- केरल की नेल्लियामपथी पहाड़ियों में सड़क हादसों में मारे गए जानवरों के एक सर्वे में कम से कम 72 प्रजातियों के 330 जानवरों के मरने के मामले दर्ज किए गए हैं।
- इनमें सरीसृप और उभयचरों की संख्या सबसे अधिक थी। सड़क के नीचे छोटे पाइप वाले रास्ते या पुलिया बनाने या सड़क के किनारे बाड़ लगाने से इन छोटे जीवों को काफी हद तक बचाया जा सकता है।
- विशेषज्ञों का कहना है कि सही जगह पर क्रॉसिंग बनाने के लिए जीवों के व्यवहार को समझना भी जरूरी है।
जब कोई जानवर या जीव सड़क पार करता है, तो वे कौन सी बातें हैं जिनसे तय होता है कि वह किस रास्ते से जाएगा और उसकी जान बचेगी या नहीं?
मैसूर यूनिवर्सिटी, ज़ू आउटरीच ऑर्गनाइजेशन और सलीम अली पक्षीविज्ञान एवं प्राकृतिक इतिहास केंद्र (SACON) के शोधकर्ताओं ने पश्चिमी घाट से गुजरने वाली सड़क पर पूरे एक साल तक निगरानी रखी, ताकि यह समझा जा सके कि सड़क दुर्घटनाओं में जानवरों की सबसे अधिक मौत किस जगह पर होती है और उसके पीछे क्या कारण हैं। इस अध्ययन के प्रमुख लेखक एस. सुशांत ने बताया, “ज्यादातर अध्ययनों का ध्यान सिर्फ इस बात पर रहता है कि दुर्घटना में कुल कितने जानवर मारे गए हैं। रिसर्च के दौरान मुझे एहसास हुआ कि सड़क हादसों में होने वाली मौतों के पीछे छिपे कारणों के बारे में काफी कम जानकारी है। इसलिए हमने अपने अध्ययन में उन पहलुओं को भी शामिल किया।”
इस अध्ययन में पाया गया कि स्थानिक या मौसमी बदलावों की बजाए बागान, जल स्रोत, भूभाग और झाड़ियों जैसे पर्यावरणीय कारक सड़क दुर्घटनाओं को अधिक प्रभावित करते हैं।
पश्चिमी घाट बदलते भूदृश्यों के वन्यजीवों पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन करने के लिए एक आदर्श जगह है। भले ही ये देश के कुल क्षेत्रफल का सिर्फ 6% हिस्सा है, लेकिन गुजरात से लेकर तमिलनाडु तक फैले पश्चिमी घाटों में देश की 30% वनस्पति, मछलियां, सरीसृप, उभयचर, पक्षी और स्तनधारी प्रजातियां पाई जाती हैं। इनमें से 325 प्रजातियां ऐसी हैं, जिन पर पूरी दुनिया में विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है। जंगलों की कटाई, शहरीकरण, और सड़कों व रेल मार्गों के फैलते जाल के कारण इन प्रजातियों का संरक्षण और सुरक्षा, अब एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।

जहां एक तरफ सड़कें और रेल मार्ग (जिन्हें लीनियर इंफ्रास्ट्रक्चर के रूप में जाना जाता है) वन आवासों को नुकसान पहुंचाते हैं, वहीं भूमि उपयोग में बदलाव (जैसे जंगल को खेती या बागानों में बदलना) भी प्राकृतिक आवासों का स्वरूप बदल रहा है। इससे वन्यजीव इंसानी गतिविधियों के करीब आ जाते हैं और उनकी मौत का खतरा बढ़ जाता है।
लेकिन सभी जीवों पर इसका असर एक जैसा नहीं होता। मैसूर यूनिवर्सिटी के इस अध्ययन में, केरल की नेल्लियामपथी पहाड़ियों से होकर गुजरने वाली 50 किलोमीटर लंबी सड़क पर हुई दुर्घटनाओं का विश्लेषण किया गया। इसमें पाया गया कि वाहनों की टक्कर से सबसे ज्यादा मौतें सरीसृपों और उभयचरों की हुईं, इसके बाद स्तनधारी जीव और फिर पक्षियों का नंबर आता है। उनकी कुल आबादी के हिसाब से देखें, तो दुर्लभ और संकटग्रस्त प्रजातियों के लिए इस तरह का नुकसान बहुत विनाशकारी साबित हो सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि जानवरों के व्यवहार को समझना इस प्रकार की दुर्घटनाओं को कम करने में मददगार साबित हो सकता है।
