- एक अध्ययन के मुताबिक छत्तीसगढ़ के जंगल सालाना करीब 17 अरब डॉलर की पारिस्थितिकी सेवाएं देते हैं।
- सरकारी आर्थिक खातों में इन सेवाओं का छोटा हिस्सा ही दर्ज होता है। भारत और दुनिया के कई देश इस अंतर को पाटने की कोशिश कर रहे हैं।
- छत्तीसगढ़ में वन और वृक्ष आवरण तेजी से बढ़ा है, लेकिन लंबे समय के आंकड़े जंगल के ग्रोइंग स्टॉक में गिरावट दिखाते हैं।
- हसदेव अरण्य में नई कोयला खदान और लाखों पेड़ों की प्रस्तावित कटाई ने सवाल उठाया है कि विकास परियोजनाओं में जंगल के आर्थिक मूल्य को कितना महत्व मिलता है।
छत्तीसगढ़ के जंगल हर साल करीब 1.41 लाख करोड़ रुपये की पारिस्थितिकी सेवाएं देते हैं। यह अनुमान राज्य के वन पारिस्थितिकी तंत्र पर हुए एक नए आर्थिक अध्ययन से निकला है। सवाल यह नहीं है कि छत्तीसगढ़ के जंगलों की कीमत 1.41 लाख करोड़ रुपये है। असली सवाल यह है कि जिस जंगल से पानी, कार्बन सोखने की क्षमता, जैव विविधता, मिट्टी, परागण और आजीविका मिलती है, उसकी कितनी कीमत हमारी अर्थव्यवस्था के हिसाब में दिखाई देती है? और अगर वह कीमत दिखाई देने लगे, तो क्या जंगल को बचाने के लिए सरकारों के पास खर्च करने का कोई मजबूत आर्थिक तर्क भी पैदा होगा?
द एनर्जी एंड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट की एक रिपोर्ट ने छत्तीसगढ़ के वन पारिस्थितिकी तंत्र की अलग-अलग सेवाओं का मौद्रिक मूल्य निकालने की कोशिश की है। कुल अनुमान 1.41 लाख करोड़ रुपये सालाना है। इसमें लगभग 66,000 करोड़ रुपये उन सेवाओं के उपयोग-मूल्य हैं, जिन्हें अध्ययन ने राज्य की आय में वानिकी के संभावित योगदान की गणना में शामिल किया है।
छत्तीसगढ़ के करीब 41 प्रतिशत भूभाग पर वन है, जिसके कारण इसकी पहचान भारत के सबसे अधिक वनाच्छादित राज्यों में है। सरकारी आर्थिक लेखे में वानिकी और लॉगिंग का योगदान करीब 18,462 करोड़ रुपये है, जो राज्य के सकल मूल्य वर्धन का 3.46 प्रतिशत है। जब अध्ययन ने कुछ वन-सेवाओं के उपयोग-मूल्य को इसमें जोड़ा तो यह आंकड़ा 66,458 करोड़ रुपये और 11.43 प्रतिशत तक पहुंच गया।
ज़ाहिर है, इसका अर्थ यह नहीं कि छत्तीसगढ़ की जीडीपी में अगले साल 66,000 करोड़ रुपये डाल दिए जाएंगे। ना ही यह जंगल स्वयं 1.41 लाख करोड़ रुपये की कोई बाजार-संपत्ति हैं। संयुक्त राष्ट्र का पर्यावरण-आर्थिक लेखांकन ढांचा यानी SEEA प्रकृति की स्थिति और उससे मिलने वाली सेवाओं को आर्थिक गतिविधियों के साथ दर्ज करने का तरीका है। इसमें सेवाओं का भौतिक लेखा बनाया जा सकता है, उनका मौद्रिक मूल्य निकालना अनिवार्य नहीं है। संयुक्त राष्ट्र भी साफ करता है कि किसी पारिस्थितिकी सेवा का मौद्रिक मूल्य निकालना पूरी प्रकृति पर कीमत चिपका देना नहीं है।
