- भारत के 141 शहरों पर किए गए एक नए अध्ययन से पता चला है कि मौसम और भौगोलिक स्थितियों की वजह से विभिन्न क्षेत्रों में एरोसेल प्रदूषण का स्तर अलग-अलग होता है।
- अध्ययन के मुताबिक, उत्तर भारत के शहरों की हवा अपने आस-पास के ग्रामीण इलाकों की तुलना में अधिक साफ है। इसके विपरीत, दक्षिण भारत के शहरों में उनके ग्रामीण इलाकों के मुकाबले प्रदूषण का स्तर ज्यादा है।
- यह अध्ययन इस बात पर जोर देता है कि वायु प्रदूषण से निपटने के लिए योजनाएं बनाते समय क्षेत्रीय और मौसमी बदलावों को ध्यान में रखना बहुत जरूरी है।
हाल ही में हुए एक अध्ययन में पाया गया है कि उत्तर भारत के शहरों में प्रदूषण (एरोसोल) का स्तर उनके आस-पास के ग्रामीण इलाकों की तुलना में कम है। वहीं दक्षिण भारत में यह स्थिति बिल्कुल उलट है यानी इस क्षेत्र में शहरों की हवा ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में ज्यादा प्रदूषित है। ऐसा इसलिए है क्योंकि शहर की बनावट और उस पूरे इलाके का मौसम आपस में मिलकर प्रदूषण के फैलने के तरीके को प्रभावित करते हैं। यह अध्ययन वायु प्रदूषण की निगरानी और रोकथाम के लिए एक क्षेत्रीय नजरिए को अपनाने की जरूरत पर जोर देता है।
शहर अपने स्थानीय वातावरण पर गहरा प्रभाव डालते हैं। उदाहरण के लिए, अर्बन हीट आइलैंड इफेक्ट के कारण शहर अक्सर अपने आस-पास के क्षेत्रों की तुलना में अधिक गर्म होते हैं। ऐसा तब होता है जब शहरों में हरियाली कम हो जाती है, निर्मित संरचनाएं बढ़ जाती हैं और ग्रामीण क्षेत्रों के मुकाबले शहरों में ग्रीनहाउस गैसें अधिक व्यापक रूप से फैली होती हैं। इसी तरह, वायु प्रदूषक शहरों के ऊपर जमा होकर फंस सकते हैं, जिससे ‘अर्बन पॉल्यूशन आइलैंड’ बन जाते हैं। एरोसोल या पार्टिकुलेट मैटर (पीएम) वायु प्रदूषण के महत्वपूर्ण घटक हैं; ये विभिन्न स्रोतों से निकलने वाले हवा में तैरते ठोस या तरल कण होते हैं और इन्हें इनके आकार के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है। जब हम सांस लेते हैं तो ये हमारे शरीर में प्रवेश कर जाते हैं, जो खासतौर पर प्रदूषण के गुंबदों (पॉल्युशन डोम) से घिरे घनी आबादी वाले शहरी क्षेत्रों में स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर खतरा पैदा करते हैं।
आईआईटी दिल्ली के सग्निक डे ने एरोसोल और जलवायु के बीच के संबंध और मानव स्वास्थ्य पर उनके प्रभावों का अध्ययन किया है। वह कहते हैं, “एरोसोल कई तरह के स्वास्थ्य जोखिमों के लिए जाने जाते हैं, जन्म के समय होने वाली समस्याओं से लेकर वयस्कों में होने वाली गैर-संक्रामक बीमारियों तक, जो असामयिक मृत्यु का कारण बनती हैं।” डे ‘ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज स्टडी- 2019’ का हिस्सा थे, जिसमें 2019 में एरोसोल प्रदूषण को लगभग 10 लाख लोगों की मौत का जिम्मेदार माना गया था। साथ ही तीन दशक पहले की तुलना में इस प्रदूषण से होने वाली मृत्यु दर में 115% की वृद्धि की बात कही गई थी।

सभी शहर एक जैसे नहीं होते
