- एक नए अध्ययन से पता चला है कि रुशिकुल्या में ऑलिव रिडली कछुओं के चार प्रमुख प्रजनन तटों पर जमीन और इंसानी गतिविधियों से फैला प्लास्टिक कचरा भारी मात्रा में मौजूद है।
- कुल दर्ज किए गए कचरे में 85% से अधिक हिस्सेदारी प्लास्टिक (जैसे बोतलें और रैपर) की थी। इसमें छः पड़ोसी देशों से बहकर आया कचरा भी शामिल है।
- कुछ जगहों पर कुल कचरे में से कबाड़ हो चुके फिशिंग नेट का हिस्सा 32% से अधिक था, तो वहीं कुछ अन्य जगहों पर थर्माकोल का योगदान 31% से ज्यादा पाया गया।
- समुद्र में लावारिस पड़े मछली पकड़ने के ये उपकरण कछुए के बच्चों के लिए जानलेवा साबित हो रहे हैं। अध्ययन में 237 मृत और उपकरण में फंसे ऑलिव रिडली के 121 बच्चों को दर्ज किया गया है। यह खतरा तट के पास के पानी में रहने वाले वयस्क कछुओं पर भी मंडरा रहा है।
ओडिशा के गंजम जिले में स्थित रुशिकुल्या रूकरी दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण कछुआ प्रजनन स्थलों में से एक है। हर साल, लाखों ऑलिव रिडली समुद्री कछुए (लेपिडोचेलीस ओलिवेशिया) यहां सामूहिक रूप से अंडे देने के लिए आते हैं, जिसे ‘अरिबाडा’ कहा जाता है। अकेले फरवरी 2025 में लगभग 7,00,000 ऑलिव रिडली कछुए अंडे देने के लिए तट पर पहुंचे थे।
हालाँकि, भारत के पूर्वी तट पर फैला यह 10 किलोमीटर लंबा महत्वपूर्ण इलाका इन दिनों प्लास्टिक प्रदूषण और उससे जुड़ी समस्याओं से जूझ रहा है। गोवा स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओशियनग्राफी (NIO) के एक हालिया अध्ययन से पता चलता है कि रुशिकुल्या के चारों प्रजनन तटों पर प्लास्टिक कचरा और कबाड़ हो चुके मछली पकड़ने के जाल भारी मात्रा में मौजूद हैं। यह तस्वीर दुनियाभर में बढ़ते समुद्री प्लास्टिक प्रदूषण के संकट को सामने लाती है।
प्लास्टिक के बीच अंडे देते कछुए
साल 2025 के मुख्य प्रजनन सीजन के दौरान चार तटों न्यू पोदामपेटा, पुरूनबंधा, सिद्धांतनगर और प्रयागी- पर किए गए सर्वे में 1,100 से अधिक कबाड़ हो चुकी वस्तुएं दर्ज की गईं, जिनमें से 85% से ज्यादा हिस्सा केवल प्लास्टिक का था। प्लास्टिक की बोतलें, रैपर और थैलियां इस बात का संकेत देती हैं कि जमीन से बहकर आने वाला कचरा और इंसानी गतिविधियां इसके मुख्य स्रोत हैं।
मछली पकड़ने की गतिविधियों से जुड़ा कचरा सभी जगहों पर कुल दर्ज कचरे का 41% हिस्सा था। इस कचरे में टूटे और फटे हुए जाल, थर्माकोल और नायलॉन की रस्सी के टुकड़े शामिल हैं। इन सभी चीज़ों को सामूहिक रूप से ‘घोस्ट गियर’ या छोड़े गए, खोए हुए और अन्य प्रकार से फेंके गए मछली पकड़ने के उपकरण ALDFG कहा जाता है। अकेले न्यू पोदामपेटा में मछली पकड़ने के जाल कुल कचरे का लगभग 32% थे, जबकि सिद्धांतनगर में थर्माकोल का योगदान भी 31% से थोड़ा अधिक था।

चिंता की बात यह है कि प्लास्टिक एबंडेंस इंडेक्स (PAI) और क्लीन कोस्ट इंडेक्स (CCI) जैसे पर्यावरण गुणवत्ता के तय पैमानों पर, चारों तटों को ‘गंदे’ से लेकर ‘अत्यंत गंदे’ की श्रेणी में रखा गया है। यहां प्लास्टिक की मात्रा बहुत अधिक है। इस कारण रुशिकुल्या में कचरे का स्तर दुनिया भर के अन्य कछुआ के प्रजनन वाले तटों की तुलना में काफी ज्यादा पाया गया है।
कई बार कोशिश करने के बावजूद मोंगाबे-इंडिया को इस रिपोर्ट के प्रकाशन के समय NIO की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिल पाई थी।
