जम्मू-कश्मीर: दो विरोधाभासी कानून के साथ लागू होने से वन-अधिकार को लेकर धुंधलाती तस्वीर

जम्मू-कश्मीर के लिद्दर घाटी में घास के मैदान में पशुओं को चराती गुज्जर महिला। कश्मीर का आदिवासी समुदाय मुख्यतः पशुपालक है और चारा और दूसरी जरूरतों के लिए पूरी तरह से जंगल पर आश्रित है। धारा 370 हटने के बाद जम्मू-कश्मीर में वन विभाग ने जंगल की ज़मीन पर बसे समुदायों को बेदखली के नोटिस जारी कर दिए गए, जिसके बाद इनके अस्तित्व पर संकट मंडरा रहा है। तस्वीर– माइक प्रिंस/फ्लिकर

यह विडंबना ही है कि मार्च, 2019 में केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय स्तर पर ऐसे ही संशोधन करने के प्रयास किए जिसकी काफी मुखालफत हुई। आखिरकार सरकार को इस मसौदे को वापस लेना पड़ा। लेकिन जम्मू-कश्मीर में इन्हें अमल में लाया जा रहा है विशेष रूप से वन अपराधों से जुड़ी तमाम धाराएं स्थानीय समुदायों को फिर से अतिक्रमणकारी साबित कर सकती हैं, तुषार दास का कहना है।

जैसे वन विभाग को ही वन अधिकार कानून के क्रियान्वयन के लिए ‘नोडल एजेंसी’ बनाया जाना। इससे परिस्थितियां न केवल जटिल हो जाएंगीं बल्कि मंत्रालयों के बीच काम के विभाजन को लेकर तय हुए नियम का उल्लंघन भी होगा।

“मूल रूप में वन अधिकार कानून के क्रियान्वयन के लिए नोडल एजेंसी जनजाति कार्य मंत्रालय होता है। ऐसा करने के पीछे के तर्क था कि वन विभाग की औपनिवेशिक संरचना और कार्य-पद्धति सामुदायिक अधिकारों को तवज्जो नहीं देती। पर जम्मू-कश्मीर में यही हो रहा है,” तुषार दास समझाते हैं।

जम्मू-कश्मीर में इसे यह कहकर लागू किया जा रहा है कि जनजाति कल्याण विभाग में पर्याप्त कार्य-बल नहीं है, जावेद राही बताते हैं। लेकिन यह व्यवस्था न तो कानून सम्मत है और न ही इससे वन अधिकार कानून के मूल मकसद हासिल होंगे।

 

बैनर तस्वीरः जम्मू-कश्मीर के सरबल गांव में लकड़ी का पुल पार करते स्थानीय लोग। प्रदेश के आदिवासी समाज के लोग आश्वस्त थे कि जब धारा 370 हटेगी तो यहां स्वतः वन अधिकार कानून लागू हो जाएगा और उन्हें जंगल पर अधिकार मिलेगा। हालांकि, 18 महीने बीत जाने के बाद भी ऐसा नहीं हुआ। तस्वीर– संदीपा चेतन/फ्लिकर

क्रेडिट्स

संपादक

विषय

नेपाल आपदा: तबाही की पूरी तस्वीर अब भी बाकी, विनाशकारी बाढ़ से कैसे बचे बिहार और यूपी

नेपाल आपदा: फिर उजागर हुई क्षेत्रीय तैयारी, तालमेल मजबूत करने की ज़रूरत

जहां बढ़ रहा मानव-बाघ संघर्ष, वहीं खनन परियोजना ने बढ़ाई चिंता

वायु प्रदूषण से और भी जानलेवा हो सकता है डेंगू: अध्ययन

दिल्ली की हवा में बैक्टीरिया का भारी बोझ, कई पर एंटीबायोटिक बेअसर

‘बंजर’ नहीं हैं ये घास के मैदान, नई मकड़ी की खोज ने दिखाई जैव-विविधता की झलक

चार हिस्सों में बांटना होगा कचरा, क्या नए नियम बदल पाएंगे पुरानी व्यवस्था?

केन-बेतवा परियोजना: कौन छूटा, किसे कितना मिला मुआवजा और आंदोलन के बाद क्या बदला

नए लेख

सभी लेख

छत्तीसगढ़ के जंगलों की कीमत 1.41 लाख करोड़, फिर जीडीपी में क्यों नहीं दिखता पूरा हिसाब?

बढ़ता गया बीकानेर, घटता गया गिद्ध, शिकारी पक्षियों का जोड़बीड़

सात साल में तीन गुना हुआ बिहार का ग्रीन बजट, पर्यावरण के नतीजे अब भी कमजोर

ग्लोबल वार्मिंग से अस्थिर हो रहा हिमालय, बढ़ रहे हिमस्खलन और बाढ़ के खतरे

खनिज कर पर हुआ केंद्र का नियंत्रण, क्या घटेगा झारखंड-ओडिशा जैसे राज्यों का राजस्व?

जहां जाते हैं कीट, वहीं पहुंचते हैं पक्षी: पूर्वी हिमालय के अध्ययन में मिले संकेत

नेपाल आपदा: तबाही की पूरी तस्वीर अब भी बाकी, विनाशकारी बाढ़ से कैसे बचे बिहार और यूपी

नेपाल आपदा: फिर उजागर हुई क्षेत्रीय तैयारी, तालमेल मजबूत करने की ज़रूरत