- संसद के मॉनसून सत्र में खान और खनिज कानून, 1957 में किए गए संशोधन के बाद राज्य खनिजों पर कर, उपकर या अन्य लेवी नहीं लगा सकेंगे।
- केंद्र का कहना है कि इन संशोधनों का मकसद राज्य स्तर पर करों में क्षेत्रीय असमानताएं दूर करना और खनिजों के गैर-जरूरी आयात को कम करना है।
- राज्यों को राजस्व नुकसान का हवाला देकर विपक्षी दल इन संशोधनों का पुरजोर विरोध कर रहैं हैं। कांग्रेस शासित राज्यों के साथ-साथ झारखंड भी संशोधनों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने वाला है।
तेरह अगस्त को खत्म हुए संसद के मॉनसून सत्र में जिन 12 विधेयकों को मंजूरी मिली, उनमें सबसे ज्यादा विरोध खान और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 (एमएमआरडी संशोधन विधेयक) का हो रहा है। छात्र आंदोलन को लेकर गतिरोध के दौरान केंद्र-राज्य संबंधों और संघीय ढांचे पर दूरगामी असर वाला यह विधेयक 10 अगस्त को लोकसभा में पेश किया गया और 12 अगस्त को दो मिनट के भीतर इसे ध्वनिमत से मंजूरी दे दी गई।
विधेयक से जुड़े उद्देश्यों और कारणों के कथन में कहा गया, “…व्यापक जनहित को ध्यान में रखते हुए, संघ (केंद्र) ने खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957 की धारा 2 के अधीन खानों के विनियमन और खनिजों के विकास को अपने नियंत्रण में ले लिया है।”
इन संशोधनों के जरिए खान और खनिज (विकास और विनियमन) कानून, 1957 में बड़े बदलाव किए गए हैं। अब खनिज धारित भूमि को विनियमित करने का अधिकार राज्यों के पास से केंद्र के पास चला गया है।
राज्य अब ऐसी भूमि पर केंद्र द्वारा तय शर्तों या प्रतिबंधों के अलावा किसी भी तरह का कर, सेस या लेवी नहीं लगा पाएंगे। इसमें खनिज की मात्रा, खनिज की कीमतें, रॉयल्टी और किसी अन्य आधार पर लेवी शामिल है।
कराधान का यह अधिकार राज्यों को 2024 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद मिला था। इसी फैसले में शीर्ष अदालत ने राज्यों को एक अप्रैल, 2025 से 12 किस्तों में बकाया राशि वसूलने का आदेश दिया था।
विपक्षी दलों का आरोप है कि एमएमडीआर कानून में संशोधन के बाद खनन-बहुल राज्यों को राजस्व का नुकसान झेलना पड़ेगा, क्योंकि नए संशोधनों के मुताबिक राज्य इस बकाया को आगे नहीं वसूल सकेंगे। हालाँकि, उन्हें मिली हुई राशि लौटानी भी नहीं होगी।

कर पर किसका अधिकार
खान मंत्रालय के अनुसार संशोधन विधेयक से राज्यों के भूमि और खनिजों से संबंधित किसी भी अधिकार या राज्यों द्वारा एकत्र किए जाने वाले खनिजों पर कोई भी कर खत्म नहीं होगा।
छत्तीसगढ़ में खनन विभाग के सेवानिवृत्त अतिरिक्त निदेशक अनुराग दीवान ने मोंगाबे-हिंदी से कहा कि अगर केंद्र ने खनिज धारित भूमि का रेगुलेशन अपने अधिकार में ले लिया है, तो राज्य अब खनिज अधिकार या खनिज धारित भूमि पर अपनी तरफ से कोई कर, उपकर या लेवी नहीं लगा सकेंगे।
एमएमडीआर कानून पर जारी अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न में कहा गया है कि अभी राज्यों को लगभग 14 प्रकार के कर, प्रभार, शुल्क और अन्य वसूली मिल रही हैं, जिनमें रॉयल्टी, नीलामी प्रीमियम, डेड रेंट, जिला खनिज प्रतिष्ठान (डीएमएफ) को भुगतान, जीएसटी और पारगमन शुल्क शामिल हैं।
