- बिहार में हरित बजट पेश किए जाने के सात साल बाद भी जलवायु और पर्यावरण के मोर्चे पर बहुत अधिक प्रगति नहीं हुई है।
- बिहार हरित बजट पेश करने वाले शुरुआती राज्यों में शामिल है, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि जलवायु परिवर्तन को कम करने, प्रदूषण घटाने, जैव-विविधता के संरक्षण और कचरा प्रबंधन के क्षेत्र में प्रगति सुस्त रही है।
- अभी देश के आठ राज्य हरित बजट पेश कर रहे हैं और लगभग सभी बजट एक ही तरीके का पालन करते हैं। जानकार ऐसी हरित पहलों के मूल्यांकन पर जोर देते हैं।
बिहार में हरित बजट को लागू हुए सात साल हो चुके हैं। हालांकि, अभी भी अलग-अलग स्रोतों से मिले आंकड़े बताते हैं कि नवीन ऊर्जा, वायु प्रदूषण, जैव-विविधता और कचरा प्रबंधन जैसे पर्यावरण से जुड़े अहम संकेतकों में बहुत कम या कोई सुधार नहीं हुआ है।
बिहार सरकार ने अपना पहला हरित बजट 2020-21 में पेश किया था। इस साल उसने अपना सातवां हरित बजट पेश किया, जिसकी राशि लगभग 158 अरब रुपए है। यह शुरुआती 56 अरब रुपए के बजट से करीब तीन गुना है। हालांकि, पर्यावरण से जुड़े प्रमुख संकेतकों पर राज्य का प्रदर्शन अब भी खराब बना हुआ है।
उदाहरण के तौर पर, बिहार के कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में ऊर्जा क्षेत्र की हिस्सेदारी लगभग 65% है, जिसका मुख्य कारण कोयला आधारित बिजली संयंत्र हैं। नवीन ऊर्जा की ओर बदलाव धीमा रहा है। साल 2020 में 376 मेगावाट की तुलना में 2025-26 में नवीन ऊर्जा क्षमता 651 मेगावाट थी। यह आंकड़ा बिहार राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (BSPCB) की ओर से 2030 तक नवीन ऊर्जा क्षमता को बढ़ाकर 10,000 मेगावाट (10 गीगावाट) और 2050 तक 28,000 मेगावाट (28 गीगावाट) करने के लक्ष्य से काफी पीछे है, ताकि ‘नेट जीरो’ की दिशा में आगे बढ़ा जा सके। ऐसा बोर्ड की 2024 की रिपोर्ट में बताया गया है। मौजूदा गति से बिहार 2030 तक करीब 900 मेगावाट तक ही पहुंच पाएगा, जो 2030 के लक्ष्य का दसवें हिस्से से भी कम है।
जैव-विविधता से जुड़े आंकड़े भी इसी तरह की तस्वीर पेश करते हैं। 2019 में बिहार में 3,89,713 हेक्टेयर क्षेत्र में फैली 4,550 आर्द्रभूमियां थी। 2025 तक आर्द्रभूमियों की संख्या 24 घटकर 4,526 रह गई। नए हरित बजट के आंकड़ों के अनुसार, इस अवधि में प्राकृतिक जल निकायों का कुल क्षेत्रफल 16,843 हेक्टेयर घट गया, जो बिहार की राजधानी पटना के आकार का लगभग 70% है।
कचरा प्रबंधन के क्षेत्र में भी बिहार का प्रदर्शन खराब बना हुआ है। हरित बजट की शुरुआत से पहले 2019 में राज्य में हर रोज 2,272 टन कचरा पैदा होता था, जिसमें से 51% कचरे का प्रसंस्करण किया जाता था। 2021 में यह आंकड़ा बढ़कर 58% हो गया। हालांकि, इसके बाद प्रसंस्करण दर में गिरावट आई। 2025 में यह दर करीब 30% है जो 2021 की तुलना में काफी कम है।
