- अतिवृष्टि, स्टॉर्म वॉटर (झंझा नीर), सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट, कचरे के ढेर और कपड़े धोने वाली जगहें माइक्रोप्लास्टिक को शहरों की झीलों तक पहुंचा रहे हैं।
- शोधकर्ताओं का कहना है कि मीठे पानी के स्रोतों में माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण एक गंभीर पर्यावरणीय समस्या बनकर उभरा है। इसके बावजूद, प्रदूषण फैलाने वाले माध्यमों की पहचान करने और उन्हें रोकने के प्रयास अभी तक बहुत सीमित हैं।
- जलवायु परिवर्तन के कारण बारिश के चक्र में जो बदलाव आ रहे हैं, उनसे यह समस्या भविष्य में और भी गंभीर होने की आशंका है।
शहरों की झीलों में बढ़ता प्लास्टिक प्रदूषण अब एक गंभीर संकट बनता जा रहा है। हाल ही में श्रीनगर की डल झील पर किए गए एक नए अध्ययन ने पर्यावरणविदों की चिंता बढ़ा दी है। इस रिपोर्ट के अनुसार, अतिवृष्टि या अत्यधिक बारिश और खराब मौसम प्लास्टिक के बारीक कणों यानी माइक्रोप्लास्टिक्स को झीलों तक पहुंचाने का सबसे बड़ा जरिया बन रहे हैं। इसके अलावा, स्टॉर्म वॉटर (झंझा नीर), सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट, कचरा फेंकने और कपड़े धोने वाली जगहों से भी ये कण झीलों तक पहुंचते हैं।
श्रीनगर की डल झील पर किए गए इस अध्ययन में उन कारणों की जांच की गई, जिनके जरिए माइक्रोप्लास्टिक शहरी झीलों तक पहुँचते हैं। हालांकि, लंबे समय से मीठे पानी के स्रोतों में माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण को एक गंभीर समस्या माना जाता रहा है, लेकिन यह प्रदूषण वहां तक पहुंचता कैसे है, इसे समझाने वाले शोध बेहद कम हैं। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) की एक रिपोर्ट की मानें तो मीठे पानी के स्रोतों में प्लास्टिक की मात्रा तेजी से बढ़ रही है। साल 2016 में यह लगभग 90-140 लाख टन (9-14 मिलियन टन) थी, जिसके 2040 तक बढ़कर करीब 230-370 लाख टन (23-37 मिलियन टन) होने का अनुमान है।
‘एनवायर्नमेंटल साइंस: एडवांसेज’ में प्रकाशित डल झील में किए गए इस नए अध्ययन से पता चलता है कि कैसे तेज़ बारिश शहरी झीलों में माइक्रोप्लास्टिक के गुणों में बदलाव ला रही हैं और कैसे मौसम की स्थिति, खासकर लगातार बारिश, माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण के फैलने के तरीकों को और भी जटिल बना रही है।
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) खड़गपुर के सिविल इंजीनियरिंग विभाग की प्रोफेसर और इस अध्ययन की लेखिका सुधा गोयल ने मोंगाबे-इंडिया को बताया, “इससे पहले किए गए ज्यादातर अध्ययन सिर्फ नदियों और झीलों जैसे प्राकृतिक जल निकायों में मौजूद माइक्रोप्लास्टिक की मात्रा को मापने पर केंद्रित थे। लेकिन हमारा अध्ययन इससे एक कदम आगे जाता है और यह पता लगाता है कि माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण किन खास प्रवेश बिंदुओं से पानी तक पहुंच रहा है।”
गोयल की टीम (जिसमें आईआईटी खड़गपुर, एनआईटी श्रीनगर और डरबन के शोधकर्ता शामिल हैं) ने डल झील के पास अलग-अलग रास्तों से आने वाले माइक्रोप्लास्टिक की मात्रा और उनके प्रकारों की तुलना की। उन्होंने सीवेज के निकास, तेज बहाव वाले खुले नालों, कपड़े धोने के घाटों और कचरे वाली जगहों से नमूने लिए। गोयल ने कहा, “नतीजों से साबित हुआ कि झील में प्लास्टिक जिस रास्ते से पहुंचता है, उसकी अपनी एक अलग पहचान होती है। उदाहरण के तौर पर स्टॉर्म वाटर में टायरों और सड़कों के घर्षण से उत्पन्न होने वाले काले कण मिले, तो वहीं सीवेज और कपड़े धोने वाली जगहों से आने वाले पानी में बारीक रेशों की भरमार थी।”

