- असम के डिब्रू-साईखोवा राष्ट्रीय उद्यान और बायोस्फीयर रिजर्व में बंगाल टाइगर की मौजूदगी की अपुष्ट खबरों के बाद अब तस्वीरों से इसकी पुष्टि हुई है।
- कैमरा ट्रैपिंग अभियान के जरिए 60 कैमरों के इस्तेमाल से मिली ये तस्वीरें इस क्षेत्र में इस बड़ी बिल्ली प्रजाति की मौजूदगी का पहला दस्तावेजी सबूत है।
- संरक्षणवादियों का कहना है कि इससे अधिकारियों को क्षेत्र में शिकार-रोधी उपायों को और सख्त करने के लिए प्रेरित होना चाहिए।
असम के डिब्रू-साईखोवा राष्ट्रीय उद्यान और बायोस्फीयर रिजर्व में हाल ही में बंगाल टाइगर का तस्वीरों के रूप में पहला प्रमाण मिला है।
इस क्षेत्र में 1990 के दशक में बाघों की मौजूदगी थी, लेकिन बाघों की आबादी का कोई दस्तावेजी सबूत नहीं था। पहले के सालों में छोटे पैमाने पर किए गए कैमरा ट्रैपिंग अभियान सफल नहीं रहे, लेकिन हाल ही में जब लगभग 60 कैमरे लगाए गए, तब बाघ की मौजूदगी को पता चला।
डिब्रू-साईखोवा राष्ट्रीय उद्यान और बायोस्फीयर रिजर्व तिनसुकिया वन्यजीव प्रभाग का हिस्सा है। साल 1997 में 765 वर्ग किलोमीटर के इलाके को बायोस्फीयर रिजर्व घोषित किया गया था। इसके बाद साल 1999 में इसके 340 वर्ग किलोमीटर के मुख्य क्षेत्र को राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया गया।
तिनसुकिया वन्यजीव प्रभाग के प्रभागीय वन अधिकारी बिबिसन टोकबी ने मोंगाबे-इंडिया को बताया “राष्ट्रीय उद्यान बनाए जाने के बाद यह पहली बार है जब डिब्रू-साईखोवा में किसी बाघ की तस्वीर कैमरे में कैद हुई है।” “हमने बाघ को दो बार कैमरा ट्रैप में कैद किया, पहली बार 14 दिसंबर, 2025 को और फिर 1 जनवरी, 2026 को। दोनों तस्वीरें एक ही बाघ की थी।”
उन्होंने आगे बताया कि कर्मचारियों को हाल ही में एक और बाघ के पंजों के निशान भी मिले हैं, जिससे यह संकेत मिलता है कि वहां कई बड़े शिकारी जीव मौजूद हैं।

टोकबी बताते हैं कि इस क्षेत्र में पहले भी बाघ की मौजूदगी की कुछ अपुष्ट खबरें मिलती रही हैं। इसलिए उनकी टीम ने बाघों की तस्वीरें लेने की संभावना बढ़ाने के लिए कई कैमरे लगाए।
वह कहते हैं, “2009 में हमारे कर्मचारी ने एक बाघ के पैरों के निशान देखे थे। उस समय के डीएफओ ने दो कैमरे लगाए, लेकिन उनमें कुछ भी रिकॉर्ड नहीं हुआ। 2024 में डीएफओ केएन दास ने भी कैमरा ट्रैप का तरीका आजमाया, लेकिन उसमें भी कुछ नहीं दिखा। जब मैंने पिछले साल सितंबर में कार्यभार संभाला, तो कर्मचारी ने मुझे बाघों के पैरों के निशान के बारे में बताया। मैंने डिगबोई डिवीजन से कैमरे मंगवाए और 60 कैमरे लगवाए। आखिरकार, इस बार हमें सफलता मिली।”
कैमरा ट्रैप में बाघों के अलावा ब्लैक पैंथर, तेंदुआ, लेपर्ड कैट, जंगली भैंसा, जंगली सूअर और साही जैसी प्रजातियां भी रिकॉर्ड हुईं।

स्थानीय पर्यावरणविदों के अनुसार, 1990 के दशक में डिब्रू-साईखोवा में बाघों की अच्छी संख्या के संकेत मिलते थे। सेवानिवृत्त नौकरशाह और पर्यावरणविद् अनवरुद्दीन चौधरी कहते हैं, “1992-94 के दौरान मैं तिनसुकिया में तैनात था और मैंने खुद कई बार डिब्रू-साईखोवा में बाघ के पंजों के निशान देखे थे। उस समय मैंने डिब्रू-साईखोवा को टाइगर रिजर्व बनाने की मांग भी उठाई थी।”
साल 2007-09 के बीच तिनसुकिया के डिप्टी कमिश्नर रहे और अब असम के मुख्यमंत्री के अतिरिक्त सचिव के.के. द्विवेदी बताते हैं कि उस समय उन्हें भी डिब्रू-साईखोवा में बाघों के देखे जाने की खबरें नियमित रूप से मिलती थीं। वह कहते हैं, “लेकिन हमारे पास उनकी मौजूदगी की पुष्टि करने के लिए कैमरा ट्रैप नहीं थे।” वह बाघों की मौजूदगी के फोटोग्राफिक सबूत को सकारात्मक बात मानते हैं।
पुराने बाघों का क्या हुआ?
तिनसुकिया के पूर्व मानद वन्यजीव वार्डन जॉयनाल अबेदीन ने मोंगाबे-इंडिया को बताया कि डिब्रू-साईखोवा में 1993 में 27 और 1997 में 37 बाघ थे। इस बात का कोई सबूत नहीं है कि उन बाघों के साथ क्या हुआ। चौधरी को शक है कि वे बाघ शायद अवैध शिकार और आवास खत्म होने से मारे गए होंगे, जिनकी कोई रिपोर्ट दर्ज नहीं हुई।
बाढ़ का निचला मैदान होने से यह पार्क उत्तर में ब्रह्मपुत्र और लोहित नदियों और दक्षिण में डिब्रू नदी से घिरा हुआ है। चौधरी कहते हैं, “इसलिए, जैसे-जैसे बाढ़ तेज हुई, बाघ दूसरी जगहों पर चले गए। शायद वे सीमा पार करके अरुणाचल प्रदेश चले गए।”
डिब्रू-साईखोवा के मशहूर जंगली घोड़ों के शोधकर्ता शमिकु चांगमाई का मानना है कि बाघों के वहां से चले जाने की वजह शिकार की कमी नहीं हो सकती। वे कहते हैं, “मुझे नहीं लगता कि यहां बाघों के लिए शिकार ढूंढ़ना कोई समस्या है, क्योंकि जंगल के अंदर सैकड़ों खुटी (अर्ध-खानाबदोश चरवाहों के पारंपरिक ठिकाने) या मवेशी फार्म हैं। इसके अलावा, दलदली हिरण और जंगली भैंसों जैसे जंगली शिकार भी मौजूद हैं।”

