- असम की बराक घाटी में बारिश की अनिश्चितता और तापमान के बदलते पैटर्न से खेती पर असर पड़ रहा है।
- वैज्ञानिकों के अनुसार, मौसमी बारिश की जगह अब कम समय में भारी और अचानक बारिश की घटनाएं बढ़ रही हैं।
- धान और सब्जियों की खेती ज्यादा प्रभावित हो रही है, क्योंकि फसल चक्र बारिश और तापमान पर बहुत निर्भर है।
- कृषि विज्ञान केंद्र जलवायु-रोधी और कम अवधि वाली धान की किस्मों को बढ़ावा दे रहे हैं, लेकिन बीजों की लागत, सीमित पहुंच और संस्थागत कमी बड़ी बाधा हैं।
मधुसूदन ग्वाला ने अपनी जिंदगी का अधिकतर हिस्सा खेती-बाड़ी में ही बिताया है। पिछले साल मई के आखिर में जब जोरदार बारिश शुरू हुई, तो उनका खेत डूब गया। उस समय वह धान रोपने की तैयारी कर रहे थे। कुछ ही दिनों के भीतर असम के कछार जिले में उनके पूरे खेत में पानी टखनों से भी ऊपर तक आ गया।
वह कहते हैं, “पहले बारिश धीरे-धीरे थम जाया करती थी। लेकिन पिछले एक दशक में हमारे खेतों को बहुत नुकसान हुआ है। मिट्टी अनुपजाऊ हो गई है। बारिश मिट्टी को बहा ले जाती है और उसके साथ ही खेत तैयार करने की मेहनत भी बेकार हो जाती है। उसके बाद उस खेत में घास के अलावा कुछ भी नहीं उगता।”
दक्षिणी असम की बराक घाटी कछार, हैलाकांडी और श्रीभूमि जिलों से मिलकर बनी है। किसानों का कहना है कि पिछले एक दशक में बारिश का मिजाज और भी ज़्यादा अनिश्चित हो गया है, जिससे धान और दूसरी फसलों को उनके अहम पड़ावों पर नुकसान पहुंच रहा है।
भौगोलिक स्थिति
असम की भौगोलिक स्थिति उसकी कृषि संबंधी चुनौतियों में अहम भूमिका निभाती है। अध्ययनों से पता चलता है कि असम की लगभग 29% जमीन पर बाढ़ का खतरा बना रहता है। इससे खेत पानी भर जाने और सतह पर पानी बहने जैसे खतरों को लेकर संवेदनशील हो जाते हैं।
असम भारतीय और यूरेशियाई प्लेटों के आपस में टकराने से बने ‘फोरलैंड बेसिन’ में स्थित है। इस क्षेत्र की मुख्य पहचान ब्रह्मपुत्र और बराक घाटियां हैं, जो चारों ओर पहाड़ियों और पठारों से घिरी हुई हैं। यह राज्य देश के उन क्षेत्रों में शामिल है, जहां सबसे अधिक बारिश होती है। हालांकि, यहां बारिश हमेशा से ही तेज होती रही है, लेकिन पहले यह अनुमानित चक्र के अनुसार होती थी। हाल के सालों में बारिश बहुत कम समय में ही मूसलाधार होने लगी है, जिससे खेत-खलिहान बह जाते हैं और बड़ी संख्या में लोगों को विस्थापित होना पड़ता है।
बहादुर रबिदास और मोहन धोबी जैसे कई अन्य किसान भी ग्वाला की चिंताओं से सहमत हैं। “जब बारिश नहीं होती, तो हमारे खेत सूख जाते हैं।” नदी-प्रधान भौगोलिक संरचना और मॉनसून पर बहुत अधिक निर्भर खेती से यह घाटी खास तौर पर संवेदनशील बनी हुई है। राज्य में खेती लायक जमीन का लगभग 14% से 23% हिस्सा ही सिंचाई के दायरे में है, जिससे राज्य की अधिकतर खेती मॉनसून पर ही निर्भर है।