जलवायु परिवर्तन संबंधी चिंताएं
केरला यूनिवर्सिटी, तिरुवनंतपुरम में भूविज्ञान के प्रोफेसर एराथ शाजी कहते हैं कि नदियों और झीलों में माइक्रोप्लास्टिक का बढ़ना पर्यावरण के लिए एक गंभीर समस्या बन चुका है। लेकिन अभी तक इस बात पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है कि ये प्लास्टिक आखिर पानी में किन रास्तों से पहुंच रहा है। उनका कहना है कि अगर हम उन रास्तों या स्रोतों को पहचान लें जहां से ये प्लास्टिक पानी में आ रहा है और वहीं पर इसे रोक दें, तो यह प्रदूषण को कम करने में काफी असरदार साबित हो सकता हैं। उदाहरण के तौर पर, डल झील जैसे शहरी इलाकों में लगातार होने वाली बारिश इन माइक्रोप्लास्टिक कणों को बहाकर झील में ले आती है और समस्या को बढ़ा देती है। शाजी इस अध्ययन का हिस्सा नहीं थे।
अध्ययन की लेखिका सुधा गोयल ने बताया कि अध्ययन का अगला महत्वपूर्ण पहलू ‘लगातार होने वाली बारिश’ के प्रभाव को समझना था। उन्होंने कहा, “इसके नतीजे काफी चौंकाने वाले रहे। लगातार बारिश ने न सिर्फ माइक्रोप्लास्टिक की मात्रा बढ़ा दी, बल्कि स्टॉर्म वाटर निकासी के पास पॉली विनाइल क्लोराइड, पॉलीयुरेथेन और एक्रिलोनाइट्राइल ब्यूटाडीन स्टाइरीन (एक थर्मोप्लास्टिक) जैसे अधिक खतरनाक पॉलिमर भी पाए गए। इन रसायनों ने झील के पानी की विषाक्तता को और अधिक कर दिया था।
गोयल कहती हैं कि इसके साथ जलवायु परिवर्तन से जुड़ी एक बड़ी समस्या भी है। साल 2023 एशिया और यूरोप के इतिहास में दूसरा सबसे गर्म साल रहा है। हवा में नमी बढ़ने के कारण अब पहले से कहीं ज़्यादा तेज़ और बार-बार बारिश होने की आशंका है। वह चेतावनी देते हुए कहती हैं, “हमें यह नहीं पता कि भारत के मौजूदा सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट मौसम के इन बड़े बदलावों को झेलने के लिए कितने सक्षम हैं। भारी बारिश के कारण जब अचानक बहुत ज्यादा पानी और कचरा इन प्लांटों में पहुंचेगा, तो इनकी सफाई करने की सामान्य प्रक्रिया बिगड़ सकती है। इसका नतीजा यह होगा कि जो पानी साफ होकर बाहर निकलेगा, उसमें भी माइक्रोप्लास्टिक की मात्रा मौजूद रहेगी।”
वह आगे कहती हैं, “देश में कचरा और अपशिष्ट प्रबंधन की अव्यवस्था को देखते हुए, हमें आने वाले सालों में अपने मीठे पानी के स्रोतों में माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण के और अधिक गंभीर होने की आशंका सता रही है। ऐसे में हमें और बेहद सख्त कदम उठाने होंगे।”
शाजी के मुताबिक, डल झील पर हुआ यह अध्ययन शहरी जल प्रणालियों को समझने का एक नया और गहरा नजरिया पेश करता है। इसमें केवल वैज्ञानिक आंकड़ों को ही नहीं, बल्कि समाजिक-आर्थिक स्थिति और हितधारकों की राय भी जोड़ी गई है। इसके अलावा कई अन्य अध्ययनों में तेजी से बढ़ते शहरीकरण और बढ़ती आबादी, प्रदूषण और खेती का विस्तार, अक्रामक प्रजातियों और कचरा प्रबंधन की कमी जैसे प्रमुख कारकों को डल झील की सेहत और वहां रहने वाले लोगों के जीवन पर पड़ने वाले कुछ बड़े खतरों के रूप में पहचाना है। शाजी ने बताया, “आईआईटी खड़गपुर का यह अध्ययन डल झील में माइक्रोप्लास्टिक के कारण वर्तमान और भविष्य में पैदा होने वाले खतरों को उजागर करता है। और इस बात पर भी जोर देता है कि झील को सुरक्षित बनाए रखने के लिए हमें ऐसी प्रबंधन रणनीतियां अपनाने की जरूरत है जो समय और परिस्थितियों के हिसाब से बदली जा सकें।”

खतरे में भारत की शहरी झीलें