प्रदूषण के आंकड़ों का विश्लेषण करने पर सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (CREA) की 2025 की एक रिपोर्ट में पाया गया कि बिहार के 23 निगरानी वाले शहरों में से 20 में PM2.5 का स्तर सामान्य सीमा से ज्यादा था। BSPCB के आंकड़ों से पता चलता है कि 2020 की तुलना में 2025 में PM2.5 और PM10 की सांद्रता में गिरावट आई, लेकिन इसी अवधि में सल्फर डाइऑक्साइड की सांद्रता 8.6 से बढ़कर 11.4 ug/m3 हो गई। बिहार ने राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम के तहत जारी राशि का भी पूरा इस्तेमाल नहीं किया। CREA की रिपोर्ट के अनुसार, केंद्र सरकार की ओर से आवंटित 3.28 अरब रुपये में से बिहार ने 60% यानी 1.98 अरब रुपये का ही इस्तेमाल किया।

हालांकि, जानकारों का कहना है कि हरित बजट के असर की व्यापक तस्वीर तभी सामने आएगी, जब इसका स्वतंत्र मूल्यांकन किया जाएगा और फिलहाल ऐसा नहीं हो रहा है।
एशियन डेवलपमेंट रिसर्च इंस्टीट्यूट (ADRI) की अर्थशास्त्री और सदस्य-सचिव अश्मिता गुप्ता ने मोंगाबे-इंडिया को बताया, “हरित बजट और उससे जुड़े सालाना खर्च के असल असर का आकलन करने के लिए प्रभाव का मूल्यांकन करना जरूरी है। सिर्फ धन खर्च करना पर्याप्त नहीं है; बजट में उस खर्च के नतीजे भी दिखाई देने चाहिए, लेकिन फिलहाल हरित बजट में यह पहलू गायब है।” बिहार स्थित स्वतंत्र शोध संस्था ADRI उस टीम का हिस्सा थी, जिसने बिहार सरकार को अपना पहला हरित बजट तैयार करने में मदद की थी।
नीतियों पर शोध करने वाला स्वतंत्र संगठन ‘द एनर्जी एंड रिसोर्सेज़ इंस्टीट्यूट’ (TERI) की सीनियर फेलो शैली केडिया ने भी इस चिंता से सहमति जताई। हरित बजट लाने की सरकार की कोशिशों की तारीफ करते हुए उन्होंने कहा कि अगला कदम हरित बजट और ‘आउटपुट-आउटकम मॉनिटरिंग फ्रेमवर्क’ (OOMF) के बीच संबंध को मजबूत करना होगा। उन्होंने मोंगाबे-इंडिया को बताया, “इससे सिर्फ खर्च पर नजर रखने के बजाय पर्यावरण से जुड़े नतीजों और लागू करने की असरदार क्षमता को मापने में मदद मिलेगी।”
मार्च 2025 में इंटरनेशनल रिसर्च जर्नल ऑन एडवांस्ड इंजीनियरिंग एंड मैनेजमेंट में प्रकाशित एक शोध अध्ययन भी लगातार निगरानी की जरूरत को रेखांकित करता है। शोधपत्र में कहा गया है, “महत्वपूर्ण हरित परियोजनाओं में तीसरे पक्ष से ऑडिट की मदद लेने से प्रगति की स्थिति जानने में मदद मिल सकती है। इससे जवाबदेही और पारदर्शिता दोनों पक्की होती है।”
हरित बजट की संरचना
वित्त वर्ष 2020-21 में राज्य ने “बिहार की पारिस्थितिकी कमजोरियों को सक्रिय रूप से ठीक करने” के लक्ष्य से हरित बजट पेश किया। राज्य रियो मार्कर पद्धति का पालन करता है। यह सरकार को पर्यावरण और जलवायु लक्ष्यों में योगदान के आधार पर विकास परियोजनाओं की पहचान करके उन्हें अलग-अलग करने में मदद करता है।
हरित बजट के लागू होने से पहले, हरित घटकों वाली सभी योजनाएं संबंधित विभागों का हिस्सा थी। लेकिन जब बिहार सरकार ने हरित बजट लाने का फैसला लिया, तो उसने हरित घटकों वाली सभी योजनाओं को अलग किया और उन्हें हरित बजट में शामिल कर दिया। चूंकि, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन विभाग पूरी तरह से जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण के लिए समर्पित है, इसलिए इस विभाग के लिए किया गया पूरा आवंटन हरित बजट में जाता है।