सेंटर फॉर सोशल एंड इकनोमिक प्रोग्रेस (सीएसईपी) में एसोसिएट फेलो कार्तिक बंसल मोंगाबे-हिंदी से कहते हैं, “केंद्र और राज्यों के बीच करों के बंटवारे की मौजूदा व्यवस्था चलती रहेगी और इसमें कोई बदलाव नहीं होगा। खनन से संबंधित अधिकतर राजस्व राज्यों को ही जाता है। इस व्यवस्था में कोई बदलाव नहीं होगा।”
मॉनसून सत्र के आखिरी दिन राज्य सभा ने भी संक्षिप्त चर्चा के बाद गतिरोध के बीच ध्वनिमत से यह विधेयक पारित कर दिया। राज्य सभा में द्रविड़ मुनेत्र कषगम (डीएमके) के सांसद त्रिची शिवा सहित नौ सदस्यों ने व्यापक चर्चा के लिए विधेयक को प्रवर समिति (सेलेक्ट कमेटी) में भेजने की मांग की, लेकिन सदन ने इसे खारिज कर दिया।
झारखंड मुक्ति मोर्चा की राज्य सभा सांसद महुआ माजी ने मोंगाबे-हिंदी से बातचीत में केंद्र सरकार पर हड़बड़ी में विधेयक लाने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा, “अक्सर विधेयक पर दोपहर दो बजे से चर्चा होती है। लेकिन, इस बिल को पारित कराने के लिए प्रश्नकाल और शून्यकाल स्थगति कर दिए गए। इस दौरान विपक्ष कई मुद्दों पर विरोध कर रहा था। सरकार चुपके से यह बिल ले आई और गिने-गुने सांसदों को ही बोलने का मौका मिला।”
लोक सभा में संशोधनों के खिलाफ सबसे पहले आवाज उठाने वाले रिवॉल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी के सांसद एन के प्रेमचंद्रन ने मोंगाबे-हिंदी से बातचीत में अंदेशा जताया कि खनन पट्टा देने का काम भी अब केंद्र सरकार अपने हाथ में ले सकती है, जो काम अभी भी राज्य सरकारों के पास है।
दरअसल, खनिज धारित भूमि पर करारोपण शुरू से ही विवादास्पद मुद्दा रहा है। तमिलनाडु सरकार बनाम इंडिया सीमेंट के मामले में सुप्रीम कोर्ट की सात जजों की पीठ ने 1989 में इंडिया सीमेंट के पक्ष में फैसला सुनाते हुए कहा था कि कानून के तहत खान और खनिज को रेगुलेट करने की शक्ति केंद्र के पास है।

इस फैसले को चुनौती देने वाली 80 से ज्यादा याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने नौ जजों की संविधान पीठ का गठन किया और जिसने 2024 में अपने आदेश में कहा कि पुराने फैसले में रॉयल्टी को टैक्स मानना चूक थी।
केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के द्वारा आठ-एक के बहुमत से 2024 में दिए गए गए आदेश के दो साल बाद ये संशोधन लेकर आई है।
बंसल का मानना है कि 2026 के संशोधनों में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को नजरअंदाज किया है और ये विधेयक पारित हुआ है जो कि गलत उदाहरण पेश करता है। उन्होंने मोंगाबे-हिंदी से कहा, “जब भी केंद्र को लगेगा कि राज्यों के पास यह शक्ति नहीं होनी चाहिए, तो वह संसद में कानून पारित करके उस शक्ति को खत्म कर कर सकता है। यह भविष्य के लिए अच्छा नहीं है।”
इन संशोधनों के लागू होने के बाद एमएमआरडी अधिनियम, 1957 में चार बड़े बदलाव होंगे।
खनिज युक्त भूमि पर केंद्र का नियंत्रण: केंद्र अब खनिज सामग्री वाली भूमि को भी विनियमित करेगा। ऐसी भूमि की पहचान एमएमडीआर अधिनियम के तहत केंद्र सरकार की ओर से तय मानदंडों के अनुसार की जाएगी।