गोयल कहती हैं, “हालांकि अभी भी राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक निगरानी की जरूरत है, लेकिन हमारे अध्ययन और हाल की अन्य रिपोर्ट भारत की शहरी झीलों में माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण को एक बड़ी और गंभीर समस्या मान रही हैं।” उन्होंने आगे कहा, “हमने यह देखने के लिए एक अध्ययन किया कि भारतीय झीलें दुनिया के अन्य देशों की झीलों के मुकाबले कितनी प्रदूषित हैं। रिसर्च से सामने आया कि भारतीय झीलें दूसरे देशों की तुलना में कहीं ज्यादा प्रदूषित हैं। इसका बड़ा कारण भारत में कचरा प्रबंधन के बुनियादी ढांचे की कमी, प्लास्टिक कचरे के खतरों के प्रति जनता में जागरूकता और शिक्षा का अभाव, संसाधनों की भारी कमी और हर कहीं कूड़ा फेंकने की आदतें हैं।”
रिपोर्ट बताती है कि डल झील में माइक्रोप्लास्टिक की औसत मात्रा, फिनलैंड की साइमा झील और कनाडा की ओंटारियो झील की तुलना में कहीं अधिक थी। हालांकि, जब इसकी तुलना एशिया की अन्य झीलों से की गई, तो यह मात्रा लगभग उतनी ही मिली जितनी अन्य विकासशील देशों की शहरी झीलों में होती है। इनमें भारत की रेणुका झील व कुमारस्वामी झील और पाकिस्तान की रावल झील शामिल हैं।
गोयल का कहना है कि डल झील जैसी शहरी झीलें विशेष रूप से संवेदनशील हैं क्योंकि ये घनी आबादी वाले क्षेत्रों में स्थित हैं और यहां साल भर बड़ी संख्या में पर्यटक आते हैं। कचरा प्रबंधन और बारिश के पानी के निकास की सही व्यवस्था न होने के कारण, ये झीलें एक तरह से ऐसी सिंक बन जाती हैं, जहां आसपास के पूरे इलाके की गंदगी आकर जमा हो जाती है।
यह समस्या सिर्फ पानी की सतह तक सीमित नहीं है, बल्कि तल में जमी गंदगी की गहराई तक में समाई हुई है। ये तलछट माइक्रोप्लास्टिक को अपने अंदर जमा कर लेती हैं और जब भारी बारिश होती है, तो ये कण फिर से पानी में ऊपर आ जाते हैं। इससे प्रदूषण का कभी न खत्म होने वाला एक चक्र बन जाता है। भारत की कोई भी ऐसी शहरी झील, जहां मानवीय गतिविधियां काफी ज्यादा है, वो डल झील की तरह या फिर शायद इससे भी बदतर स्थिति का सामना कर रही होंगी।
शाजी भी इस बात से सहमत हैं कि भारत के शहरों की झीलों में माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण एक बहुत बड़ी और लगातार बढ़ती समस्या है। तिरुवनंतपुरम की वेल्लयानी झील, चेन्नई की झीलों, तमिलनाडु की धरापदवेदु झील और कश्मीर की डल झील जैसे अलग-अलग इलाकों में हुए अध्ययन से यह बात साफ हो चुकी है। इन झीलों के पानी और तलछट, दोनों ही जगहों पर माइक्रोप्लास्टिक की काफी अधिक मात्रा पाई गई। इसमें सबसे ज्यादा प्लास्टिक के रेशे और टुकड़े मिले हैं, जो आमतौर पर उच्च घनत्व पॉलिएथिलीन (एचडीपीई), पॉलीप्रोपाइलीन (पीपी), पॉलीएथिलीन टेरिफ्थेलैट (पीईटी) और निम्न घनत्व पॉलिएथिलीन (एलडीपीई) जैसे अलग-अलग तरह के प्लास्टिक से बने होते हैं।
शाजी की टीम का एक अन्य अध्ययन वेल्लयानी झील में माइक्रो प्लास्टिक प्रदूषण की व्यापकता और विशेषताओं के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी देता है। यह दक्षिण भारत की मीठे पानी की झीलों में माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण पर किए गए शुरुआती अध्ययनों में से एक है।
अध्ययन में झील के तीन अलग-अलग हिस्सों से लिए गए पानी के नमूनों में माइक्रोप्लास्टिक की मौजूदगी पाई गई। शोध के अनुसार, गर्मियों की तुलना में मानसून के मौसम में माइक्रोप्लास्टिक की मात्रा ज्यादा थी। शाजी कहते हैं, ये नतीजे इसलिए अधिक चिंताजनक हैं क्योंकि वेल्लायनी झील इस इलाके के हजारों लोगों के लिए पीने के पानी का मुख्य स्रोत है। लोगों की सेहत और पर्यावरण को बचाने के लिए अब यह बहुत ज़रूरी हो गया है कि कचरा प्रबंधन और प्रदूषण रोकने के लिए तुरंत और कड़े कदम उठाए जाएं।