रियो मार्कर पद्धति के तहत, विभागीय योजनाओं को ‘हरित गतिविधियों’ के रूप में अलग-अलग करने के लिए छह श्रेणियां तय की गईं, जो योजनाओं में मौजूद हरित घटकों के आधार पर तय होती हैं। इन हरित घटकों का हिस्सा अधिकतम 100% और न्यूनतम 1% तक हो सकता है।

इस साल सरकार ने हरित बजट में 298 योजनाओं को शामिल किया, जो पहले हरित बजट में शामिल 96 योजनाओं की संख्या से तीन गुना से भी ज्यादा है। लेकिन जानकारों के अनुसार, इन योजनाओं का सत्यापन जरूरी है, ताकि गैर-हरित घटक अनजाने में हरित बजट में शामिल न हो जाएं।
गुप्ता ने मोंगाबे-इंडिया को बताया, “हालांकि, हरित बजट की कई चीजें हरित दिखाई दे सकती हैं, लेकिन यह सत्यापित करने के लिए कि क्या ये योजनाएं असल में हरित गतिविधियों का हिस्सा हैं, हरित ऑडिट एजेंसियों की ओर से गहराई से मूल्यांकन जरूरी है।”
आवंटन और खर्च
हरित बजट के लिए आवंटन के आंकड़े भी बीच-बीच में बढ़ती प्रवृत्ति का संकेत देते हैं, लेकिन चालू वित्तीय वर्ष में आवंटन में भारी गिरावट आई है।
वित्तीय वर्ष 2020-21 में पेश बिहार के पहले हरित बजट में लगभग ₹57 अरब का आवंटन किया गया था, जो राज्य के कुल बजट का लगभग सात फीसदी था। 2021-22 में यह हिस्सा बढ़कर 9.6 फीसदी से ज्यादा हो गया। अगले साल आवंटन लगभग वही रहा और 2023-24 में सबसे ज्यादा 12.5 फीसदी पर पहुंचने के बाद इसमें गिरावट आई। 2026-27 में कुल बजट में हरित बजट का हिस्सा लगभग 7.5 फीसदी है, जो इसके पहली बार पेश किए जाने के लगभग बराबर है।
दूसरी ओर, आंकड़े बताते हैं कि बिहार सरकार ने हरित बजट की राशि का कभी भी पूरी तरह इस्तेमाल नहीं किया। 2021-22 में 9.68 फीसदी के आवंटन के मुकाबले कुल बजट का लगभग 6.48 फीसदी ही खर्च किया गया। इसी तरह, 2022-23 में 9.73 फीसदी के आवंटन के मुकाबले व्यय 6.18 फीसदी रहा। 2023-24 और 2024-25 में खर्च में सुधार हुआ, जब आवंटित राशि का अधिकांश हिस्सा उपयोग किया गया। 2020-21, 2025-26 और 2026-27 के लिए खर्च संबंधी आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं।
अर्थशास्त्री और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट कलकत्ता की प्रोफेसर रूना सरकार ने मोंगाबे-इंडिया को बताया, “यह असामान्य नहीं है। आवंटन और खर्च के बीच का अंतर शायद प्रशासनिक और तकनीकी स्तर पर कार्यान्वयन की क्षमता और और मूल रूप से संसाधनों के आवंटन में की गई अपर्याप्त योजना को दिखाता है।”

देशभर में हरित बजट की स्थिति
बिहार में हरित बजट पेश किए जाने से पहले ओडिशा ने वित्तीय वर्ष 2019-20 में जलवायु बजट की शुरुआत की थी।
ओडिशा ने जलवायु बजट टैगिंग (CBT) लागू किया है। यह सरकारी बजट में जलवायु से संबंधित खर्च को शामिल करने की एक रूपरेखा है। यह तरीका जलवायु परिवर्तन से पार पाने और इसके हिसाब से ढलने के लिए तय वित्तीय आवंटनों की व्यवस्थित रूप से निगरानी, उन पर नजर रखने और विश्लेषण करने में मदद करता है।
फिलहाल बिहार और ओडिशा समेत कम से कम आठ राज्य हरित बजट पेश कर रहे हैं।
