- शोधकर्ताओं ने दक्कन पठार के अर्ध-शुष्क घास के मैदानों से ट्रैपडोर मकड़ी की एक नई प्रजाति, टिजिडिया सिंघल के बारे में बताया है। यह मायगैलोमॉर्फ मकड़ियों के एक प्राचीन समूह से संबंधित है, जो अपना अधिकांश जीवन बिलों में बिताती हैं।
- यह खोज अर्ध-शुष्क, खुले प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्रों में टिजिडिया (Tigidia) वंश की पहली मौजूदगी है, जो इसके ज्ञात दायरे को जंगलों से आगे बढ़ाती है।
- शोधकर्ताओं का कहना है कि इन उपेक्षित पारिस्थितिकी तंत्रों का अध्ययन करने के लिए और अधिक जैव-विविधता सर्वेक्षणों की जरूरत है, जहां कई और ऐसी अकशेरुकी (invertebrate) प्रजातियां होने की संभावना है जिनके बारे में अभी तक पता नहीं चला है।
महाराष्ट्र के अर्ध-शुष्क घास के मैदानों में वनस्पतियों की नियमित निगरानी के लिए किए जा रहे एक सर्वेक्षण की शुरुआत सामान्य तरीके से हुई। लेकिन, इसमें तब अप्रत्याशित मोड़ आ गया जब शोधकर्ताओं ने एक चट्टान को हटाया और उसके नीचे रेशम से बनी परत वाले एक बिल को देखा। उन्होंन इसकी पहचान ट्रैपडोर मकड़ी के बिल के तौर पर की। यह मकड़ियों का प्राचीन समूह है, जिसकी कई प्रजातियां अपने बिल के मुहाने को छिपाने और वहां से गुजरने वाले शिकार पर अचानक हमला करने के लिए रेशम और मिट्टी से दरवाजे बनाती हैं।
टीम ने मिट्टी की खुदाई की और उस बिल के तह तक गए जहां ‘टिजिडिया वंश की मादा ट्रैपडोर मकड़ी गुंबद के आकार वाले कक्ष में मिली। महाराष्ट्र के अहिल्यानगर में नंदेश्वर महादेव मंदिर के पास पिछले साल नवंबर में इकट्ठा किए गए नमूने की व्यापक जांच में इस नई प्रजाति के बारे में पता चला। शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन में इसे टिजिडिया सिंघल का नाम दिया है और यह शोध आर्कियोलॉजी जर्नल में छपा है। इस खोज के बाद भारत में टिजिडिया प्रजातियों की संख्या बढ़कर आठ हो गई है।
अब तक, इस वंश की प्रजातियां प्रायद्वीपीय भारत के उष्णकटिबंधीय सदाबहार और पर्णपाती वनों, खास तौर पर पश्चिमी और पूर्वी घाट में पाई जाती थीं। टी. सिंघल इस वंश की अर्धशुष्क खुले प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र से पहली मौजूदगी है। इससे इसके आवास के बारे में ज्ञात जानकारी का उल्लेखनीय रूप से विस्तार हुआ है।
अध्ययन के लेखक ऋषिकेश त्रिपाठी और प्रसाद बोल्डे ने मोंगाबे-इंडिया को बताया, “इस प्रजाति का आवास दक्कन पठार की चट्टानी पहाड़ी चोटियों के घास के मैदान हैं। जैव-विविधता में इसकी अहमियत के बावजूद, इस पारिस्थितिकी तंत्र को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है।” उन्होंने आगे कहा, “यहां ट्रैपडोर मकड़ी की ऐसी प्रजाति मिली है जिसके बारे में हम पहले से कुछ नहीं जानते थे। इससे पता चलता है कि हम इन खुले प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र की जैव-विविधता के बारे में अभी भी कितना कम जानते हैं।”

प्राचीन वंश
त्रिपाठी और बोल्डे बताते हैं कि ट्रैपडोर लंबे समय तक जीवित रहने वाली, एक ही जगह पर निवास करने वाली मकड़ियां हैं जो अपनी जिंदगी का ज्यादातर हिस्सा बिल में ही बिताती हैं। वह अपने साथी की तलाश के अलावा कभी-कभार ही बिल से बाहर आती है। त्रिपाठी इस अध्ययन के प्रमुख लेखक हैं और वह अशोका ट्रस्ट फॉर रिसर्च इन इकोलॉजी एंड द एनवायरनमेंट (ATREE) में पोस्ट-डॉक्टोरल रिसर्च एसोसिएट हैं। वहीं बोल्डे भारतीय वन्यजीव संस्थान में प्रोजेक्ट एसोसिएट हैं। ATREE में सेंटर फॉर पॉलिसी डिजाइन में डायरेक्टर अबी तमिन वनक इस अध्ययन के सह-लेखक हैं।