धोबी बताते हैं, “डर्बी के आस-पास बाढ़ की समस्या को कम करने के लिए लगभग एक दशक पहले दो नालियां बनाई गई थीं। लेकिन मॉनसून के दौरान कम या बिल्कुल भी रखरखाव न होने से यह इलाका अभी भी जलमग्न रहता है।” पानी तेजी से जमा होता है और नीचे के खेतों में भर जाता है। इन्हीं खेतों में ग्वाला, रबिदास और कई अन्य लोग खेती करते हैं जिससे कई बार खेती हो ही नहीं पाती।

क्या कहता है विज्ञान
जलवायु परिवर्तनों के इस दौर में कृषि वैज्ञानिक बारिश के पैटर्न में आ रहे बदलावों पर भी नजर रखे हुए हैं। असम कृषि विश्वविद्यालय में कृषि-मौसम विज्ञान वैज्ञानिक एजाफुल अहमद बताते हैं कि पिछले एक दशक के दौरान बारिश में समय-समय पर उतार-चढ़ाव देखने को मिला है।
अहमद ने कहा, “2010 से कुल बारिश की मात्रा हर चार से पांच साल के अंतराल पर घटती-बढ़ती रही है। 2022 में जब बराक घाटी में भयंकर बाढ़ आई थी, तब कुल बारिश लगभग 4,900 मिमी थी। 2023 में यह घटकर लगभग 3,500 मिमी रह गई, जो घटते रुझान का संकेत है और यह रुझान 2025 तक जारी रहा।”
जून में हुई बारिश के आंकड़े इस अस्थिरता को और भी स्पष्ट करते हैं। जून 2022 में इस क्षेत्र में लगभग 1,400 मिमी बारिश हुई थी, जो कि सामान्य औसत 710 मिमी यानी लगभग दोगुनी थी। 2023 में बारिश घटकर 912 मिमी रह गई और 2024 में यह और भी कम होकर 732 मिमी पर आ गई।
बदलाव के हिसाब से फसल
बारिश का अनियमित होना अक्सर खेत तैयार करने पर असर डालता है। रोपाई से पहले जोरदार बारिश होने पर क्यारियां बह जाती हैं और लंबे समय तक जलभराव से पौधे खराब हो जाते हैं। रबिदास कहते हैं, “अब कैलेंडर का कोई मतलब नहीं रह गया है।” “हम अब भी पुराने समय का पालन करने की कोशिश करते हैं, लेकिन बारिश उसका पालन नहीं करती।”
फसल चक्र बहुत कठोर होता है और एक ही मौसम में कई छोटी-छोटी अनिश्चितताएं होती हैं। अहमद बताते हैं कि फूल आने के समय धान के पौधे बेहद संवेदनशील होते हैं। इस दौरान भारी बारिश या तूफान पराग को नुकसान पहुंचा सकते हैं और दानों के बनने की प्रक्रिया को कम कर देते हैं। साल भर आर्द्रता वाले असम खासकर बराक घाटी में अगस्त-सितंबर के दौरान कुछ ही दिनों में भारी बारिश होती है, जिससे कीटों का प्रकोप, फफूंद का संक्रमण और अन्य समस्याएं बढ़ जाती हैं।

बारिश की तरह तापमान के बदलते पैटर्न भी फसलों के बढ़ने और पैदावार पर असर डाल रहे हैं, खासकर धान और सब्जियों पर। पहले जुलाई और अगस्त में सबसे अधिक तापमान दर्ज किया जाता था, लेकिन अब किसान और वैज्ञानिक बता रहे हैं कि गर्मी सितंबर तक रहती है। अहमद बताते हैं, “प्रकृति में जो कुछ भी उगता है, उसके बढ़ने के लिए खास तापमान और समय की जरूरत होती है और ये बदलाव फसलों के बढ़ने के समय पर बहुत अधिक असर डाल रहे हैं, जो खेती के पारंपरिक तरीकों के लिए बहुत नुकसानदायक है।”
मधुसूदन ग्वाला बताते हैं, “पहले मैं अपने छह लोगों के परिवार का पालन-पोषण करता था और पास के गांवों व बाज़ारों में ट्रकों में भरकर बीज और अनाज भी भेज पाता था।” उनके बेटे अब बीज की