सड़क दुर्घटनाओं के पैटर्न
पश्चिमी घाट में सड़कें और अन्य रेखीय बुनियादी ढांचे न सिर्फ कानूनी संरक्षण उपायों के असर को कम कर सकते हैं, बल्कि अपने साथ कई तरह के खतरे भी लेकर आते हैं। आक्रामक प्रजातियों का फैलना इसका एक बड़ा उदाहरण है।
हालांकि, इसका सबसे सीधा और बड़ा खतरा वाहनों से होने वाली टक्कर है। मैसूर यूनिवर्सिटी के अध्ययन में पराम्बिकुलम टाइगर रिजर्व के पास ‘नेम्मारा-नेल्लियम्पथी मुख्य मार्ग’ के एक हिस्से पर कम से कम 72 प्रजातियों के 330 जानवरों के मरने के मामले दर्ज किए गए। अलग-अलग मौसम के हिसाब से सटीक आंकड़े जुटाने के लिए, जून 2023 से मई 2024 के बीच इस सड़क के उसी हिस्से का 22 बार सर्वे किया गया।
सड़क दुर्घटनाओं में मारे गए जीवों में सबसे अधिक संख्या सरीसृपों (228) की थी। इसमें सबसे ज्यादा नुकसान अनामलाई पिट वाइपर, बेडडोम कीलबैक, नेल्लियमपथी शील्डटेल जैसी सांपों की प्रजातियों और इंडियन गार्डन लिजर्ड को हुआ। अध्ययन में लिखा गया, “सरीसृपों का सड़कों के आसपास अधिक समय बिताना, शरीर का तापमान नियंत्रित करने के लिए सड़कों पर धूप सेंकना, धीमी गति से चलना और उनके खान-पान का व्यवहार उन्हें सबसे ज्यादा असुरक्षित बनाता है। इसके अलावा, सांप और अन्य सरिसृप लोगों में डर भी पैदा करते हैं, जिसकी वजह से कई बार सड़कों पर उन्हें जानबूझकर मार दिया जाता है।”

सड़क हादसों में मारे गए अधिकांश जीव आईसीयूएन की ‘कम चिंताजनक’ सूची में शामिल थे, लेकिन इनमें 22 प्रजातियां ऐसी थीं जो केवल पश्चिमी घाट में ही पाई जाती हैं। इसके अलावा, पांच विशेष प्रजातियों को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की अनुसूची-I के तहत वर्गीकृत किया गया था (ये वे लुप्तप्राय प्रजातियां होती हैं जिन्हें कानून के तहत उच्चतम स्तर का संरक्षण प्राप्त होता है)। इनमें चेकर्ड कीलबैक स्नेक, रैट स्नेक, सदर्न हिल मैना, बोनट मैकाक और तेंदुआ शामिल थे।
सुशांत ने कहा, “हमें इस बात की उम्मीद नहीं थी कि सड़क दुर्घटनाओं पर आस-पास के कॉफी के बागानों का इतना बड़ा और गहरा असर होगा।” अध्ययन किए गए चारों श्रेणियों के जीवों (taxa) के मामले में, उन सड़कों पर सबसे ज्यादा जानवर मरे हुए पाए गए जिनके दोनों तरफ कॉफी के बागान थे। सर्वे की गई सड़क के सिर्फ 37.6% हिस्से में ही कॉफी के बागान थे, फिर भी यहां प्राकृतिक वर्षावनों, चाय और रबर के बागानों के मुकाबले कहीं ज्यादा मौते हुईं थीं। पिछले कुछ दशकों में पश्चिमी घाट में कॉफी के बागान बहुत तेजी से बढ़े हैं। एक अध्ययन के अनुमान के मुताबिक, इस क्षेत्र के 25% संरक्षित वन क्षेत्र में अब ये बागान फैल चुके हैं।”
केरल फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिक पी. बालकृष्णन, जो इस अध्ययन का हिस्सा नहीं थे, ने बताया, “पश्चिमी घाट में फैले अधिकांश कॉफी बागान असल में पहले जंगल ही थे, इसलिए वहां की प्राकृतिक स्थितियां आज भी जंगलों जैसी ही हैं। कई अध्ययनों से पता चला है कि इन बागानों में स्तनधारियों, रेंगने वाले जीवों और उभयचरों की विविधता लगभग उतनी ही है जितनी असली जंगलों में होती है। शायद इसी वजह से इन इलाकों में ये जीव इतनी भारी संख्या में पाए जाते हैं।”
