- हिमाचल प्रदेश में साल 2025 की बाढ़ के बाद तेजी से निर्माण हो रहा है, लेकिन जानकारों ने चेतावनी है कि इन कोशिशों में भूभाग, मिट्टी की भार सहने की क्षमता और लंबे समय से मौजूद पारिस्थितिकी जोखिमों को नजरअंदाज किया जा रहा है।
- जानकार कहते हैं कि हिमालय की परिस्थितियों के मुताबिक विकसित हुई पारंपरिक वास्तुकला शैलियों को आधुनिक इंजीनियरिंग के साथ जोड़ा जाना चाहिए, ताकि पुनर्निमाण मजबूत और जलवायु-संवेदनशील हो सके।
- आपदा के बाद पुनर्निर्माण के तौर-तरीकों से इस हिमालयी राज्य के भविष्य का अंदाजा लगेगा।
हिमाचल प्रदेश में लोग तेजी से नई वास्तुकला शैलियां अपना रहे हैं, जिसमें सीमेंट और पक्की ईंटें मुख्य निर्माण से जुड़ी मुख्य चीजें हैं। हालांकि नई वास्तुकला को अक्सर आधुनिकता और सामाजिक गतिशीलता की निशानी माना जाता है। हालांकि, वास्तुकारों और योजनाकरों का कहना है कि सदियों से स्थानीय भूभाग, जलवायु और प्राकृतिक जोखिमों के हिसाब से तैयार ये पारंपरिक (वर्नाक्युलर) तरीके ही इस हिमालयी क्षेत्र को स्थिर और सुरक्षित रख सकते हैं।
हिमाचल प्रदेश में लगातार हो रही मौसम की चरम घटनाओं ने हजारों परिवारों की रोजमर्रा की जिंदगी बदल दी है। अगस्त 2025 में राज्य में सामान्य से 68% ज्यादा बारिश हुई, जो 1901 के बाद से अगस्त में नौंवी सबसे ज्यादा बारिश थी और 1949 के बाद से सबसे अधिक थी। मॉनसून ने राज्य में भारी तबाही मचाई, जिसमें 320 लोगों की जान चली गई और कुल नुकसान तीन लाख करोड़ रुपए से अधिक होने का अनुमान है। लगभग 1,280 घर पूरी तरह से तबाह हो गए, जबकि 27,640 घरों को कुछ हद तक नुकसान पहुंचा।
राज्य में 2023 में भी भारी बारिश हुई थी। उस साल सिर्फ तीन दिनों (7-10 जुलाई) के भीतर 436% अधिक बारिश रिकॉर्ड की गई जिससे भूस्खलन, अचानक बाढ़ और सामाजिक व आर्थिक गतिविधियों को जबरदस्त नुकसान हुआ था।
इन घटनाओं का स्थानीय समुदायों पर गहरा असर हुआ। महिलाओं के सशक्तिकरण और आपदा प्रबंधन पर काम करने वाले एनजीओ जागोरी द्वारा किए गए अध्ययन में 2023 की आपदा के असर की सीमा का दस्तावेजीकरण किया गया। कांगड़ा जिले में किए गए इस अध्ययन में पाया गया कि 63% से अधिक परिवारों को संपत्ति का नुकसान हुआ, जबकि 55% परिवारों के घर नष्ट हो गए। इसके बावजूद, लगभग 40% परिवारों ने बताया कि उन्हें किसी तरह की सरकारी राहत नहीं मिली और कई परिवार 2025 में भी अस्थायी व्यवस्थों में रहने को मजबूर हैं। हिमाचल प्रदेश नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी की ओर से आपदा से संबंधित शोध को प्रकाशित करने की अपील के जवाब में किए गए इस अध्ययन में यह भी उल्लेख किया गया है कि महिलाओं और बुजुर्गों में इसे झेलने की क्षमता का स्तर सबसे कम था और मानसून में उनमें बार-बार तनाव और चिंता देखी गई।

व्यापक स्तर पर इतने बड़े नुकसान के बाद, राज्य ने पुनर्निमाण शुरू किया है जिसमें घर बनाना, राष्ट्रीय राजमार्गों को ठीक करना, स्कूलों की मरम्मत करना और खेती और पशुपालन में मदद करना शामिल है। यह मदद 2025 में भी जारी है। लेकिन, जानकारों का कहना है कि राज्य वही गलतियां दोहराने का जोखिम उठा रहा है जिन्होंने शुरुआत में ही इन इलाकों को इतना कमजोर बना दिया है।
