- ओडिशा के रुशिकुल्या समुद्र तट पर रेत के बढ़ते तापमान की वजह से ज्यादा मादा कछुए पैदा हो रहे हैं। वैज्ञानिक चेतावनी देते हैं कि लंबे समय में यह स्थिति आनुवांशिक सेहत और प्रजनन की सफलता के लिए खतरा बन सकती है।
- साल 2050 तक दुनिया भर में समुद्री कछुओं के आधे से ज्यादा पारंपरिक आवास खत्म हो सकते हैं, क्योंकि समुद्र के गर्म होने से कछुए नए इलाकों में पलायन के लिए विवश हो रहे हैं। भारत में बढ़ते शिपिंग कॉरिडोर से टकराव का खतरा बढ़ रहा है, क्योंकि कछुए भोजन की पारंपरिक जगहों को छोड़ रहे हैं।
- समुद्री कछुओं के संरक्षण के लिए आंकड़ों से जुड़ा मॉडल जलवायु में होने वाले बदलावों के लिए काफी नहीं हो सकते हैं। रियल-टाइम डेटा, मौसमी गति पर रोक और कछुओं की आबादी के लिए लचीली संरक्षण योजनाओं का इस्तेमाल करके महासागर से जुड़े प्रबंधन में बदलाव की जरूरत है।
हर सर्दियों में ओडिशा के समुद्र तट कुदरत की सबसे शानदार घटनाओं में से एक का गवाह बनते हैं। बंगाल की खाड़ी से लाखों ऑलिव रिडले कछुए सामूहिक रूप से अंडा देने के लिए बाहर आते हैं। इस घटना को अरिबाडा कहा जाता है। इन प्राचीन समुद्री यात्रियों के संरक्षण में भारत की कामयाबी उल्लेखनीय रही है। लेकिन, जलवायु परिवर्तन धीरे-धीरे खतरे में पड़ी इन प्रजातियों के जिंदा रहने के नियम बदल रहा है।
आपस में जुड़े हुए दो खतरे अब धीरे-धीरे हकीकत बनते जा रहे हैं। जिन समुद्र तटों पर कछुए अंडा देते हैं, वहां की गर्म होती रेत पूरी पीढ़ी को मादा बना रही है। समुद्र का बढ़ता तापमान कछुओं को पारंपरिक चारागाह छोड़ने पर मजबूर कर रहा है, जिससे वे शिपिंग लेन में जा रहे हैं और यहां जहाजों के टकराने का खतरा बढ़ रहा है। ये दोनों दबाव भारत के आस-पास के समुद्र में इन कछुओं के पारंपरिक आवास को पूरी तरह बदल रहे हैं।
रेत में दबे समुद्री कछुओं के अंडों के लिए तापमान ही सब कुछ तय करता है। अंडा देने की जगहें गर्म होने से मादा और ठंडी जगहों से नर बच्चे निकलते हैं। तापमान पर निर्भर लिंग निर्धारण लाखों सालों से समुद्री कछुओं के लिए अच्छा रहा है, लेकिन अब संतुलन बदल रहा है। डेटा से पता चलता है कि ओडिशा के रुशिकुल्या समुद्र पर ओलिव रिडले के बच्चे ज्यादातर मादा ही निकल रहे हैं। पिछले नौ सालों में औसत 71% मादा और पिछले कुछ सालों में यह अनुपात 97% से भी अधिक रहा है। ये बातें दक्षिण फाउंडेशन की ‘मॉनिटरिंग सी टर्टल्स इन इंडिया 2008-2024’ रिपोर्ट में दर्ज है।

गर्म होती रेत के खतरे
छोटी अवधि में मादाओं की अधिकता वाला अनुपात आबादी बढ़ाने में मदद कर सकता है, क्योंकि ज्यादा मादा होने का मतलब अधिक अंडे होना है। लेकिन इस फायदे के साथ जेनेटिक स्वास्थ्य के लिए भारी कीमत भी चुकानी पड़ती है। समुद्री कछुओं के जीव विज्ञान के जानकार डीकन यूनिवर्सिटी के ग्रीम सी. हेयस चेतावनी देते हैं कि मादाओं की अधिकता छोटी अवधि में मदद करती है, लेकिन लंबी अवधि में यह चिंतित करने वाला है। हेस ने चेतावनी दी, “लंबी अवधि में पर्याप्त व्यस्क नर जरूरी हैं, ताकि संभोग और अंडों की उर्वरता पक्की की जा सके।” “इसलिए, बहुत असंतुलित लिंग अनुपात चिंता का विषय है और किसी समय में ज्यादा नर पैदा करने के लिए अंडा देने की कुछ जगहों को ठंडा करने के लिए हस्तक्षेप की जरूरत पड़ सकती है।”