अगर इन आंकड़ों के आधार पर पूरे साल का अनुमान लगाया जाए, तो सिर्फ इस 50 किलोमीटर लंबी सड़क पर ही हर साल लगभग 5,490 जानवर सड़क दुर्घटना में मारे जाते हैं। अध्ययन के मुताबिक, “सड़कें मानवीय प्रगति के लिए बहुत जरूरी हैं, लेकिन उन्हें इस तरह से बनाया और प्रबंधित किया जाना चाहिए कि वे प्राकृतिक परिवेश के साथ तालमेल बिठा सकें। इसके अलावा बुनियादी ढांचे की योजना बनाते समय अगर वन्यजीव संरक्षण विज्ञान को भी शामिल किया जाए, तो जानवरों की मौतों को कम किया जा सकता है और उनकी संकटग्रस्त आबादी को बचाने में मदद मिल सकती है।”
सड़कों का सफर और मौतें
नेल्लियम्पथी पहाड़ियों में वाहनों की टक्करों में सरीसृपों और उभयचरों की सबसे अधिक मौतें होना कोई हैरानी की बात नहीं है। पश्चिमी घाट और अन्य भूभागों में किए गए कई अध्ययनों में भी इसी तरह के निष्कर्ष सामने आए हैं। जैन यूनिवर्सिटी की असिस्टेंट प्रोफेसर और पर्यावरण विशेषज्ञ देयातिमा घोष आंध्र प्रदेश के पापीकोंडा नेशनल पार्क में सरीसृप और उभयचरों की कुछ प्रजातियों के सड़क यातायात के प्रति अधिक संवेदनशील होने के कारणों का अध्ययन कर रही हैं।
घोष ने बताया, “जब हम जानवरों के प्राकृतिक आवासों को बदलते हैं, तो उनके व्यवहार में भी बदलाव आता है। आप कॉमन इंडियन टोड का उदाहरण ले सकते हैं। उसका शरीर थोड़ा भारी और गठीला होता है और वह ज्यादा उछल-कूद नहीं करता। जब वह किसी गाड़ी को अपनी ओर आते देखता है, तो डरकर वहीं स्थिर हो जाता है और मरने का नाटक करने लगता है। शिकारियों से बचने के लिए उसका प्राकृतिक तरीका यही है। हालांकि, दूसरे मेंढक या उभयचर जीव इस स्थिति में शायद ऐसा व्यवहार न करें।”
नेल्लियमपथी की पहाड़ियों में उभयचरों में सबसे अधिक मौते ‘बाइकलर्ड फ्रॉग’ (दो रंगों वाले मेंढक) की हुईं और उसके बाद कॉमन इंडियन टोड सबसे ज्यादा मारे गए। इसकी तुलना में, ‘लीपिंग फ्रॉग’ और ‘स्पिनुलर नाइट फ्रॉग’ जैसी प्रजातियों के मारे जाने की संख्या काफी कम रही।

कर्नाटका के उत्तर कन्नड़ा जिले में पश्चिमी घाट की एक यात्रा के दौरान घोष ने एक किंग कोबरा को हाईवे पार करते हुए देखा। उन्होंने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया, “उस सांप को सड़क पार करने में 3 से 4 मिनट का समय लगा, लेकिन जैसे ही उसने सड़क के दूसरी तरफ अपने प्राकृतिक आवास को छुआ, वह महज 2 सेकंड में आंखों से ओझल हो गया। यह घटना इस ओर इशारा करती है कि जब ये जीव सड़क पर होते हैं, तो उनकी गतिविधि करने की क्षमता कम हो जाती है। यही कारण है कि वे सड़क पर और भी अधिक असुरक्षित हो जाते हैं और गाड़ियों की चपेट में आ जाते हैं।”
दुर्घटनाओं को कम करने के उद्देश्य से बनाए गए ज्यादातर इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट बाघों और हाथियों जैसे बड़े स्तनधारियों को ध्यान में रखकर बनाए जाते हैं। मेंढक और सांप जैसे छोटे जीवों पर बहुत कम गौर किया जाता है। सड़क के नीचे छोटे पाइप वाले रास्ते या पुलिया बनाना या सड़क के किनारे बाड़ लगाना, इन छोटे जीवों को बचाने में काफी हद तक मददगार हो सकता है।
घोष ने कहा, “बाड़ लगाना शायद कॉमन इंडियन टोड को सड़क पर आने से रोककर उसकी जान बचा ले, लेकिन ‘बुल फ्रॉग’ के लिए यह काम नहीं करेगा, क्योंकि वह खोजी स्वभाव का होता है और बाड़ के ऊपर चढ़ने की कोशिश करेगा।” उन्होंने आगे समझाया, “बचाव के तरीके जानवरों के व्यवहार के हिसाब से होने चाहिए। एक ही फॉर्मूला हर जीव पर लागू नहीं किया जा सकता है।”
बचाव के उपाय