कई प्रजातियां रेशम, मिट्टी, काई और पत्तियों से अपना बिल बनाती हैं, ताकि उन्हें छिपने में आसानी हो और इसी से इस समूह को उसका नाम मिला है। आर्कियोलॉजिस्ट और हरपिटियोलॉजिस्ट जीशान ए मिर्जा ने कहा, “यह अनुकूलन मकड़ियों के लिए खासा फायदेमंद है। इससे उन्हें शिकारियों से सुरक्षा के साथ-साथ अपने शिकार को पकड़ने में मदद मिलती है।” मिर्जा मिजोरम विश्वविद्यालय में रिसर्च एसोसिएट हैं और इस अध्ययन से जुड़े हुए नहीं हैं। लेकिन छिपने की यह प्रक्रिया उन्हें खोजना मुश्किल बना देती है।
ट्रैपडोर मकड़ियां मायगैलोमोर्फी इन्फ्राऑर्डर से संबंधित हैं जिसमें टैरेंटुला और फनल-वेब मकड़ियां भी शामिल हैं। मिर्जा ने कहा, “[मायगैलोमोर्फ] पर सबसे कम अध्ययन हुए हैं, क्योंकि वह अधिकांश समय बिलों में रहती हैं और उन्हें सामान्य सर्वे में खोजना मुश्किल है।” वह कहते हैं कि ये अक्सर आकार में बड़ी होती हैं और उन्हें आदिम माना जाता है।
टिगिडिया वंश ब्रश-फुटेड मकड़ियों की प्रजाति में शामिल है जो भारत में पाई जाने वाली मायगैलोमोर्फ मकड़ियों की नौ प्रजातियों में से एक है। लेखकों के अनुसार, टिगिडिया वंश की मकड़ियां सिर्फ मेडागास्कर, मॉरीशस और भारत में पाई जाती हैं। उन्होंने कहा, “इस तरह इसका अलग-अलग क्षेत्रों में पाया जाना लंबे समय से दिलचस्पी का विषय रहा है, क्योंकि यह गोंडवाना महाद्वीप के टूटने से जुड़े प्राचीन भूवैज्ञानिक संबंधों के अनुरूप है। इसलिए हर नई प्रजाति इन प्राचीन ट्रैपडोर मकड़ियों के विकासवादी इतिहास और जैव-भौगोलिक वितरण को समझने के लिए अहम जानकारी देती है।”
इस खोज को “दिलचस्प” बताते हुए मिर्जा ने कहा कि गोंडवाना से जुड़े संबंध इन मकड़ियों को ऐसे अहम अवशेष बनाते हैं, जिनका संरक्षण किया जाना जरूरी है। उन्होंने कहा, “इन मकड़ियों की विविधता के बारे में अभी पूरी जानकारी नहीं है और दक्कन से हुई यह नई खोज हैरान करने वाली नहीं है, क्योंकि इन क्षेत्रों में इनके लिए बहुत कम सर्वेक्षण किए गए हैं।” मिर्जा ने पहले टिगिडिया की कई प्रजातियों के बारे में बताया है। उन्होंने कहा कि उन्होंने प्रायद्वीपीय भारत से ऐसी तस्वीरें और नमूने देखे हैं, जो संकेत देते हैं कि अभी कई प्रजातियों के बारे में बताया जाना बाकी है।

बिल में रहने वाली मकड़ी
इकट्ठा किया गया नमूना 15 मिलीमीटर लंबा मादा मकड़ी का था जिसके काले पैरों पर भूरे रंग के रोएं जैसे बाल थे। इसके पेट का रंग हल्का था, जिस पर शेवरॉन के आकार के निशान थे। शोधकर्ताओं ने बाहरी विशेषताओं के आधार पर इसके वंश की पहचान की। इसके बाद उन्होंने विस्तृत आकार संबंधी संबंधी विश्लेषण किया और नमूने की विशेषताओं की तुलना टिगिडिया की सभी ज्ञात प्रजातियों से की। त्रिपाठी और बोल्डे ने बताया, “स्पर्मेथीकी (मादा की प्रजनन संरचनाओं) का अनोखा आकार और विन्यास तथा आकार संबंधी अन्य विशेषताओं के मेल ने विज्ञान के लिए इस प्रजाति की पुष्टि की।”
अब तक उन्हें यह प्रजाति सिर्फ उसी जगह के आसपास मिली है, जहां इसे पहली बार दर्ज किया गया था जो इसके सीमित वितरण का संकेत देता है। कई बार दोबारा वहां जाने के बावजूद टीम को अभी तक कोई नर नहीं मिला है। हालांकि, इस साल जून में उन्हें एक मादा अंडों की थैली की रखवाली करती हुई मिली, जिससे संकेत मिलता है कि प्रजनन संभवतः मई के आसपास मानसून-पूर्व शुरुआती बारिश के साथ शुरू होता है और जून तक जारी रहता है। टीम प्रयोगशाला में 17-18 नवजात मकड़ियों का पालन कर रही है, जो पहले ही अंडों की थैली से बाहर निकल चुकी हैं।
शोधकर्ताओं ने जिन अधिकांश बिलों को देखा, वे पूरी तरह रेशम से ढके हुए थे, उनमें दो मुहाने थे और वे आमतौर पर चट्टानों के किनारों पर स्थित थे, जहां मिट्टी में अधिक नमी बनी रहती थी और उसे संरचनात्मक सहारा मिलता था। उन्होंने बताया कि गर्मी के महीनों में चट्टानों के नीचे की नमी वाली मिट्टी “शायद बिल के अंदर अनुकूल सूक्ष्म जलवायु बनाए रखने में मदद करती है।”
