- हिंदू कुश-हिमालय क्षेत्र के क्रायोस्फीयर से जुड़े 145 अध्ययनों के आंकलन में पाया गया कि ग्लोबल वार्मिंग की वजह से नदियों में पानी का बहाव (पीक फ्लो), हिमस्खलन (एवलांच) और बाढ़ की घटनाएं बढ़ गयी हैं।
- ताजिकिस्तान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, भारत, नेपाल, चीन, भूटान और म्यांमार में पड़ने वाले हिंदूकुश-हिमालय इलाके में 1980 से 2020 के बीच हर दशक में तापमान 0.2–0.3°C बढ़ा है।
- साल 1977 और 2010 के बीच मध्य हिमालय में ग्लेशियल झीलों की संख्या लगभग दोगुनी होकर 1,160 से 2,168 हो गई है।
एक नए अध्ययन के अनुसार, हिंदू कुश-हिमालय क्षेत्र में बढ़ते तापमान की वजह से क्रायोस्फीयर (बर्फ और बर्फ से जुड़ी संरचनाओं) में काफी बदलाव हो रहे हैं। हिंदू कुश-हिमालय वह क्षेत्र है जहां ध्रुवीय इलाकों के बाद सबसे ज्यादा बर्फ और ग्लेशियर पाए जाते हैं।
‘अर्थ-साइंस रिव्यूज़’ जर्नल में प्रकाशित हुई इस समीक्षा में क्षेत्र के क्रायोस्फीयर से जुड़े 145 अध्ययनों का आकलन किया गया। इसमें पाया गया कि ग्लोबल वार्मिंग की वजह से नदियों में पानी का बहाव (पीक फ्लो) बढ़ रहा है और हिमस्खलन (एवलांच) और बाढ़ की घटनाएं भी बढ़ गयी हैं।
ताजिकिस्तान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, भारत, नेपाल, चीन, भूटान और म्यांमार में पड़ने वाले हिंदूकुश-हिमालय इलाके में 1980 से 2020 के बीच हर दशक में तापमान 0.2–0.3°C बढ़ा है। यह वृद्धि दुनिया के औसत दर से लगभग दोगुनी है। हालाँकि, ये बदलाव एक जैसे नहीं हैं। साल 1990 से 2020 के बीच मध्य और पूर्वी हिमालय में बर्फ का आवरण लगभग 30% कम हो गया, जिससे हर साल वनस्पतियों की ऊंचाई में 8 से 20 मीटर का बदलाव आया। दूसरी ओर, काराकोरम रेंज में तुलनात्मक रूप से स्थिरता देखी गई। इस अध्ययन के अनुसार, इसका कारण “पश्चिमी हवाओं से होने वाली सर्दियों की बारिश और उसी समय गर्मियों में ठंडक का असर” है, जो ग्लेशियर के नुकसान की कुछ हद तक भरपाई करता है, इस घटना को ‘काराकोरम एनोमली’ कहा जाता है।
पिछले 40 सालों में, हिंदू कुश-हिमालय क्षेत्र का शायद ही कोई हिस्सा ऐसा हो जो बढ़ते तापमान से अछूता रहा हो। इसके बावजूद, एकेडमिक रिसर्च में पूर्वी हिमालय पर बहुत कम ध्यान दिया गया है। ग्लेशियर पिघलने से सबसे ज्यादा खतरे में होने के बावजूद, ग्लेशियल झील के फैलने और ग्लेशियल झील के फटने से आने वाली बाढ़ (GLOFs) पर अध्ययन “पूर्वी हिमालय, खासकर भूटान और अरुणाचल में, बहुत कम हए हैं,” स्टडी में कहा गया है।
साल 1977 और 2010 के बीच मध्य हिमालय में ग्लेशियल झीलों की संख्या लगभग दोगुनी होकर 1,160 से 2,168 हो गई है। इस विस्तार से ग्लेशियल झील के फटने से आने वाली बाढ़ का खतरा भी बढ़ जाता है, जिसके निचले इलाकों में विनाशकारी परिणाम हो सकते हैं। अध्ययन में यह भी बताया गया है कि 1982 और 2022 के बीच हिमस्खलन की 681 घटनाओं में 3,100 से ज्यादा लोगों की मौत हुई, और 2010 के बाद इनकी संख्या में बढ़ोतरी हुई है।
अभी, बड़ी नदी घाटियों में पानी के सालाना बहाव का 33 से 42% हिस्सा बर्फ और ग्लेशियर के पिघलने से आता है, जिससे नदी के निचले इलाकों में रहने वाले करोड़ों लोगों को पानी मिलता है। अनुमान है कि ज़्यादातर घाटियों में पानी का बहाव 2050 के आसपास अपने सबसे ऊँचे स्तर पर होगा। इसके बाद, बर्फ़ पिघलने से मिलने वाले पानी में कमी आने की उम्मीद है, जिससे पनबिजली उत्पादन पर असर पड़ेगा और लंबे समय में पानी की उपलब्धता को लेकर सवाल उठेंगे। स्टडी के मुताबिक, पश्चिमी चीन की यारकंद और होटन घाटियों में पानी का बहाव पहले ही अपने सबसे ऊँचे स्तर पर पहुँच चुका है।
इस इलाके में लगभग दस लाख वर्ग किलोमीटर में फैली पर्माफ्रॉस्ट (जमी हुई मिट्टी) तेज़ी से पिघल रही है, जिससे ढलान अस्थिर हो रहे हैं और तिब्बती पठार पर ऊँचाई वाले इलाकों में बने इंफ्रास्ट्रक्चर पर असर पड़ रहा है। कुछ इलाकों में पर्माफ्रॉस्ट से प्रभावित मिट्टी की सबसे ऊपरी परत (जिसे ‘एक्टिव लेयर’ कहते हैं) की मोटाई हर साल 2 से 23 सेंटीमीटर तक बढ़ रही है।
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स्टडी के अनुसार, मुश्किल से पहुँचने वाले इलाकों में बदलावों पर नज़र रखने के लिए सैटेलाइट इमेज और जियोस्पेशियल टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल क्रांतिकारी साबित हो सकता है। यह खास तौर पर काराकोरम में सियाचिन ग्लेशियर; हिमालय में छोटा शिगरी, लांगटांग, गुरुडोंगमार और गोमुख; हिंदूकुश में चित्राल; और पामीर में वाखान जैसे ग्लेशियरों के लिए अहम है, जिनकी अभी ठीक से निगरानी नहीं हो पाती है।
बेहतर अनुकूलन योजना के लिए स्थानीय ज्ञान को शामिल करने, सीमाओं के पार सहयोग बढ़ाने और हाई-रिज़ॉल्यूशन मॉनिटरिंग को प्राथमिकता दी गई है। इसमें कहा गया है, “सीमा-पार सहयोग आज की ज़रूरत है। संयुक्त मॉनिटरिंग फ्रेमवर्क, बहु-पक्षीय आपदा फ्रेमवर्क और डेटा साझा करने के प्रोटोकॉल विकसित करना ज़रूरी है।”
बैनर तस्वीर: पाकिस्तान से दिखाई देने वाले हिंदू कुश पहाड़। तस्वीर: निनारा द्वारा विकिमीडिया कॉमन्स (CC BY 2.0) के माध्यम से।