- हिमाचल प्रदेश की स्पीति घाटी के जिन स्टेपी इलाकों में चराई नहीं होती और जहां इंसानी दखल सबसे कम है, वहीं पक्षियों की संख्या सबसे तेजी से घटी है।
- यह जानकारी स्पीति घाटी में पिछले 20 वर्षों तक चले एक पक्षी सर्वेक्षण के बाद सामने आई है।
- यह संकेत देता है कि पक्षियों की गिरावट के पीछे केवल भूमि उपयोग में बदलाव नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन जैसे बड़े और व्यापक दबाव भी काम कर रहे हैं।
हिमाचल प्रदेश के लाहौल-स्पीति जिले के किब्बर गांव के 43-वर्षीय कालज़ांग गुरमेट पक्षियों के सर्वेक्षण के अपने काम के लिए निकल जाते हैं। जिन दिनों निगरानी का इलाका घर से दूर होता है, वे सुबह करीब पांच बजे निकल पड़ते हैं और खुले स्टेपी मैदानों (खुले, सूखे, घास-प्रधान इलाके, जहां पेड़ नहीं के बराबर होते हैं) और पथरीली ढलानों को पार करते हुए तीन से चार घंटे पैदल चलते हैं। इतनी जल्दी निकलना जरूरी होता है, क्योंकि जैसे-जैसे धूप तेज होती है, पक्षियों की गतिविधि कम होने लगती है और उन्हें देख पाना मुश्किल हो जाता है।
“सुबह का समय सबसे अच्छा रहता है,” वे कहते हैं।
कालज़ांग गुरमेट का जन्म किब्बर में हुआ। उन्होंने इतिहास की पढ़ाई की, कश्मीर से मास्टर डिग्री पूरी की और फिर गांव लौट आए। साल 2007 से वे नेचर कंज़र्वेशन फाउंडेशन (एनसीएफ) के साथ काम कर रहे हैं और वैज्ञानिकों को दुनिया के सबसे ऊँचे इलाकों में से एक में पक्षियों का दस्तावेजीकरण करने में मदद कर रहे हैं।
पिछले दो दशकों में गुरमेट ने डेटा जुटाने और फील्डवर्क में अहम भूमिका निभाई है। तानज़िन थिनले और अन्य स्थानीय फील्ड स्टाफ के साथ मिलकर उन्होंने हर साल गर्मी के मौसम में उन्हीं तय रास्तों पर चलकर पक्षियों की गिनती की है। ये ऐसे इलाके हैं जो 4,000 मीटर से ज्यादा की ऊंचाई पर बसे हैं और जहां साल में सिर्फ कुछ महीनों तक ही वनस्पति उग पाती है।
हर साल वही जगहें, वही तरीके और वही मेहनत, अब एक चिंताजनक कहानी सामने ला रही हैं।
गुरमेट और उनकी टीम के काम के निष्कर्ष इकोलॉजिकल एप्लिकेशंस में प्रकाशित एक अध्ययन में दर्ज हैं। एनसीएफ के शोधकर्ताओं के मुताबिक, अलग-अलग आवासों में पक्षियों की संख्या घटी है, लेकिन गिरावट के साफ़ आंकड़े सिर्फ उन स्टेपी इलाकों में दिखे जहां चराई नहीं होती और जहां इंसानी दखल सबसे कम है। यहां ‘बिना चराई वाले स्टेपी’ से मतलब ऊंचाई वाले ऐसे घास के मैदानों से है, जहां पशुओं को चरने नहीं दिया जाता और जहां वनस्पति लंबे समय तक लगभग बिना छेड़छाड़ के उगती रहती है।
साल 2002 से 2023 तक चले इस अध्ययन में स्पीति के अलग-अलग आवासों में पक्षियों की आबादी में आए बदलावों को दर्ज किया गया। ये बदलाव स्थानीय मानवीय गतिविधियों के साथ-साथ जलवायु से जुड़ी बड़ी ताकतों के असर को भी दिखाते हैं।

हालांकि, इस अध्ययन में दो दशकों तक पक्षियों की आबादी पर नजर रखी गई, लेकिन हर साल पूरे तौर पर सर्वे नहीं हो पाया। यह विश्लेषण 2002 से 2023 के बीच किए गए 14 वर्षों के सर्वे से मिले आंकड़ों पर आधारित है।