छत्तीसगढ़ के आंकड़े ने जीडीपी को बदल देने की घोषणा से ज्यादा अर्थव्यवस्था के उस अंधे कोने में रोशनी डालने की कोशिश है, जहां जंगल अब तक लगभग मुफ्त दिखाई देते रहे हैं।

राज्य के प्रधान मुख्य वन संरक्षक अरुण पांडेय का मानना है कि इस अध्ययन ने हमारे सामने संभावनाओं के नए दरवाज़े खोले हैं। उन्होंने मोंगाबे-हिंदी से कहा, “इस अध्ययन को देखने से एक तस्वीर तो बिल्कुल साफ हो जाती है कि लकड़ी, बांस, ईंधन और लघु वनोपज जैसे प्रत्यक्ष उत्पाद इस विशाल राशि का केवल एक हिस्सा भर हैं। इससे कहीं बड़ा हिस्सा उन सेवाओं का है, जिनके लिए जंगल कोई बिल नहीं भेजता- पानी का संरक्षण और शुद्धिकरण, कार्बन का अवशोषण, परागण, पोषक चक्र और जैव विविधता।”
वे कहते हैं, “एक कारखाना सीमेंट बनाता है तो उसका उत्पादन रुपये में दर्ज होता है। जंगल किसी खेत की मिट्टी को बहने से बचाता है या किसी जलग्रहण क्षेत्र में पानी को रोकता है तो उस सेवा को कहीं दर्ज़ नहीं किया जाता। दुनिया अब इस अंतर को भरने की कोशिश कर रही है।”
भारत सरकार के सांख्यिकी मंत्रालय ने 2025 में ‘वन पर पर्यावरण लेखा’ का पहला समर्पित संस्करण प्रकाशित किया था। इसमें वनों की सीमा, उनकी स्थिति, संपत्ति-मूल्य और उनसे मिलने वाली पारिस्थितिकी सेवाओं को एक ही लेखांकन ढांचे में रखने की कोशिश की गई थी। यह लेखा पर्यावरण-आर्थिक लेखांकन ढांचा के वन-संपदा और पारिस्थितिकी-लेखांकन मानकों के अनुरूप तैयार किया गया था।
इसलिए छत्तीसगढ़ का अध्ययन अकेला प्रयोग नहीं है। वह उस बड़े बदलाव का स्थानीय उदाहरण है, जिसमें सरकारें धीरे-धीरे यह पूछ रही हैं कि प्रकृति अर्थव्यवस्था के बाहर की चीज क्यों मानी जाए, जबकि अर्थव्यवस्था का इतना बड़ा हिस्सा उसी पर टिका है?
जंगल का बाज़ार भाव
इस तरह के बुनियादी सवाल के उत्तर असल में इस अध्ययन की एक सीमा को भी दर्शाते हैं। लकड़ी की कीमत बाजार में मिल सकती है। लेकिन एक हेक्टेयर जंगल ने कितनी गर्मी रोकी? उसने कितनी मिट्टी बचाई? किसी नदी के बहाव को स्थिर रखने में उसका कितना योगदान था? किसी ऐसी प्रजाति के अस्तित्व की कीमत क्या है, जिसे शायद किसी मनुष्य ने कभी देखा भी न हो? इन सवालों के लिए बाजार-भाव नहीं हैं।
यही कारण है कि द एनर्जी एंड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट ने अपने अध्ययन में, अलग-अलग सेवाओं के लिए अलग-अलग विधियां इस्तेमाल कीं- कार्बन के लिए मॉडल आधारित गणना, कुछ सेवाओं के लिए बाजार या प्रतिस्थापन लागत, पर्यटन के लिए यात्रा-लागत जैसी विधियां और अन्य सेवाओं के लिए अप्रत्यक्ष अनुमान। अध्ययन में स्ट्रैटिफाइड सैंपलिंग पद्धति से चुने गए 1,200 घरों का प्राथमिक सर्वेक्षण भी किया गया।
रिपोर्ट खुद इन सीमाओं को स्वीकार करती है। बड़े और विविध वन क्षेत्र के लिए अधिक बारीक आंकड़ों की जरूरत है। जबकि यहां कुछ गणनाएं द्वितीयक आंकड़ों पर निर्भर हैं और कुछ को प्रजाति-विशेष या स्थानीय जानकारी से सुधारा जा सकता है।