जागोरी में आपदा प्रबंधन परियोजना की जिला समन्यवयक अक्षिता शर्मा ने कहा, “हिमाचल प्रदेश में आपदा के बाद का पुनर्निर्माण समय के खिलाफ दौड़ जैसा लगता है।” “मंडी, कुल्लू और कांगड़ा जैसे जिलों में गति को प्राथमिकता दी जा रही है। लेकिन, पारिस्थितिकी संतुलन और स्थानीय समझ को नजरअंदाज किया जा रहा है, जिसने कभी निर्माण को दिशा दी थी। कंक्रीट की इमारतें हिमाचल के पारंपरिक घरों की जगह ले रही हैं जो प्राकृतिक रूप से इलाके के हिसाब से बने थे।”
नई गाइडलाइन, पुरानी चुनौतियां
साल 2025 के मानसून के बाद निर्माण की प्रक्रिया दोबारा शुरू होने पर राज्य सरकार ने निर्माण के नए नियम लागू किए हैं, लेकिन जानकार चेतावनी दे रहे हैं कि व्यापक और प्रणाल में योजना से जुड़े सुधार के बिना ये नियम नाकाफी होंगे।
हिमाचल के टाउन एंड कंट्री प्लानिंग मंत्री राजेश धरमानी ने मोंगाबे-इंडिया को बताया कि सरकार ने जल निकायों के 500 मीटर के दायरे में रिहायशी और सरकारी दोनों तरह की इमारतें बनाने पर रोक लगा दी है। उन्होंने कहा, “अधिकतर प्रभावित घर वे थे जो बरसाती नालों के आसपास या स्ट्रक्चर के हिसाब से असुरक्षित जगहों पर बने थे। जिन लोगों ने बिना सही स्ट्रक्चरल डिजाइन के गलत जगहों पर घर बनाए थे, उन्हें ही सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ा।”
उन्होंने यह भी जोड़ा कि सभी नए निर्माण को सबसे ऊंची बाढ़ रेखा (HFL) से 5-7 मीटर की दूरी बनाए रखनी होगी। सरकारी इमारतें अब कम से कम 700 मीटर दूर बनाई जा रही हैं। “हम असुरक्षित निर्माण को रेगुलेट करने के लिए भू-स्थानिक (जियोस्पेशियल) योजना और क्षेत्रीय विकास योजना पर काम कर रहे हैं। लेकिन एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में असरदार क्रियान्वयन सबसे बड़ी चुनौती है।”

हालांकि, जानकारों का कहना है कि योजना के लिए व्यापक ढांचे के बिना इन पाबंदियों से अंदरूनी जोखिम शायद ही खत्म हो।
आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय (MoHUA) में टाउन एंड कंट्री प्लानर एपी जैकब मनोहर ने कहा, “केंद्र सरकार नीतियां और ढांचा देती है, जबकि राज्य सरकार क्षेत्रीय और मास्टर प्लान के लिए जिम्मेदार है।” “हिमाचल प्रदेश की समस्या यह है कि उसके पास कोई क्षेत्रीय योजना नहीं है। इस तरह की योजना में इलाके की पारिस्थितिकी संवेदनशीलता के आधार पर निर्माण प्रतिबंधित जोन को स्पष्ट तौर पर चिन्हित किया जाना चाहिए।”
मनोहर ने इस पर जोर दिया कि हिमालय में भविष्य की सभी पुनर्निर्माण नीतियों को दो सिद्धांतों के हिसाब से तय किया जाना चाहिए – वहन क्षमता और निर्माण प्रतिबंधित जोन। “यह सिर्फ किसी इमारत की मजबूती के बारे में नहीं है, बल्कि भार वहन करने की मिट्टी की क्षमता स संबंधित है जो पानी, ढलान, वनस्पति और मिट्टी के प्रकार पर निर्भर करती है।”
मनोहर भारत की योजना प्रणाली में खामियों को उजागर करते हैं: “मास्टर प्लान वैधानिक होते हैं, लेकिन खतरे वाले इलाकों के नक्शे नहीं हैं। जब तक पारिस्थितिकी और जोखिम संबंधी आंकड़ों को वैधानिक योजनाओं में शामिल नहीं किया जाएगा, तब तक बार-बार आपदाओं के बाद भी असुरक्षित इलाकों में निर्माण जारी रहेगा।”
मनोहर के अनुसार, मास्टर प्लान में आपदा से जुड़े नक्शों और अध्यायों को शामिल करने से हिमाचल को लंबे समय में ज्यादा सुरक्षित और टिकाऊ तरीके से दोबारा बनने में मदद मिल सकती है।
