- उत्तर प्रदेश में ईंट-भट्ठा मजदूर लू से बचने के लिए रात में काम करने लगे हैं।
- सामान्य से ज्यादा गर्म रातें और हवादार कमरे नहीं होने से वे दिन में सिर्फ तीन से चार घंटे ही सो पाते हैं। नींद की कमी का असर सेहत पर पड़ता है और इससे काम करने की क्षमता बहुत कम हो जाती है।
- हालांकि, राज्य के हीट ऐक्शन प्लान में ईंट-भट्ठा मजदूरों को असुरक्षित समूह माना गया है, फिर भी गर्मी के महीनों में उनमें से कई को पर्याप्त मदद नहीं मिल पाती।
तारीख 22 मई। सुबह के 3 बज रहे हैं। उत्तर प्रदेश में बरेली जिले के कुरका गांव के पास खुले मैदान में झींगुरों की आवाज गूंज रही है। लेकिन, 30 साल की रीना कश्यप और उनके पति जगदीश कश्यप दो घंटे पहले ही काम करना शुरू कर चुके हैं। वे सौर बिजली की रोशनी में ईंट ढाल रहे हैं। उन्होंने कहा, “हम अब रात में काम कर रहे हैं, क्योंकि दोपहर की चिलचिलाती धूप में यहां रहना नामुमकिन है।”
आदर्श ब्रिक इंडस्ट्री के लिए ईंटें ढालने वाला यह दंपति रात 9 बजे सोता है और फिर रात में ही 12:30 बजे उठ जाता है। उनकी योजना सुबह 11 बजे तक लगातार काम करने की होती है। रीना कहती हैं, “उसके बाद मुझे नहाना, कपड़े धोना, खाना बनाना और बच्चों को खिलाना होता है। फिर शाम को हम ईंट जमाते हैं और अगले दिन के लिए मिट्टी तैयार करते हैं। इस तरह पूरा दिन इसी में निकल जाता है।”
जगदीश कहते हैं, “गर्मियों में हम दिन में मुश्किल से चार घंटे ही सो पाते हैं। दिन में इतनी गर्मी होती है कि सोना नामुमकिन है। भट्ठे पर हमारे पास पंखे, कूलर या बिजली जैसी कोई सुविधा नहीं है।”
यह दंपति जनवरी 2026 में मीरगंज तहसील के ही बुज्हिया जागीर गांव से कुरका स्थित इस ईंट-भट्ठे पर आया था। परिवार अपने चार बच्चों के साथ ईंट और कच्ची मिट्टी से बने टीन की छत वाले अस्थायी कमरे में रहता है। यह कमरा न तो हवादार है और न ही यहां बिजली है।
रीना ने बताया, “हम दिन में एक-दो घंटे सोने की कोशिश करते हैं, लेकिन अंदर बहुत गर्मी होती है। सोना नामुमकिन है; पूरा शरीर बेचैन रहता है।” रीना ने रात की पाली के दौरान लाइट जलाने और मोबाइल फोन चार्ज करने के लिए 40-वाट का सोलर पैनल खरीदा है।
रात में काम करने के अपने फैसले की वजह बताते हुए वह कहती हैं, “हम जितनी भी ईंटें ढालते हैं, उनमें से हर 1,000 ईंटों के लिए हमें ₹400 मिलते हैं। गर्मियों में तापमान इतना ज्यादा होता है कि दिन में काम करना लगभग नामुमकिन होता है, इसलिए हम रात में काम करते हैं। ऐसा नहीं करेंगे, तो हमारा गुजारा नहीं हो पाएगा। कम ईंटें ढालने का मतलब है कम कमाई। हम या तो अच्छी नींद ले सकते हैं या अपने परिवार का पेट भर सकते हैं। हम दोनों काम एक साथ नहीं कर सकते।”

22 मई को बरेली में अधिकतम तापमान 46° सेल्सियस दर्ज किया गया। रामपुर जैसे पड़ोसी जिलों में भी ऐसी ही गर्मी रही। उसी दिन, दुनिया के 100 सबसे गर्म शहरों में से 97 शहर भारत में थे।
कुछ किलोमीटर दूर रामपुर जिले के रुस्तमपुर गांव के रहने वाले एक अन्य ईंट-ढलाई मजदूर रईस अहमद ने मई के तीसरे हफ्ते में अपनी सेहत पर तीन दिन की अपनी पूरी मजदूरी खर्च कर दी। उन्होंने बताया, “पिछले हफ्ते मुझे चक्कर आने लगे। डॉक्टर ने मुझे चार बोतल ग्लूकोज (आईवी ड्रिप) चढ़ाईं, जिन पर 1,200 रुपये खर्च हो गए। मेरी तीन दिन की कमाई एक ही झटके में खत्म हो गई।”
