- कानपुर देहात के रनियां में करीब 1976 के आसपास रनियां क्षेत्र में क्रोमियमयुक्त खतरनाक औद्योगिक कचरा खुले में डंप किया गया था।
- एनजीटी ने 2019 में डंप हटाने, स्वास्थ्य जांच कराने, प्रभावित हैंडपंप और ट्यूबवेल बंद करने और सुरक्षित पानी उपलब्ध कराने के निर्देश दिए थे।
- स्वास्थ्य विभाग की जांच में 1028 लोगों में से 947 में क्रोमियम और 45 लोगों में मरकरी की मौजूदगी दर्ज की गई।
- प्रशासन टैंकर और वैकल्पिक जलापूर्ति का दावा कर रहा है, लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि पीने और खाना बनाने के बाद बाकी जरूरतों के लिए पानी पर्याप्त नहीं बचता।
करीब 50 साल की मीना देवी अपने बेटे के साथ कानपुर देहात के रनियां औद्योगिक क्षेत्र से सटे खानचंद्रपुर गांव में रहती हैं। पानी की समस्या का जिक्र होते ही वह घर के भीतर ले गईं और ट्यूबवेल चलाकर पानी दिखाया। इस पानी में हल्का हरापन दिखाई दे रहा था। उन्होंने कहा, “काफी दिक्कत है… मजबूरी में इसी पानी का इस्तेमाल करना पड़ता है।”
खानचंद्रपुर में भूजल के प्रदूषण के चलते पानी की समस्या लोगों की रोजमर्रा की बातचीत का हिस्सा बन चुकी है। भूजल में औद्योगिक रसायनों के प्रदूषण के कारण गांव में कई सरकारी हैंडपंप निष्क्रिय पड़े हैं। कुछ हैंडपंपों के हत्थे हटा दिए गए हैं, ताकि लोग उनका इस्तेमाल न कर सकें। इसके बावजूद घरों के भीतर लगे निजी हैंडपंप और बोरिंग अब भी चल रहे हैं।
मीना के मुताबिक गांव में टैंकर या टंकी से साफ़ पानी की आपूर्ति की जाती है लेकिन यह पानी घर की सभी जरूरतों के लिए पर्याप्त नहीं होता। इसका इस्तेमाल मुख्य रूप से पीने और खाना बनाने में इस्तेमाल हो जाता है। नहाने, कपड़े धोने, सफाई और पशुओं के लिए कई परिवार अब भी घरों में लगे निजी हैंडपंप या बोरिंग पर निर्भर हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि पानी की टंकी से सप्लाई होती है, लेकिन मात्रा सीमित है। ऐसे में पीने के पानी के लिए कुछ राहत मिल जाती है, पर घरेलू इस्तेमाल और पशुओं के लिए साफ पानी की कमी बनी रहती है। कई लोग पानी के रंग और स्वाद को लेकर भी चिंता जताते हैं।
रनियां में पानी की यह समस्या हाल के वर्षों में शुरू नहीं हुई। राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण यानी एनजीटी के सामने पेश रिपोर्टों के अनुसार, करीब 1976 के आसपास रनियां औद्योगिक क्षेत्र में क्रोमियमयुक्त खतरनाक औद्योगिक कचरा खुले में डाला गया था। यह कचरा कथित तौर पर बेसिक क्रोम सल्फेट बनाने वाली इकाइयों से निकला था। लंबे समय तक खुले में पड़े रहने के कारण बारिश के पानी के साथ इसमें मौजूद रसायनों के मिट्टी में रिसने और फिर भूजल तक पहुंचने की आशंका जताई गई।

बाबू बनारसी दास विश्वविद्यालय के पर्यावरण विज्ञान विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर प्रमोद कुमार सिंह के अनुसार रनियां क्षेत्र में क्रोमियम प्रदूषण की मुख्य वजह कई साल पहले खुले में डंप किया गया औद्योगिक कचरा है। यह कचरा बेसिक क्रोम सल्फेट यानी बीसीएस बनाने वाली इकाइयों से निकलता था। लंबे समय तक खुले में पड़े रहने के कारण बारिश का पानी इस कचरे में मौजूद रसायनों को धीरे-धीरे मिट्टी के अंदर ले गया और समय के साथ यही प्रदूषण भूजल तक पहुंच गया।
