- नक्सलवाद से मुक्ति के दावों के बीच बस्तर में सरकार ने हर आदिवासी परिवार को गाय या भैंस देकर डेयरी अर्थव्यवस्था विकसित करने की नई योजना की घोषणा की है।
- यह पहल 2003 में किए गए उस वादे की याद दिलाती है, जब हर आदिवासी परिवार को दुधारू गाय देने की बात कही गई थी। लेकिन उस समय महज 1.26 फीसदी परिवारों को ही गाय मिल पाई थी।
- बस्तर की सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक परिस्थितियां डेयरी मॉडल के लिए चुनौतीपूर्ण हैं। यहां अधिकांश आदिवासी दूध उत्पादन की बजाय पशुओं का उपयोग खेती और पारंपरिक जरूरतों के लिए करते हैं।
- बस्तर की आजीविका का आधार आज भी जंगल और लघु वनोपज हैं, जिनसे आदिवासी परिवारों को नियमित नकद आय मिलती है। ऐसे में डेयरी तभी सफल होगी, जब वह इस व्यवस्था की पूरक बने, उसका विकल्प नहीं।
मध्यभारत में नक्सली हिंसा के लिए चर्चित रहे बस्तर में गाय फिर लौटने वाली है।
मध्य क्षेत्रीय परिषद की 26वीं बैठक के बाद केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने घोषणा की कि बस्तर संभाग के हर आदिवासी परिवार को एक गाय या एक भैंस उपलब्ध कराई जाएगी। उन्होंने दावा किया कि अगले छः महीने में पूरे बस्तर में डेयरी नेटवर्क खड़ा किया जाएगा। गांवों में दूध संग्रहण केंद्र बनेंगे, सहकारी समितियां काम करेंगी और राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड इस पूरी व्यवस्था में सहयोग करेगा।
इससे पहले दिसंबर 2024 में भी गृहमंत्री ने नक्सल प्रभावित इलाकों के आदिवासी परिवारों को गाय या भैंस देने की बात कही थी। लेकिन ताज़ा दावे के बाद सरकार एक्शन मोड में होने का दावा कर रही है।
राज्य के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय का दावा है कि बस्तर में डेयरी मॉडल को तेजी से लागू किया जा रहा है। सरकार का दावा है कि इससे आदिवासी परिवारों की नियमित नकद आय बढ़ेगी और बस्तर में विकास का नया दौर शुरू होगा।
यह घोषणा नई जरूर है। लेकिन इसका विचार नया नहीं है। करीब 22 साल पहले भी लगभग यही सपना दिखाया गया था।
वह 2003 का साल था। छत्तीसगढ़ को राज्य बने अभी तीन साल हुए थे। पहली बार विधानसभा चुनाव हो रहे थे। नया राज्य था, नई उम्मीदें थीं और हर राजनीतिक दल अपने-अपने विकास मॉडल के साथ जनता के सामने था। भारतीय जनता पार्टी ने अपने घोषणा-पत्र में एक ऐसा वादा किया, जिसने खासकर आदिवासी इलाकों का ध्यान खींचा। पार्टी ने कहा कि आदिवासी परिवारों की आय बढ़ाने और दूध उत्पादन को प्रोत्साहन देने के लिए हर आदिवासी परिवार को मुफ्त में एक दुधारू गाय दी जाएगी।

करीब 31 फीसदी आदिवासी आबादी वाले छत्तीसगढ़ में भाजपा की डॉ. रमन सिंह की सरकार बनने के बाद इस योजना पर काम शुरू हुआ। सरकारी बैठकों और भाषणों में इसे आदिवासी परिवारों की आर्थिक आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ा कदम बताया गया। तर्क सीधा था। अगर परिवार के पास दुधारू पशु होगा, तो वह रोज़ दूध बेच सकेगा। दूध से नकद आमदनी होगी। खेती को सहारा मिलेगा। गांव की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी।
सुनने में यह तर्क सहज लगता था। लेकिन बात बनी नहीं।
महज सवा फीसदी को मिली गाय
