- गोवा में इस यूरेशियन ऊदबिलाव के दिखने के बाद इस राज्य में भारत में पाए जाने वाली ऊदबिलावों की तीनों प्रजातियों की पुष्टि हुई है।
- यह ऊदबिलाव एक सड़क के किनारे घायल अवस्था में मिला था और बाद में इसकी मौत हो गई।
- इस प्रजाति पर काम करने वाले विशषज्ञों का मानना है कि इसकी मौजूदगी की पुष्टि करने में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए।
अक्सर अपने शर्मीले और छिपकर रहने वाले स्वभाव के लिए पहचाने जाने वाला यूरेशियन ऊदबिलाव या यूरेशियन ऑटर के गोवा में होने की पहली बार पुष्टि हुई है। इस घटना के बाद भारत में पाई जाने वाली तीनों ऊदबिलाव की प्रजातियां के गोवा में पाए जाने की उम्मीद जगी है।
यूरेशियन ऊदबिलाव की मौजूदगी पिछले साल की शुरुआत में, फरवरी में दर्ज की गई थी और 28 अगस्त को जर्नल ऑफ़ थ्रेटन्ड टैक्सा में छपे एक आर्टिकल ने इस मौजूदगी पर मुहर लगा दी। हालांकि, चिकने कोट वाले ऊदबिलाव (स्मूद कोटेड ऑटर) और छोटे पंजे वाले ऊदबिलाव (स्मॉल क्लॉड ऑटर) दोनों गोवा में पाए जाते हैं, लेकिन यूरेशियन ऊदबिलाव को पहले रिकॉर्ड नहीं किया गया था। गोवा में रहने वाले एक वाइल्डलाइफ़ रेस्क्यूअर, चरण देसाई, जिन्होंने इस ऊदबिलाव को देखा, ने कहा, “जब हमने इस ऊदबिलाव को बचाया, तो पहले हमने सोचा कि यह स्मूद कोटेड ऑटर है, लेकिन बाद में हमने देखा कि यह दिखने में कुछ अलग था।” यूरेशियन ऊदबिलाव को “W” आकार के राइनेरियम (उसकी नाक के चारों ओर बिना बालों वाली स्किन) से पहचाना जा सकता है।
यह ऊदबिलाव गोवा के धारबंदोडा इलाके में भगवान महावीर वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी के किनारे एक सड़क पर घायल हालत में मिला था। यह इलाका मिश्रित वन (सेमी-एवरग्रीन जंगल) के कुछ भूभागों, खेती की ज़मीन और बंद हो चुकी पत्थर की खदानों से घिरा हुआ है। इस इलाके में मौसमी नदियां और छोटी नदियां रागाडा नदी और जुआरी नदी बेसिन से जुड़ी हुई हैं। गोवा में काम करने वाली संस्था ‘वाइल्ड ऑटर्स’ की सह संस्थापक और चीफ़ इकोलॉजिस्ट कैटरीना फ़र्नांडीज़ ने बताया, “रहने की जगह के हिसाब से, यूरेशियन ऊदबिलाव को पथरीली जगहों वाली नदियां और घने पेड़-पौधों वाले किनारे पसंद हैं। यह छोटे पंजों वाले ऊदबिलाव जैसा ही है और इसलिए वे एक साथ रह सकते हैं।”
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दुख की बात है कि बचाए जाने के एक दिन बाद ही इस ऊदबिलाव की मौत हो गई, शायद यह उस सड़क पर किसी गाड़ी से टकराया होगा। ऊदबिलावों को अपने अस्तित्व के लिए कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, इनमें रहने की जगह में कमी, वेटलैंड का गायब होना, पानी का प्रदूषण, और यहाँ तक कि एक आम चीज़ – मछली – के लिए इंसानों के साथ लड़ाई शामिल है। वे एक खास प्रजाति हैं जिनकी मौजूदगी इकोसिस्टम की सेहत का संकेत है। देसाई ने कहा, “सीवेज लाइनों से निकलने वाला कचरा, खासकर होटलों से निकलने वाला कचरा, अक्सर सीधे नदियों में डाल दिया जाता है, जो ऊदबिलाव के लिए एक बड़ा खतरा है।”
यूरेशियन ऊदबिलाव भारत में पाई जाने वाली दूसरी दो प्रजातियों की तुलना में ज़्यादा छिपकर रहने वाला और अकेला होता है। इन कारणों से इसे पहचानना मुश्किल हो जाता है। यह आम तौर पर छोटे पंजों वाले ऊदबिलाव की तरह पश्चिमी और पूर्वी हिमालय में पाया जाता है। वहीं चिकने कोट वाले ऊदबिलाव की मौजूदगी पूरे देश में ज़्यादा है।
फर्नांडीज के अनुसार, गोवा में यूरेशियन ऊदबिलाव की मौजूदगी की घोषणा करने से पहले इस पर और शोध की जरूरत है। उन्होंने कहा, “मैं सावधान रहना पसंद करती हूँ क्योंकि ऊदबिलाव पालतू जानवरों के तौर पर बेचे जाते हैं, और यह पक्का करना जरूरी है कि वे वहाँ ज़्यादा संख्या में हैं और यह एक ऊदबिलाव किसी बाहरी वजह से यहाँ नहीं था।” उन्होंने आगे कहा, “सबसे पहले, कुछ और रिसर्च करना ज़रूरी है, पता लगाना है कि वे कहाँ मौजूद हैं, और फिर उस जानकारी का इस्तेमाल उन जगहों की बेहतर सुरक्षा के लिए करना है जहाँ वे हो सकते हैं।”
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 18 सितम्बर, 2025 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: मध्य भारत से यूरेशियन ऊदबिलाव (लुट्रा लुट्रा) की एक तस्वीर। तस्वीर – Aditya4wiki द्वारा विकिमीडिया कॉमन्स के माध्यम से [CC BY-SA 4.0]।