- भारत में हेजहॉग की तीन प्रजातियां हैं, जिनमें से बेयर बैलीड हेजहॉग या मद्रास हेजहॉग खासतौर पर दक्षिणी भारत में पाया जाता है।
- इनका शिकार अक्सर उनके मांस और मुलायम बालों के लिए किया जाता है, लेकिन उनकी आबादी के बारे में कम जानकारी होने के कारण, उनकी सुरक्षा की स्थिति को कम करके आंका जाता है।
- विशेषज्ञ बेयर बैलीड हेजहॉग के बेहतर संरक्षण की मांग करते हैं, जो एक खास तरह के वातावरण में रहने वाला जीव है और पारिस्थितिक तंत्र की सेहत का संकेत देता है।
हेजहॉग सिर्फ ‘एलिस इन वंडरलैंड’ की कहानी में दिखने वाले गोल-मटोल, प्यारा सा जीव नहीं हैं, न ही हॉलीवुड की एनिमेटेड फिल्मों में उनके मनमोहक कारनामे ही सब कुछ हैं। हेजहॉग पारिस्थितिकी तंत्र में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, क्योंकि उनकी अपनी खास पारिस्थितिकी, खान-पान की आदतें और व्यवहार होते हैं। उन्हें पारिस्थितिक संकेतक माना जाता है। वे मिट्टी में रहने वाले कीड़ों को खाते हैं, इसलिए अगर हेजहॉग की संख्या में भारी कमी आती है, तो इसका मतलब है कि पर्यावरण की गुणवत्ता बहुत घट गई है। वे उन शुष्क इलाकों में, जहां वे पाए जाते हैं, शिकार और शिकारी दोनों की भूमिका निभाते हैं, जो पारिस्थितिक संतुलन के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।
सिर्फ इतना ही नहीं, सर्वाहारी होने के कारण, वे कीड़ों-मकोड़ों को बहुत पसंद करते हैं और एक घंटे में 40 कीड़ों तक को चट कर सकते हैं। इसलिए, इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि उन्हें किसानों का सबसे अच्छा दोस्त माना जाता है, जो बहुत ही सटीकता के साथ प्राकृतिक कीट नियंत्रक का काम करते हैं। अपने नरम कांटेदार बालों वाले शरीर के बावजूद, वे घास के मैदानों, झाड़ियों और रेगिस्तानों में रहने वाले भारतीय लोमड़ी, सियार और नेवले जैसे शिकारियों की भूख मिटाते हैं।
इनके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं
चेहरे, पैरों और पेट के निचले हिस्से को छोड़कर, उनके पूरे शरीर पर नरम मुलायम कांटेदार बाल होते हैं और इनकी नाक सुअर जैसी होती है। हेजहॉग को यूलिपोटाइफला गण और एरिनेसिडी परिवार के अंतर्गत वर्गीकृत किया गया है और ये एशिया, अफ्रीका और यूरोप में पाए जाते हैं। लंबे समय से हेजहॉग पर रिसर्च कर रहे हैं पारिस्थितिकी विशेषज्ञ ब्राविन कुमार के मुताबिक, भारत में तीन तरह के हेजहॉग पाए जाते हैं: भारतीय लॉन्ग ईयर्ड हेजहॉग या कॉलर्ड हेजहॉग (हेमीचिनस कॉलरिस); इंडियन हेजहॉग (पैराचिनस माइक्रोफस); और बेयर बैलीड हेजहॉग, जिसे मद्रास हेजहॉग या दक्षिण भारतीय हेजहॉग (पैराचिनस नुडीवेंट्रस) भी कहा जाता है।
इंडियन हेजहॉग राजस्थान के डेजर्ट नेशनल पार्क और गुजरात के नारायण सरोवर अभयारण्य में पाया जाता है, जबकि कॉलर वाला हेजहॉग मुख्य रूप से राजस्थान और डेजर्ट नेशनल पार्क में देखा जा सकता है। कुमार कहते हैं कि बेयर बैलीड हेजहॉग दक्षिण भारत का स्थानिक है, जो सिर्फ दक्षिण के पांच राज्यों के शुष्क क्षेत्रों में पाया जाता है। तमिलनाडु में इसके सबसे ज्यादा देखे जाने की सूचना है।