2001 की जनगणना के अनुसार राज्य की कुल जनसंख्या 2.08 करोड़ में, आदिवासियों की जनसंख्या 66.16 लाख यानी कुल आबादी का लगभग 31.76 फीसदी थी। इनमें कुल आदिवासी परिवारों की संख्या 12.65 लाख थी। यानी राज्य सरकार को 12 लाख से अधिक गाय बांटनी थी। सरकारी रिकॉर्ड बताते हैं कि योजना शुरू तो हुई, लेकिन कुल 15,994 परिवारों को ही गाय मिल सकी।
अगर इसकी तुलना 2001 की जनगणना में दर्ज 12.65 लाख आदिवासी परिवारों से करें, तो यह संख्या करीब 1.26 प्रतिशत बैठती है। फिर इस योजना को बंद कर दिया गया। बाद में सरकार ने बैल और सांड वितरण जैसी योजनाओं पर जोर दिया, लेकिन ये योजनाएं भी धीरे-धीरे बंद हो गईं। उस समय विपक्ष ने आरोप लगाया था कि कई जगहों पर लाभार्थियों के चयन में गड़बड़ियां हुईं। कुछ स्थानों पर बीमार या कमजोर पशु बांटे गए। कुछ परिवारों तक पशु पहुंचे ही नहीं।
कई सालों तक छत्तीसगढ़ में कृषि मंत्री रहे चंद्रशेखर साहु, मोंगाबे हिंदी से अपने कार्यकाल की याद करते हुए कहते हैं, “उस समय कई परेशानियां आईं। कई इलाकों में तो आदिवासियों ने ही गाय लेने से मना कर दिया क्योंकि आदिवासियों में गाय पालने की परंपरा ही नहीं रही है। ऐसे में हमारे सामने इस योजना को बंद करने के अलावा कोई चारा नहीं था। आदिवासी आज भी छोटे पशु जैसे बकरी, सुअर पालना पसंद करता है। अगर उस समय गाय बंट गई होती तो बस्तर में आज डेयरी उद्योग के तौर पर खड़ा रहता। ”
लेकिन सबसे बड़ा सवाल था कि क्या केवल गाय बांट देने से डेयरी अर्थव्यवस्था खड़ी हो जाती है? यही वह सवाल है, जो 2003 को 2026 से जोड़ता है। लेकिन इस बार सरकार सिर्फ गाय और भैंस देने की बात नहीं कर रही। इस बार वह पूरी डेयरी व्यवस्था बनाने की बात कर रही है।
गाय का दूध बछड़े के लिए
असल में बस्तर के आदिवासियों में दूध पीने की परंपरा का सर्वथा अभाव रहा है। बड़ी संख्या में आदिवासी यह मानते रहे हैं कि गाय या भैंस का दूध, उसके बछड़े के लिए होता है।
सर डब्ल्यू व्ही ग्रिग्सन 1938 में प्रकाशित अपनी किताब ‘द माड़िया गोंड ऑफ बस्तर‘ में लिखते हैं कि आदिवासियों के पास गाय और भैंसें थीं, लेकिन वे उनका उपयोग केवल कृषि के लिए करते थे, दूध के लिए नहीं। हालाँकि, 1930 के दशक में, बाहरी लोगों और रावत जाति के संपर्क में आने के बाद कुछ माड़िया परिवारों ने गायों को दुहना और दूध पीना शुरू किया था। इसी तरह वेरियर एल्विन ‘द मुरिया एंड देयर घोटुल’ में लिखते हैं कि मुरिया आदिवासी दूध पसंद नहीं करते। खुद भी नहीं पीते और बच्चों को भी नहीं पिलाते।

छत्तीसगढ़ में सर्व आदिवासी समाज के अध्यक्ष शिशुपाल सोरी मानते हैं कि आदिवासियों में दूध के लिए गाय-भैंस पालने की परंपरा नहीं रही है। लेकिन अगर सरकार पहल कर रही है तो इसका स्वागत किया जाना चाहिए। बस्तर के रहने वाले सोरी ने कहा, “इस बात की गारंटी तो नहीं ली जा सकती कि सरकार की यह योजना सफल होगी। लेकिन अगर दूध की बिक्री के लिए स्थानीय स्तर पर अधोसंरचना का निर्माण किया जाए तो संभव है, पुरानी परंपरा को छोड़ कर आदिवासी गाय-भैंस पालने और दूध की बिक्री के क्षेत्र में आ सकते हैं।”
हालाँकि 20वीं पशुधन गणना के आंकड़े बताते हैं कि बस्तर संभाग के जिलों में दूध देने वाले पशुओं विशेषकर भैंसों और उन्नत नस्ल की गायों की संख्या राज्य के अन्य विकसित जिलों की तुलना में बेहद कम है।