अध्ययन के मुख्य लेखक और एनसीएफ, मैसूरु से जुड़े शोधकर्ता सिद्धार्थ श्रीनिवासन कहते हैं, “हमने पाया कि पिछले दो दशकों में सबसे कम प्रभावित आवासों में भी पक्षियों की संख्या घटी है और उनकी प्रजातीय संरचना में बदलाव आया है।”
इस अध्ययन के सह-लेखक भी रहे गुरमेट के लिए, कभी आम दिखने वाली प्रजातियों की घटती संख्या सिर्फ आंकड़ों की बात नहीं है। यह उस भू-दृश्य और जीवनशैली के बदलने का संकेत है, जिसे वे अपनी आंखों के सामने बदलते देख रहे हैं। वे कहते हैं, “हम इन पक्षियों के साथ बड़े हुए हैं और उन्हें यूं धीरे-धीरे गायब होते देखना अपनी विरासत का एक हिस्सा खोने जैसा लगता है। मुझे उम्मीद है कि मेरे बच्चे भी वही स्पीति देख पाएंगे, जिसे मैंने जाना है।”
एक ही इलाके में चार तरह के आवास
इस अध्ययन में किब्बर गांव के आसपास लगभग 16 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैले चार तरह के आवासों में पक्षी समुदायों का अध्ययन किया गया। ये आवास हैं: खेती वाले खेत, चराई वाले घास के मैदान, चराई वाले स्टेपी मैदान और बिना चराई वाले स्टेपी मैदान। ये इलाके मिलकर ट्रांस-हिमालय की उस कृषि-पशुपालन व्यवस्था को दर्शाते हैं, जहां खेती, पशु चराई और वन्यजीव एक-दूसरे के बेहद करीब मौजूद रहते हैं।
इनमें खेती वाले खेत सबसे अधिक इस्तेमाल किए जाने वाले इलाके थे। वहीं दूसरी ओर, बिना चराई वाले स्टेपी मैदान इस क्रम का आखिरी सिरा था। यह एक ऐसा इलाका है, जिसे किब्बर समुदाय ने साल 1998 में चराई से मुक्त क्षेत्र के रूप में चिन्हित किया था। यह कदम समुदाय आधारित संरक्षण के तहत उठाया गया था, ताकि नीले भेड़ (ब्लू शीप) की संख्या बढ़ाई जा सके। यह भेड़ हिम तेंदुए का एक अहम शिकार है। समय के साथ यह इलाका ऐसा दुर्लभ स्थान बन गया, जहां दशकों तक भूमि उपयोग में कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ।
हर साल मई से सितंबर के बीच, जब पक्षियों का प्रजनन काल होता है, शोधकर्ता और स्थानीय फील्ड स्टाफ इन चारों आवासों में तय रास्तों पर चलते हुए सर्वे करते थे। दूरी-आधारित विधि का इस्तेमाल करते हुए वे पक्षियों की प्रजाति, संख्या और यह भी दर्ज करते थे कि पक्षी ट्रांसेक्ट लाइन से कितनी दूरी पर दिखे। प्रजनन में शामिल न होने वाली और बहुत कम दिखने वाली प्रजातियों को हटाने के बाद, विश्लेषण में 44 प्रजातियों के 17,000 से ज्यादा पक्षियों के आंकड़े शामिल किए गए।

ज़्यादा संख्या, लेकिन कम विशेषज्ञ प्रजातियाँ
नतीजों से पता चला कि अलग-अलग आवासों में पक्षी समुदायों की संरचना में साफ फर्क था।
खेती वाले खेतों में पक्षियों की संख्या सबसे ज़्यादा पाई गई, लेकिन वहां ज़्यादातर सामान्य और इंसानों के आसपास रहने वाली प्रजातियाँ थीं, जैसे गौरैया और पहाड़ी कबूतर। इसके उलट, स्टेपी वनस्पति और उसकी बनावट पर निर्भर रहने वाली विशेषज्ञ प्रजातियाँ या तो वहां लगभग नहीं थीं या बहुत कम संख्या में दिखीं।
अध्ययन के मुख्य लेखक सिद्धार्थ श्रीनिवासन कहते हैं, “स्पीति में पारंपरिक खेती में अब भी पक्षियों की संख्या अच्छी दिखती है। लेकिन कुछ विशेषज्ञ प्रजातियाँ यहां या तो गायब हैं या बहुत कम संख्या में मौजूद हैं। इसकी वजह शायद यह है कि खेती वाले इलाके उनके खास आवास या भोजन की जरूरतें पूरी नहीं कर पाते।”
