जलसंकट की चपेट में उत्तराखंड के कई गांव, क्या रेल परियोजना है जिम्मेदार?

जानकार मानते हैं कि अगर सुरंग खोदने में अवैज्ञानिक तरीके का इस्तेमाल हो तो जमीन के भीतर जल संचय करने वाले एक्वीफर  पंक्चर हो सकते हैं। यदि किसी क्षेत्र में एक्वीफरपंक्चर हो जाता है तो पानी भारी मात्रा में पंक्चर वाली जगह से बाहर निकलने लगता है। इससे प्राकृतिक स्रोतों को पानी नहीं मिल पाता और वे सूख जाते हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि काम शुरू होने के कुछ महीने बाद उन्होंने यहां से एक पनचक्की चलाने लायक पानी बाहर निकलते देखा, तब से लगातार पानी बह रहा है। तस्वीर- त्रिलोचन भट्ट

इनके अनुसार अवैज्ञानिक तरीके अथवा लापरवाही से पहाड़ के अंदर की जा रही खुदाई से एक्वीफर के पंक्चर होने की पूरी संभावना रहती है। यदि किसी क्षेत्र में एक्वीफरपंक्चर हो जाता है तो पानी भारी मात्रा में पंक्चर वाली जगह से बाहर निकलने लगता है। इससे प्राकृतिक स्रोतों को पानी नहीं मिल पाता और वे सूख जाते हैं।

मोंगाबे-हिन्दी से बात करते हुए हिमालयी मामलों के जानकार प्रसिद्ध भूवैज्ञानिक और इसरो के सेवानिवृत्त वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. नवीन जुयाल कहते हैं कि सुरंगें खोदे जाने से ऊपरी क्षेत्रों में जलस्रोतों के सूखने और निचले क्षेत्रों में अचानक पानी आने के मामले पहले भी सामने आते रहे हैं। जोशीमठ के सुनील क्षेत्र का उदाहरण देते हुए वे कहते हैं निचले क्षेत्र में सुरंग बनाये जाने से सुनील इलाके के प्राकृतिक जनस्रोतों में पानी बहुत कम हो गया था।

दोगी के मामले में वे कहते हैं कि बिना अध्ययन के यह कह पाना मुश्किल होगा कि इस क्षेत्र में पानी के स्रोत सूखने का कारण वास्तव में रेलवे लाइन की सुरंग है या कुछ और। उनका कहना है कि 2020 में नीति आयोग ने इस मामले को उठाया था और जोर देकर कहा था कि सुरंग बनाने के दौरान इस बात का विशेष ध्यान रखा जाए कि संबंधित क्षेत्र में प्राकृतिक जलस्रोतों पर इसका असर न पड़े। वे जोर देकर कहते हैं कि न सिर्फ दोगी क्षेत्र बल्कि हर उस इलाके में प्राकृतिक जलस्रोतों का अध्ययन किया जाना चाहिए जहां सुरंगे बनाई गई हैं।

डॉ. जुयाल कहते हैं कि सुरंगों के कारण जलस्रोत सूखने की संभावना तब बन सकती है, जबकि सुरंग बनाते समय ब्लास्ट किये जाएं। ऐसे में जमीन के अंदर की दरारें चौड़ी हो जाती हैं और इनसे पानी रिसने लगता है। इसे वाटर पायरेसी कहा जाता है। ऐसी स्थिति में यह पानी प्राकृतिक जलस्रोतों तक नहीं पहुंचता है और दूसरी अनपेक्षित जगहों से बाहर आने लगता है।

दूसरी तरफ रेल विकास निगम के वरिष्ठ परियोजना अधिकारी ओम प्रकाश मालगुड़ी दावा करते हैं कि ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेलवे लाइन की सुरंगें पूरी तरह से वैज्ञानिक तरीके से बनाई जा रही हैं। टनलबोरिंगमैथड से खोदी जा रही सुरंगों में स्वास्थ्य, पर्यावरण और सुरक्षा का पूरा ध्यान रखा जा रहा है। ये सुरंगें बाढ़ और भूकंप जैसी घटनाओं से निपटने में पूरी तरह से सक्षम हैं। भूस्खलन से सुरंगों को बचाने के लिए पोरलस्टेबलाइजेशन किया गया है। आईआईटीरुड़की के विशेषज्ञों ने इस योजना की पेसिफिकस्पेक्ट्रमस्टडी की है। विश्व के अनेक विशेषज्ञों से भी इस संबंध में समय-समय से सलाह ली जा रही है। ऐसे में इस परियोजना का पर्यावरण या जलस्रोतों पर किसी तरह का प्रभाव पड़ने की कोई संभावना नहीं है।


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बैनर तस्वीरः उत्तराखंड में चमोली जिले के कर्णप्रयाग तक लगभग 126 किलोमीटर लंबी इस रेल लाइन बिछाई जा रही है। तस्वीर- त्रिलोचन भट्ट

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