सिंह बताते हैं कि क्रोमियम का एक रूप, हेक्सावैलेंट क्रोमियम, स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए अधिक खतरनाक माना जाता है। उनके शोध में यह सामने आया कि डंप साइट पर मौजूद कचरे से लंबे समय तक क्रोमियम के रिसाव की संभावना बनी रहती है। उनके मुताबिक समस्या केवल डंप साइट तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर आसपास की मिट्टी और पानी पर भी पड़ सकता है।
खानचंद्रपुर, पालनपुरवा, केशव नगर, उमरन, बजरंग नगर, अंबेडकर नगर, श्याम सुंदर नगर, यादव पुरवा, शिवनाथ पुरवा, चौहान पुरवा और घनारामपुर में लोगों से बातचीत के दौरान पानी की उपलब्धता और गुणवत्ता, दोनों को लेकर चिंता सामने आई। ग्रामीणों का कहना है कि पानी की टंकी से दिन में दो बार आपूर्ति होती है, लेकिन यह जरूरत के मुकाबले कम है। आपूर्ति बाधित होने पर समस्या और बढ़ जाती है।
गांव के प्रवेश मार्ग पर एक दुकाननुमा कमरे में रायबरेली जिले के 30 वर्षीय धनेश कश्यप, 27 वर्षीय दिलीप कश्यप, फतेहपुर निवासी 32 वर्षीय जयप्रकाश कश्यप और रायबरेली के रामतीरथ कश्यप रहते हैं। चारों पास की एक फैक्ट्री में काम करते हैं। धनेश बताते हैं कि जब वे यहां काम के लिए आए थे, तब पानी की समस्या की गंभीरता का अंदाजा नहीं था। वह कमरे में रखे स्टील के बर्तनों की ओर इशारा करते हुए कहते हैं, “करीब 15 दिन पहले नए बर्तन खरीदे थे, उनका रंग बदलने लगा है।” दिलीप कहते हैं कि नहाने और हाथ-पैर धोने के बाद त्वचा रूखी महसूस होती है।
खानचंद्रपुर की 55 वर्षीय कमलेश देवी अपने बेटे और बहू के साथ रहती हैं। वह कहती हैं कि गांव में पानी की उपलब्धता लंबे समय से समस्या बनी हुई है। “कई घरों के बाहर और अंदर लगे नल बेकार पड़े हैं। जब ट्रांसफॉर्मर खराब हो जाता है या बिजली चली जाती है तो पानी की टंकी भी प्रभावित हो जाती है। उस समय खाना बनाने तक के लिए पानी जुटाना मुश्किल हो जाता है।”
ग्रामीणों के मुताबिक टैंकर और टंकी की व्यवस्था से पीने के पानी में कुछ राहत मिली है, लेकिन घरेलू कामों और पशुओं के लिए साफ पानी की कमी बनी हुई है। इसी वजह से निजी बोरिंग और हैंडपंपों का इस्तेमाल पूरी तरह बंद नहीं हो पाया है।
एनजीटी ने माना गंभीर स्वास्थ्य संकट
एनजीटी ने इस मामले को गंभीर पर्यावरणीय और सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट माना। अगस्त 2019 के आदेश में एनजीटी ने कहा कि रनियां में लंबे समय से पड़ा क्रोमियम वेस्ट तीन महीने के भीतर ट्रीटमेंट, स्टोरेज और डिस्पोजल सुविधा यानी टीएसडीएफ में भेजा जाना चाहिए। प्राधिकरण ने उत्तर प्रदेश सरकार को प्रभावित क्षेत्रों में स्वास्थ्य शिविर लगाने, लोगों की जांच कराने और क्षेत्र में पड़े कचरे को सुरक्षित तरीके से हटाने के निर्देश दिए।
इसके बाद सितंबर 2019 में एनजीटी ने प्रभावित हैंडपंपों और ट्यूबवेलों को बंद करने, टैंकरों से साफ़ पानी उपलब्ध कराने, टंकी और पाइपलाइन आधारित जलापूर्ति व्यवस्था विकसित करने के निर्देश दिए। प्राधिकरण ने यह भी कहा कि राज्य सरकार सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने की अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती।