बोरियों की ओर इशारा करते हुए कहते हैं कि अब उन्हें बाजार से इन्हें खरीदना पड़ता है। वह कहते हैं, “अगर हालात ऐसे ही रहे, तो हम अपना गुजारा कैसे करेंगे, इसे लेकर हम बहुत चिंतित हैं।”
मौसम-आधारित खेती
इन समस्याओं से पार पाने के लिए, बराक घाटी के कृषि विज्ञान केंद्रों (केवीके) ने बाढ़-रोधी और बहादुर सब-1 दिसांग जैसी कम समय में पकने वाली धान की किस्मों को बढ़ावा देना शुरू कर दिया है। श्रीभूमि स्थित केवीके के वरिष्ठ वैज्ञानिक पुलकाभ चौधरी बताते हैं कि घाटी की जलवायु आहू और साली जैसी पारंपरिक किस्मों के लिए अनुकूल नहीं है। “इस समस्या से निपटने के लिए कम समय में पकने वाली और जलवायु-रोधी किस्म दिसांग को बढ़ावा दिया गया है। यहां मॉनसून (जून-अगस्त) के दौरान ओले गिरते हैं और बाढ़ आती है।”
हालांकि, इसे अपनाने की प्रक्रिया धीमी रही है। किसानों का कहना है कि बीजों की नई किस्में अक्सर महंगी होती हैं और अगर उनसे उपज नहीं मिली, तो अनिश्चितता बनी रहती है।
हालांकि चावल की स्थानीय किस्म के मुकाबले दिसांग की पैदावार 35% ज्यादा थी, लेकिन इसकी खेती की लागत भी 42.8% अधिक थी। पहले से ही कर्ज में डूबे ग्वाला जैसे किसानों के लिए ऐसे बीज खरीदना बहुत मुश्किल होता है। अब उन्होंने आमदनी के दूसरे जरिये ढूंढने शुरू कर दिए हैं। “मैंने गायें खरीदी हैं और दूध बेचना शुरू कर दिया है। दूध बेचकर जो पैसे मिलते हैं, वे मेरी गायों को खिलाने या शेड बनाने के लिए लिए गए कर्ज को चुकाने के लिए भी काफी नहीं हैं।”
वैसे केवीके इन किस्मों को लोकप्रिय बनाने के लिए कई कार्यक्रम चला रहा है। इसके बावजूद शहरों और प्रदर्शनी वाली जगहों से दूर रहने वाले किसानों का कहना है कि ऐसे बीज हासिल करना मुश्किल है। चौधरी इस बात से सहमत हैं कि संस्थागत क्षमता कमजोर पड़ गई है। वह आगे कहते हैं, “हमारे पास कर्मचारियों की कमी है और विस्तार की योजनाएं भी समय से पीछे हैं। सीमित उत्पादन के चलते बीजों की कमी है और यहां तक कि गांवों तक जाने के लिए हमारे पास परिवहन के साधन भी कम हैं।”

श्रीभूमि जिले के बाहरी इलाकों में पड़ने वाले रानीग्राम और ब्राह्मणशासन जैसे क्षेत्रों में अब्दुल रज्जाक जैसे किसानों ने पूरी तरह से सर्दियों की फसलें लगानी शुरू कर दी हैं। इनमें ज्यादातर सब्जियां हैं। “अब धान की खेती फायदेमंद नहीं है; हालांकि मेरे पास अपनी जमीन है, लेकिन गर्मियों में उसमें वैसे भी पानी भर जाता है।” जब उनसे पूछा गया कि क्या उन्होंने ऐसी किस्मों के बारे में सुना है या क्या उनके ब्लॉक के आस-पास ऐसे कार्यक्रम आयोजित किए गए थे, तो रज्जाक ने जवाब दिया, “हां, मैंने सुना था कि कुछ समय पहले वैज्ञानिक और कृषि विभाग के लोग किसानों को सिखाने के लिए यहां आए थे। लेकिन मैं किसी से सीधे तौर पर बात नहीं कर पाया।” उन्होंने आगे कहा, “अगर बीज उपलब्ध भी होते हैं, तो हमें उन्हें बाजार से खरीदना पड़ता है और वे बहुत महंगे पड़ते हैं।”
