- कई अध्ययनों से पता चला है कि दुनिया भर की नदियों में नदी-संबंधी लू (नदी-जल का सामान्य से अधिक तापमान) की तीव्रता और आवृत्ति बढ़ रही है।
- मॉडलिंग अध्ययनों के मुताबिक इस सदी के आखिर तक गंगा के आधे से ज्यादा हिस्सों में साल भर लू चलेगी, जिससे बड़ी आबादी इसकी चपेट में आएगी।
- इसे बेहतर तरीके से समझने में आंकड़ों की कमी और नदी-जल तापमान के अध्ययन की जटिलताएं बड़ी बाधाएं हैं।
जलवायु परिवर्तन के असर अब केवल हवा और समुद्र तक सीमित नहीं हैं। दुनिया की नदियां भी असामान्य गर्मी झेल रही हैं, जिसका असर मछलियों, जैव विविधता, पानी की गुणवत्ता और नदी पर निर्भर समुदायों पर पड़ सकता है।
नदी-लू को ऐसे समय के रूप में परिभाषित किया जाता है, जब नदी-जल का दैनिक औसत तापमान स्थानीय रूप से निर्धारित और मौसम के अनुसार बदलने वाले नदी के तापमान के 90वें परसेंटाइल स्तर से कम से कम लगातार पांच दिनों तक ज्यादा बना रहता है। आसान शब्दों में कहें, तो जब किसी स्थान और साल के उस समय के लिए नदी का तापमान उसके पिछले दर्ज तापमानों के 90 प्रतिशत से अधिक हो जाता है, तो उसे लू माना जाता है। यानी नदी के पानी का लंबे समय तक सामान्य से ज्यादा गर्म बने रहना। वहीं, कम अवधि के लिए तापमान में बढ़ोतरी को “हीट स्पाइक” यानी अचानक तापमान बढ़ना कहा जाता है।
इस साल की शुरुआत में प्रकाशित एक मॉडलिंग अध्ययन में शोधकर्ताओं ने बताया कि 1976 से 2005 के बीच दुनिया भर में औसतन हर साल 2.19 बार नदी-संबंधी लू की घटनाएं देखी गईं। इस अवधि में नदी-संबंधी लू की तीव्रता और अवधि में क्रमशः प्रति दशक 0.02 डिग्री सेल्सियस और 0.09 हफ्ते की दर से बढ़ोतरी हुई है। अनुमान बताते हैं कि ज्यादा जलवायु उत्सर्जन वाली स्थिति में 21वीं सदी के आखिर तक नदी-संबंधी लू में 95 गुना तक की बढ़ोतरी हो सकती है।
अध्ययन में अनुमान लगाया गया है कि उपरोक्त स्थिति में 2090 के दशक तक भारत में गंगा नदी का आधा से अधिक हिस्सा पूरे साल लू की चपेट में रहेगा। इससे नदी पारिस्थितिकी तंत्र को व्यापक नुकसान होगा। साथ ही, गंगा पर निर्भर आबादी पर लू का दुष्प्रभाव (पेयजल, खेती और मछली पालन पर असर) भी दुनिया में सबसे ज्यादा होगा।

कई तरह के दुष्प्रभाव
नदी-संबंधी लू का इसके पारिस्थितिकी तंत्र और उन पर निर्भर जीवों पर कई तरह से असर पड़ सकता है। इस दबाव से उनकी प्रजनन दर प्रभावित हो सकती है, उनका पलायन कम हो सकता है और उनकी खाद्य श्रृंखला में बदलाव आ सकता है। चूंकि, अलग-अलग जीव गर्मी के इस दबाव पर अलग-अलग तरह से प्रतिक्रिया देते हैं, इसलिए मौजूदा शोध से पता चलता है कि इसके नतीजे भी काफी अलग-अलग हो सकते हैं।
