- एक अध्ययन ने तमिलनाडु में डुगोंग के आवास क्षेत्र, पाल्क खाड़ी, में समुद्री घास के वितरण की जांच की।
- शोध में समुद्री जीवन के लिए महत्वपूर्ण स्वस्थ समुद्री घास के क्षेत्रों की पहचान की गई, साथ ही उन हिस्सों की भी, जहां वनस्पति नहीं है लेकिन उन्हें पुनर्स्थापित किया जा सकता है।
- ध्वनिक तकनीकों और ग्राउंड-ट्रुथिंग के संयोजन से किए गए इस अध्ययन ने समुद्री घास के मैदानों की मैपिंग में इस विधि की उपयोगिता को रेखांकित किया है और इसे बड़े पैमाने पर पुनर्स्थापना के लिए अपनाने की संभावनाओं को भी उजागर किया है।
तमिलनाडु में मनोरा का समुद्र तट डुगोंग का एक महत्वपूर्ण आवास क्षेत्र है। एक नए अध्ययन में इस तट पर समुद्री घास (सीग्रास) के फैलाव और वितरण की मैपिंग की गई है। इस अध्ययन में ध्वनिक तकनीकों (acoustics) और ग्राउंड-ट्रूथिंग विधियों का उपयोग किया गया है, जो समुद्री घास की बहाली (restoration) की संभावनाओं को रेखांकित करता है।
समुद्री घास, समुद्री के अंदर उगने वाले ऐसे पौधे हैं जिनमे फूल भी लगते हैं। यह उथले और गर्म समुद्री जल में घास के मैदान बनाते हैं और समुद्री जीवों जैसे डुगोंग, कछुए, मछलियों और अकशेरुकी प्रजातियों के लिए महत्वपूर्ण आवास होते हैं। साथ ही यह अन्य प्रजातियों के लिए भोजन स्थल और प्रजनन केंद्र (nurseries) का भी कार्य करते हैं।
समुद्री घास के पौधे शक्तिशाली कार्बन सिंक के रूप में भी काम करते हैं। ये पौधे वातावरण से बड़ी मात्रा में कार्बन को सोखकर संग्रहित करते हैं और इस तरह जलवायु परिवर्तन को कम करने में मदद करते हैं।
हालांकि, इस घास के पारितंत्र (इकोसिस्टम) पर मानवीय गतिविधियों, जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक आपदाओं के कारण लगातार खतरा बढ़ता जा रहा है, जिससे उन समुद्री जीवों का जीवन संकट में पड़ रहा है जो इन पारितंत्रों पर निर्भर हैं।
हाल के कुछ वर्षों में इन महत्वपूर्ण पारितंत्रों के संरक्षण के लिए वैश्विक स्तर पर एक मजबूत आंदोलन शुरू हुआ है जिसे तेजी से समर्थन और गति मिल रही है।
इसी संदर्भ में, शोधकर्ताओं की एक टीम ने पाल्क खाड़ी (Palk Bay) क्षेत्र में स्थित सीग्रास मैदानों के स्थानिक वितरण और बहाली की संभावनाओं का आकलन करने के लिए एक छोटे पैमाने का अध्ययन किया। यह क्षेत्र डुगोंग कंज़र्वेशन रिज़र्व (DCR) के आरक्षित क्षेत्र का भी हिस्सा है। DCR भारत का पहला संरक्षित क्षेत्र है जो विशेष रूप से डुगोंग के संरक्षण के लिए समर्पित है।
साल 2022 में स्थापित यह आरक्षित क्षेत्र लगभग 500 वर्ग किलोमीटर में फैला है और डुगोंग या “समुद्री गाय” जैसी संकटग्रस्त प्रजातियों की रक्षा करता है, जो पूरी तरह सीग्रास पर निर्भर होती है।
यह शोध OMCAR फाउंडेशन (Organization for Marine Conservation, Awareness and Research), पाल्क खाड़ी, तमिलनाडु और केंद्रीय समुद्री मत्स्य अनुसंधान संस्थान (CMFRI), कारवार, कर्नाटक की टीम द्वारा किया गया।