सामुदायिक स्तर पर खेती-बाड़ी में मदद करने वाली कृषि सखी पर भी काम के दायरे की वजह से बहुत बोझ है। कछार जिले के बरजलेंगा ब्लॉक की कृषि सखी उषा ग्वाला कहती हैं, “किसानों और सरकारी अधिकारियों के बीच बातचीत में मदद करने के अलावा, हम किसानों को यह भी सिखाते हैं कि वे जैविक खेती को किस तरह अपना सकते हैं।” उनके अनुसार, “जो महिलाएं पहले सिर्फ घर-गृहस्थी संभालती थीं, अब वे खेती की प्रक्रिया के हर चरण में हिस्सा ले रही हैं।” लेकिन बार-बार फसल खराब होने, कम आमदनी और मजदूरों की कमी जैसी समस्याओं की वजह से, खेती के सुझाए गए तरीकों को अपनाने में रुकावटें आ रही हैं। “किसान अपने खेती के तरीके बदलने से हिचकिचाते हैं; उन्हें इस बात का भरोसा चाहिए कि इन बदलावों से उनका नुकसान नहीं बढ़ेगा।” वह मानव संसाधनों की कमी की बात पर जोर देते हुए आगे कहती हैं, “अभी इस ब्लॉक में मैं अकेली कृषि सखी हूं और लोगों तक पहुंचने वाले कार्यक्रमों के लिए अगर और सदस्य मिल जाएं, तो बहुत अच्छा होगा।”
आंकड़ों में पारदर्शिता की कमी
राष्ट्रीय फसल बीमा पोर्टल पर उपलब्ध आंकड़े बढ़ते जलवायु संकट और किसानों द्वारा अपनी आजीविका के लिए किए जा रहे उपायों को दिखाते हैं। आंकड़ों से पता चलता है कि पिछले चार सालों में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (पीएमएफबीआई) के तहत कवरेज का विस्तार पूरे क्षेत्र में हुआ है।
साल 2022 और 2025 के बीच, असम में बीमा कराने वाले किसानों की कुल संख्या लगभग पांच लाख (436,618) से बढ़कर दस लाख (10,20,001) से ज्यादा हो गई। बीमा वाला कुल फसल क्षेत्र भी दोगुने से 3,17,000 हेक्टेयर से बढ़कर 8,01,000 हेक्टेयर यानी करीब दोगुना हो गया।
राज्य में खरीफ फसल की बीमा के लिए नामांकन का समय मॉनसून के साथ शुरू हो जाता है, जो धान की खेती के लिए मददगार है। यह बढ़ोतरी बराक घाटी के जिला-स्तरीय आंकड़ों में भी साफ दिखाई देती है। 2022 से 2025 के बीच, कछार, हैलाकांडी और श्रीभूमि जिलों में बीमा कराने वाले किसानों की संख्या 19,300 से बढ़कर 58,600 से अधिक हो गई, जबकि बीमा वाली जमीन का रकबा 13,000 से बढ़कर 43,000 हेक्टेयर हो गया।

हालांकि, रबी के मौसम में भागीदारी अपेक्षाकृत कम रहती है। साल 2022 में सिर्फ 7,762 किसानों ने पंजीकरण कराया था; लेकिन यह संख्या बढ़कर 13,810 किसानों तक पहुंच गई, जो 5,000 से 7,000 हेक्टेयर क्षेत्र में फैले हुए थे।
चौधरी रबी मौसम के दौरान कम भागीदारी की वजह सर्दियों की जलवायु स्थिरता को मानते हैं, लेकिन उनके लहजे से अनिश्चितता झलकती है। अहमद भी इन चिंताओं से सहमत हैं और कहते हैं, “अभी सर्दियां हैं, लेकिन पहले सर्दियां ऐसी नहीं होती थी। 2025 में ठंड के दिनों को मैं अपनी उंगलियों पर गिन सकता हूं।” हर गुजरते साल के साथ ठंड के दिनों की संख्या कम होती जा रही है। आंकड़े तो सिक्के का एक पहलू ही बताते हैं। बीमा कवरेज में काफी बढ़ोतरी होने के बावजूद, इस क्षेत्र की कुल खेती योग्य जमीन का सिर्फ 16% हिस्सा ही औपचारिक रूप से बीमा वाला है।