आईआईटी भुवनेश्वर के जलवायु वैज्ञानिक विनोज वी. कहते हैं, “जब वायु प्रदूषण को मापने और उसे कम करने के लिए कदम उठाने की बात आती है, तो ज्यादातर योजनाएं शहरों को एक अलग इकाई के रूप में देखती हैं। लेकिन स्थानीय मौसम और इससे जुड़ी क्षेत्रीय हवा की गतिविधियां प्रदूषण के रोजाना होने वाले उतार-चढ़ाव और फैलाव में बहुत अहम भूमिका निभाती हैं।” इसकी जांच करने के लिए उन्होंने और उनके छात्र सौम्या सत्यकांत सेठी ने 141 भारतीय शहरों में एरोसोल प्रदूषण के जमाव (पॉल्युशन डोम्स) के पैटर्न की तुलना करते हुए एक अध्ययन किया। विनोज समझाते हैं, “जब हमने यह शोध शुरू किया, तब हम एरोसोल प्रदूषण और जलवायु के बीच संबंध को समझना चाहते थे।”
एरोसोल की मात्रा का अनुमान लगाने के लिए शोधकर्ताओं ने सैटेलाइट ऑब्जर्वेशन से प्राप्त एरोसोल ऑप्टिकल डेप्थ (AOD) आंकड़ों का इस्तेमाल किया। यह तकनीक बताती है कि वायुमंडल के एक कॉलम में मौजूद एरोसोल रोशनी को कितना फैलाते या अवशोषित करते हैं। हर शहर के लिए उन्होंने केंद्र के आसपास 50 किलोमीटर तक के दायरे का अध्ययन किया और इस क्षेत्र के हर एक किमी के हिस्से (पिक्सेल) के लिए 18 सालों (2003 से 2020) के औसत AOD मान निकाले। ‘शहरी एरोसोल आईलैंड’ प्रभाव की जांच करने के लिए टीम ने शहरी और आसपास के गैर-शहरी इलाकों के बीच AOD मानों के अंतर की गणना की। उन्होंने यह भी देखा कि शहर के केंद्रों से बाहर की ओर यानी बाहरी इलाकों की तरफ बढ़ते हुए प्रदूषण की मात्रा में स्थानीय स्तर पर कैसे बदलाव आता है।
जैसा कि उम्मीद थी, अध्ययन में शहरी एरोसोल प्रदूषण आईलैंड के संकेत मिले। लेकिन हैरानी की बात ये थी कि ऐसा सभी शहरों में नहीं था। ये द्वीप भारत के उन दक्षिणी और पूर्वी हिस्सों में साफ तौर पर दिखाई दिए, जहां शहर अपने आस-पास के इलाकों की तुलना में उच्च एरोसोल प्रदूषण के गुंबद में घिरे हुए नजर आए। इसके विपरीत, उत्तर और उत्तर-पश्चिमी भारत के शहर ‘क्लीन आईलैंड’ के रूप में उभरे। हालांकि दक्षिण और पूर्वी भारत के शहरों की तुलना में उत्तर भारत के शहरों में प्रदूषण का कुल स्तर कहीं ज्यादा था, फिर भी दिलचस्प बात यह रही कि उत्तर भारत के इन शहरों की हवा अपने आस-पास के ग्रामीण इलाकों की तुलना में अपेक्षाकृत साफ पाई गई।
विनोज कहते हैं, “हम हैरान थे क्योंकि हमें उम्मीद थी कि हर शहर एक ‘पॉल्युशन आईलैंड’ ही होगा। ये नतीजे हमारी सामान्य सोच के बिल्कुल उलट थे।”
एरोसोल प्रदूषण के मौसमी पैटर्न की गहराई से जांच करने पर, उन्होंने पाया कि मानसून से पहले के शुष्क महीनों में शहरी एरोसोल क्लीन आईलैंड की संख्या तेजी से बढ़ जाती है। इसके उलट, मानसून के बाद (जब हवा में धूल कम होती है) शहरी एरोसोल पॉल्युशन आईलैंड सबसे अधिक दिखाई देते हैं। कुल मिलाकर, शहरी एरोसोल आईलैंड की तीव्रता और धूल के स्तर के बीच एक महत्वपूर्ण संबंध पाया गया। इससे यह संकेत मिलता है कि इन स्थितियों के पीछे सिर्फ शहर के भीतर की गतिविधियां ही नहीं, बल्कि शहर के दायरे से भी बड़ी भौगोलिक और जलवायु संबंधी प्रक्रियाएं काम कर रही हैं।