भारतीय वन्यजीव संस्थान के वैज्ञानिक बिलाल हबीब के अनुसार, “सिर्फ सड़क दुर्घटनाओं के प्रमुख क्षेत्रों की पहचान करना काफी नहीं है। बचाव की एक सफल योजना बनाने के लिए जीवों के व्यवहार के साथ-साथ सड़क का डिजाइन, आसपास का वातावरण, उसकी विशेषता और भूमि उपयोग पर भी ध्यान देना जरूरी है।”
उन्होंने बताया, “सड़क पर मरने वाले जीवों की संख्या बताती है कि उस इलाके में उनकी आबादी कितनी घनी है। अगर किसी खास प्रजाति के बहुत सारे जीव मर रहे हैं, तो उस प्रजाति की मृत्यु के पारिस्थितिक प्रभाव का आकलन उस क्षेत्र में उनकी संख्या के आधार पर किया जाना चाहिए।” हबीब ने आगे कहा, “हमें बहुत सावधानी और समझदारी से यह तय करना होगा कि बड़े पैमाने पर रोकथाम के लिए बुनियादी ढांचे (जैसे अंडरपास या ओवरपास) कहां और किन प्रजातियों के लिए बनाने हैं, क्योंकि ये रास्ते अगले 100 सालों तक के लिए होते हैं। जीव सड़क पार करने के लिए आखिर किसी खास जगह को ही क्यों चुनते हैं, यह समझने के लिए एक व्यापक स्थलाकृतिक सर्वे (टोपोग्राफिकल सर्वे) भी किया जाना चाहिए।”

पिछले एक दशक में, भारत ने संरक्षित क्षेत्रों के आसपास वन्यजीव गलियारों को बढ़ाने के साथ-साथ जानवरों की सुरक्षित आवाजाही और दुर्घटनाओं से बचने के लिए राजमार्गों पर अंडरपास और ओवरपास बनाने का प्रयोग किया है। पेंच टाइगर रिजर्व में 2014 में NH44 पर बनाए गए एक अंडरपास का 2020 तक, 18 बड़ी स्तनधारी प्रजातियों ने 5400 बार इस्तेमाल किया था।
डब्ल्यूडब्ल्यूएफ इंडिया में सस्टेनेबल इंफ्रास्ट्रक्चर के प्रमुख प्रमोद न्यौपाने ने कहा, “जब कोई जंगली जानवर इन खास रास्तों (अंडरपास या ब्रिज) का इस्तेमाल करके सुरक्षित बाहर निकलता है, तो इसका मतलब है कि सड़क पर होने वाली एक संभावित दुर्घटना टल गई। अब सरकार और संबंधित अधिकारी इस मामले में पहले से ज्यादा जागरूक हो गए हैं। देश की बड़ी सड़क परियोजनाओं में अब जानवरों की सुरक्षा के इंतजाम साफ दिखाई देते हैं। आज के हालात 10 साल पहले के मुकाबले काफी बेहतर हैं।”
पेंच में शुरू हुए पहले बड़े प्रोजेक्ट के बाद से असम, महाराष्ट्र और दिल्ली सहित पूरे देश के राजमार्गों पर भी ऐसी क्रॉसिंग संरचनाएं (जानवरों के लिए पुल या रास्ते) डिज़ाइन की गई हैं। भविष्य में टकराव की संभावना वाले क्षेत्रों से बचना इन संरचनाओं के लंबे समय तक बने रहने के लिए जरूरी है।
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जैसे-जैसे सड़कों का जाल फैलता जाएगा, पहले से ही खंडित हो चुके प्राकृतिक आवासों पर उनका दबाव और बढ़ेगा। साल 2014 से 2025 के बीच भारत के राष्ट्रीय राजमार्गों में 60% की वृद्धि हुई है यानी इनकी लंबाई 91,287 किमी से बढ़कर 1,46,204 किमी हो गई हैं। यह देश में हर दिन लगभग 35 किलोमीटर लंबा हाईवे बनाने के बराबर है। हबीब कहते हैं, “जब पुरानी सड़कों को बेहतर बनाया जाता है, तो हमारे पास उनके डिजाइन में एक व्यापक बचाव योजना को जोड़ने का मौका होता है। चुनौती उन सड़कों के साथ है जिन्हें बेहतर नहीं बनाया जा सकता है, वहां अलग से सुरक्षा ढांचे बनाना मुश्किल है और जानवरों पर हमेशा खतरा बना रहता है।”
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 2 सितंबर 2025 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: सड़क दुर्घटना में सबसे ज्यादा मौतें इंडियन गार्डन लिज़र्ड की हुईं हैं। तस्वीर- जे.एम. गर्ग, विकिमीडिया कॉमन्स (CC BY 3.0)