उदाहरण के लिए, भारतीय मीठे पानी की मछली मागुर (क्लैरियस मागुर) पर किए गए एक अध्ययन से पता चला है कि बहुत ज्यादा गर्मी के संपर्क में आने पर इस प्रजाति की प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर हो जाती है। ऊतकों और शारीरिक अंगों को भी गंभीर नुकसान पहुंचता है। रोहू (लैबियो रोहिता) मछली पर अध्ययन से पता चलता है कि थोड़े समय के लिए भी अत्यधिक गर्मी पड़ने से ऊर्जा चयापचय और प्रतिरक्षा प्रणाली के नियमन में शामिल प्रोटीन के उत्पादन में बदलाव होता है और अन्य शारीरिक प्रतिक्रियाएं भी बदल जाती हैं।
इसके अलावा, वैश्विक रिपोर्टों से यह भी पता चलता है कि नदी-संबंधी लू के परोक्ष असर भी हो सकते हैं, जैसे कि रोगजनकों के प्रसार को बढ़ावा मिलना और नदी-जल की गुणवत्ता का कम होना।
अमेरिका की जॉर्जिया यूनिवर्सिटी के ओडम स्कूल ऑफ इकोलॉजी में डॉक्टोरल छात्र शिशिर राव बताते हैं, “नदी-जल का तापमान जैविक उत्पादकता, खाद्य-श्रृंखला को बनाए रखने और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के काम करने में अहम भूमिका निभाता है। तापमान में बदलाव पत्तियों के कचरे के विघटन तथा कार्बन के प्रसंस्करण और भंडारण जैसी प्रक्रियाओं को प्रभावित करता है। इन प्रक्रियाओं में होने वाले बदलाव खाद्य श्रृंखला में व्यापक असर डाल सकते हैं जिससे जलीय कीट, कड़े खोल वाले जलीय जीव, मछलियां और जलीय स्तनधारी प्रभावित होते हैं।” राव का शोध भारत के पश्चिमी घाट की उष्णकटिबंधीय नदियों पर आधारित है।

कर्नाटक के पश्चिमी घाट की कुछ नदियों पर छोटी पनबिजली परियोजनाओं (एसएचपी) के प्रभावों से जुड़े शोध बताते हैं कि ऐसे प्रोजेक्ट नदी-संबंधी लू को बढ़ावा दे सकते हैं। राव बताते हैं, “हमारे अध्ययनों में पाया गया कि एसएचपी के कारण कम बहाव वाला नदी का हिस्सा पारिस्थितिकी के लिहाज से सबसे ज्यादा बदलाव वाला क्षेत्र था। इस हिस्से में पानी की गहराई और फैलाव कम होने से खास तौर पर सूखे मौसम में पानी का तापमान बढ़ गया और घुली हुई ऑक्सीजन का स्तर घट गया। साथ ही, मछलियों की प्रजातियों में भी बदलाव देखा गया जहां खास, देसी, स्थानीय और तेज बहाव वाले पानी के अनुकूल प्रजातियों की जगह सामान्य, धीमे पानी और जलकुंडों में रहने वाली प्रजातियां बढ़ने लगीं। यह जलीय समुदाय में बड़े बदलाव का संकेत है।”
राव बताते हैं कि समुद्री की तरह नदी-संबंधी लू भी उन स्थानीय और संकटग्रस्त प्रजातियों पर अतिरिक्त दबाव डालती हैं, जिनकी तापमान सहन करने की क्षमता सीमित होती है। वहीं, अधिक तापमान सहन करने वाली आक्रामक प्रजातियों को इससे फायदा होता है।
नदी के तापमान और बारिश के पैटर्न में बदलाव से गंगा में कॉमन कार्प (इजरायली मछली), तिलापिया और अफ्रीकन कैटफिश जैसी आक्रामक प्रजातियों में बढ़ोतरी देखी गई है। शोध में पाया गया कि 2009 से 2019 के बीच नदी के मध्य हिस्से का सालाना औसत तापमान 0.9 से बढ़कर 1.88 डिग्री सेल्सियस हो गया। नदी जल के तिमाही और सालाना आधार पर लिए गए आंकड़ों से यह भी सामने आया कि तापमान में बढ़ोतरी रैखिक (धीरे-धीरे) नहीं थी, बल्कि यह कम समय में अचानक बढ़ोतरी थी। तापमान और बारिश में हुए इन बदलावों का प्रभाव नदी में आक्रामक प्रजातियों की आबादी पर पड़ा।