नई धारा 9 डी – राज्य लेवी पर सीमा: केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित शर्तों या प्रतिबंधों के अलावा खनिज अधिकारों या खनिज युक्त भूमि पर राज्य सरकार कोई कर, उपकर या अन्य लेवी नहीं लगा पाएगी। इसमें खनिज की मात्रा, खनिज की कीमतें, रॉयल्टी और किसी अन्य आधार पर लेवी शामिल है।
पिछले शुल्कों के संदर्भ में नियम: संशोधन लागू होने से पहले राज्य द्वारा भुगतान या एकत्र नहीं किए गए किसी भी लेवी को अमान्य माना जाएगा। हालांकि, इस तरह के बदलाव से पहले पूर्व में जमा की गई या वसूल की गई राशि वापस नहीं की जाएगी।
धारा 13 के तहत नियम बनाने की शक्ति: धारा 9डी की उपधारा 1 के तहत कर, उपकर और अन्य लेवी के संबंध में शर्तें या प्रतिबंध तय करना।
सुप्रीम कोर्ट ने 25 जुलाई, 2024 को दिए अपने फैसले (पेज 197-198) में कहा था कि सूची II की प्रविष्टि 49 (राज्य सूची) के अंतर्गत “भूमि” में खनिज धारित भूमि भी शामिल है। शीर्ष अदालत ने टैक्स के मामले कहा था, “खनिज अधिकारों पर कर लगाने की विधायी शक्ति राज्य विधानमंडलों में निहित है। संसद को सूची I की प्रविष्टि 54 (संघ सूची) के तहत खनिज अधिकारों पर कर लगाने की विधायी क्षमता प्राप्त नहीं है, क्योंकि यह एक सामान्य प्रविष्टि है।”
इस फैसले के बाद झारखंड के बकाये पर वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने कहा कि राज्य को एक लाख छत्तीस हजार करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ेगा।
वहीं मीडिया रिपोर्टों और विपक्षी दल बीजू जनता दल के मुताबिक राज्य को पिछले बकाया में करीब एक लाख करोड़ रुपये का घाटा हो सकता है।
हालाँकि, कोयला और खान मंत्री जी किशन रेड्डी के मुताबिक खान और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 खनिज कर व्यवस्था में एकरूपता, पूर्वानुमान और राजकोषीय स्थिरता लाने के लिए लाया गया है।
सरकार का कहना है कि ये संशोधन पिछली तारीख से कर, उपकर या लेवी लगाने से जुड़ी चुनौतियों का समाधान करते हैं, क्योंकि इस सेक्टर पर टैक्स का भारी बोझ है और राज्यों के बीच कर की दरें असमान हैं।
वैसे, संविधान पीठ ने 2024 के अपने फैसले में कहा था, “छत्तीसगढ़, झारखंड और ओडिशा जैसे राज्यों में खनिज संसाधनों का भंडार अधिक है। इसलिए, इन राज्यों के सकल राज्य घरेलू उत्पाद में खनन क्षेत्र का योगदान भी अधिक है। खनिज संपदा की प्रचुरता के बावजूद, इनमें से कई राज्य आर्थिक रूप से पिछड़े हुए हैं। कराधान इन राज्यों के राजस्व के अहम स्रोतों में से एक है, जिसका सीधा असर लोगों तक कल्याणकारी योजनाओं और सेवाओं को पहुंचाने की उनकी क्षमता पर पड़ता है।”
स्वनीति इनीशिएटिव में एनर्जी ट्रांजिशन की सीनियर फेलो चिनमयी शल्या मोंगाबे-हिंदी से कहती हैं, “जमीन, पर्यावरण और समुदायों की जिम्मेदारी राज्यों की होती है। इसके (खनन) प्रभाव जमीनी स्तर पर महसूस किए जाते हैं और इसका असर उन लोगों पर पड़ता है जो राज्य सरकार से शासित होते हैं। अगर सावधानी नहीं बरती गई, तो चीजों को केंद्रीकृत (सेंट्रलाइज़) करने के फैसले का असर फंड पर पड़ सकता है। इसके अलावा, यह भी बहुत अहम होगा कि खनन को लेकर राज्यों की स्वायत्तता कम न हो और केंद्र व राज्य के बीच बेहतर तालमेल पक्का किया जाए।”

राज्य और राजस्व