यह सिर्फ ओडिशा के तट तक ही सीमित नहीं है।
दक्षिण फाउंडेशन के साथ पहले कछुओं का अध्ययन कर चुकीं और वर्तमान में कनाडा की लॉरेंशियन यूनिवर्सिटी में पीएचडी की शोधार्थी चंदना पुसापती बताती हैं, “भारत में कछुओं के प्रजनन वाले ज़्यादातर तट घनी आबादी वाले तटीय इलाकों के पास स्थित हैं। अध्ययनों से यह बात सामने आई है कि लक्षद्वीप जैसे दूर-दराज के इलाकों समेत भारतीय तटरेखा के लगभग सभी समुद्र तटों पर प्लास्टिक का कचरा मौजूद है।”
हालाँकि इस अध्ययन में दर्ज अधिकांश कूड़ा स्थानीय स्तर पर जमीनी और मछली पकड़ने की गतिविधियों से आया था, लेकिन प्लास्टिक की कुछ चीज़ों पर म्यांमार, मलेशिया, वियतनाम और सिंगापुर जैसे दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के लेबल लगे थे। यह इस बात का संकेत है कि महासागरीय धाराओं के जरिए सीमा पार से बहकर आने वाला कचरा ओडिशा के तट तक पहुंच रहा है। महासागरीय परिसंचरण के मॉडल इस घटना की वजह साफ करते हैं, जो यह दिखाते हैं कि प्लास्टिक का कचरा लंबी दूरी तय कर सकता है और अपने मूल स्थान से बहुत दूर तटीय क्षेत्रों में जमा हो सकता है।
इस तरह के कचरे से निपटना और भी मुश्किल हो जाता है, क्योंकि इसके स्रोत स्थानीय क्षेत्राधिकार से बाहर के होते हैं। संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून अभिसमय (UNCLOS), जहाजों से होने वाले प्रदूषण को रोकने के लिए अंतर्राष्ट्रीय कन्वेंशन (MARPOL) और UNEP के क्षेत्रीय समुद्र कार्यक्रम के तहत शुरू की गई क्षेत्रीय पहल जैसे अंतर्राष्ट्रीय फ्रेमवर्क तटीय देशों के बीच समुद्री पर्यावरण की रक्षा के लिए आपसी सहयोग पर जोर देते हैं, फिर भी इन नियमों का पालन और निगरानी अभी भी असमान बनी हुई है।

बढ़ते खतरे
दुनिया भर में समुद्री और तटीय कचरे में सबसे बड़ा हिस्सा प्लास्टिक का होता है, जो इसे सबसे बड़े पर्यावरणीय खतरों में से एक बनाता है। एक अनुमान के मुताबिक, 2010 में 48 लाख से 1 करोड़ 27 लाख टन प्लास्टिक कचरा महासागरों में गया था। यह आंकड़ा 2016 में बढ़कर 1 करोड़ 90 लाख से 2 करोड़ 30 लाख टन (कुल उत्पादित कचरे का लगभग 11%) हो गया। वहीं, इसके 2030 तक बढ़कर सालाना खतरनाक स्तर यानी 5 करोड़ 30 लाख टन तक पहुंचने का अनुमान है। हालाँकि सटीक आंकड़े स्पष्ट नहीं हैं, लेकिन ऐसा अनुमान है कि हर साल समुद्री पक्षियों, मछलियों, कछुओं और स्तनधारियों सहित समुद्री जीवों की हजारों प्रजातियां प्लास्टिक निगल जाती हैं।
पुसापति बताती हैं, “प्रजनन स्थल वाले तटों और भोजन की तलाश करने वाले क्षेत्रों में बढ़ता प्लास्टिक प्रदूषण एक उभरता हुआ खतरा है, खासकर मादा कछुओं और उनके बच्चों के लिए। ऑलिव रिडली नदी के मुहानों के पास अंडे देना ज्यादा पसंद करते हैं, जहां अक्सर प्लास्टिक और जमीन से बहाकर लाया गया अन्य कचरा जमा हो जाता है।”
कछुए के बच्चे अपने छोटे आकार, कम ताकत और समुद्र तक पहुंचने के लिए प्राकृतिक संकेतों पर निर्भरता के कारण अत्यधिक संवेदनशील होते हैं। समुद्र की ओर जाने के लिए वे समुद्र तट के ढलान, रेत की बनावट और चांद की रोशनी जैसे प्राकृतिक संकेतों का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन कचरे और घोस्ट नेट जैसी भौतिक बाधाएं, साथ ही रात की कृत्रिम रोशनी (खासकर एलईडी लाइट्स) इन प्राकृतिक संकेतों को बाधित कर देती हैं। इससे कछुए भ्रमित हो जाते हैं और तट पर उन्हें ज्यादा समय बिताना पड़ता है। थोड़ी सी भी उलझन समुद्र तक पहुंचने में उनके लगने वाले समय को बढ़ा सकती है, जिससे उनके डिहाइड्रेशन, अत्यधिक गर्मी और पक्षियों या आवारा कुत्तों द्वारा शिकार बनाए जाने का खतरा बढ़ जाता है। रुशिकुल्या में तटीय कटाव के कारण कछुओं के घोंसले और अंडे भी बाहर आ रहे हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ रहे समुद्र के जलस्तर से पैदा होने वाले खतरे और अधिक गंभीर हो गए हैं।