अंसुतलित लिंगानुपात के अलावा, रेत का बढ़ता तापमान सामने नहीं आने वाली मौतों के बारे में बताता है। हेयस के शोध से पता चलता है कि अंडों को सेने के दौरान ज्यादा तापमान नवजात कछुओं की मृत्यु दर को बढ़ाता है। यही नहीं, रेत और हवा दोनों के तापमान में बढ़ोतरी से नवजात ज्यादा कमजोर हो जाते हैं और भ्रूण के खराब होने की आशंका बढ़ जाती है। वैश्विक तापमान भले ही स्थिर हो जाए, लेकिन स्थिति इसलिए गंभीर हो रही है कि तटीय विकास और गर्मी को सोंखने वाली आधारभूत संरचरनाएं अंडा देने वाली अहम जगहों पर तापमान और बढ़ा सकती हैं।
दक्षिण फाउंडेशन के फाउंडर ट्रस्टी और मॉनिटरिंग रिपोर्ट के लेखक कार्तिक शंकर इस स्थिति का नपा-तुला आकलन प्रस्तुत करते हैं। शंकर कहते हैं “मध्यम अवधि में मादाओं की अधिकता वाला अनुपात, नरों की प्रधानता वाले अनुपात से बेहतर है। लेकिन, इसका आबादी के आनुवंशिक स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव पड़ सकता है।” “फिलहाल मैं यह नहीं कहूंगा कि स्थिति चिंताजनक है, लेकिन आगे आने वाले दशकों में अगर तापमान इसी तरह बढ़ता रहे और कछुए साल के उसी मौसम में अंडा देते रहे, तो इस आशंका को नकारा नहीं जा सकता है।”
खतरनाक प्रवास
जमीन जैसा ही संकट समुद्र में भी दिखाई दे रहा है और इससे खतरनाक बदलाव हो रहे हैं। महासागर के बढ़ते तापमान और इसके अम्लीकरण ने समुद्री खाद्य जाल को बाधित कर दिया है, जिससे फाइटोप्लांकटन (समुद्री खाद्य श्रृंखला का आधार) कम हो रहा है और कोरल रीफ और प्रवाल भित्तियों और समुद्री घास के मैदान जैसी खाने की जरूरी जगहों को नुकसान हो रहा है। ये बदलाव बहुत ज्यादा प्रवासी इस जीव को ठंडे, अधिक पोषक पानी की तलाश में अपने खाने और प्रवास मार्गों को बदलने पर मजबूर कर रहे हैं। इन कछुओं को हजारों मील का सफर करने के लिए भी जाना जाता है।
जलवायु की वजह से हो रहा यह विस्थापन समुद्री कछुओं के पारंपरिक आवासों की अवधारणा को ही बदल रहा है। साइंस एडवांसेज़ जर्नल में हाल के एक चिंताजनक शोध से पता चलता है कि 2050 तक दुनिया भर में समुद्री कछुओं के मौजूदा पारंपरिक आवासों में से आधे से अधिक खत्म हो जाएंगे। इसका मतलब है कि भारत में प्रजनन के लिए बनाए गए और सुरक्षित किए गए समुद्र तट भोजन की अच्छी जगहों से अपना जुड़ाव खो सकते हैं।
भारत के संदर्भ में टेलीमेट्री अध्ययनों से पता चलता है कि अंडमान और निकोबार द्वीप समूह से लेदरबैक कछुए बड़े पैमाने पर पलायन कर रहे हैं और हिंद महासागनर को पार करके मेडागास्कर और पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया तक पहुंच जाते हैं। वहीं, लक्षद्वीप के हरे कछुए नए इलाकों की तरफ जा रहे हैं, समुद्री घास के मैदानों में ज्यादा चराई कर रहे हैं और अचानक पारिस्थितिकी दबाव पैदा कर रहे हैं।
जैसे-जैसे कछुए मजबूरी में जलवायु के हिसाब से अनुकूल जगहों की ओर पलायन कर रहे हैं, नए उपयुक्त आवास उन क्षेत्रों में उभर रहे हैं जहां शिपिंग का काम ज्यादा होता है। यह बदलाव जहाजों से टकराने का खतरा बढ़ाता है, जो बड़े समुद्री कछुओं की मौत की बड़ी वजह है। भारत का विशेष आर्थिक क्षेत्र उसके समुद्र तट से 200 नॉटिकल मील तक फैला हुआ है और लगभग 2.02 मिलियन वर्ग किमी क्षेत्र को कवर करता है। इस क्षेत्र में बड़े बंदरगाहों को जोड़ने वाले घने शिपिंग कॉरिडोर हैं जो भविष्य में टकराव के संभावित इलाके के रूप में उभरते हुए दिख रहे हैं।