असम ने वित्त वर्ष 2023-24 में हरित बजट पेश किया। अपने हरित बजट में असम योजनाओं को पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन पर उनके असर के अनुसार चार श्रेणियों में बांटता है, अत्यधिक अनुकूल, मध्यम रूप से अनुकूल, तटस्थ और कम अनुकूल।
मेघालय ने वित्तीय वर्ष 2023-24 में राज्य जलवायु कार्रवाई बजट (CAB) पेश करना शुरू किया। यह जलवायु परिवर्तन से पार पाने और उस हिसाब से ढलने में उनकी भूमिका के आधार पर जलवायु खर्च की पहचान करने के लिए जलवायु बजट टैगिंग तंत्र का पालन करता है।
उत्तर प्रदेश 2024-2025 से हरित बजट पेश कर रहा है। राज्य हरित बजट टैगिंग पद्धति का पालन करता है, जो राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDCs) और जलवायु परिवर्तन पर राज्य कार्य योजना (SAPCC) के मुताबिक है। इसके बाद यह योजनाओं की विभागवार हरित प्रासंगिकता की गणना करता है और उसी के अनुसार धनराशि अलग रखता है। अपने पहले हरित बजट में, उत्तर प्रदेश सरकार ने कुल बजट के 26% को हरित प्रासंगिकता के रूप में चिन्हित किया।
केरल भी 2024-25 से पर्यावरण बजट पेश कर रहा है। इसने सिर्फ उन योजनाओं का चयन किया है, जिनका पर्यावरण पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है, जैसे जैव-विविधता और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण, जलवायु परिवर्तन के हिसाब से ढलना आदि से संबंधित योजनाएं।
केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी ने 2023-24 में अपना हरित बजट पेश करना शुरू किया और राजस्थान ने 2025-2026 में ऐसा करना अनुसरण किया।
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TERI की शैली केडिया के मुताबिक सभी राज्यों में बिहार का तरीका ज्यादा व्यापक है। TERI हरित बजट पर करीबी नजर रखता है और पुडुचेरी और बिहार सहित कुछ राज्यों को इन्हें तैयार करने में मदद भी कर चुका है। उन्होंने कहा, “क्योंकि यह न सिर्फ पर्यावरणीय प्रासंगिकता के आधार पर खर्च को बांटता है, बल्कि उन्हें विषयों, गतिविधियों और SDGs के हिसाब से भी दिखाता है। जलवायु बजटिंग आम तौर पर हरित बजटिंग का उप-भाग है, जिसमें जलवायु से पार पाने और इस हिसाब से तैयारी पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। हरित या पर्यावरण संबंधी बजटिंग व्यापक तरीका अपनाती है और जलवायु संबंधी चिंताओं के साथ-साथ कचरा प्रबंधन, वायु गुणवत्ता, जल संरक्षण, जैव-विविधता और प्रदूषण नियंत्रण जैसी अन्य पर्यावरण संबंधी प्राथमिकताओं को भी शामिल करती है।”
शुरुआत के रूप में, हरित बजट स्वागत योग्य कदम है, लेकिन जानकारों का मानना है कि अब इसके लिए समावेशी मूल्यांकन जरूरी है।
रूना सरकार ने कहा, “व्यापक मूल्यांकन शुरू करना अच्छा रहेगा, जिसमें अन्य बातों के अलावा, जलवायु परिवर्तन के लिए राज्य की कार्ययोजना के साथ बजट आवंटन और खर्चों के तालमेल की भी जांच की जानी चाहिए।”
यह खबर मोंगाबे-इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 31 जुलाई, 2026 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: कांटी ताप विद्युत संयंत्र, बिहार। तस्वीर: Muzaffarpur1947\विकिमीडिया कॉमन्स (CCO 1.0)।