- हिमालयी घास के मैदानों की वैज्ञानिक समझ में अब भी एक बड़ा अंतर मौजूद है।
- इस अध्ययन में जमीन के ऊपर और नीचे के बायोमास के बीच एक मजबूत नकारात्मक संबंध पाया।
- कश्मीर के दाचीगाम जैसे गर्म और कम ऊंचाई वाले घास के मैदानों में जमीन के ऊपर कार्बन सोखने की क्षमता ज्यादा दिखी।
दुनिया भर में घास के मैदान ख़ास जैव विविधता को सहारा देते हैं, महत्त्वपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र सेवाएँ प्रदान करते हैं और उन पर निर्भर खानाबदोश एवं चरवाहा समुदायों के लिए आजीविका का स्रोत हैं। घास के मैदानों को जलवायु परिवर्तन, भूमि उपयोग और भूमि आवरण में बदलाव, तथा मानवीय दबावों सहित कई तरह के तनावों का भी सामना करना पड़ता है।
हालांकि, हिमालयी घास के मैदानों की वैज्ञानिक समझ में अब भी एक बड़ा अंतर मौजूद है। यही अंतर बढ़ते पर्यावरणीय परिवर्तनों के दौर में इन घास के मैदानों के प्रभावी प्रबंधन में बाधा भी बन रहा है और वैश्विक स्तर पर समेकित अध्ययन (ग्लोबल सिंथेसिस) को भी प्रभावित कर रहा है। यह बातें कश्मीर में स्थित हिमालयी घास के मैदानों की दीर्घकालिक पारिस्थितिक निगरानी पर प्रकाशित एक शोधपत्र में निकलकर आईं।
इस शोधपत्र के मुख्य लेखक, कश्मीर यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर, मंज़ूर ए. शाह बताते हैं कि दुनिया भर में इकोसिस्टम मॉनिटरिंग के लिए लॉन्ग-टर्म इकोलॉजिकल ऑब्ज़र्वेटरी (LTEO) बनाने पर जोर दिया जा रहा है और वहीं से इस काम की शुरुआत हुई। साल 2015 में, भारत में इकोसिस्टम मॉनिटरिंग के लिए ये ऑब्ज़र्वेटरी बनाने के लिए एक वैज्ञानिक कमेटी बनाई गई थी और 2019 तक, पर्यावरण मंत्रालय की मंजूरी से, कश्मीर समेत पूरे देश में इन्हें स्थापित किया गया।
इस अध्ययन ने कश्मीर में हिमालय के घास के मैदानों की लंबे समय तक निगरानी के लिए एक आधाररेख स्थापित की। इसके लिए तीन अलग-अलग जगहों पर स्थाई प्लॉट बनाए गए और प्रजातियों की संरचना, बायोमास, तथा कार्बन–नाइट्रोजन अनुपात जैसे पारिस्थितिक मानकों का विश्लेषण किया गया।
“हमने तीन अलग-अलग साइट बनाई, एक संरक्षित क्षेत्र के अंदर और दो संरक्षित क्षेत्रों के बाहर। हर साइट को तीन ब्लॉकों में, और हर ब्लॉक को पाँच प्लॉट्स में विभाजित किया गया। फील्डवर्क के दौरान इन जगहों के बीच ऊँचे ढ़लान (एलीवेशन ग्रेडिएंट) सामने आए, जिसके चलते उल्लेखनीय पारिस्थितिक अंतर देखने को मिले,” शाह ने मोंगाबे इंडिया को बताया।
इस अध्ययन के लिए चुनी गई तीन जगहें थीं, दाचीगाम नेशनल पार्क (कम ऊंचाई पर), बाबरेशी और गुलमर्ग (ज़्यादा ऊंचाई पर)। “अध्ययन में कार्यात्मक समूहों: घास, फोर्ब (शाकीय पौधे) और फलियों के वितरण की भी जाँच की गई,” शाह बताते हैं। अलग-अलग साइट के बीच प्रजातीय संरचना और विविधता में उल्लेखनीय अंतर पाया गया, जिसमें कम ऊँचाई पर स्थित दाचीगाम में प्रजातीय समृद्धि अधिक देखी गई। “यह उसके संरक्षित दर्जे और कम मानवीय हस्तक्षेप के कारण हो सकता है,” वे कहते हैं। दाचीगाम में घास का आवरण और बायोमास प्रमुख था, जबकि अधिक ऊँचाई वाली जगहों पर फोर्ब और फलियों की अधिकता पाई गई, जो स्थानीय जलवायु और पारिस्थितिक ढालों के प्रति अनुकूलन को दर्शाती है।
इस अध्ययन में ज़मीन के ऊपर और नीचे के बायोमास के बीच एक मजबूत नकारात्मक संबंध पाया। दाचीगाम जैसे गर्म और कम ऊंचाई वाले घास के मैदानों में जमीन के ऊपर कार्बन सोखने की क्षमता ज्यादा दिखी, वहीं ऊँचे घास के मैदानों में, जहां हालात और मौसम कठिन होता है, कार्बन सोखने की क्षमता जमीन के अंदर जड़ों में ज़्यादा दिखाई दी।
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इस अध्ययन ने एक ऐसी आधाररेखा स्थापित की है जो हिमालयी घास के मैदानों में भविष्य की संरक्षण पहलों, प्रबंधन रणनीतियों और जलवायु परिवर्तन मॉडलिंग के लिए मूलभूत आँकड़े उपलब्ध कराती है। यह ऊँचाई, जलवायु और मानवीय दबावों से प्रेरित गर्म और ठंडे समशीतोष्ण घास के मैदानों के बीच मौजूद पारिस्थितिक भिन्नताओं को भी रेखांकित करता है।
इस अध्ययन के परिणाम जैव विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं को बनाए रखने में संरक्षित क्षेत्रों के महत्व को रेखांकित करते हैं, साथ ही जलवायु परिवर्तन के प्रति लचीलापन (रेज़िलिएंस) और अनुकूलन को समझने में दीर्घकालिक निगरानी की भूमिका को भी सामने लाते हैं। “जो स्थल जलवायु परिवर्तन के प्रति कम लचीले और अधिक संवेदनशील हैं, उनके लिए लक्षित नीतिगत हस्तक्षेपों की आवश्यकता हो सकती है, ताकि उनके पारिस्थितिक कार्यों और कार्बन सोखने की क्षमता को मजबूत किया जा सके,” शोधपत्र में कहा गया है।
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 19 सितम्बर, 2025 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: दाचीगाम नेशनल पार्क में घास के मैदान का एक दृश्य। तस्वीर – उमर इखलाक