स्पीति में खेती अब भी कम तीव्रता वाली है। यहां कीटनाशकों का इस्तेमाल बहुत कम होता है और जैविक खाद व सिंचाई जैसे इनपुट आम हैं। ऐसी परिस्थितियों में कीटों की उपलब्धता बढ़ती है, जिससे सामान्य कीटभक्षी पक्षियों को फायदा मिलता है। लेकिन शोधकर्ता बताते हैं कि ऐसे इलाके प्राकृतिक स्टेपी आवासों जैसी जटिल संरचना नहीं दे पाते, जिसकी जरूरत विशेषज्ञ प्रजातियों को होती है।
इसके मुकाबले, बिना चराई वाले स्टेपी मैदानों में न सिर्फ पक्षियों की संख्या अधिक थी, बल्कि प्रजातीय विविधता भी सबसे ज्यादा पाई गई। इनमें तिब्बती सैंडग्राउस और लीफ वॉर्बलर जैसी विशेषज्ञ प्रजातियाँ भी शामिल थीं। वहीं, चराई वाले आवास हर मामले में सबसे कमजोर साबित हुए, जहां पक्षियों की संख्या भी कम थी और विशेषज्ञ प्रजातियाँ भी बहुत कम दिखीं।

एक चिंताजनक संकेत
जहां अलग-अलग इलाकों में दिखे अंतर भूमि उपयोग की तीव्रता से जुड़े थे, वहीं सबसे चिंता बढ़ाने वाले नतीजे तब सामने आए, जब शोधकर्ताओं ने समय के साथ आए बदलावों को देखा।
अध्ययन के शुरुआती दौर (2002–2010) की तुलना बाद के वर्षों (2016–2023) से करने पर पता चला कि सभी तरह के आवासों में पक्षियों की संख्या घटी है। हालांकि, यह गिरावट सांख्यिकीय रूप से साफ तौर पर सिर्फ बिना चराई वाले स्टेपी इलाकों में ही दर्ज की गई।
सिद्धार्थ श्रीनिवासन कहते हैं, “यह नतीजा इसलिए चिंताजनक है, क्योंकि यह सिर्फ भूमि उपयोग में बदलाव से आगे के, गहरे और व्यापक दबावों की ओर इशारा करता है। अगर परेशान किए गए आवासों में पक्षियों की हालत खराब होती है, तो वे शायद कम प्रभावित इलाकों को चुन सकते हैं। लेकिन अगर बिना छेड़छाड़ वाले इलाकों में भी उनकी संख्या घट रही है, तो हमें अपनी संरक्षण रणनीतियों से आगे जाकर सोचना होगा।”
अध्ययन में कई आम कीटभक्षी प्रजातियों, जैसे ब्लैक रेडस्टार्ट, डेज़र्ट व्हीटियर और लीफ वॉर्बलर में तेज गिरावट दर्ज की गई। एक प्रजाति, ह्यूम्स लार्क, साल 2009 के बाद से अध्ययन क्षेत्र में दिखाई ही नहीं दी, जो इसके स्थानीय स्तर पर खत्म हो जाने की आशंका को दिखाता है।
खास बात यह है कि पूरे अध्ययन काल के दौरान बिना चराई वाले स्टेपी इलाके में भूमि उपयोग में कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ।
श्रीनिवासन बताते हैं, “बिना छेड़छाड़ वाला यह इलाका एक तरह से प्राकृतिक ‘कंट्रोल साइट’ की तरह काम करता है, क्योंकि यहां भूमि उपयोग स्थिर रहा। इसलिए साफ है कि इन बदलावों के पीछे कोई और कारण काम कर रहा है।”

जलवायु का दबाव
यह अध्ययन सीधे तौर पर यह अलग नहीं कर सकता कि प्रभावित इलाकों में पक्षियों पर जलवायु परिवर्तन का असर कितना है और भूमि उपयोग में बदलाव का कितना। लेकिन शोधकर्ताओं का अनुमान है कि जलवायु परिवर्तन इसमें भूमिका निभा सकता है, खासकर इसलिए क्योंकि बिना चराई वाले स्टेपी इलाकों में भूमि उपयोग पूरे अध्ययन काल में स्थिर रहा।
सिद्धार्थ श्रीनिवासन कहते हैं, “जलवायु परिवर्तन के कारण पक्षी आमतौर पर अपनी ऐतिहासिक तापमान सीमा के साथ तालमेल बिठाते हुए ऊंचाई की ओर खिसकते हैं। लेकिन स्पीति का भू-दृश्य पहले ही धरती की सबसे ऊंची सीमाओं पर स्थित है, ऐसे में यहां के पक्षी जलवायु परिवर्तन के साथ कैसे तालमेल बिठाएंगे, यह सवाल बना रहता है।”