स्वास्थ्य विशेषज्ञ आमतौर पर वयस्कों को हर रोज सात से नौ घंटे की नींद लेने का सुझाव देते हैं। लेकिन बरेली, रामपुर और अमरोहा जिलों के ईंट-भट्ठों पर किए गए साक्षात्कारों से पता चला कि भीषण गर्मी के दौरान कई मजदूर महज तीन से चार घंटे ही सो पाते हैं।
कमाई में कमी का उनका अनुभव भी कोई अपवाद नहीं है। 2025 की लैंसेट काउंटडाउन ऑन हेल्थ एंड जलवायु परिवर्तन रिपोर्ट में श्रम घंटों पर गर्मी के दुष्प्रभाव का अनुमान लगाया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में भीषण गर्मी के कारण संभावित श्रम के सबसे ज्यादा 247 अरब घंटे नष्ट हो गए। औसतन, हर व्यक्ति के हिस्से में 419 काम के घंटे का नुकसान दर्ज किया गया।

प्रतिकूल अनुकूलन
उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (UPPCB) के आंकड़ों के अनुसार, 2024 में राज्य में 19,718 ईंट-भट्टे थे। लोकसभा में एक सवाल के जवाब में श्रम और रोजगार मंत्रालय ने बताया कि 2020 में उत्तर प्रदेश में 25 लाख से ज्यादा लोग ईंट-भट्ठों पर काम करके अपनी आजीविका चला रहे थे।
पश्चिम बंगाल में ईंट-भट्ठे पर काम करने वाली महिलाओं पर हुए एक अध्ययन में पाया गया कि गर्मी के संपर्क में रहने से शारीरिक दिक्कतें काफी बढ़ जाने से काम करने की क्षमता कम हो जाती है। शोधकर्ताओं ने देखा कि तापमान के 34.9 डिग्री सेल्सियस से ऊपर जाने पर हर 1 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी से उत्पादकता लगभग दो फीसदी कम हो जाती है।
कल्याणी विश्वविद्यालय के फिजियोलॉजी विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर और पश्चिम बंगाल के अध्ययन के सह-लेखक सुभाषिस साहू ने कहा, “कई मामलों में मजदूर दिन की भीषण गर्मी से बचने के लिए अपना काम रात या सुबह में कर रहे हैं। हालांकि, इस बदलाव से अनजाने में नींद पूरी न होने और शरीर के ठीक से स्वस्थ न हो पाने से सेहत से जुड़ा एक और छिपा हुआ खतरा पैदा हो सकता है। इस तरह, गर्मी के सीधे संपर्क में आने से तो वे बच सकते हैं, लेकिन साथ ही उनमें थकान, सोचने-समझने की क्षमता में कमी और लंबे समय तक रहने वाले शारीरिक दिक्कतों का खतरा भी बढ़ सकता है।”
उन्होंने बताया, “हमारे पिछले शोध पत्र के आधार पर हमने पाया कि बहुत ज्यादा शारीरिक मेहनत वाले काम के दौरान दिल पर पड़ने वाला दबाव बढ़ जाता है। इसके अलावा, उन्हें (भट्ठे में काम करने वालों को) बेचैनी, गर्मी से थकान, बहुत ज्यादा पसीना आने और गर्मी के कारण त्वचा पर दाने निकलने जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ा।”
साहू ने आगे कहा, “हमारे अध्ययन में काम के दौरान गर्मी के संपर्क में रहने पर मजदूरों ने अक्सर गर्मी से जुड़ी बीमारियों की शिकायत की।” उनकी टीम अभी इस बात पर काम कर रही है कि कैसे नींद की कमी गर्मी से जुड़ी बीमारियों को और बढ़ा देती है।
शोध और जागरूकता से जुड़ी गैर-लाभकारी संस्था हीट वॉच की संस्थापक अपेक्षिता वार्ष्णेय ने कहा, “यह स्पष्ट रूप से प्रतिकूल अनुकूलन का उदाहरण है। काम के घंटे बदलने से भले ही गर्मी के तत्काल खतरे से कुछ हद तक बचाव हो जाए, लेकिन इससे लंबे समय में ऐसा नुकसान होता है जिसे ज्यादा दिनों तक झेला नहीं जा सकता। असल अनुकूलन वही है जो लोगों की सभी मुश्किलों को कम करे, न कि नए जोखिम पैदा करे।”