लेकिन यह सिर्फ छत्तीसगढ़ की समस्या नहीं है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी प्राकृतिक पूंजी के लेखांकन की एक मूलभूत कठिनाई की ओर ध्यान दिलाया गया कि पारिस्थितिक तंत्रों की प्रक्रियाएं, आर्थिक खातों की कठोर लेखा-परिभाषाओं में हमेशा आसानी से नहीं बैठतीं। ऐसे में प्राकृतिक पूंजी लेखांकन में अनिश्चितता को व्यवस्थित ढंग से दर्ज किया जाना ज़रुरी है।
यही कारण है कि छत्तीसगढ़ के 1.41 लाख करोड़ के आंकड़े को जंगल की अंतिम कीमत कहना उतना ही गलत होगा, जितना उसे शून्य मानना। पहला हमें झूठी निश्चितता देता है, वहीं दूसरा हमें जंगल के वास्तविक आर्थिक महत्व से वंचित कर देता है।
बढ़ गया जंगल, घट गया जैवभार
पिछले कुछ सालों में वन आवरण और वृक्ष आवरण के साझा आंकड़ों को मिला कर, हरित आवरण का जो आंकड़ा केंद्र सरकार ने पेश करना शुरू किया है, उसने छत्तीसगढ़ की एक अलग ही तस्वीर गढ़ी है। भारत के वन सर्वेक्षण की 2023 की रिपोर्ट के मुताबिक 2021 से 2023 के बीच छत्तीसगढ़ के वन और वृक्ष आवरण में 684 वर्ग किलोमीटर की वृद्धि हुई, जो देश के दूसरे राज्यों की तुलना में सबसे अधिक है। सुनने में यह संरक्षण की सफलता जैसी लगती है।
लेकिन द एनर्जी एंड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट का अध्ययन एक दूसरे पैमाने की ओर देखता है- ग्रोइंग स्टॉक, यानी जंगल में खड़ी लकड़ी और जैवभार की मात्रा। उसके अनुसार छत्तीसगढ़ में यह आंकड़ा 1997 के 74.42 घन मीटर प्रति हेक्टेयर से घटकर 2019 में 55.69 घन मीटर प्रति हेक्टेयर रह गया।
छत्तीसगढ़ वन्यजीव बोर्ड की सदस्य मीतू गुप्ता कहती हैं, “एक बार के लिए इन दोनों आंकड़ों को सामने रखने पर भ्रम की स्थिति बनती है लेकिन सच यही है कि दोनों आंकड़े एक-दूसरे को झुठलाते नहीं हैं। ये आंकड़े कहीं अधिक साफ़-गोई से जंगल की एक दूसरी सच्चाई को सामने रखते हैं कि जंगल का क्षेत्रफल और जंगल की सेहत एक ही चीज नहीं होती है। उपग्रह से दिखाई देने वाला वन आवरण बढ़ सकता है, जबकि उसी समय किसी वन में पेड़ों का आकार, जैवभार, प्रजातियों की संरचना या कार्बन भंडारण क्षमता बदल सकती है।”

मीतू गुप्ता का मानना है कि प्राकृतिक पूंजी लेखांकन में सिर्फ यह गिनना पर्याप्त नहीं है कि जंगल कितनी जमीन पर है। यहां यह भी देखना जरूरी है कि वह जंगल किस हालत में है और कितनी पारिस्थितिकी सेवाएं दे रहा है। संयुक्त राष्ट्र का पर्यावरण-आर्थिक लेखांकन ढांचा भी वन और दूसरे पारिस्थितिकी तंत्रों के विस्तार के साथ उनकी स्थिति को लेखांकन का हिस्सा मानता है।
छत्तीसगढ़ में यही शायद सबसे बड़ा नीतिगत सवाल है- क्या हम जंगल गिन रहे हैं या स्वस्थ जंगल?