गल्फ ऑफ मन्नार और पाल्क खाड़ी में सीग्रास के विस्तृत मैदान पाए जाते हैं। राष्ट्रीय सतत तटीय प्रबंधन केंद्र (National Centre for Sustainable Coastal Management) के 2022 के अनुमान के अनुसार, भारत में सीग्रास पारितंत्र का क्षेत्रफल 516.59 वर्ग किलोमीटर है। इसकी CO₂ अवशोषण (sequestration) दर प्रति वर्ष 434.9 टन प्रति वर्ग किमी तक है, जिससे 517 वर्ग किमी क्षेत्रफल के लिए वार्षिक शुद्ध CO₂ अवशोषण लगभग 0.75 मिलियन टन होता है।
सीग्रास को उनकी पारितंत्र स्वास्थ्य सूचक क्षमता के कारण “जैविक प्रहरी” (biological sentinels) कहा जाता है। इन्हें “पारिस्थितिक अभियंता” (ecological engineers) भी माना जाता है, क्योंकि ये पारितंत्र को संशोधित और स्थिर करने में सक्षम हैं। रिपोर्टों के अनुसार, सीग्रास 28 प्रकार की पारिस्थितिक सेवाएं(ecosystem services) प्रदान करते हैं, और इन सेवाओं की प्रकृति प्रजातियों (genera) और जैव भौगोलिक क्षेत्रों (bioregions) के अनुसार भिन्न हो सकती है।

सीग्रास आवास की मैपिंग
यह अध्ययन तमिलनाडु के मनोरा तट से लगभग दो किलोमीटर दूर किया गया और इसमें 500 हेक्टेयर (पांच वर्ग किलोमीटर) क्षेत्र को शामिल किया गया। यह क्षेत्र एक जानामाना डुगोंग आवास है, जहां स्थानीय मछुआरों और अन्य लोगों द्वारा कई बार डुगोंग देखे जाने की पुष्टि की गई है।
ध्वनिक सर्वेक्षण (acoustic survey) से पता चला कि सर्वेक्षण क्षेत्र का 46% हिस्सा (2.3 वर्ग किमी) सीग्रास और समुद्री शैवाल (seaweeds) से भरा था, जबकि शेष 54% (2.7 वर्ग किमी) क्षेत्र खुला समुद्री तल (open seafloor) था। इस अध्ययन के लिए इकट्ठे किये गए नमूनों वाली जगहें 1.88 मीटर से 3.76 मीटर के बीच की गहराई में थीं।
मुख्य रूप से पाई जाने वाली सीग्रास प्रजाति Cymodocea serrulata थी, जिसे सामान्यतः सेरेटेड रिबन सीग्रास कहा जाता है। इस क्षेत्र में पाई गई अन्य सीग्रास प्रजातियों में Syringodium isoetifolium (नूडल सीग्रास) और Halophila ovalis शामिल हैं, और ये सभी डुगोंग्स के भोजन का हिस्सा हैं।
तमिलनाडु और गुजरात के तटों पर डुगोंग्स की आंतों में इन सीग्रास प्रजातियों के अवशेष पाए गए हैं, जैसा कि 2022 में वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (WII) द्वारा किए गए एक अलग अध्ययनमें सामने आया।
“तमिलनाडु तट पर फंसे डुगोंग की आंतों की सामग्री के विश्लेषण में शैवाल और सीग्रास दोनों की उपस्थिति देखी गई। आंतों में सबसे अधिक Cymodocea spp. के टुकड़े पाए गए, उसके बाद Halophila spp., Syringodium spp. और Halodule spp. मिले। यह संभव है कि नमूने एकत्र किए जाने तक Halophila spp. जैसे नरम सीग्रास पहले ही पच चुके हों, जिससे परिणाम प्रभावित हुए हों,” WII अध्ययन का हिस्सा रहे वाइल्डलाइफ कंजर्वेशन सोसाइटी-इंडिया के मरीन प्रोग्राम के वरिष्ठ वैज्ञानिक अनंत पांडे बताते हैं।
वर्तमान अध्ययन का हवाला देते हुए, OMCAR फाउंडेशन के डायरेक्टर बालाजी वेधराजन कहते हैं, “यहां समुद्री घास के विस्तार के बारे में पहले कोई जानकारी नहीं थी, और इसकी मैपिंग करना जरूरी था क्योंकि यह क्षेत्र डुगोंग कंज़र्वेशन रिज़र्व का हिस्सा है। हमें लगा था कि समुद्री घास का फैलाव लगभग 25-30% के आसपास होगा, लेकिन हमें समुद्री घास और समुद्री शैवाल मिलाकर कुल 46% फैलाव मिला, जो कि एक अच्छी बात है।”