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद झारखंड और तमिलनाडु जैसे राज्यों ने खनिजों पर उपकर लगाने के कानून बनाए थे। अब ये कानून अधर में लटक गए हैं। वहीं ओडिशा ग्रामीण बुनियादी ढांचा और सामाजिक-आर्थिक विकास शुल्क लगाता है। छत्तीसगढ़ भी खनन पर पर्यावरण और अधोसंरचना विकास उपकर भी लगाता है।
उदाहरण के तौर पर खनिज बहुल झारखंड के गैर-कर राजस्व में खनन (रॉयल्टी, सेस, डेड रेंट व अन्य) की हिस्सेदारी 2018-19 के 71.9 प्रतिशत से बढ़कर 2024-25 (वास्तविक) में 84.9 प्रतिशत हो गई। साल 2025-26 के लिए खनन राजस्व 21,900 करोड़ रुपये अनुमानित है, जो राज्य के कुल अनुमानित 25,856 करोड़ रुपये के गैर-कर राजस्व का 84.7 प्रतिशत है।” (पेज 49)
राज्य को खनिज भूमि पर उपकर लगाने से वित्त वर्ष 2026-27 में 13,000 करोड़ रुपये से अधिक मिलने की उम्मीद है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के मुताबिक इस रकम का इस्तेमाल मईयां सम्मान और बिरसा आवास जैसी सामाजिक योजनाओं में किया जाता है।
झारखंड के वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने कहा, “केंद्र सरकार द्वारा जीएसटी को तर्कंसंगत बनाने से हमें चार हजार करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। वीबी-जीराम-जी के आने से हमारा हिस्सा 10 से बढ़कर 40 फीसदी होने से भी हमें चार हजार करोड़ रुपये का नुकसान होगा। अब खनन कानून में संशोधनों से हमें चौदह हजार करोड़ रुपये का घाटा होगा। इस तरह, हमारा कुल नुकसान बाइस हजार करोड़ रुपये है जो हमारे कुल राजस्व का करीब एक-चौथाई है।”
खनिज-बहुल पड़ोसी ओडीशा का अपने गैर-कर राजस्व (60 हजार करोड़ में) खनिज से मिलने वाली रॉयल्टी का हिस्सा करीब तीन-चौथाई (page 32) से ज्यादा है। वहीं छत्तीसगढ़ को भी खनिजों से 2026-27 में 15 हजार करोड़ रुपये का राजस्व मिलने का अनुमान है।
हालाँकि, केंद्र ने इन आशंकाओं को निराधार बताया। खनन मंत्री ने लिखा कि पिछले 11 सालों में झारखंड का खनन राजस्व 618 फीसदी और ओडिशा का राजस्व 1,051 फीसदी बढ़ा है।
खान मंत्रालय का कहना है कि वर्तमान में राज्य खनन कार्यों पर 14 प्रकार के कर, शुल्क, फीस और अन्य उपकर लगा रहे हैं। वित्त वर्ष 2015-16 से 2025-26 तक खनिज बहुल राज्यों को कुल पांच लाख करोड़ रुपये से ज्यादा प्राप्त हुए हैं। इसी अवधि में केंद्र का राजस्व महज 82 हजार करोड़ रुपये था।
केंद्र सरकार के मुताबिक अनियंत्रित और असमान राज्य स्तरीय शुल्क से प्रचुर स्थानीय भंडार के बावजूद अनावश्यक विदेशी आयात को प्रोत्साहन मिलता है।
हालाँकि, दीवान खनिजों पर केंद्र और राज्यों के बीच बेहतर तालमेल के लिए सभी करों, उपकरों और अन्य करों को मिलाकर जीएसटी जैसी व्यवस्था बनाने का सुझाव देते हैं। उनकी दलील है कि इससे पूरे देश में एक तरह की कीमतें तय करके भारत के खनिज सेक्टर को प्रतिस्पर्धी बनाया जा सकेगा जिसका फायदा उद्योगों को मिलेगा और खनिजों का आयात भी नहीं करना पड़ेगा।