इस सवाल को समझने के लिए बहुत दूर जाने की जरूरत नहीं है।
2026 में हसदेव-अरण्य के परसा ईस्ट केते बासन कोयला खदान की पहले चरण की खुदाई के बाद केते एक्सटेंशन खदान को मंजूरी दे दी गई। मई में केंद्र से 1,742.6 हेक्टेयर वन क्षेत्र के इस्तेमाल के लिए सैद्धांतिक वन-मंजूरी की खबर सामने आई और जून में इस परियोजना को पर्यावरणीय मंजूरी भी मिल गई। इस खदान में करीब 4.48 लाख पेड़ों की कटाई का प्रस्ताव है। यहां सवाल को कोयला बनाम जंगल की आसान भाषा में समेटना पर्याप्त नहीं होगा। कोयला बिजली और उद्योग के लिए ऊर्जा देता है। उससे राजस्व आता है। रोजगार पैदा हो सकता है।
हसदेव अरण्य जंगल को बचाने में जुटे स्थानीय आदिवासी समुदाय के रामलाल कहते हैं, “जंगल कार्बन रोकता है, जलग्रहण क्षेत्र को सहारा देता है, जैव विविधता बचाता है और स्थानीय समुदायों की अर्थव्यवस्था का आधार है। दोनों तरफ आर्थिक मूल्य हैं। लेकिन सरकारी परियोजना-निर्णयों में क्या दोनों तरफ के मूल्य एक ही मेज पर, एक ही गंभीरता से रखे जाते हैं? पारिस्थितिकी सेवाओं का लेखांकन किसी अकादमिक अभ्यास से कहीं ज्यादा, एक व्यावहारिक मुद्दा है।”
जंगल का सबसे बड़ा हिसाब किसके नाम है?
छत्तीसगढ़ के जंगलों के हिसाब में एक और पक्ष है, जिसे रुपये की किसी बड़ी संख्या से ढकना आसान है और वह है जंगल में रहने वाले लोग।
इस अध्ययन के अनुसार राज्य में करीब 1.27 करोड़ लोग जंगलों पर निर्भर हैं और लघु वनोपज से परिवारों को सालाना 20,000 से 50,000 रुपये तक की आय मिलती है। भारत का वनाधिकार कानून भी जंगल पर निर्भर आदिवासी और दूसरे परंपरागत वनवासियों के सामुदायिक और व्यक्तिगत अधिकारों को मान्यता देता है।
इसलिए यदि जंगल को आर्थिक संपदा मानकर उसके संरक्षण के लिए ज्यादा धन आता है, तो अगला सवाल यही सामने आता है कि उस धन का मालिक कौन होगा- वन विभाग, राज्य सरकार, केंद्र या वे समुदाय जिनकी रोजमर्रा की अर्थव्यवस्था जंगल के साथ बनी हुई है? यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि प्राकृतिक पूंजी के लेखांकन का उद्देश्य सिर्फ जंगल को ‘महंगा’ बनाना नहीं होना चाहिए। उसका उद्देश्य उन फैसलों को बदलना होना चाहिए जिनमें जंगल को अब तक सस्ता या मुफ्त मान लिया जाता है।
एक जंगल छत्तीसगढ़ में खड़ा है, लेकिन उसमें जमा कार्बन केवल छत्तीसगढ़ का मामला नहीं है। उसकी जलवायु सेवा वैश्विक है। जैव विविधता का मूल्य भी स्थानीय सीमा से कहीं बड़ा हो सकता है। भारत की वित्तीय व्यवस्था में इस विचार की एक झलक पहले से है।
13वें और 14वें वित्त आयोग ने राज्यों के बीच कर-वितरण में वन आवरण को शामिल किया था। 15वें आयोग ने वन और पारिस्थितिकी को 10 प्रतिशत भार दिया। अब 16वें वित्त आयोग की 2026-31 की व्यवस्था में भी वन आवरण को 10 प्रतिशत भार मिला है।

ताज़ा अध्ययन के अनुसार यह अंतर संख्या में भी दिखता है। 15वें वित्त आयोग से छत्तीसगढ़ को वानिकी के लिए सालाना करीब 34,729 रुपये प्रति हेक्टेयर मिलते हैं, जबकि अध्ययन के मुताबिक जंगल का उपयोग-मूल्य इससे कहीं ज्यादा, करीब 1,11,104 रुपये प्रति हेक्टेयर सालाना है। यानी सरकारी आवंटन जंगल के आर्थिक योगदान के पांचवें हिस्से तक भी नहीं पहुंचता। लेकिन यह अभी भी जंगल द्वारा दी जाने वाली हर सेवा का पूरा भुगतान नहीं है।