पर्यावरणविद मृदु पबन फुकन का दावा है कि बड़े पैमाने पर शिकार की ऐसी अवैध घटनाएं होती हैं, जिनकी रिपोर्ट दर्ज नहीं की जाती। वह कहते हैं, “डिब्रू-साईखोवा में शिकारी न सिर्फ बाघों को, बल्कि अन्य जानवरों को भी मार डालते हैं। मैंने खुद जंगली भैंसों के ऐसे शव देखे हैं, जिन पर गोलियों के निशान थे।”
डिब्रू-साईखोवा के नजदीक रहने वाले संरक्षणवादी निरंता गोहेन अवैध शिकार की खबरों को सही बताते हैं। वह कहते हैं, “हमें यहां रात में नियमित रूप से गोलियों की आवाजें सुनाई देती हैं। ये आवाज कहां से आती हैं, इसकी सही से जांच होनी चाहिए।”
हालांकि, डीएफओ टोकबी का कहना है कि उनके पांच महीने के कार्यकाल के दौरान शिकार की कोई घटना नहीं हुई है।

बाघ के साथ रहना
डिब्रू-साईखोवा राष्ट्रीय उद्यान की खास बात यह है कि पार्क के बफर जोन में स्थित 38 गांवों के अलावा जंगल के भीतर दो वन गांव लाइका और दधिया भी मौजूद हैं।
लाइका के निवासी बिलास सिंग रेगन कहते हैं, “डिब्रू-साईखोवा बाद में संरक्षित वन बन गया। हम तो आजादी से भी पहले से यहां रह रहे हैं।” “यहां एक स्कूल है जहां 8वीं कक्षा तक पढ़ाई होती है। यहां कोई प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, दवा की दुकान या बाजार नहीं है। किसी भी जरूरी चीज या आपात स्थिति के लिए हमें अपनी नाव से नदी के घाट तक जाना पड़ता है और वहां से तिनसुकिया तक जाने के लिए गाड़ी किराए पर लेनी पड़ती है जिसमें एक घंटा लगता है।”
पिछले तीन दशकों से खुटी (मवेशियों का बाड़ा) चला रहे कढ़ाई साहनी कहते हैं कि बड़ी बिल्लियों (बाघों) से परोक्ष रूप से सामना होता रहता है। वे कहते हैं, “मेरे पास लगभग 70 गायों की खुटी है। हमें बाघ नजर तो नहीं आते हैं, लेकिन जब वह हमारे मवेशियों का शिकार करता है, तो हमें उसकी मौजूदगी का पता चल जाता है। हम किसी मुआवजे की मांग नहीं करते, क्योंकि हम वन भूमि पर रहते हैं और इस नुकसान को हमें खुद ही उठाना पड़ता है।”
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जंगली जानवरों के खतरों के अलावा, ग्रामीणों को बाढ़ के कारण बार-बार विस्थापन का भी सामना करना पड़ता है। लाइका के कुछ निवासियों को सरकार ने तिनसुकिया जिले में मार्घेरिटा के पास स्थित जगुन में बसाया है। रेगन कहते हैं, “लाइका के 160 परिवारों को बसाया गया और अभी भी यहां 400 परिवार हैं। दधिया में लगभग 800 परिवार होंगे।”
वह आगे कहते हैं कि 90 के दशक में जब डिब्रू-साईखोवा में कई बाघ थे, तो वे अक्सर मवेशियों को मार डालते थे। वह कहते हैं, “अब, अगर वे फिर से लौट आते हैं, तो इससे हमारा नुकसान होगा। लेकिन यह निश्चित रूप से ऐसी खबर है जिसका हम स्वागत करते हैं, क्योंकि बाघ के बिना जंगल का क्या फायदा?”
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 6 अप्रैल, 2026 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: पिछले कुछ सालों तक छोटे पैमाने पर की गई कैमरा ट्रैपिंग की कोशिशें का कोई बेअसर रहीं; लेकिन हाल ही में बड़े पैमाने पर की गई ट्रैपिंग की मदद से डिब्रू-साईखोवा में एक बाघ की मौजूदगी की तस्वीरें मिल पाईं। तस्वीर साभार: चंद्र मोहन पटवारी।