएलओएफ जैसे खतरों की तुलना में इनके लिए कम आँकड़े उपलब्ध हैं और निगरानी के स्थापित ढांचे भी कम हैं।”
अध्ययन में यह भी कहा गया है कि ग्लेशियरों से पोषित और पर्माफ्रॉस्ट से प्रभावित घाटियों में जोखिम के आकलन, पर्माफ्रॉस्ट के कमजोर पड़ने, हिमनद झीलों के फैलने, ढलानों की बढ़ती अस्थिरता और एक के बाद एक जुड़ी आपदाओं की पूरी तस्वीर को शामिल नहीं कर पाते। इसी बीच, जोखिम वाले घाटी क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे का विस्तार जारी है।
खतरे का स्तर इस बात से भी तय होता है कि लोग और ढांचा कितने जोखिम में हैं और ऐसी घटनाएं कितनी बार हो रही हैं। अलग-अलग जगहों पर गतिविधि अलग हो सकती है, लेकिन पहाड़ी घाटियों में बुनियादी ढांचे और आबादी के बढ़ने से जोखिम बढ़ने की आशंका है। तापमान बढ़ने से ग्लेशियरों का आकार, पर्माफ्रॉस्ट और ढलानों की स्थिरता बदल रही है। इससे ज्यादा जोखिम वाले क्षेत्र भी बदल सकते हैं।
भारत उत्तराखंड में मौसम और आपदा निगरानी प्रणाली का विस्तार कर रहा है। नवंबर 2025 में देहरादून में हुए वर्ल्ड समिट ऑन डिजास्टर मैनेजमेंट में केंद्रीय पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह ने कहा था कि सरकार ने निगरानी ढांचे का विस्तार किया है। इसमें 33 मौसम वेधशालाएं, 142 स्वचालित मौसम स्टेशन, 107 वर्षामापी और तीन मौसम राडार शामिल हैं। तीन और राडार लगाए जाने की योजना है। उन्होंने यह भी कहा था कि हिमालय के लिए एक विशेष जलवायु अध्ययन कार्यक्रम शुरू किया गया है और बड़े शहरों में इस्तेमाल होने वाली “नाउकास्ट” चेतावनी प्रणाली, जो तीन घंटे का पूर्वानुमान देती है, पूरे राज्य में बढ़ाई जा रही है।
हालाँकि, अहमद का अध्ययन बताता है कि मौसम से जुड़ी व्यापक तैयारी, बर्फ-चट्टान हिमस्खलन जैसे तेजी से घटने वाले क्रायोस्फियर, यानी बर्फ और ग्लेशियर से जुड़े खतरों, से पूरी तरह नहीं निपटती। अध्ययन का तर्क है कि ऐसे जोखिमों को योजना, निगरानी और प्रतिक्रिया प्रणालियों में अभी पर्याप्त रूप से शामिल नहीं किया गया है। इस कारण पहाड़ी समुदाय कमजोर स्थिति में बने रहते हैं, जबकि केंद्रित निगरानी और समन्वित कार्रवाई से कई चेतावनी संकेतों को पहले पहचाना जा सकता है।

संकेतों के अध्ययन की चुनौतियां
शोधकर्ताओं का कहना है कि चमोली की घटना को “सेंटिनल कैस्केडिंग हैजर्ड”, यानी चेतावनी देने वाली कड़ी-दर-कड़ी आपदा, के रूप में देखा जाना चाहिए। यानी ऐसी घटना, जिसने हिमालय में आपदा जोखिम प्रबंधन की गहरी कमजोरियों को सामने रखा। अहमद ने कहा, “चमोली घटना के बाद किए गए विश्लेषण कई उपयोगी शुरुआती संकेतों की ओर इशारा करते हैं। इनमें इनसार के जरिए दिखने वाली ढलान का धीरे-धीरे खिसकना, दरारों का चौड़ा होना और अंदरूनी कमजोरी दिखाने वाली तापीय असामान्यताएं शामिल हैं। हालांकि, बड़ी सीमा यह है कि ये संकेत अक्सर बहुत हल्के होते हैं और इन्हें सामान्य बदलावों से अलग पहचानना मुश्किल होता है।”
अहमद ने आगे कहा, “कई मामलों में ऐसे बदलाव महीनों से लेकर कई वर्षों तक दिख सकते हैं, लेकिन इन संकेतों के आधार पर समय रहते चेतावनी जारी करना मुश्किल है। इसकी वजह लगातार निगरानी की कमी, चेतावनी के स्पष्ट मानकों का अभाव और अलग-अलग सेंसर से मिले डेटा का पर्याप्त एकीकरण न होना है।”