अधूरे आंकड़े
ईटीएच ज्यूरिख के वायुमंडलीय और जलवायु विज्ञान संस्थान और स्विट्जरलैंड के दावोस स्थित डब्ल्यूएसएल हिम और हिमस्खलन अनुसंधान संस्थान की असिस्टेंट प्रोफेसर मैनुएला ब्रूनर कहती हैं, “नदी-संबंधी लू ऐसा खतरा है जो पानी से जुड़ी दूसरी बड़ी घटनाओं जैसे बाढ़ और सूखे की तरह स्पष्ट तौर पर दिखाई नहीं देता। जलवायु परिवर्तन के कारण ये घटनाएं अब ज्यादा बार होने लगी हैं, क्योंकि इनका सीधा संबंध हवा के तापमान से है। यही वजह है कि इन पर अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए।” ब्रूनर नेचर वॉटर में नदी-संबंधी लू पर 2025 में छपने वाले एक लेख की सह-लेखिकाओं में से शामिल हैं।
इस शोधपत्र में लेखकों ने बताया है कि हवा के तापमान के अलावा नदी-जल का तापमान झीलों और सहायक धाराओं जैसे अन्य जल निकायों के साथ होने वाली अंतःक्रियाओं तथा भूजल व सतही जल के मिश्रण से भी प्रभावित होता है। नदी के किनारों पर मौजूद वनस्पति के साथ ही गंदा पानी और औद्योगिक बहाव के कारण होने वाले मानवजनित प्रभाव भी नदी-संबंधी लू का अध्ययन करते समय महत्वपूर्ण कारक हैं। ब्रूनर आगे कहती हैं, “पानी का कम प्रवाह और बर्फ के पिघलने से मिलने वाले पानी की कमी भी लू को बढ़ावा देते हैं। अगर ये दोनों चीजें पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हों, तो इससे नदी-संबंधी लू का असर कम हो सकता है।”
नीदरलैंड की यूट्रेक्ट यूनिवर्सिटी में जियोसाइंस विभाग में फिजिकल ज्योग्राफी विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर निको वांडर्स बताते हैं कि एक और मुश्किल यह है कि नदी-संबंधी लू अक्सर अकेले नहीं आती। वांडर्स जनवरी 2026 में प्रकाशित उस शोध पत्र के सह-लेखक हैं, जिसमें दुनिया भर में नदियों की लू की बढ़ती तीव्रता के बारे में बताया गया है।
“नदी-संबंधी लू के दौरान, हम अक्सर सामान्य लू और सूखे की स्थिति भी देखते हैं। समाज पर इनका असर नदी-संबंधी लू की तुलना में कहीं ज्यादा हो सकता है, लेकिन नदी-संबंधी लू का जैव-विविधता और औद्योगिक कूलिंग वॉटर के उत्पादन पर विनाशकारी प्रभाव पड़ता है,” वांडर्स कहते हैं।
“सबसे बड़ी चुनौती निगरानी करना, जटिल अंतर्क्रियाओं को समझने के लिए पर्याप्त आंकड़े जुटाना और साथ ही पानी के ज्यादा तापमान के अलग-अलग स्रोतों के प्रभाव को समझना है,” वह आगे कहते हैं।
भारतीय नदियों के संदर्भ में आंकड़ों की कमी बड़ी चुनौती है। इससे नदी के बदलते जल तापमान और उससे उत्पन्न होने वाली लू पर चर्चा कमजोर हो जाती है। हालांकि, हैदराबाद स्थित इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी का हाइड्रोक्लाइमेटिक रिसर्च ग्रुप इस समस्या के कुछ अहम पहलुओं को समझने और आंकड़ों की कमी को दूर करने पर काम कर रहा है।