धरमानी ने बताया, “कई जगहों पर सड़कें ऐसे पुलियों के साथ बनाई गई हैं जो भारी पानी के बहाव के लिए बहुत छोटी हैं।” “जब बारिश क्षमता से अधिक हो जाती है, तो पानी रास्ता बदलकर उन घरों को नुकसान पहुंचाता है जिन्हें कभी सुरक्षित माना जाता था।”
वास्तुकार भी इस चेतावनी सही मानते हैं। कालिया आर्किटेक्ट्स के संस्थापक और वास्तुविद राम कुमार कालिया ने कहा, “हर प्रोजेक्ट को जोखिम मानचित्र, वाटरशेड प्रोटेक्शन और ढलान स्थिरता की जांच के आधार पर बनाया जाना चाहिए। सक्रिय भूस्खलन जोन, बाढ़ के मैदानों और तेज ढलानों पर निर्माण करने से बचा जाना चाहिए; नहीं तो हम सिर्फ जोखिम को बढ़ा रहे होंगे।”

वास्तुशिल्प में बदलाव
योजना में ये खामियां इस क्षेत्र में बड़े बदलाव को भी सामने रखती हैं, जो पारंपरिक पहाड़ी वास्तुकला से दूर और आधुनिक शैलियों की ओर जा रहा है, जिसमें अक्सर हिमालयी इलाके और खतरों को नजरअंदाज़ किया जाता है।
हिमाचल प्रदेश की शीतकालीन राजधानी धर्मशाला के स्थानीय लोगों के अनुसार, काठ-कुनी लंबे समय से इस क्षेत्र में वास्तुकाल की खास शैली रही है, जिसका इस्तेमाल कभी पूरे राज्य के अधिकतर घरों और सार्वजनिक इमारतों में किया जाता था। यह पारंपरिक तकनीक है जिसमें लकड़ी और पत्थर की चिनाई की परतें बारी-बारी से इस्तेमाल की जाती हैं, जिन्हें बिना सीमेंट के साथ में जोड़ा जाता है।
काठ-कुनी की इमारतें स्थानीय स्तर पर मिलने वाली चीजों यानी देवदार की लकड़ी और स्लेट पत्थर से बनाई जाती हैं। हर ढांचे की शुरुआत भारी पत्थर के तख्ते से होती है जिससे नींव बनती है। दीवारें लकड़ी और पत्थर की बारी-बारी से बनी परतों से उठाई जाती हैं, जिनके बीच में खाली जगहों में पत्थर के टुकड़े भरे जाते हैं। जैसे-जैसे ढांचा ऊंचा होता जाता है, पत्थर की मात्रा धीरे-धीरे कम होती जाती है और ऊपरी हिस्से मौटे तौर पर लकड़ी से बने होते हैं जो एक के ऊपर एक रखे जाते हैं। छत स्लेट की टाइलों से बनी होती है; हर टाइल को लकड़ी के ढांचे पर सावधानी से जोड़ा जाता है।
लेकिन घर बनाने का पारंपरिक तरीका अब लोगों को पसंद नहीं आ रहा है और वे नई तरीकों को अपना रहे हैं, जिसमें सीमेंट और पक्की ईंटों से भवन बनाए जाते हैं।
धर्मशाला के रक्कर इलाके में रहने वाले 30 साल के भाली कुमार पेशे से राजमिस्त्री हैं। उन्होंने इस इलाके में वास्तुकला को पारंपरिक से आधुनिक होते हुए देखा है। कुमार ने कहा, “समय के साथ, हिमाचल के अधिकतर गांव और शहरी इलाके आधुनिक हो गए है, जो दिल्ली जैसे शहरों जैसा है।” “देवदार जैसी चीजों की कमी को दोष देने के बजाय, मुझे लगता है कि यह बदलाव किसी भी दूसरी चीज से ज्यादा ‘असरदार’ है।”
रक्कर, मैकलोड गंज, धर्मकोट और पालमपुर जैसे सैलानियों से आबाद रहने वाले इलाकों में तेजी से बदलाव आया है। 2022 में अपनी दिलचस्पी की वजह से रक्कर में शोध करने वाली किरण अरोड़ा ने कहा, “यहां की आधी आबादी अब दिल्ली, चंडीगढ़, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और पश्चिम बंगाल से आए प्रवासियों की है। जैसे-जैसे उन्होंने कारोबार बढ़ाए और घर बनाए, वास्तुकला की नई स्टाइल सामने आई और स्थानीय लोगों ने भी उसे अपनाया।”