हर साल पक्षियों की संख्या में आने वाले उतार-चढ़ाव सभी आवासों में एक जैसे दिखाई दिए, जो मौसम जैसे साझा क्षेत्रीय कारकों के असर की ओर इशारा करते हैं। लेकिन ट्रांस-हिमालय क्षेत्र में लंबे समय के जमीनी मौसम आंकड़े बहुत सीमित हैं, जिससे इन पैटर्न को सीधे जलवायु रुझानों से जोड़ पाना मुश्किल हो जाता है।

संरक्षण पर नए सिरे से सोच
अध्ययन के नतीजे इस धारणा को चुनौती देते हैं कि किसी इलाके को सीधे इंसानी इस्तेमाल से बचा लेना ही जैव विविधता को सुरक्षित रखने के लिए काफी है।
सिद्धार्थ श्रीनिवासन कहते हैं, “लगातार निगरानी करना और यह समझना कि इन गिरावटों के पीछे असल कारण क्या हैं, अगला जरूरी कदम है। संरक्षण के नजरिए से यह बेहद अहम है।”
अध्ययन यह भी चेतावनी देता है कि संरक्षण और आजीविका को एक-दूसरे के विरोधी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। किब्बर का कृषि–पशुपालक समुदाय न सिर्फ इस परिदृश्य को संभालने में, बल्कि इस शोध को संभव बनाने में भी अहम भूमिका निभाता रहा है।
श्रीनिवासन बताते हैं, “साल 1998 में समुदाय ने अपने इलाके के एक हिस्से को चराई-मुक्त रिज़र्व के रूप में चिन्हित किया था। यह समुदाय आधारित संरक्षण पहल का हिस्सा था। हमारी फील्ड टीम, जो किब्बर से ही है, लगभग दो दशकों से हर गर्मी में इन्हीं रास्तों पर चलकर सर्वे कर रही है।”

जब कोई अनजाना पक्षी दिखाई देता है, तो कालज़ांग उसकी तस्वीरें लेते हैं और वैज्ञानिकों के साथ साझा करते हैं। फिर रंग और निशानों जैसे छोटे-छोटे फर्कों पर चर्चा होती है। इसी बीच, गांव के बुज़ुर्ग उन पक्षियों से जुड़े स्थानीय नाम और पुरानी कहानियाँ याद करते हैं, जो औपचारिक सर्वे से भी पहले की यादों तक जाती हैं।
और पढ़ेंः पोखरा एयरपोर्ट पर एक पक्षी विज्ञानी का पहरा, गिद्धों और विमानों को बचाने की जद्दोजहद
“वैज्ञानिक हमें पक्षियों के बारे में बताते हैं और गांव के बुज़ुर्ग उनसे जुड़ा इतिहास साझा करते हैं। जानकारी दोनों तरफ से आती है,” गुरमेट कहते हैं। वे यह भी जोड़ते हैं कि गांव के कई लोग मानते हैं कि जो बदलाव वे देख रहे हैं, उनका संबंध बदलते मौसम से हो सकता है। हालांकि वे यह नहीं मानते कि परिदृश्य बहुत तेज़ी से बिगड़ रहा है, फिर भी वे भविष्य को लेकर सतर्क हैं। “अगर चीज़ों को सही तरीके से नहीं संभाला गया, तो नुकसान बड़ा हो सकता है,” वे कहते हैं। खास तौर पर कुछ खेतों में रसायनों के बढ़ते इस्तेमाल की ओर इशारा करते हुए उन्हें चिंता है कि इससे हालात और खराब हो सकते हैं।
बैनर तस्वीर: डेज़र्ट व्हीटियर। लाहौल-स्पीति में 2002 से 2023 के बीच एनसीएफ द्वारा किए गए अध्ययन से पता चला है कि अलग-अलग आवासों में पक्षियों की संख्या घटी है, यहां तक कि ऊंचाई वाले बिना चराई वाले स्टेपी इलाकों में भी, जहां इंसानी दखल सबसे कम है। कीट खाने वाली आम प्रजातियों, जिनमें डेज़र्ट व्हीटियर भी शामिल है, में भी साफ गिरावट दर्ज की गई। तस्वीर: केसांग छुनित/एनसीएफ।