कुमार अपने आसपास के जीवों की विविधता को समझने की अपील करते है। उन्होंने कहा, “वे बहुत दिलचस्प हैं। अगर आप उन्हें छूते हैं, तो वे एक गेंद की तरह सिकुड़ जाएंगे, जैसे कि पैंगोलिन।” हेजहॉग की एक और विशेषता है कि वह रात में सक्रिय होते हैं और लगभग दो से तीन किलोमीटर के सीमित क्षेत्र में ही घूमते हैं। कुमार ने आगे बताया, “वे उसी क्षेत्र में अपना पूरा जीवन गुजार देते हैं।”

कुमार द्वारा प्रकाशित 2024 के एक पेपर में बेयर बैलीड हेजहॉग के आवास को विविध बताया गया है, घास के मैदानों, सवाना और खुली झाड़ियों से लेकर कांटेदार जंगलों, छोटी पहाड़ियों की तलहटी, चरागाहों और शहरी क्षेत्रों तक यह फैले हुए हैं। रिसर्च पेपर में लिखा है, “मद्रास हेजहॉग मुख्य रूप से तमिलनाडु में दक्षिण दक्कन पठार के शुष्क पर्णपाती जंगलों और दक्कन के कांटेदार झाड़ियों वाले जंगलों में पाए जाते हैं।”
हाल ही में प्रकाशित एक रिसर्च पेपर में तमिलनाडु के तिरुनेलवेली जिले में बेयर बैलीड हेजहॉग के तीन नए स्थानीय रिकॉर्ड दर्ज किए गए हैं। इन्हें समुगरेंगापुरम, कूंथनकुलम और मूलइक्कडु के शुष्क घास के मैदानों में प्रत्यक्ष रूप से देखा गया था। यह नई खोज जिले में उनकी मौजूदगी के बारे में हमारी जानकारी को बढ़ाती है।
अशोका ट्रस्ट फॉर रिसर्च इन इकोलॉजी एंड एनवायरनमेंट (एटीआरईई) के शोधकर्ता शंकरनारायणन ने इस अध्ययन का नेतृत्व किया है। उनके मुताबिक, यह अचानक से हुई एक खोज थी। दरअसल वह घास के मैदानों में हैरियर (एक तरह का बाज) की निगरानी कर रहे रहे थे, तभी उनकी नजर इस जीव पर पड़ी। यह खोज काफी अहम रही, क्योंकि तमिलनाडु के 13 जिलों में जहां बेयर बैलीड हेजहॉग की मौजूदगी दर्ज की गई है, वहां सीधे देखने की रिपोर्ट सिर्फ 11 जगहों से ही मिली है। पेपर में कहा गया है कि ये तीन जगहें प्रजातियों के वितरण को समझने में मदद करती हैं, जो संरक्षण रणनीतियों को विकसित करने के लिए जरूरी है।
कई खतरों का सामना
ये खोज हमें बेयर बैलीड हेजहॉग के आवासों पर भी नजर डालने का मौका देती है; रिसर्च पेपर के अनुसार, ये जगहें भारत के सबसे दक्षिणी घास के मैदानों में से हैं और एशिया में उष्णकटिबंधीय घास के मैदानों के आखिरी अवशेषों का प्रतिनिधित्व करती हैं। शंकरनारायणन ने मोंगाबे इंडिया को बताया कि आवासों का नष्ट होना और भूमि उपयोग में बदलाव इस प्रजाति के लिए सबसे बड़े खतरे हैं। उन्होंने कहा, “वे खुले प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्र पर निर्भर करते हैं, जो तेजी से कृषि भूमि, कृषि वानिकी तरीकों और विकास परियोजनाओं में बदल रहे हैं।” उन्होंने आगे बताया कि हेजहॉग के मांस और मुलायम कांटेदार बालों के औषधीय गुणों, अंधविश्वासी मान्यताओं और पालतु व्यापार के कारण उनका बड़े पैमाने पर शिकार भी किया जाता है।
उन्होंने बताया, “मान्यता है कि हेजहॉग का मांस अस्थमा और काली खांसी जैसी सांस की बीमारियों को ठीक करता है। कुछ लोग उनके नरम कांटेदार बालों को सुखाकर, उनका चूर्ण बनाकर, शहद में मिलाकर बच्चों को सांस की बीमारियों से राहत दिलाने के लिए देते हैं। उनकी सूखी खाल को घरों के सामने लटकाया जाता है, क्योंकि इससे बुरी शक्तियां दूर रहती हैं।” रिसर्च पेपर में कहा गया है कि हेजहॉग सड़क दुर्घटनाओं का भी शिकार हो रहे हैं।