अध्ययन में कहा गया है कि हिमालय में चुनौती पूरी पर्वत श्रृंखला की रियल-टाइम निगरानी करना नहीं है। असली जरूरत यह है कि सैटेलाइट रिकॉर्ड की मदद से ऐसी कुछ ढलानों की पहचान की जाए, जो भू-आकृति के लिहाज से ज्यादा जोखिम वाली हैं। इसके बाद सबसे अधिक जोखिम वाली जगहों पर लक्षित निगरानी व्यवस्था लगाई जा सकती है।
चमोली से पहले शुरुआती गतिविधियों की ओर पहले के सरकारी शोध ने भी इशारा किया था। साल 2022 की एक सरकारी प्रेस रिलीज में कहा गया था कि आपदा से पहले यह क्षेत्र भूकंपीय रूप से सक्रिय था और मुख्य टूटन से पहले कई शुरुआती संकेत मिले थे। प्रेस रिलीज के अनुसार, सैटेलाइट विश्लेषण से पता चला कि विफलता क्षेत्र के पास पिछले पांच वर्षों में दरारें धीरे-धीरे बढ़ रही थीं। इसमें यह भी कहा गया कि मुख्य टूटन से लगभग 2 घंटे 30 मिनट पहले तक भूकंपीय संकेत सक्रिय थे।
स्पष्ट चेतावनी, मजबूत संचार प्रणाली की जरूरत
अहमद के अध्ययन में कहा गया है कि हिमालयी राज्यों को मौतों की संख्या कम करने के लिए स्विट्जरलैंड की पूरी निगरानी प्रणाली को हूबहू अपनाने की जरूरत नहीं है। इसके बजाय अध्ययन एक चरणबद्ध तरीका सुझाता है। इसके तहत सैटेलाइट और भू-आकृति विश्लेषण से ज्यादा जोखिम वाली ढलानों की पहचान की जा सकती है, चुनिंदा जगहों पर जमीन पर निगरानी व्यवस्था लगाई जा सकती है, चेतावनी के स्पष्ट मानक तय किए जा सकते हैं, संचार प्रणालियों को मजबूत किया जा सकता है और अलर्ट को उन अधिकारियों व समुदायों से जोड़ा जा सकता है, जो समय पर कार्रवाई कर सकें। अध्ययन में जोखिम क्षेत्रों की नई पहचान, सीमापार समन्वय को मजबूत करने और विकास योजनाओं में क्रायोस्फियर से जुड़े खतरों को बेहतर तरीके से शामिल करने की भी जरूरत बताई गई है।
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वान ट्रिख्ट ने कहा, “स्विस मॉडल से हिमालय के लिए सबसे ज्यादा अपनाने लायक चीजें उसकी मूल बातें हैं, न कि उसकी तकनीकी जटिलता।” उन्होंने कहा कि स्विट्जरलैंड जैसी घनी और उच्च-तकनीक निगरानी व्यवस्था और वहां जैसा संस्थागत समन्वय हिमालय में दोहराना मुश्किल है। इसकी वजह सीमित फंडिंग, कनेक्टिविटी की कमी और बिखरी हुई शासन व्यवस्था है।
जब उनसे पूछा गया कि शुरुआती चेतावनी की न्यूनतम प्रणाली कैसी हो सकती है, तो वान ट्रिख्ट ने कहा कि इसके लिए “एक सरल, लेकिन काम करने वाली शुरुआती चेतावनी श्रृंखला” चाहिए। इसमें सैटेलाइट डेटा से खतरनाक ढलानों की पहचान, अहम जगहों पर सीमित संख्या में कम लागत वाले सेंसर, सायरन, रेडियो या एसएमएस जैसे भरोसेमंद चेतावनी माध्यम और लोगों को सुरक्षित निकालने का आदेश देने वाली स्पष्ट जिम्मेदार संस्था होनी चाहिए।
उन्होंने कहा, “कुल मिलाकर, प्राथमिकता आपदा के बाद प्रतिक्रिया देने की व्यवस्था से हटकर, खतरे का पहले से अनुमान लगाकर जोखिम प्रबंधन करने की ओर होनी चाहिए।”
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 28 अप्रैल, 2026 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: 2021 में हुए हिमस्खलन के दो दिन बाद तपोवन बैराज का हवाई दृश्य। जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियर सिकुड़ रहे हैं, पर्माफ्रॉस्ट पिघल रहा है और अत्यधिक बारिश की घटनाएं तेज हो रही हैं। ऐसे में आपदा के जोखिम को कम करने के लिए प्रभावी उपाय जरूरी हैं। तस्वीर: एपी फोटो.