ये बिल 4-10 सेंटीमीटर गहरे थे जो मिट्टी में अंदर तक जाते थे, लेकिन चट्टानी आधार मिलने पर अपनी दिशा बदल लेते थे।
ट्रैपडोर मकड़ी के बिल हवादार होते हैं, मिट्टी की संरचना को बनाए रखते हैं और दूसरे जीवों के लिए सूक्ष्म आवास बनाते हैं। आवास में होने वाले बदलावों को लेकर बहुत ज्यादा संवेदनशील होने से ये मकड़ियां पारिस्थितिकी तंत्र की संकेतक भी होती हैं। उनकी मौजूदगी यह बताती है कि पारिस्थितिकी तंत्र अच्छा है और मिट्टी की जैव-विविधता शानदार है।
त्रिपाठी और बोल्डे ने कहा, “कई मायनों में अगर बाघ जैसे बड़े स्तनधारी जंगलों की पारिस्थितिकी अखंडता के प्रतीक हैं, तो टिगिडिया जैसी प्राचीन मायगैलोमोर्फ मकड़ियां भारत के घास के मैदानों और अन्य खुले प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्रों के लिए भी उतनी ही अहम प्रमुख प्रजातियों के रूप में काम कर सकती हैं।”

पारिस्थतिकी तंत्र की अनदेखी
टी. सिंघल की खोज भारत के खुले हुए प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्रों में जैव-विविधता सर्वेक्षण की जरूरत को उजागर करती है। इसके बड़े हिस्से को गलत तरीके से बंजर भूमि के तौर पर वर्गीकृत किया गया जिसकी जड़ें औपनिवेशिक काल से जुड़ी हुई हैं।
कृष्णमृग और भारतीय भेड़िये जैसी अनोखी प्रजातियों का आवास होने के बावजूद, ये क्षेत्र जंगलों की तुलना में अब भी उपेक्षित और खासकर अकशेरुकी जीवों के लिहाज से कम खोजे गए हैं। मिर्जा ने कहा कि “कम आकर्षक माने जाने वाले जीवों या तथाकथित बंजर भूमि” की जैव-विविधता का दस्तावेजीकरण करने के लिए धन की कमी अब भी बड़ी बाधा है।
कम वनस्पति वाले घास के मैदान जैसे वह क्षेत्र जहां टी सिंघल पाई जाती है, अक्सर ‘क्षरित’ या ‘बंजर’ माने जाते हैं और इन पर मानवीय गतिविधियों का भारी दबाव रहता है। शोधकर्ताओं ने इनमें से कुछ दबावों को सीधे तौर पर देखा। इनमें भूमि के इस्तेमाल में बदलाव और मिट्टी का खनन, पर्यटन से पैदा होना वाला प्लास्टिक कचरा और पत्थर खनन शामिल हैं, जो उन चट्टानी सूक्ष्म आवासों को नष्ट कर देता है जहां ये मकड़ियां अपना बिल बनाती हैं। उन्होंने आगे कहा, “चूंकि इस प्रजाति का वितरण बहुत सीमित प्रतीत होता है और यह खास चट्टानी घास के मैदानों पर निर्भर करती है, इसलिए ये गतिविधियां इसके अस्तित्व के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकती हैं।”
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फिलहाल, इस प्रजाति के नर के बारे में जानकारी नहीं है। वहीं, मकड़ी के प्रजनन जीव-विज्ञान, जीवन-इतिहास, आबादी की स्थिति और वितरण का भी आगे अध्ययन किया जाना बाकी है।
लेखकों ने कहा, “इस तरह की खोजें दिखाती हैं कि इन पारिस्थितिकी तंत्रों में अनोखी और बहुत ज्यादा खास प्रजातियां पाई जाती हैं, जो कहीं और नहीं मिलतीं। यह जानकारी घास के मैदानों को बंजर भूमि के बजाय जैव-विविधता से समृद्ध प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में पहचानकर संरक्षण की योजना, आवास प्रबंधन और नीतिगत फैसलों में मदद कर सकती है।”
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 28 जुलाई, 2026 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: अध्ययन करने वालों के अनुसार, पथरीले घास के मैदान जहां टी सिंघल मिली थी, वहां कृष्ण मृग, भारतीय भेड़िया, भारतीय लोमड़ी और शॉर्ट-टोएड स्नेक ईगल (सांपमार बाज) जैसी खास प्रजातियां पाई जाती हैं। तस्वीर: प्रसाद बोल्डे।