आम तौर पर प्लास्टिक का प्रदूषण प्रजनन स्थलों को खराब करता है, लेकिन छोड़े गए या कबाड़ हो चुके मछली पकड़ने के उपकरण (ALDFG) कछुए के बच्चों के जीवित रहने के लिए एक सीधा और बड़ा खतरा पैदा करते हैं। कछुए के बच्चों के आने-जाने वाले समुद्र तट के ऊपरी हिस्सों में नायलॉन के टूटे-फूटे जाल और सिंथेटिक रस्सियां बड़े पैमाने पर फैली हुई थीं। अध्ययन में, 237 मृत और कबाड़ में फंसे हुए 121 बच्चे दर्ज किए गए। इनमें से अधिकांश कछुए उन घोस्ट नेट्स और रस्सियों में फंसे हुए थे, जो रेत में आंशिक रूप से दब जाने पर लगभग अदृश्य दीवार बन जाते हैं।
इसी तरह के मामलों में जीवों के जालों में फंसने की खबरें मालदीव, ऑस्ट्रेलिया और श्रीलंका के समुद्र तटों से भी सामने आई हैं। हालाँकि कुल समुद्री कचरे की मात्रा में ALDFG का हिस्सा सिर्फ 10% के आसपास होता है, लेकिन यह समुद्री जीवों की मौत के बहुत बड़े हिस्से के लिए जिम्मेदार है। भारत के कुछ तटों पर तो समुद्र तट के कुल कचरे में अकेले ALDFG का हिस्सा 47% से अधिक है, जबकि बाकी हिस्से में अनुमानित रूप से अन्य प्लास्टिक शामिल हैं। नायलॉन जैसे गैर-बायोडिग्रेडेबल सिंथेटिक पॉलिमर से बने होने के कारण, मछली पकड़ने के ये उपकरण पर्यावरण में दशकों तक बने रह सकते हैं।

समुद्र तट से परे प्रभाव
प्लास्टिक का असर केवल तट तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समुद्र के अंदर भी पहुंचता है, जहां कछुए अपने पूरे जीवन इस कचरे के संपर्क में रहते हैं। ऑलिव रिडली विभिन्न प्रकार के आवासों में रहते हैं, लंबी दूरियां तय करते हैं और कई तरह का भोजन करते हैं, जिससे वे इसके प्रति विशेष रूप से संवेदनशील हो जाते हैं।
दक्षिण फाउंडेशन के मरीन फ्लैगशिप्स प्रोग्राम की तत्कालीन कार्यक्रम अधिकारी विदिशा कुलकर्णी टीम के अनुभव साझा करते हुए बताती हैं, “कछुए अक्सर पारदर्शी प्लास्टिक की थैलियों को जेलीफिश जैसा शिकार समझ लेते हैं और दोनों के बीच आसानी से फर्क नहीं कर पाते। उनकी भोजन नली में पीछे की ओर रोएंदार संरचनाएं होती हैं जो भोजन को वापस बाहर आने से रोकती हैं। जब वे प्लास्टिक निगल लेते हैं, तो यही प्राकृतिक खूबी उनके लिए एक बड़ी समस्या बन जाती है।”
निगला गया प्लास्टिक उनके शरीर में रुकावट पैदा कर सकता है, अंदरूनी घाव दे सकता है, या पेट भरा होने का झूठा अहसास करा सकता है, जिससे आखिरकार भूख से उनकी मौत हो जाती है। इसके अलावा, माइक्रोप्लास्टिक्स ऊतकों और अंगों में जमा होकर जहरीला खतरा पैदा कर सकते हैं, जो बाद में खाद्य श्रृंखला में प्रवेश कर जाते हैं और बायोमैग्निफिकेशन के जरिए पोषण स्तरों में ऊपर की तरफ बढ़ते जाते हैं।
कुलकर्णी ने बताया, “कछुओं के अंडे की जर्दी और छिलकों में माइक्रोप्लास्टिक्स और भारी धातुओं की उच्च सांद्रता पाई गई है, इसलिए कछुए के बच्चों को अंडे से बाहर निकलने से पहले ही प्रदूषण की यह मार झेलनी पड़ रही है।” कुलकर्णी वर्तमान में सृष्टि मणिपाल इंस्टीट्यूट ऑफ आर्ट, डिजाइन एंड टेक्नोलॉजी से पीएचडी कर रही हैं।