बस्तर क्षेत्र में व्यावसायिक डेयरी की कमी को भैंसों के आंकड़ों से सबसे सटीक रूप से समझा जा सकता है, क्योंकि डेयरी व्यवसाय मुख्य रूप से भैंस के दूध पर निर्भर करता है। बस्तर क्षेत्र के सात जिलों कोंडागांव (2,107), सुकमा (3,090), नारायणपुर (1,726), बीजापुर (2,022), दंतेवाड़ा (1,656), बस्तर (2,339) और कांकेर (1,764) को मिलाकर केवल 14,704 दुधारू भैंसें हैं। इन सभी जिलों की कुल दुधारू भैंसों की संख्या अकेले रायपुर (18,130) या अकेले दुर्ग (15,588) जिले से बेहद कम है।
उन्नत या संकर नस्ल की गाएं अधिक दूध उत्पादन के लिए जानी जाती हैं, लेकिन बस्तर के आदिवासी क्षेत्रों में इनकी संख्या नगण्य है। पूरे सुकमा ज़िले में विदेशी नस्ल की दूध देने वाली महज 23 गाय हैं। इसी तरह बीजापुर ज़िले में ऐसे गायों की संख्या 68, नारायणपुर में 140 और दंतेवाड़ा ज़िले में 152 है।
बस्तर के किसान आज भी पारंपरिक रूप से केवल देशी गायों को पाल रहे हैं, जिनका उपयोग दूध उत्पादन से अधिक कृषि कार्यों और खाद के लिए किया जाता है। सुकमा (37,992) और बस्तर (26,787) जैसे जिलों में दूध देने वाली देशी गायों की संख्या तो ठीक-ठाक है, लेकिन इनकी दूध देने की क्षमता बेहद कम होती है।
बस्तर के इलाके में डेयरी और दूध उत्पादन की स्थिति का अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि बस्तर के सात में से तीन ज़िले नारायणपुर, सुकमा और बीजापुर में 2014 तक एक भी व्यावसायिक डेयरी नहीं थी।
लेकिन सरकार अब इस दृश्य को बदलना चाहती है।
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय कहते हैं, “डेयरी उद्योग के विकास से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई गति मिलेगी और युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर सृजित होंगे। इसके साथ ही, प्रदेशवासियों के पोषण स्तर में भी सुधार होगा, जिससे बच्चों और महिलाओं के स्वास्थ्य में सकारात्मक बदलाव आएगा।”
लेकिन लाख टके का सवाल है कि क्या बस्तर डेयरी अर्थव्यवस्था के लिए तैयार है?

अर्थव्यवस्था का आधार है वनोपज
भारत सरकार के आंकड़े बताते हैं कि छत्तीसगढ़ और बस्तर के आदिवासियों की पूरी अर्थव्यवस्था वनोपज पर केंद्रित रही है। बस्तर के किसी भी गांव में जाएं, साल के आठ महीने उनकी आजीविका जंगल पर निर्भर रहती है। इसके अलावा बचे हुए समय में खेती होती है। इसमें गाय भी है, बैल भी हैं और भैंस भी। लेकिन गांव की सुबह दूध बेचने से नहीं, जंगल की ओर जाने से शुरू होती है। महुआ, तेंदूपत्ता, इमली, साल बीज, हर्रा, बहेरा, चिरौंजी और कई दूसरी वनोपज साल भर अलग-अलग मौसम में नकद आमदनी देती हैं। कई परिवारों के लिए यही वह पैसा होता है जिससे बच्चों की पढ़ाई, इलाज, कपड़े और दूसरी ज़रूरतें पूरी होती हैं।
छत्तीसगढ़ में लघु लाखों आदिवासी परिवारों की नकद अर्थव्यवस्था का आधार है और साल भर की नकद आमदनी वाली ‘जंगल-आधारित मिश्रित आजीविका’ अपना एक कैलेंडर है। उस कैलेंडर को सरकार ने नहीं, जंगल ने बनाया है। सरकार अब इस कैलेंडर में एक नई चीज़ जोड़ना चाहती है – दूध। यहीं डेयरी मॉडल की पहली परीक्षा होनी है क्योंकि डेयरी भी नियमित नकद आय का वादा करती है। लेकिन उसका तरीका अलग है। जंगल मौसम के हिसाब से आय देता है। डेयरी हर दिन आय देने का दावा करती है। लेकिन इस बात को याद रखने की ज़रुरत है कि गुजरात या कर्नाटक के कई इलाकों में डेयरी दशकों में विकसित हुई। वहां पहले सहकारी संस्थाएं बनीं, फिर दूध संग्रहण का नेटवर्क तैयार हुआ, उसके बाद उत्पादन बढ़ा। बस्तर में सरकार लगभग उल्टी दिशा से शुरुआत कर रही है। पहले पशुधन और साथ-साथ संस्थागत ढांचा खड़ा करने की कोशिश की जा रही है।