इसके अलावा टिक और परजीवी भी हेजहॉग की आबादी के लिए एक बड़ा खतरा हैं। उन्होंने कहा, “जब ये बाहरी परजीवी हेजहॉग का खून चूसते हैं, तो उनमें खून की कमी यानी एनीमिया हो जाता है। ये उनमें टिक-बोर्न रिलेप्सिंग फीवर जैसी बीमारियां भी फैलाते हैं। इससे हेजहॉग की इम्यूनिटी कमजोर हो जाती है, वे अन्य संक्रमणों के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाते हैं और उनकी प्रजनन क्षमता घट जाती है। गंभीर संक्रमण से पोषण की कमी हो सकती है, उनके व्यवहार में बदलाव आ सकता है और यहां तक कि मृत्यु दर भी बढ़ सकती है और उनकी आबादी कम हो सकती है।” 2024 में तिरुपुर जिले में टिक से बुरी तरह संक्रमित कई हेजहॉग पाए गए थे।
बेयर बैलीड हेजहॉग, या मद्रास हेजहॉग को आईयूसीएन की संकटग्रस्त प्रजातियों की लाल सूची में सबसे कम चिंताजनक प्रजाति के रूप में सूचीबद्ध किया गया है, इस तथ्य के बावजूद कि उनकी आबादी के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है। कुमार आबादी का अनुमान लगाने और प्रजातियों पर अधिक अध्ययन करने की वकालत करते हैं ताकि उनके लिए संरक्षण रणनीतियां तैयार की जा सकें। कुमार द्वारा तैयार की गई और 2021-2022 में तमिलनाडु के सभी जिला डीएफओ को भेजी गई एक विस्तृत संरक्षण योजना में, उन्होंने इस स्थानिक प्रजाति की सुरक्षा के लिए उठाए जाने वाले विभिन्न संरक्षण उपायों का उल्लेख किया है। रिपोर्ट कहती है” भारतीय वन्यजीव (संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2022 में हाल ही में किए गए संशोधन ने बेयर बैलीड हेजहॉग को अनुसूची IV से अनुसूची II में शामिल कर दिया है, जो इसके बढ़ते संरक्षण महत्व को दर्शाता है।”
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योजना में सूचीबद्ध कुछ संरक्षण रणनीतियों में आबादी का अनुमान लगाने और खतरों को समझने के मामले में बेहतर रिसर्च, फील्ड-आधारित अनुसंधान कार्य, मद्रास हेजहॉग अध्ययनों पर केंद्रित एक शोध केंद्र की स्थापना और एक हेजहॉग संरक्षण प्रजनन कार्यक्रम शामिल हैं। उन्होंने भारतीय वन्यजीव संरक्षण अधिनियम में मद्रास हेजहॉग को कृमिनाशक सूची से हटाने और प्रजातियों की सुरक्षा स्थिति को अपग्रेड करने की भी सिफारिश की है। योजना की अन्य सिफारिशों में तमिलनाडु के अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में एक संरक्षण रिजर्व और राज्य में एक छोटे स्तनपायी रिसर्च म्यूजियम की स्थापना, राष्ट्रीय हेजहॉग दिवस और हेजहॉग के संरक्षण के लिए एक राष्ट्रीय मिशन की घोषणा करना शामिल है।
शंकरनारायण इस प्रजाति के संरक्षण के लिए ठोस प्रयासों की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा, “बहुत से लोग हेजहॉग के बारे में नहीं जानते हैं। कुछ लोग तो उन्हें साही समझ लेते हैं।”
यह खबर मोंगाबे-इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 19 फरवरी 2025 प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: बेयर बैलीड हेजहॉग दक्षिण भारत के पांच राज्यों के शुष्क क्षेत्रों में ही पाया जाता है और तमिलनाडु में इसके सबसे ज्यादा देखे जाने की सूचना है। तस्वीर- अभिनीश मुथैयन।