इस टीम ने नदी जल के तापमान का अध्ययन करने और भविष्य की प्रवृत्तियों का अनुमान लगाने के लिए हाइब्रिड मॉडल विकसित किए हैं। भारत के सात नदी जलग्रहण क्षेत्रों पर किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि ठंड के मौसम में नदी-जल के तापमान में सबसे अधिक सालाना बढ़ोतरी मूसी नदी में देखी गई, जहां तापमान हर साल 0.16 डिग्री सेल्सियस बढ़ रहा है। वहीं, गर्मियों के मौसम में तुंगभद्रा जलग्रहण क्षेत्र में तापमान की बढ़ोतरी सबसे ज्यादा पाई गई, जो प्रति वर्ष 0.35 डिग्री सेल्सियस रही।

अध्ययन में यह सामने आया कि नदी-जल के तापमान में होने वाली बढ़ोतरी हवा के तापमान में होने वाली बढ़ोतरी के सीधे अनुपात में नहीं होती है। गंगा, कावेरी और गोदावरी नदी-बेसिन के लिए, हवा के तापमान में हुई बढ़ोतरी (गंगा: -0.07 डिग्री सेल्सियस/वर्ष, कावेरी: -0.06 डिग्री सेल्सियस/वर्ष और गोदावरी: -0.03 डिग्री सेल्सियस/वर्ष) का पानी के तापमान पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा। यह निगरानी बताती है कि नदी-जल के तापमान और लू की स्थितियों को प्रभावित करने वाले अनेक कारकों को ध्यान में रखना बहुत अहम है।
अध्ययन में यह भी पाया गया कि नदी-जल के तापमान में एक डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी, घुलित ऑक्सीजन के संतृप्ति स्तर को 2.3% तक कम कर देती है। जैव-विविधता को बनाए रखने और पानी की गुणवत्ता पक्की करने के लिए घुली हुई ऑक्सीजन की सांद्रता बहुत जरूरी है।
आईआईआईटी की एसोसिएट प्रोफेसर और हाइड्रोक्लाइमेटिक रिसर्च ग्रुप की प्रमुख रेहाना शेख बताती हैं कि जहां मॉडलिंग अध्ययन डेटा की कुछ कमियों को दूर करने में मदद कर सकते हैं, वहीं नदियों के बढ़ते तापमान और लू की घटनाओं के व्यापक असर को समझने के लिए कई विषयों से बना तरीका अनिवार्य है।
वह आगे कहती हैं, “नदी-जल का तापमान सिर्फ हाइड्रोलॉजिकल वेरिएबल नहीं है। यह जलविज्ञान, जलवायु विज्ञान, पर्यावरण इंजीनियरिंग, डेटा विज्ञान और सार्वजनिक नीति जैसे विषयों के संयोजन पर आधारित है। उदाहरण के लिए, उत्तर भारत में हिमालयी ग्लेशियरों के पिघलने का असर गंगा के निचले हिस्सों के तापीय स्वरूप पर पड़ता है। वहीं, मूसी नदी जैसे अर्ध-शुष्क बेसिनों में वाष्पीकरण और कम बहाव तापमान में बढ़ोतरी को तेज कर देते हैं। नर्मदा और गोदावरी जैसे बेसिनों में प्रदूषण तापमान से जुड़ी दिक्कतों को बढ़ाता है और जलवायु परिवर्तन इस पूरी प्रणाली को और जटिल बना देता है।”

समाधान की तलाश