डर्बी ग्राम पंचायत के अध्यक्ष राम सिंहासन ग्वाला बताते हैं कि जागरूकता का स्तर बहुत कम है या फिर जटिल कानूनी भाषा के बीच यह बात कहीं खो जाती है। ग्वाला और रज्जाक जैसे किसान अपनी उलझन स्वीकार करते हैं: “हम कुछ रिन्यूअल फीस तो देते हैं, लेकिन हमें कोई लाभ नहीं मिलता।” सूचना के अधिकार के तहत पूछे गए सवालों के जवाब में कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय ने निपटान के प्रदर्शन से जुड़ा डेटा देने के बजाय, सवालों और आवेदन रद्द होने के कारणों के लिए योजना के परिचालन दिशानिर्देशों का ही हवाला दे दिया।
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सिंहासन आरोप लगाते हैं, “बीमा कंपनियां मुआवजा देने से बचने के लिए शर्तों में हेर-फेर करती हैं।” वे अफसोस जताते हैं, “दिशानिर्देश बहुत लंबे होते हैं; किसानों को घंटों का समय दिया जाता है, जबकि उन्हें दिनों की जरूरत होती है और बीमा की तकनीकी शब्दावली समझने में बाधा डालती है।” ‘उपज के अनुमान,’ ‘नुकसान की वजह और ‘औपचारिक सूचनाएँ’ जैसे शब्द उन लोगों को ही इस प्रक्रिया से बाहर कर देते हैं, जिनकी सुरक्षा करना इसका मुख्य उद्देश्य है। जलवायु परिवर्तन से खेती को नुकसान शायद ही कभी तय सीमाओं के दायरे में आते हैं। कभी-कभी बाढ़ का पानी इतनी तेजी से उतर जाता है कि फसलें तो बच जाती हैं, लेकिन जमीन कमजोर पड़ जाती है।
क्या है भविष्य
आंकड़े दिखाते हैं कि यह कार्यक्रम बड़े पैमाने पर आगे बढ़ रहा है, लेकिन किसानों के लिए जोखिम अभी भी सुरक्षा से अधिक है। जानकार चेतावनी देते हैं कि मौसम के भरोसेमंद कैलेंडर का न होना लंबे समय तक चलने वाली चुनौती बनी रहेगी, क्योंकि जलवायु परिवर्तन खेती के तरीकों में लगातार अनिश्चितताएं पैदा कर रहा है। अगली पीढ़ी पहले ही खेती-बाड़ी छोड़कर रोजी-रोटी के दूसरे साधन ढूंढने लगी है। मधुसूदन ग्वाला के चारों बच्चे अलग-अलग जगहों पर हैं: उनका सबसे बड़ा बेटा शरत कुमार पास के ही चाय बागान में पार्ट-टाइम काम करता है और कभी-कभी आस-पास के कस्बों में दूध बेचता है; एक बेटा बेंगलुरु चला गया है और बाकी लोग स्थानीय स्तर पर छोटा-मोटा काम ढूंढने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। रज्जाक मानते हैं, “शायद मैं अपने परिवार में खेती करने वाला आखिरी व्यक्ति हूं; मेरे किसी भी बच्चे की इसमें कोई दिलचस्पी नहीं है और मैं उन्हें इसके लिए दोषी भी नहीं मानता।”
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 3 अप्रैल, 2026 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर- श्रीभूमि जिले के कुछ हिस्सों में अब्दुल रज्जाक जैसे किसानों ने पूरी तरह से सर्दियों की फसलें उपजाने लगे हैं जिनमें अधिकतर सब्जियां शामिल हैं। तस्वीर: देबारुण चौधरी।