बेल्जियम में यूनिवर्सिटी लिब्रे डी ब्रुक्सेल्स में शोध सहयोगी और साइंस एडवांसेज अध्ययन के सह-लेखक डेनिस फोर्नियर कहते हैं, “बढ़ता तापमान, बदलती समुद्री धाराएं और उत्पादकता और ऑक्सीजन में हो रहे बदलाव की वजह से 2050 तक समुद्री कछुओं के आधे से ज़्यादा पारंपरिक आवास खत्म होने का अनुमान है।” “जैसे-जैसे कछुए ठंडे पानी की ओर पलायन करेंगे, उनके मार्ग कई बड़े शिपिंग रास्तों से टकराएंगे, जिससे टकराव और बायकैच (जाल में अचनाक फंसने) का खतरा बढ़ेगा और इससे कछुओं की आबादी और उन पर निर्भर तटीय पारिस्थितिकी तंत्र दोनों को खतरा बढ़ेगा।

जटिल नीतिगत चुनौतियां
समुद्री कछुओं के संरक्षण के लिए भारत की मजबूत प्रतिबद्धता के बावजूद, वन्यजीव सुरक्षा उपायों से लेकर कछुओं के पाए जाने वाले तटीय समुद्रों में, मछली पकड़ने के जाल से कछुओं को बाहर रखने से जुड़ी डिवाइस (टर्टल एक्सक्लूडर डिवाइस\TED) लगाने को अनिवार्य बनाने तक, जलवायु परिवर्तन की गति और पैमाने ने पारंपरिक नीति में खामियों को उजागर किया है।
“नीतिगत चुनौती अत्यंत बड़ी है। जलवायु विज्ञान की जटिल और लगातार बदलती जानकारी को देश के संरक्षण कानूनों में शामिल करना जरूरी है और हिंद महासागर–दक्षिण-पूर्व एशिया (IOSEA) समुद्री कछुआ समझौते जैसे अंतर-क्षेत्रीय सहयोग तंत्रों की भी जरूरत है। वास्तविक कार्रवाई जलवायु नीति और आवास संरक्षण दायरे में है,” शंकर ने बताया। “जब अंडा देने की जगहें और भोजन से जुड़े आवास सुरक्षित होते हैं, तो समुद्री कछुओं की आबादी तेजी से बढ़ने लगती है।”
फोर्नियर का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के इस दौर में सिर्फ स्थिर संरक्षण पर निर्भर रहना काम नहीं आएगा, क्योंकि यह जीव पहले से ही नए क्षेत्रों में जा रहे हैं, जिनमें से कई ज्यादा जोखिम वाले और इंसानों के इस्तेमाल वाले इलाके हैं। उन्होंने कहा, “संरक्षण समुदाय और राष्ट्रीय नीति बनाने वालों को पूर्वानुमाना वाले और गतिशील कदमों को प्राथमिकता देनी चाहिए जैसे रियल-टाइम में निगरानी, लचीली स्थानीय सुरक्षा और शिपिंग और मछली पालन के नियमन जिन्हें वहां और उसी समय लागू किया जा सके जब कछुए दिखाई दें।” फोर्नियर ने कहा कि आवास की सुरक्षा ही पर्याप्त नहीं है। गतिशीलता, प्रजातियों के बीच संपर्क और कम मौत वाले रास्तों की सुरक्षा करना सबसे सही काम है।
हेज ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय समझौते समुद्री कछुओं के बचाव के उपायों को आगे बढ़ाने में मदद के लिए रूपरेखा दे सकते हैं। उन्होंने आगे कहा, “2030 तक देशों द्वारा अपने समुद्र के 30% हिस्से को सुरक्षित क्षेत्र के रूप में घोषित करने की वैश्विक पहल समुद्री कछुओं की मदद कर सकती है, क्योंकि इससे उनके लिए ऐसे सुरक्षित क्षेत्र उपलब्ध होंगे जहां खतरे कम होंगे।”
भारत में समुद्री कछुओं के संरक्षण का मजबूत आधार पहले से उपलब्ध है। भारत के आस-पास के समुद्रों में पाई जाने वाली सभी प्रजातियों को वन्यजीव (संरक्षण) कानून, 1972 की अनुसूची-I के तहत सुरक्षित किया गया है, जो कानून के जरिए उपलब्ध सबसे मजबूत सुरक्षा है। ओडिशा और आंध्र प्रदेश में TED के जरूरी इस्तेमाल से बायकैच कम करने में मदद मिली है और मछली पकड़ने पर मौसम आधारित प्रतिबंध से अस्थायी राहत मिली है। लेकिन ये उपाय तब किए गए थे, जब कछुओं की आबादी स्थिर थी।

लचीलेपन का रास्ता