विनोज ने बताया, “हमें हवा के रुख, धूल के स्तर और ‘शहरी एरोसोल क्लीन आईलैंड’ के बनने के बीच एक सीधा संबंध मिला।” उत्तर भारत में, शहर शुष्क इलाकों से उड़कर आने वाली धूल और आस-पास के छोटे शहरों से निकलने वाले प्रदूषण के लिए एक दीवार की तरह काम करते हैं। इसकी वजह से प्रदूषण शहरों के भीतर जाने के बजाय उनके ठीक बाहर जमा हो जाता है। विनोज समझाते हैं, “हमारा मानना है कि शहरीकरण और ऊंची इमारतों के कारण शहर के ऊपर हवा की गति कम हो जाती है। इससे शहर के उस हिस्से में एक रुकावट (बैरियर) पैदा होती है जहां से हवा आ रही होती है। यह रुकावट प्रदूषकों को एक जगह इकट्ठा कर देती है या उनकी दिशा बदल देती है। हवा शहर के चारों ओर दो हिस्सों में बंटकर निकल जाती है और अपने साथ प्रदूषकों को भी शहर के बाहर ले जाती है।” इंडो-गंगा के मैदानी इलाकों के शहरों के आसपास प्रदूषण के स्तर में जो बदलाव देखे गए हैं, वे इस बात का और भी पुख्ता सबूत देते हैं।
हवा के रुख और धूल के स्तर में मौसमी बदलावों के कारण, वायु प्रदूषण का यह उतार-चढ़ाव भी समय के साथ कम या ज्यादा होता रहता है। जिन इलाकों में ‘शहरी प्रदूषण गुंबद’ बनते हैं, वहां शहर की बनावट एक रुकावट की तरह काम करती है जो प्रदूषकों को बाहर जाने से रोक देती है। इसकी वजह से शहर के भीतर प्रदूषण के स्तर में भारी बढ़ोतरी हो जाती है। विनोज कहते हैं, “अतीत में हुए कई अध्ययनों में भी शहरों के भीतर प्रदूषण के इस तरह एक ही जगह थम जाने की बात कही गई है।”

वायु प्रदूषण के प्रति क्षेत्रीय दृष्टिकोण अपनाना
एक वैश्विक अध्ययन में भी इसी तरह के नतीजे सामने आए हैं। बड़े स्तर के डेटा का उपयोग करते हुए इस अध्ययन में पाया गया कि भारतीय और चीनी शहरों के बाहरी इलाकों में एरोसोल प्रदूषण अधिक है। दक्षिण एशिया के आठ शहरों पर किए गए एक अन्य शोध में भी प्रदूषण के अलग-अलग भौगोलिक और मौसमी पैटर्न देखे गए। ज्यादातर शहरों में प्रदूषण का स्तर अधिक पाया गया और मौसम के अनुसार बदलने वाला संथानीय अंतर भी नजर आया। इसके लिए शहरों से निकलने वाले उत्सर्जन के प्रसार और स्थानीय या बाहर से उड़कर आने वाली धूल को जिम्मेदार माना गया है।
हालिया शोध में जमीन पर लगे उपकरणों और सैटेलाइट डेटा के इस्तेमाल से यह पता चला है कि हवाएं उत्तर भारत से एरोसोल को उड़ाकर सुदूर दक्षिण तक ले जाती हैं। इस अध्ययन से जुड़े आईआईटी (IIT) मद्रास के पृथ्वी विज्ञान वैज्ञानिक चंदन सारंगी बताते हैं, “सर्दियों में भारत के ऊपर बहने वाली हवाएं अक्सर उत्तर से प्रदूषित हवा को चेन्नई समेत दक्षिण-पूर्वी तट तक ले जाती हैं। हवा के ये प्रवाह अपने साथ एरोसोल लाते हैं जो जमीन से 1 से 3 किलोमीटर ऊपर जम जाते हैं। ये कण वायुमंडल को गर्म कर देते हैं, जिससे प्रदूषण सतह के करीब ही फंसकर रह जाता है।”
शहरों और उनके आसपास के इलाकों में एरोसोल प्रदूषण में 2% (क्लीन आईलैंड) और 3% (पॉल्यूशन आईलैंड) के अंतर के बारे में समझाते हुए विनोज कहते हैं, “यह अंतर भले ही छोटा है लेकिन स्पष्ट है।” वह इस बात पर जोर देते हुए कहते हैं, “हमें स्वच्छ हवा कार्यक्रमों को शहर के स्तर पर नहीं, बल्कि क्षेत्रीय स्तर पर देखने की जरूरत है। भविष्य में स्वच्छ और जलवायु-अनुकूल शहरों को बनाने की योजना के लिए भी यह जानकारी बहुत महत्वपूर्ण है।”
राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा 2019 में शुरू की गई एक पंचवर्षीय योजना है। इसका उद्देश्य भारतीय शहरों में वायु प्रदूषण की निगरानी करना और वायु गुणवत्ता को बेहतर बनाना है। मौजूदा समय में यह कार्यक्रम 130 शहरों में लागू है, जिसका लक्ष्य 2026 तक पीएम10 (10 माइक्रोमीटर या उससे कम व्यास वाले कण) के स्तर को 40% तक कम करना है। पिछले साल के आकड़ों के अनुसार, इनमें से 55 शहरों में 2017-2018 की तुलना में पीएम10 के स्तर में 20% या उससे अधिक की कमी देखी गई, हालांकि सिर्फ 18 शहर ही पीएम10 सांद्रता के लिए राष्ट्रीय परिवेशी वायु गुणवत्ता मानकों (एनएएक्यूएस) को पूरा कर पाए हैं।
डे कहते हैं, “शहरी-ग्रामीण सीमा से परे, पूरे इंडो-गैंगा मैदानी इलाके में वायु प्रदुषण का स्तर NAAQS से लगभग दोगुना है। जब तक जवाबदेही और तय समय सीमा वाले लक्ष्यों के साथ राज्य-स्तरीय क्षेत्रीय योजनाएं लागू नहीं की जातीं, तब तक सुधार की गति धीमी ही रहेगी।” उन्होंने आगे बताया, “वायु प्रदूषण नीतियों को अब शहरों को ध्यान में रखकर नहीं बल्कि क्षेत्रीय एयरशेड (समान वायु-क्षेत्र) के स्तर पर लागू करने की जरूरत है।”
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सारंगी कहते हैं, “हमारे मॉनिटरिंग नेटवर्क मुख्य रूप से जमीन से 2 मीटर की ऊंचाई तक होने वाले बदलावों को ही मापते हैं और वायु गुणवत्ता की चर्चाएं भी सिर्फ जमीनी स्तर तक ही सीमित रहती हैं। हालांकि प्रदूषण जमीन पर ही होता है, लेकिन दूर से लाए गए कण (एरोसोल) इससे ज्यादा ऊंचाई पर भी हो सकते हैं।” वह आगे कहते हैं, “जब लंबी दूरी से बहकर आई धुंध की परतें बड़े शहरों के प्रदूषण वाले गुंबदों के ऊपर काफी ऊंचाई पर जम जाती हैं, तो वे वायुमंडल को उन दिनों की तुलना में अधिक गर्म कर देती हैं जब ये परतें नहीं होतीं।” उनके समूह के शोध से यह भी पता चलता है कि एरोसोल के इस तरह लंबी दूरी तक बहकर आने की घटनाएं पिछले एक दशक में और लंबे समय तक बनी रहने लगी हैं। ये घटनाएं वायुमंडल की स्थिति को बदल देती हैं, जिससे प्रदूषण की समस्या और भी गंभीर हो जाती है।
जलवायु और शहरों के आपसी संबंध का मतलब है कि जलवायु परिवर्तन के कारण एरोसोल प्रदूषण के मौजूदा पैटर्न में बदलाव आ सकता है। विनोज के शोध समूह के पिछले कार्यों से संकेत मिलते हैं कि उत्तर-पश्चिमी भारत के शुष्क क्षेत्रों से धूल का उत्सर्जन कम हो रहा है, जिसका असर मानसून के चक्र को कमजोर कर रहा है। डे कहते हैं, “बदलती जलवायु मौसम के मिजाज को बदल देगी, जो हर जगह एक जैसा नहीं रहता और कई स्थानीय एवं क्षेत्रीय कारकों पर निर्भर करता है। इन जटिल रास्तों को समझने और भविष्य की नीतियों में उन्हें शामिल करने की जरूरत है।” वह आगे कहते हैं, “मजबूत नीतिगत और तकनीकी हस्तक्षेप, स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ना और पूरी तरह से स्वच्छ रसोई ईंधन को अपनाना, जलवायु और वायु प्रदूषण दोनों के लक्ष्यों को हासिल करने में मदद करेगा।” विनोज ने आखिर में कहा, “कल के (भविष्य के) शहरों को बेहतर बनाने के लिए हमें शहरी नियोजकों, वायु गुणवत्ता विशेषज्ञों और जलवायु वैज्ञानिकों के बीच और भी मजबूत तालमेल की आवश्यकता है।”
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 15 सितंबर 2025 को प्रकाशित हुई थी।
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