श्रमिक अधिकारों के लिए काम करने वाले गैर-सरकारी संगठन सेंटर फॉर लेबर रिसर्च एंड ऐक्शन के सचिव सुधीर कटियार ने बताया, “तापमान के साथ-साथ बहुत ज्यादा गर्म दिनों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है। ईंट-भट्ठों पर काम करने वाले ये मजदूर बेहद खराब परिस्थितियों में रहते हैं। उनके कच्चे घरों की ऊंचाई बहुत कम होती हैं, जिनमें हवा के आने-जाने की कोई व्यवस्था नहीं होती। टीन की छत वाले ये कमरे भीषण गर्मी में बुरी तरह तपने लगते हैं। भट्ठा मालिक उन्हें पंखे या कूलर जैसी बुनियादी सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं कराते। यही वजह है कि वे बहुत ज्यादा गर्मी वाले दिनों में ठीक से सो नहीं पाते। इसका असर उनके स्वभाव पर पड़ता है, वे चिड़चिड़े हो जाते हैं और उनकी काम करने की क्षमता भी घट जाती है।”

गर्म होती दुनिया में नींद की कमी
अमरोहा जिले के लुहारी खादर गांव में प्रियंका जाटव ईंटें बनाने के बाद रोटी और चटनी से दोपहर का खाना खा रही हैं। वह कहती हैं, “कल रात मैं सिर्फ तीन घंटे सो पाई थी। नींद पूरी न होने से शरीर बहुत थक जाता है और हम ठीक से काम नहीं कर पाते। सर्दियों या सुहावने मौसम में हम आसानी से एक दिन में 2,000 से 2,500 ईंटें बना लेते हैं, लेकिन इस गर्मी में हम सिर्फ 1,200 से 1,800 ईंटें ही बना पाते हैं। इस वजह से, कभी-कभी हमें दोपहर की तेज धूप और गर्मी में भी काम करना पड़ता है। दोपहर में मिट्टी और रेत बहुत ज़्यादा गर्म हो जाती हैं, जिससे ईंटें बनाना और भी मुश्किल हो जाता है।”
बरेली के ही तुरसा पट्टी के रहने वाले ईंट-ढलाई मजदूर दिनेश राजपूत अब यह तय करने के लिए अपने मोबाइल फोन पर तापमान देखते हैं कि काम कब शुरू करना है। वह कहते हैं, “जिस दिन तापमान 42 डिग्री सेल्सियस से ऊपर चला जाता है, मैं रात 10 या 11 बजे काम शुरू करता हूं और पूरी रात काम करते हुए अगली सुबह तक लगा रहता हूं।” वह कहते हैं, “अब मौसम ही बदल गया है। पहले हमारे काम का चक्र ऐसा था कि चार महीने सर्दी रहती थी और चार महीने गर्मी। अब सर्दी सिर्फ दो महीने रह गई है, जबकि गर्मी छह महीने तक रहती है। अब तो फरवरी से ही गर्मी शुरू हो जाती है। पहले ऐसा कभी नहीं होता था।” दिनेश बताते हैं, “जब मैं पूरी तरह थक जाता हूं और महसूस करता हूं कि आराम किए बिना काम करना संभव नहीं है, तब एक दिन की छुट्टी ले लेता हूं। उस रात मैं अपनी नींद पूरी करता हूं। सात-आठ घंटे की नींद पाने के लिए मुझे एक दिन की पूरी मजदूरी गंवानी पड़ती है।”
रुस्तमपुर गांव के मुबारक शाह ने कहा, “हम किन हालात में काम करते हैं और किन मुश्किलों का सामना करते हैं, यह तो बस भगवान ही जानता है। शरीर थक जाता है, सुस्ती आ जाती है और हमारी काम करने की क्षमता कम हो जाती है। इस वजह से हमें और भी अधिक घंटों तक काम करना पड़ता है।”
उत्तर प्रदेश हीट वेव ऐक्शन प्लान (UPHWAP) 2025 में भी राज्य में बढ़ती गर्मी की प्रवृत्ति और इससे श्रमिकों के सामने पैदा हो रही चुनौतियों का उल्लेख किया गया है। इसमें 1982 और 2023 की गर्मियों के दौरान दर्ज किए गए अधिकतम तापमान की तुलना की गई है, जिससे पता चलता है कि राज्य के ज्यादातर जिले पहले की तुलना में अधिक गर्म हो गए हैं। उदाहरण के लिए बरेली में अप्रैल, मई और जून 2023 के दौरान दर्ज किया गया अधिकतम तापमान, 1982 के इन्हीं महीनों की तुलना में क्रमशः 0.94 डिग्री सेल्सियस, 1.38 डिग्री सेल्सियस और 1.19 डिग्री सेल्सियस अधिक था।