मौजूदा जलवायु परिवर्तन संकट के बीच नदी-संबंधी लू चिंता का उभरता हुआ विषय बन गई है। न्यूजीलैंड की कैंटरबरी यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर और रदरफोर्ड डिस्कवरी फेलो जोनाथन टोनकिन बताते हैं कि इन चीजों को समझने के लिए डेटा इकट्ठा करना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी नदियों को मौसम की चरम घटनाओं से बचाने के लिए पहले से ही कदम उठाना भी है। अपने हालिया रिव्यू आर्टिकल में, टोनकिन और दुनिया भर के अन्य शोधकर्ताओं ने इस बात पर जोर दिया है कि मौसम की चरम घटनाएं नदियों की जैव-विविधता को तेजी से बदल रही हैं। ऐसे में, अब ऐसे समाधानों पर विचार करना बहुत जरूरी हो गया है जो नदियों में विपरीत परिस्थितियों का सामना करने की क्षमता को बढ़ावा दें।
टोनकिन कहते हैं, “इस समय सबसे जरूरी चीज यह है कि सिर्फ स्थानीय स्तर के हस्तक्षेपों से आगे बढ़ा जाए और बहाली के ऐसे उपायों पर ध्यान दिया जाए जो पूरी नदी-घाटी को शामिल करें। ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र में होने वाली कोई भी चरम घटना पूरे नदी तंत्र को प्रभावित कर सकती है। पारिस्थितिकी और जैविक प्रतिक्रियाएं भी निचले हिस्सों तक फैल सकती हैं। इसलिए बड़े पैमाने पर बहाली को प्राथमिकता देने के लिए पूरे जलग्रहण क्षेत्र या नदी प्रणाली के बारे में सोचना बहुत जरूरी है।”
राव बताते हैं कि ऐसा करने का एक तरीका नदी किनारे के जंगलों को फिर से बहाल करना और उनका संरक्षण हो सकता है। वह कहते हैं, “नदी किनारे की वनस्पति छाया प्रदान करती है, जिससे पानी के गर्म होने की प्रक्रिया धीमी हो जाती है। साथ ही, यह नदी तटों को स्थिर बनाए रखने और जलीय आवासों को बेहतर बनाने में भी मदद करती है। हालांकि, उपयुक्त प्रजातियों और पेड़ लगाने के लिए जगहों का चुनाव सावधानी से किया जाना जरूरी है, क्योंकि कुछ आक्रामक पेड़ बड़ी मात्रा में पानी का इस्तेमाल करते हैं, जिससे नदी में पानी की कुल उपलब्धता कम हो सकती है।”
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राव इस बात पर भी जोर देते हैं कि पनबिजली, पेयजल और सिंचाई की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए जलाशयों का उचित प्रबंधन किया जाए, ताकि नदियों में पर्याप्त बहाव बना रहे। राव कहते हैं, “अगर नदी प्रणाली में पर्याप्त पानी बनाए रखा जाए, तो पर्यावरणीय प्रवाह नदियों को जलवायु संबंधी चरम परिस्थितियों के असर से बचाने में मददगार हो सकता है।”
टोनकिन आगे कहते हैं कि नदी प्रणालियों में ‘थर्मल रिफ्यूज’ यानी गर्मी से बचने की जगहों को ढूंढ़ना और उनकी सुरक्षा करना भी जरूरी है। वह बताते हैं, “इसके लिए जमीनी स्तर पर कुछ बुनियादी निगरानी की जरूरत होगी, जिसमें कोई व्यक्ति नदी प्रणाली में प्राकृतिक ठंडे पानी वाली जगहों की खोज करेगा। इन ‘सुरक्षित ठिकानों’ की पहचान करना, पूरे पारिस्थितिकी के भविष्य के लिए बुनियादी तौर पर बहुत जरूरी होगा।”
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 4 मई, 2026 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: पश्चिमी घाट की एक नदी से मिली महसीर की स्थानीय प्रजाति। तस्वीर: शिशिर राव।