कृषि वैज्ञानिक संकेत ठाकुर कहते हैं, “डेयरी केवल एक पशु खरीद लेने का नाम नहीं है। डेयरी का मतलब है कि हर सुबह दूध निकले। उसे समय पर संग्रहण केंद्र तक पहुंचाया जाए। वहां से वह प्रसंस्करण केंद्र पहुंचे। भुगतान नियमित मिले। पशु बीमार पड़े तो डॉक्टर उपलब्ध हो। चारा खत्म हो तो व्यवस्था हो। बिजली हो। सड़क हो। परिवहन हो। यानी डेयरी की सफलता गाय से कम और व्यवस्था से ज्यादा तय होती है।”
यही कारण है कि 2003 और 2026 के बीच सबसे बड़ा अंतर गाय या भैंस नहीं, बल्कि संस्थागत ढांचा है।
एक बड़ा मुद्दा चारे का भी है। एक दुधारू पशु को रोज़ पर्याप्त हरा और सूखा चारा चाहिए। पानी चाहिए। अगर पशु की नस्ल अधिक दूध देने वाली है, तो उसकी पोषण संबंधी ज़रूरतें भी बढ़ जाती हैं। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद और पशुपालन एवं डेयरी विभाग की कई रिपोर्टें बताती हैं कि देश में पहले से ही हरे और सूखे चारे की कमी एक बड़ी चुनौती है।
बस्तर में यह सवाल और बड़ा हो जाता है क्योंकि यहां खेती का बड़ा हिस्सा वर्षा पर निर्भर है। किसान खरीफ की फसल के बाद लंबे समय तक खाली खेत छोड़ देते हैं। सिंचाई का दायरा अभी भी सीमित है। एक रास्ता यह हो सकता है कि किसान चारे की खेती करें। दूसरा रास्ता जंगल की चराई है। तीसरा रास्ता बाहर से चारा खरीदना है। लेकिन इन तीनों रास्तों की अपनी-अपनी लागत है।
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डेयरी उद्योग के जानकार रायपुर के अक्षय साहु कहते हैं, “इस योजना का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि कितनी गायें या भैंसें बांटी जाएंगी। असली सवाल यह है कि क्या डेयरी बस्तर की पहले से मौजूद अर्थव्यवस्था का पूरक बनेगी या उसका विकल्प? अगर वह जंगल आधारित आय के साथ जुड़ती है, तो संभव है कि परिवारों के लिए आय का एक नया स्रोत बने। लेकिन अगर इसे यह मानकर बनाया गया है कि जंगल की जगह अब डेयरी ले लेगी, तो यह मान लेना बस्तर की सामाजिक और आर्थिक वास्तविकताओं को बहुत सरल बना देना होगा।”
लेकिन कई विशेषज्ञों का कहना है कि इस पूरी बहस को गाय बनाम जंगल की बहस बनाना भी गलत होगा। असल सवाल दोनों के बीच संतुलन का है।
सरकार कहती है कि डेयरी आय का नया स्रोत बनेगी। आलोचकों का कहना है कि पहले बुनियादी ढांचा मजबूत होना चाहिए। इन दोनों के बीच फैसला अभी नहीं हुआ है। वह अगले कुछ वर्षों में होगा। जब पहली गाय किसी गांव में पहुंचेगी। जब पहला दूध संग्रहण केंद्र खुलेगा। जब पहली बार किसी परिवार के खाते में दूध बेचने के पैसे आएंगे। तभी पता चलेगा कि बस्तर में इस बार केवल गाय लौटी है या सचमुच एक नई डेयरी अर्थव्यवस्था भी बन रही है।
बैनर तस्वीरः एक डेयरीकर्मी गाय का दूध निकालते हुए। नियमित दूध उत्पादन के लिए पर्याप्त चारा, पानी, पशु स्वास्थ्य सेवाएं और संग्रहण केंद्रों तक पहुंच आवश्यक होती है। तस्वीर- आलोक प्रकाश पुतुल