वार्ष्णेय ने कहा, “नींद की कमी असल में जलवायु से जुड़ी काम-काज से संबंधित नाइंसाफ़ी है। आस-पास का बढ़ता तापमान सुकून भरी नींद में बाधा डालता है, भले ही कर्मचारी आराम करने की कोशिश करें।”

नीति पर अमल नहीं
UPHWAP में ईंट-भट्ठों पर काम करने वाले मजदूरों को गर्मी को लेकर बहुत ज्यादा जोखिम वाले समूह में रखा गया है। योजना में नियोक्ताओं को सलाह दी गई है कि वे दोपहर 12 बजे से शाम 4 बजे के बीच पड़ने वाली भीषण गर्मी के वक्त बाहरी काम को दूसरे समय में कराएं, काम की जगह पर आराम के लिए छायादार जगह, पीने का पानी, इलेक्ट्रोलाइट (ओआरएस) और आपातकालीन चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराएं। साथ ही अप्रैल से जून के गर्मी वाले मौसम के दौरान गर्मी से जुड़ी बीमारियों के मामलों की जानकारी सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थानों को देने के लिए भी कहा गया है। लेकिन, जमीनी स्तर पर इन सलाहों और असल व्यवस्था के बीच बड़ा अंतर साफ दिखाई देता है।
आदर्श ब्रिक इंडस्ट्री के संचालक सुमेरी लाल यादव ने बताया कि उनके भट्ठे पर ईंटें बनाने वाले लगभग 30 परिवार काम करते हैं, जिनमें से 25 परिवार टीन की छत वाले अस्थायी शेड में रहते हैं। उन्होंने कहा, “बढ़ती गर्मी और बदलते मौसम की वजह से मुश्किलें निश्चित रूप से बढ़ रही हैं। हम सोलर पैनल और छोटी बैटरी उपलब्ध कराने की कोशिश करते हैं।” हालांकि, रीना कश्यप ने बताया कि उनके परिवार ने अपना छोटा पैनल खुद खरीदा था और उन्हें कोई मदद नहीं मिली। वे जो पैनल इस्तेमाल करते हैं, वह सिर्फ 40 वॉट का है।
यादव ने अपनी सीमाओं को स्वीकार करते हुए कहा, “हम अपने दम पर इन लोगों को बिजली का कनेक्शन, अधिक क्षमता वाले सोलर पैनल, पंखे या कूलर उपलब्ध नहीं करा सकते। इसके लिए हमें सरकार की सहायता की जरूरत है।” उन्होंने आगे कहा, “लू से निपटने के संबंध में हमें अब तक अधिकारियों की ओर से कोई लिखित निर्देश, परामर्श या नियामकीय आदेश प्राप्त नहीं हुआ है।”
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बरेली के उप श्रम आयुक्त अनुराग मिश्रा ने मोंगाबे-इंडिया से कहा, “मेरी नियुक्ति हाल ही में यहां हुई है। हमारी टीम इन ईंट-भट्ठों का निरीक्षण करेगी, जिसके बाद उचित कदम उठाए जाएंगे।”
वार्ष्णेय ने कहा, “इससे (भट्ठे पर काम करने वाले मजदूरों की मुश्किलों से) पता चलता है कि भारत की श्रम संहिता गर्मी को काम से जुड़े खतरे के तौर पर पहचानने में पूरी तरह नाकामी रही है। उद्योग कानून में गर्मी से निपटने के लिए ठंडक, पानी या आराम जैसे कोई खास नियम नहीं हैं। ‘हीट ऐक्शन प्लान’ में आम लोगों को चेतावनी देने पर जोर दिया जाता है, न कि मजदूरों की सुरक्षा पर। ईंट-भट्ठों जैसे असंगठित क्षेत्र के मजदूर इन सभी नियमों और सुरक्षा उपायों के दायरे से पूरी तरह बाहर रह जाते हैं।”
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 26 जून, 2026 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: रात के समय ईंटें ढालने का काम करती हुई रीना कश्यप। तस्वीर: शिवम भारद्वाज।