भारत के तटों के आसपास रहने वाले समुदाय लंबे समय से समुद्री कछुओं को सम्मान देते रहे हैं। आंध्र प्रदेश की कूर्मा कुलम जाति और ओडिशा में कछुओं से जुड़ी पूजा के रीति-रिवाजों में यह सांस्कृतिक आस्था शोषण के खिलाफ सुरक्षात्मक ढाल की तरह काम करती रही है। लेकिन, परंपरा से ना तो गर्म होती रेत को ठंडी होगी और ना ही जहाजों के रास्ते बदलेंगे।
फोर्नियर ने कहा कि संभावित संकट का पैमाना बड़े बदलाव की मांग करता है, जिसमें स्थिर, स्थान-आधारित संरक्षण से आगे बढ़कर अनुकूल, प्रक्रिया-आधारित संरक्षण की ओर बढ़ना शामिल है। इसका मतलब है यह फिर से कल्पना करना कि हम समुद्री कछुओं की रक्षा किस तरह और कहां करते हैं।
डायनेमिक ओशन मैनेजमेंट उम्मीदों से भरा तरीका पेश करता है। उपग्रह टेलीमेट्री और जहाजों की ट्रैकिंग से प्राप्त रियल-टाइम डेटा का इस्तेमाल करके, प्रबंधक उन क्षेत्रों में मौसमी गति सीमाएं या मछली पकड़ने पर अस्थायी रोक लागू कर सकते हैं जहां कछुओं के समूह पाए जाते हैं। ऐसी रणनीतियां लचीली और परिस्थिति के हिसाब से होती हैं और उन्हें मौजूदा जहाजरानी और मत्स्य पालन प्रशासनिक ढांचों के साथ जोड़ा जा सकता है।
जमीन पर अंडों वाली जगहों को छायादार बनाना या पटवन जैसे हस्तक्षेप प्रजनन के दौरान गर्मी को कम करने में मदद कर सकते हैं। हेज ने कहा, “ अंडे वाली जगहों को छायादार बनाना, नियंत्रित हैचरी स्थापित करने जैसे सामान्य, समुदाय की अगुवाई में हस्तक्षेप असरदार हो सकते हैं।” लेकिन, इन उपायों को सोच-समझकर लागू करना चाहिए। “अंडों से बच्चे निकलने की प्रक्रिया के दौरान अभी भी लिंगानुपात, व्यस्क नर कछुओं की संख्या और अंडे वाली जगहों को ठंडा करने के लिए समय के चुनाव जैसे स्थानीय स्तर पर हस्तक्षेप के लिए इन जानकारियों की जरूरत है।
और पढ़ेंः आदमकद कछुए: लिटिल अंडमान में पाए जाने वाले जीव पर पड़ सकती है ‘विकास’ की मार
रुशिकुल्या में ऑलिव रिडले की वंशावली 30-40 लाख साल पुरानी है। यह आबादी हिमयुगों और महासागर में आए बड़े बदलावों से बचकर निकल चुकी है। हज़ारों सालों की यह मजबूती आज मानव-जनित जलवायु परिवर्तन की अभूतपूर्व तेजी के सामने बिल्कुल विपरीत दिखती है। शायद सबसे महत्वपूर्ण कदम यह है कि हम उन पारिस्थितिकी प्रक्रियाओं को बचाएं, जो समुद्री कछुओं को बदलते माहौल के अनुरूप ढलने में मदद करती हैं। फोर्नियर ने कहा,“हमें आगे की सोच के साथ ऐसी गतिशील संरक्षण रणनीतियों को प्राथमिकता देनी होगी, जिन्हें उसी जगह और उसी समय लागू किया जा सके जहां और जब कछुए दिखाई दें।” “संरक्षण को मानचित्र पर खींची स्थिर रेखाओं से बांधकर नहीं रखा जा सकता। इसे कछुओं की गतिविधियों और उनके रास्तों की निगरानी करनी चाहिए।”
भारत में समुद्री कछुओं का जिंदा रहना इस बात पर निर्भर करता है कि हम धरती पर हो रहे बदलावों के साथ बचाव की रणनीति को किस तरह जोड़ते हैं। जलवायु विज्ञान को समुद्री नीति में शामिल करना, क्षेत्रीय सहयोग को लागू करना और गतिशील सुरक्षा को अपनाना जरूरी कदम हैं। इनके बिना, भारत उन समुद्र तटों की सुरक्षा करते रह जाएगा जहां अब बहुत कम कछुए आते हैं और उन जल क्षेत्रों की निगरानी करेगा जहां वे अब नहीं जाते हैं, जबकि ये प्राचीन समुद्री जीव खुद को व्यस्त जहाज वाले रास्तो के बीच फंसा हुआ पाते हैं।
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 3 नवंबर, 2025 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: अभी-अभी अंडा देकर आई व्यस्क मादा कछुआ अपने अंडे को शिकारियों से बचाने के लिए उसे ढकती हुई। तस्वीर: कार्तिकेयन हेमलता