इस अध्ययन का हिस्सा रहे वेधराजन कहते हैं कि समुद्री घास के खाली हिस्सों के पीछे के सटीक कारण अभी स्पष्ट नहीं हैं। “यह मछली पकड़ने की गतिविधियों की वजह से हो सकता है या किसी और कारण से; हमें कारणों को समझने के लिए और समय चाहिए। लेकिन कुछ ऐसे खुले हिस्से हैं जिन्हें छोटे, स्थानीय ट्रॉलर, जिन्हें कंट्री बोट ड्रैगनेट कहा जाता है, द्वारा नुकसान पहुंचाया गया है या उखाड़ दिया गया है,” उन्होंने आगे बताया।
तंजावुर जिला का वन विभाग इस क्षेत्र में क्षतिग्रस्त समुद्री घास के मैदानों को पुनर्स्थापित करने की योजना बना रहा है, और ऐसे में यह मैपिंग स्टडी उनके प्रयासों का मार्गदर्शन करने के लिए एक अहम आधार बनेगा।

भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) द्वारा 2024 में प्रकाशित डुगोंग के आवास पर आधारित एक अन्य अध्ययन पाल्क खाड़ी के कुछ हिस्सों को डुगोंग के लिए एक महत्वपूर्ण आवास क्षेत्र के रूप में रेखांकित करता है। इस अध्ययन में शामिल पांडे कहते हैं, “WII की टीम ने इस बड़े क्षेत्र में आवास उपयुक्तता और जोखिम आकलन का सर्वेक्षण किया था, और उत्तर पाल्क खाड़ी, जिसमें मनोरा तट भी शामिल है, एक अहम क्षेत्र के रूप में सामने आया। इस पूरे क्षेत्र में समुद्री घास के बड़े-बड़े हिस्से अब भी मौजूद हैं और यही वजह है कि डुगोंग इस हिस्से में अधिक देखे जाते हैं।”
तकनीकों से समाधान
इस रिसर्च टीम ने बायोसॉनिक्स एमएक्स एक्वाटिक हैबिटैट मैपिंग इंस्ट्रूमेंट/इको साउंडर सिस्टम का उपयोग किया, यह एक इको साउंडर है जो जलमग्न वनस्पतियों और तलछट की मैपिंग कर सकता है और उनका डेटा एकत्र करता है। यह उपकरण ध्वनि तरंगें (acoustic pulses) उत्सर्जित करता है जो समुद्र तल और वनस्पति से टकराकर वापस आती हैं। इस उपकरण को सर्वेक्षण नौका के किनारे पर लगाया गया था, और इन लौटती तरंगों का चित्रण एक जुड़े हुए लैपटॉप पर दर्ज किया गया। सटीक भौगोलिक निर्देशांक दर्ज करने के लिए एक डिफरेंशियल ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (DGPS) का उपयोग किया गया।
इस डेटा को सत्यापित करने के लिए ग्राउंड-ट्रुथिंग तकनीकों का उपयोग किया गया। ग्राउंड-ट्रुथिंग फील्ड डेटा की सटीकता की प्रत्यक्ष पुष्टि करने की प्रक्रिया है। इसके तहत 21 जगहों पर यह प्रक्रिया अपनाई गई। चुनी गई जगहों पर एक पीवीसी फ्रेम से जुड़ी कैमरा प्रणाली को समुद्र तल तक उतारा गया ताकि वहां के दृश्य की रिकॉर्डिंग की जा सके और यह पुष्टि की जा सके कि वहां समुद्री घास है या नहीं। इन 21 जगहों में से आठ पर समुद्री घास पाई गई, जिससे ध्वनिक (acoustic) डेटा की पुष्टि हुई।
वैन वीन ग्रैब, एक हाथ से चलाया जाने वाला उपकरण जिसका उपयोग नमूने इकट्ठे करने के लिए किया जाता है – की मदद से समुद्री घास के नमूने एकत्र किए गए ताकि प्रजातियों की पहचान और उनकी ऊंचाई (canopy height) मापी जा सके।
चुनौतियों का समाधान