साल 2020 में कचरा हटाने की योजना बनी और इसके लिए धनराशि जारी हुई। इस कचरे के वैज्ञानिक निस्तारण के लिए राज्य सरकार ने मार्च 2020 को ₹23.44 करोड़ जिलाधीश के एस्क्रो खाते में जारी किए। बाद में कचरे की संशोधित मात्रा करीब 85,008 मीट्रिक टन आंकी गई, जिसके निस्तारण की लागत लगभग ₹98.46 करोड़ तय हुई। इसके लिए सरकार ने ₹48.44 करोड़ अतिरिक्त जारी किए और दो एजेंसियों को कार्य सौंपा। बाद में साल 2021 में आईआईटी कानपुर को मिट्टी और भूजल के उपचार यानी रेमेडिएशन की योजना से जोड़ा गया। हालाँकि, बाद की सुनवाइयों में एनजीटी ने पाया कि कई निर्देशों का पालन पूरी तरह से नहीं हुआ है।
साल 2022 की ओवरसाइट कमेटी रिपोर्ट के अनुसार, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और आईआईटी कानपुर के संयुक्त निरीक्षण में रनियां साइट पर मौजूद कचरे की मात्रा 1,22,799 घन मीटर आंकी गई थी। मौके से 2024 में क्रोमियम वेस्ट को पूरी तरह से अलग कर दिया गया।
साल 2025 में एनजीटी ने स्वास्थ्य जांच और लंबे समय की निगरानी को लेकर भी सवाल उठाए। नवंबर 2025 की एमिकस क्यूरी की रिपोर्ट में कानपुर देहात में 29 लोगों की जांच का जिक्र है। रिपोर्ट के अनुसार, जांच में सभी 29 लोगों में क्रोमियम पाया गया, जबकि 20 लोगों में मरकरी या पारे की मौजूदगी दर्ज की गई। इसी रिपोर्ट में जुलाई 2025 के हलफनामे के आधार पर कहा गया कि कानपुर देहात में लिए गए 132 रक्त नमूनों में क्रोमियम की मात्रा तय सीमा से अधिक पाई गई।
फरवरी 2026 में इस मामले को प्रभावित लोगों के जीवन और आजीविका से जुड़ा बताते हुए उत्तर प्रदेश सरकार से आगे की रिपोर्ट मांगी। प्राधिकरण ने राज्य को प्रभावित लोगों की जांच, इलाज, निगरानी और सुरक्षित पानी से जुड़े कदमों पर रिपोर्ट दाखिल करने के लिए छः सप्ताह का समय दिया।

खेती और पशुपालन पर असर
खानचंद्रपुर में पानी की समस्या अब घरेलू खर्च, खेती और पशुपालन से भी जुड़ गई है। करीब 45 वर्षीय किसान धर्मेंद्र सिंह यादव अपने पांच सदस्यों वाले परिवार के साथ गांव में रहते हैं। परिवार की आजीविका मुख्य रूप से खेती पर निर्भर है। धर्मेंद्र बताते हैं कि निजी कैम्परों से पानी लेना पड़ता है। “15 लीटर पानी के लिए 10 से 20 रुपये तक देने पड़ते हैं। यह पानी सिर्फ पीने और खाना बनाने के लिए ही बचाकर इस्तेमाल किया जाता है। बाकी कामों के लिए दूसरी व्यवस्था करनी पड़ती है।” ग्रामीणों के अनुसार एक परिवार को रोज औसतन तीन कैम्पर (45 लीटर) पानी की जरूरत पड़ती है। इस हिसाब से केवल पीने और घरेलू उपयोग के पानी पर एक परिवार का मासिक खर्च लगभग 1,800 रुपये तक पहुंच जाता है।
धर्मेंद्र के मुताबिक गांव की टंकी से दिन में दो बार पानी आता है, लेकिन यह पूरे दिन की जरूरत के लिए पर्याप्त नहीं होता। वह कहते हैं कि पानी की समस्या का असर खेती पर भी दिख रहा है। सरकारी योजनाओं और सिंचाई संसाधनों की वजह से खेती पूरी तरह बंद नहीं हुई है, लेकिन पहले जैसी पैदावार नहीं मिलती।
पशुपालकों के लिए यह संकट अलग रूप लेता है। करीब 50 साल के छोटेलाल के पास तीन गाय और दो भैंस हैं। वे बताते हैं कि घर के लोग किसी तरह पीने का पानी खरीद लेते हैं, लेकिन पशुओं के लिए साफ पानी जुटाना मुश्किल है। “टैंकर का पानी सीमित होता है। पशुओं को कई बार वही पानी पिलाना पड़ता है, जिसे लोग अपने लिए सुरक्षित नहीं मानते।” छोटेलाल को डर है कि खराब पानी से पशु बीमार पड़ सकते हैं या दूध कम हो सकता है, जिससे उनकी आमदनी पर असर पड़ेगा।