अगर किसी राज्य का जंगल पूरे देश के लिए जलवायु और जल-सुरक्षा में योगदान करता है, तो भविष्य की बहस शायद इस ओर जाएगी कि जंगल की मात्रा के साथ उसकी गुणवत्ता और उससे मिलने वाली वास्तविक सेवाओं को भी वित्तीय हस्तांतरण से जोड़ा जाए।
दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी यही सोच आकार ले रही है। विश्व बैंक ने 2025 में अफ्रीकी देशों के उदाहरण देते हुए कहा है कि प्राकृतिक पूंजी के लेखे, अब जलवायु-सहनशीलता, भूमि प्रबंधन और आर्थिक नियोजन में इस्तेमाल होने लगे हैं। 2025 में प्रकाशित कोलंबिया के एक अध्ययन ने दिखाया कि किसी क्षेत्र के पारिस्थितिकी तंत्रों की जल-नियमन जैसी सेवाओं का आर्थिक योगदान स्थानीय सकल घरेलू उत्पाद के 1.7 प्रतिशत के बराबर हो सकता है। यानी छत्तीसगढ़ का सवाल असाधारण जरूर है, लेकिन अकेला नहीं।
आखिर जीडीपी में जंगल आएगा कैसे?
आज की तारीख़ में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या जीडीपी में जंगल को शामिल किया जा सकता है? दुनिया भर के अध्ययन बताते हैं कि अभी यह इतना आसान नहीं है। लेकिन जीडीपी की जगह कोई नया ‘प्रकृति-जीवन-आनंद’ सूचकांक रख देना समाधान नहीं है। हर पेड़, हर नदी या हर प्रजाति को रुपये में बदल देना भी शायद ठीक नहीं होगा। लेकिन आर्थिक फैसलों में जंगल की अनुपस्थिति को बनाए रखना भी अब मुश्किल होता जा रहा है।
भारत के सांख्यिकी मंत्रालय ने 2025 में वन-संपदा का अलग पर्यावरणीय लेखा शुरू कर दिया है। संयुक्त राष्ट्र प्राकृतिक पूंजी के लेखांकन के लिए मानक विकसित कर चुका है। वित्त आयोग राज्यों के बीच संसाधन बांटते समय वन को लगातार एक वित्तीय कसौटी बना रहा है और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में सरकारें यह देखने लगी हैं कि प्रकृति के योगदान को राष्ट्रीय संपदा की तस्वीर में कैसे लाया जाए।
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छत्तीसगढ़ का अध्ययन इस बदलती सोच को एक स्थानीय, बहुत ठोस संख्या देता है- 1.41 लाख करोड़ रुपये। लेकिन इस अध्ययन का अहम हिस्सा वह रकम नहीं है, यह सवाल है कि अगर जंगल हर साल इतनी आर्थिक उपयोगिता पैदा करता है, तो उसे बचाने, पुनर्जीवित करने और उस पर निर्भर लोगों को बेहतर जीवन देने के लिए हम कितना खर्च कर रहे हैं? जब कोई खदान उस जंगल को हटाकर दूसरी तरह की संपदा पैदा करती है, तो क्या उसके हिसाब में जंगल की वह अदृश्य अर्थव्यवस्था भी दर्ज होती है जिसे फिर कभी वापस नहीं खरीदा जा सकता? शायद छत्तीसगढ़ का असली प्रयोग जंगल की कीमत तय करने में नहीं, बल्कि उस कीमत के बाद लिए जाने वाले फैसलों में है।
बैनर तस्वीरः छत्तीसगढ़ के एक वन क्षेत्र में जंगल की ओर देखती एक महिला। राज्य के जंगल स्थानीय आजीविका, जल संरक्षण, कार्बन भंडारण और जैव विविधता जैसी कई पारिस्थितिकी सेवाओं का आधार हैं। तस्वीर- आलोक प्रकाश पुतुल