हालिया अध्ययन को अंजाम देने में आई चुनौतियों को लेकर वेधराजन बताते हैं कि पानी की गंदलापन (turbidity) एक बड़ी बाधा रही। “डुगोंग कंज़र्वेशन रिज़र्व के लगभग आधे समुद्री तल को ड्रोन या सैटेलाइट इमेजरी से नहीं देखा जा सकता क्योंकि वहां पानी बहुत गंदा होता है। कावेरी नदी घाटी तंजावुर जिले के पास है और वह अपने साथ तलछट (sediments) लाती है। साल के अधिकांश समय पानी गंदला ही रहता है,” उन्होंने बताया।

इसके अलावा भी कई अन्य चुनौतियां थीं, जिन्हें लेखक मानते हैं कि और अधिक मजबूत अध्ययन और सैंपलिंग के ज़रिए दूर किया जा सकता है। समुद्र तल की अलग-अलग सतहें (जैसे समुद्री घास, समुद्री शैवाल, रेत आदि) ने ध्वनिक डेटा को पढ़ना कठिन कर दिया, जिससे निष्कर्षों में गलतिओं की गुंजाइश रह गई। वेधराजन कहते हैं कि इस तरह के अध्ययन को कहीं बड़े क्षेत्र में दोहराने के लिए और अधिक सांसदों की आवश्यकता होगी।
भले ही यह अध्ययन एक छोटे से क्षेत्र में किया गया था, लेकिन इसने समुद्री घास वाले क्षेत्रों की मैपिंग के लिए ध्वनिक रिमोट सेंसिंग की उपयोगिता और ग्राउंड-ट्रुथिंग की प्रासंगिकता को उजागर किया।
लेखक लगभग 270 हेक्टेयर (2.7 वर्ग किलोमीटर) के बिना वनस्पति वाले समुद्री तल में लक्षित पुनर्स्थापना प्रयासों की संभावना को रेखांकित करते हैं। वे दीर्घकालिक, पारिस्थितिक-अनुकूल पुनर्स्थापना तकनीकों के साथ-साथ सख्त नियम प्रवर्तन की सिफारिश करते हैं, ताकि विनाशकारी गतिविधियों जैसे कि समुद्री घास से ढके क्षेत्रों में मछली पकड़ने के हानिकारक तरीकों को रोका जा सके।
किसी भी आवास स्थल का पुनर्स्थापन एक कठिन कार्य होता है और यह प्रक्रिया शायद ही कभी सरल होती है, इसके लिए एक समग्र दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है, ऐसा कहना है नेचर कंजर्वेशन फाउंडेशन के ओशन्स एंड कोस्ट्स प्रोग्राम से जुड़ी वैज्ञानिक एलरिका डी’सूजा का।“समुद्री घास के मैदान उपेक्षित पारिस्थितिक तंत्र हैं और इनके महत्व को कम आंका जाता है। भले ही ये कई संकटग्रस्त प्रजातियों को आवास और भोजन प्रदान करते हों, इनकी अन्य भूमिकाओं को अक्सर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। समुद्री घास का संरक्षण केवल रोपण के ज़रिए पुनर्स्थापन तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उन खतरों पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए जिन्होंने इनके क्षरण में योगदान दिया है,” वे बताती हैं।
समुद्र तटीय क्षेत्रों में इस तरह के अनेक अध्ययनों से प्राप्त जानकारियों को अपनाकर और बेहतर बनाकर, समुद्री घास के क्षतिग्रस्त मैदानों की मैपिंग और पुनर्स्थापना, मौजूदा आवासों के संरक्षण, और अंततः समुद्री जैव विविधता के संरक्षण की दिशा में बड़े प्रयास किए जा सकते हैं। हालांकि, ज़मीनी स्तर पर ठोस परिणाम हासिल करने से पहले कई महत्वपूर्ण अनुसंधान क्षेत्रों को भरने की आवश्यकता है।
बैनर तस्वीर: साइमोडोसिया समुद्री घास जिसके टुकड़े भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) द्वारा गुजरात और तमिलनाडु के तटों पर अध्ययन किए गए डुगोंग के पेट में प्रमुख रूप से पाए गए थे। तस्वीर: क्रिस टैक्लिस द्वारा Wikimedia Commons (CC BY 4.0) के माध्यम से।