जानकारों का मानना है कि फिलहाल जिला खनिज फाउंडेशन ट्रस्ट (डीएमएफटी) फंड पर इन संशोधनों का कोई असर नहीं पड़ेगा। डीएमएफटी फंड का मकसद उन लोगों और इलाकों के हित और फ़ायदे के लिए काम करना है जो माइनिंग से जुड़े कामों से प्रभावित हुए हैं। खनन सेक्टर से जुड़े एक जानकार ने नाम न छापने की शर्त पर मोंगाबे-हिंदी को बताया कि जिला खनिज फाउंडेशन ट्रस्ट (डीएमएफटी) फंड रॉयल्टी से जुड़ा है। इन संशोधनों से बदलाव यह हुआ है कि रॉयल्टी पहले राज्य तय करता था, लेकिन अब केंद्र तय करेगा। तो, इस तरह देखें तो राज्यों की स्वायत्तता पर प्रभाव पड़ेगा। अगर भविष्य में नई खदानों के लिए रॉयल्टी कम की जाती है, तो डीएमएफटी पर असर पड़ सकता है।

आगे की राह
इस विधेयक के पारित होने के बाद कई राज्य संशोधनों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने के लिए तैयार हैं। कांग्रेस शासित राज्यों के साथ-साथ झारखंड भी इस फैसले को शीर्ष अदालत में चुनौती देने का ऐलान कर चुका है।
झारखंड, केरल और तमिलनाडु के मुख्यमंत्रियों ने प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखकर इन संशोधनों को वापस लेने की अपील की है। वहीं, कर्नाटका के उपमुख्यमंत्री डॉ जी परमेश्वरा ने भी प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर संशोधनों को वापस लेने और सभी राज्यों से निर्धारित समयसीमा में इस मसले पर बातचीत करने की मांग की है।
ओडिशा में नेता विपक्ष नवीन पटनायक ने राज्य के मुख्यमंत्री मोहन चरण मांझी को चिट्ठी लिखकर आरोप लगाया कि यह विधेयक केंद्र-राज्य संबंधों के महत्वपूर्ण आधार को सीधे कमजोर करता है।
अब इस मसले पर एनडीए के भीतर से भी विरोध होने लगा है। एनडीए में शामिल आल झारखण्ड स्टूडेंट यूनियन पार्टी (आजसू-पी) के प्रमुख सुदेश महतो ने कोयला और खान मंत्री जी किशन रेड्डी को लिखी चिट्ठी में कहा कि झारखंड की जनता के विरुद्ध लिया गया कोई भी निर्णय झारखंड की जनता को स्वीकार्य नहीं होगा और झारखंड को मिनरल बियरिंग लैंड सेस लगाने की अनुमति दी जानी चाहिए।
बंसल कहते हैं, “अगर राज्य संशोधनों को स्वीकार कर लेते हैं, तब यह समाधान काम करेगा। अगर राज्य सुप्रीम कोर्ट में चले जाते हैं, तब ज्यादा संभावना यह है कि अदालत संशोधनों को फिलहाल निलंबित कर दे।
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जानकार मानते हैं कि अगर राज्य चाहें, तो वे अन्य तरीकों से कर लगाकर अपने नुकसान की भरपाई कर सकते हैं।
दीवान कहते हैं, “राज्यों के पास यह रास्ता है कि वे खनिज पर नहीं, बल्कि समस्त प्रकार की भूमि पर सेस लगा दें और सेस की दर उस भूमि पर हो रहे कार्यों पर आधारित हो, क्योंकि कानून में हुआ संशोधन खनिज धारित भूमि के संदर्भ में है।” हालांकि, वह जोड़ते हैं कि इसके लिए राज्यों को बेहतर मसौदा तैयार करके अपने विधि विभाग से परामर्श करके ही आगे बढ़ना चाहिए।
बंसल भी दीवान की बातों से सहमति जताते हैं। वह कहते हैं, “अगर राज्य को जमीन पर टैक्स या बाकी लेवी नहीं लगाने दिया जाता है, तो राज्य सरकार बाकी दूसरी लागत बढ़ा सकती है, ताकि उन्हें राजस्व का नुकसान नहीं हो। इस तरह, ये संशोधन समाधान नहीं हैं। राज्य दूसरे तरीके इस्तेमाल कर सकते हैं। समाधान खोजने के लिए केंद्र और राज्य को साथ मिलकर काम करना होगा।“
बैनर तस्वीर- एक माइनिंग इंजीनियर क्रोमियम ओडिशा के जाजपुर जिले की एक खदान में अयस्क की परत की ओर इशारा करते हुए। तस्वीर- एपी/अनुपम नाथ