महत्वपूर्ण प्रजनन स्थल पर संरक्षण के मायने
ओडिशा के तट के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कुलकर्णी ने कहा, “भारत के मुख्य भूमि के तटों पर केवल दो ही जगहों पर ‘अरिबाडा’ (कछुओं का एक साथ बड़े पैमाने पर अंडे देने के लिए तट पर आना) होता है और ये दोनों ही तट यानी गहिरमाथा और रुशिकुल्या ओडिशा में हैं।
पुसापति आगे कहती हैं, “1980 और 1990 के दशक की शुरुआत में कछुओं की संख्या में भारी गिरावट के बाद, राज्य के वन विभागों और स्थानीय गैर-सरकारी संगठनों द्वारा प्रजनन स्थलों की सुरक्षा और तट के पास निगरानी जैसे लगातार संरक्षण प्रयासों के कारण ऑलिव रिडली कछुओं की आबादी को स्थिर करने में मदद मिली है और कुछ क्षेत्रों में तो इनकी संख्या बढ़ी भी है।”
मौजूदा समय में, रुशिकुल्या में अरिबाडा के दौरान अक्सर समुद्र तटों से मछली पकड़ने के जाल हटा दिए जाते हैं और मानवीय गतिविधियों को नियंत्रित किया जाता है। हालाँकि, ये उपाय आमतौर पर अल्पकालिक हैं और स्थानीय स्तर तक ही सीमित होते हैं।

अध्ययन में कछुओं की आबादी की सुरक्षा के लिए समन्वित और लक्षित कदम उठाने की सिफारिश की गई है। इसके तहत मछली पकड़ने पर मौसमी रोक को सख्ती से लागू करने, सामुदायिक स्तर पर कचरा प्रबंधन में सुधार करने तथा बेकार पड़े मछली पकड़ने के उपकरणों को हटाकर पर्यावरण के अनुकूल विकल्प अपनाने की बात कही गई है। इसके अलावा, स्थानीय और सीमा-पार कचरे के स्रोतों से निपटने तथा कछुओं की रक्षा के लिए, स्थानीय लोगों को शामिल करते हुए दीर्घकालिक जागरूकता अभियानों और मजबूत क्षेत्रीय सहयोग की भी आवश्यकता है।
भले ही जमीन से बहकर आने वाले कचरे के आंकड़े उपलब्ध हैं, लेकिन कछुओं पर इस प्रदूषण के शारीरिक प्रभावों और समुद्र के भीतर कचरे की आवाजाही को लेकर स्थानीय स्तर पर अभी कम ही शोध हुआ है।
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पुसापति निष्कर्ष निकालते हुुए कहती हैं, “समुद्र के भीतर निगरानी से इन निष्कर्षों को और पुख्ता करने में मदद मिल सकती है, क्योंकि प्लास्टिक का कचरा समुद्र से बहकर तटों पर आ जाता है। अरिबाडा के दौरान हमने ऐसे कई मामले देखे हैं जब कछुए पानी से बाहर निकलते ही मछली पकड़ने के जालों में फंसे हुए थे।”
ओडिशा के इन प्रजनन स्थलों पर कचरे का भारी अंबार, जालों में फंसे कछुए के बच्चे और बदलता हुआ प्राकृतिक आवास खतरे की घंटी बजा रहे हैं। भले ही जालों में फंसने से मरने वाले बच्चों की संख्या थोड़ी कम लगे, लेकिन साल-दर-साल होने वाला यह नुकसान और बढ़ता प्लास्टिक प्रदूषण कछुओं की आबादी की प्रतिकूल परिस्थितियों से उबरने की क्षमता को कम कर सकता है, खास तौर पर उस प्रजाति के लिए जिसे IUCN ने पहले ही ‘संवेदनशील’ घोषित कर चुुका है।
यह खबर मोंगाबे-इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 27 अप्रैल, 2026 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: रुशिकुल्या तट पर ऑलिव रिडली कछुए के बच्चे। अपने छोटे आकार और कम ताकत के कारण ये बहुत नाज़ुक होते हैं और समुद्र तक पहुंचने के सफर में इन्हें अनगिनत खतरों का सामना करना पड़ता है। तस्वीर: अलिवा साहू, विकिमीडिया कॉमन्स,(CC BY-SA 4.0)