इसी तरह, वेल्लोर इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर एस. महेनथिरन द्वारा वेल्लोर की धरपदावेदु झील पर किए गए एक अध्ययन में भी सतह और तलछट में माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण का स्तर मध्यम से काफी अधिक पाया गया। यह अध्ययन माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण फैलाने में इंसानी गतिविधियों और झील के इकोसिस्टम को बचाने के लिए कचरा प्रबंधन और प्रदूषण नियंत्रण के उपायों में सुधार की जरूरत पर भी चर्चा करता है।

नियमों, तकनीक और जागरूकता में सुधार
शाजी का कहना है कि डल झील समेत भारत की शहरी झीलों में माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण को कम करने के लिए तकनीक, कड़े नियमों और सामुदायिक प्रयासों के तालमेल की जरूरत है। इसके लिए प्लास्टिक कचरे को उसके शुरुआती स्रोत पर ही अलग करने, रीसाइक्लिंग को बढ़ावा देने और सिंगल-यूज़ प्लास्टिक के इस्तेमाल को कम करने जैसे कदमों के साथ-साथ सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स को आधुनिक बनाना और नालों में फिल्टर लगाना अनिवार्य है।
इसके अलावा वेटलैंड्स को फिर से बहाल करना और झीलों के किनारों पर पेड़-पौधे लगाना भी प्रभावी हो सकता है। ये पौधें प्राकृतिक फिल्टर की तरह काम करते हुए माइक्रोप्लास्टिक को सोखने और झील के पारिस्थितिकी को बेहतर बनाने में मदद करते हैं।
शाजी के मुताबिक, माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण वाली जगहों की पहचान और सुधार के लिए नियमित निगरानी और शोध जरूरी है, जबकि लोगों की भागीदारी से ही आदतों में स्थायी बदलाव लाया जा सकता है। इसके अलावा राष्ट्रीय स्तर पर एक मजबूत नीति की जरूरत है, जिसमें कंपनियों की जवाबदेही (ईपीआर), बेहतर शहरी नियोजन और औद्योगिक कचरे के लिए सख्त मानक और बेहतर निगरानी शामिल हो। यह नीति भारत के शहरों में पानी के स्रोतों को माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण से बचाने और नियमों को सख्ती से लागू करने में मदद करेगी।
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महेनथिरन झीलों के आसपास के उन क्षेत्रों में फिल्ट्रेशन सिस्टम जैसी जल निकासी प्रबंधन तकनीक अपनाने का सुझाव देते हैं जहां से पानी झीलों में बहकर आता है। इसके साथ ही, प्लास्टिक के इस्तेमाल पर कड़े नियम लागू करना, पर्यावरण के अनुकूल विकल्पों को बढ़ावा देना और लोगों को अपनी जिंदगी से प्लास्टिक को बाहर निकालने जैसी आदतें अपनाने के लिए प्रेरित करना, इस समस्या के ठोस समाधान हो सकते हैं। प्लास्टिक के इस्तेमाल पर सख्त नियम और पर्यावरण के अनुकूल विकल्पों को बढ़ावा देने से भी झीलों में माइक्रो प्लास्टिक प्रदूषण की समस्या से निपटा जा सकता है। उनके मुताबिक, “झीलों में माइक्रो प्लास्टिक के प्रभाव के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए सोशल मीडिया का सहारा लिया जा सकता है। जागरूकता अभियान जैसे जन भागीदारी कार्यक्रम चलाना और झीलों में माइक्रोप्लास्टिक की नियमित निगरानी करना प्रदूषण के रुझानों को ट्रैक करने और उन्हें कम करने में मदद करेगा।”
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 30 अक्टूबर 2025 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: कर्नाटका के बेंगलुरु की बेलंदूर झील में उद्योगों से निकलने वाले जहरीले प्रदूषक। तस्वीर – (एपी फोटो/एजाज राही)