चूंकि हिमाचल प्रदेश भारत के ज्यादा जोखिम वाले भूकंप क्षेत्रों में आता है, स्थानीय राजमिस्त्रियों का मानना है कि पारंपरिक डिजाइन ने पिछले भूकंपों के दौरान जान बचाई थी। काठ-कुनी में पत्थरों का हल्का अंदर की ओर झुकाव यह पक्का करता है कि भूकंप के झटकों के दौरान, ढांचा ढहने के बजाय और अधिक मजबूत बना रहे।
आईआईटी दिल्ली में पीएचडी अध्येता स्वाति एस. शिंदे ने कहा कि प्रभावित समुदायों के पास अनुभव पर आधारित कीमती ज्ञान होता है, जिसमें से अधिकतर का दस्तावेजीकरण नहीं हुआ है। उन्होंने कहा, “इस जानकारी का व्यवस्थित तरीके से मैप बनाना, दस्तावेजीकरण करने और पुनर्निमाण योजना में शामिल करने की अधिक जरूरत है।”

डिजाइनरों का नजरिया
कश्मीर के लेखक और संरक्षणवादी हकीम समीर हमदानी ने कहा, “हमें पारंपरिक तरीकों से सीखना चाहिए और उन्हें आज के डिजाइन में जितना हो सके शामिल करने की कोशिश करनी चाहिए।” खुद एक वास्तुकार और डिजाइनर होने के नाते हमदानी ‘सोच-समझकर बनाई गई डिजाइन’ पर जोर देते हैं। उनके अनुसार, हर वास्तुकार की यह जिम्मेदारी है कि वह निर्माण शुरू होने से पहले क्लाइंट को उस इलाके के आपदा जोखिम और कमजोरियों के बारे में बताए।
हमदानी ने कहा, “हिमालयी क्षेत्र में पुरानी परंपराओं से सीखना जरूरी है, क्योंकि वे आजमाए हुए और परखे हुए डिजाइन हैं।” “बदलाव जरूरी है, लेकिन ऐसा सावधानी के साथ होना चाहिए।”
उन्होंने कहा, “चाहे वह कश्मीर का धज्जी-दिवारी हो या हिमाचल का काठ-कुनी, हम सैकड़ों साल पहले की तरह जीवन नहीं जी सकते। लेकिन आज का इंजीनियरिंग ज्ञान पारंपरिक शैलियों और इनोवेशन का मिला-जुला रूप होना चाहिए जो स्थलाकृति, जलवायु का सम्मान करे और भूकंपीय गतिविधियों से बचाए।”
वास्तुकार कालिया उनकी बातों से सहमत हैं, “हमें पीछे जाने की जरूरत नहीं है; हमें समझदारी के साथ आगे बढ़ना है। हिमाचल की पारंपरिक तकनीकों को आधुनिक भूकंपरोधी कोड के साथ जोड़ा जा सकता है। उदाहरण के लिए, रीइन्फोर्स्ड चिनाई के साथ लकड़ी की पट्टियों का इस्तेमाल करना या ढलान-आधारित संचरना। इसका मकसद पुरानी यादें नहीं, बल्कि मजबूती है।”
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कालिया ने कहा, “हमें सिर्फ कंक्रीट के समाधान नहीं, बल्कि जोखिम को कम करने वाली जोनिंग, हरित संरचना और स्थानीय स्तर पर क्षमता बढ़ाने की जरूरत है।”
हिमाचल प्रदेश का 45% से ज़्यादा हिस्सा बाढ़, भूस्खलन और हिमस्खलन की चपेट में आने का खतरा है। एक्सपर्ट्स ने कहा कि मजबूत दोबारा निर्माण के लिए पारंपरिक और आधुनिक तरीकों को मिलाना जरूरी है।
मंत्री धरमानी भी इस संतुलन को स्वीकार करते हैं, “पारंपरिक शैलियां छोटे ढांचे के लिए सही हैं, लेकिन बड़ी इमारतों के लिए RCC फ्रेमवर्क जरूरी है। फिर भी, हम लोगों को छोटे घरों के लिए पहाड़ी वास्तुकला अपनाने के लिए प्रेरित करते हैं।”
उन्होंने आगे कहा, “लंबे समय में, हमें टिकाऊपर पर ध्यान देना चाहिए। जब तक हम सतत विकास की ओर नहीं बढ़ते, सभी कोशिशें अधूरी रहेंगी।”
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 5 दिसंबर, 2025 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: हिमाचल प्रदेश भारत के ज्यादा जोखिम वाले भूकंप क्षेत्र में आता है, इसलिए स्थानीय राजमिस्त्री मानते हैं कि इमारतों के लिए पारंपरिक डिजाइन सबसे सुरक्षित विकल्प है। तस्वीर: आमिर बिन रफी।