मिट्टी और स्वास्थ्य जांच पर सवाल
मीना ने गांव के उस रास्ते की ओर इशारा किया, जहां कभी क्रोमियमयुक्त कचरे का ढेर बताया जाता था। वहां खुले तौर पर कचरा नजर नहीं आया, लेकिन कई जगह मिट्टी का रंग बदला हुआ और पैच जैसे निशान दिखाई दिए। आसपास मौजूद ग्रामीणों का कहना है कि कचरे के हटने के बाद भी पानी की समस्या खत्म नहीं हुई है।
बाबू बनारसी दास विश्वविद्यालय के सिंह के मुताबिक अगर भारी धातुएं मिट्टी और पानी में बनी रहती हैं तो उनका असर खेती, फसलों और पशुओं तक पहुंच सकता है। इसलिए केवल पीने के लिए टैंकर या पाइपलाइन से पानी उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं माना जा सकता। जरूरी है कि मिट्टी और भूजल की नियमित जांच होती रहे और जहां जरूरत हो वहां वैज्ञानिक तरीके से उपचार किया जाए।
सिंह कहते हैं कि अगर डंप साइट से कचरा हट भी गया हो, तब भी भूजल में पहुंच चुका प्रदूषण तुरंत खत्म नहीं होता। इसके प्रभाव कई वर्षों तक बने रह सकते हैं। इसलिए प्रभावित लोगों की स्वास्थ्य जांच और इलाके की निगरानी लंबे समय तक जारी रहनी चाहिए।
क्षेत्रीय प्रदूषण अधिकारी मनोज चौरसिया ने मोंगाबे-हिन्दी को बताया कि भूगर्भ जल प्रदूषण की समस्या को गंभीरता से लेते हुए तकनीकी और प्रशासनिक स्तर पर काम किया जा रहा है। उनके अनुसार क्रोमियम वेस्ट को सुरक्षित तरीके से हटाकर अधिकृत टीएसडीएफ साइट पर निस्तारित किया जा चुका है। जिन स्थानों पर मिट्टी में पीले पैच दिखाई दिए हैं, उन्हें चिन्हित कर वैज्ञानिक तरीके से उपचारित करने की प्रक्रिया जारी है। उन्होंने कहा कि प्रभावित क्षेत्रों में समय-समय पर भूजल और मिट्टी के नमूने लिए जाते हैं, ताकि प्रदूषण के स्तर का आकलन किया जा सके।

इस बीच स्वास्थ्य विभाग की जांच ने ग्रामीणों की चिंता बढ़ाई है। स्थानीय मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, अक्टूबर से मार्च के बीच 1028 लोगों की जांच कराई गई। इनमें 947 लोगों में क्रोमियम की मात्रा अधिक पाई गई। 45 लोगों में मरकरी और 25 लोगों में फ्लोराइड की मौजूदगी दर्ज की गई। रिपोर्ट के अनुसार, मार्च 2026 में लिए गए 336 नमूनों में से 315 में मानक से अधिक क्रोमियम मिला, जबकि 18 लोगों में क्रोमियम की मात्रा 20 माइक्रोग्राम प्रति लीटर से अधिक दर्ज की गई।
मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. ए.के. सिंह ने मोंगाबे-हिंदी से बातचीत में बताया कि क्रोमियम प्रभावित गांवों में स्वास्थ्य विभाग की ओर से समय-समय पर विशेष हेल्थ कैंप लगाए जा रहे हैं। उनके अनुसार जिन लोगों के नमूनों में क्रोमियम या मरकरी की मात्रा अधिक मिली है, उनकी निगरानी की जा रही है। विभाग का कहना है कि अब तक किसी व्यक्ति में इन तत्वों के कारण गंभीर बीमारी की पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन प्रभावित क्षेत्रों में स्वास्थ्य सर्वेक्षण और जांच की प्रक्रिया जारी है।
बैनर तस्वीर- पावरग्रिड के पास फैला मलबा, जो भूजल को प्रदूषण कर रहा है। तस्वीर- रजत अवस्थी/मोंगाबे