- नेपाल के ऊंचे पहाड़ी इलाकों में रहने वाले पारंपरिक चरवाहे जलवायु परिवर्तन, बढ़ती लागत, मजदूरों की कमी और बीमारियों के अलावा याक से बने उत्पादों के लिए बाजार की कमी से परेशान हैं।
- बढ़ता तापमान, जल चक्र, पेड़-पौधों और मिट्टी में कार्बन की मात्रा का संतुलन बदल रहा है। इसके साथ ही, आर्द्रभूमियों या वेटलैंड्स के सूखने और ग्लेशियरों में होने वाले बदलावों के कारण आग लगने का खतरा भी बढ़ गया है, जिससे पालतू और जंगली, दोनों ही तरह के याकों के लिए चराई क्षेत्र कम होते जा रहे हैं।
- जंगली याकों के आवासों का कम होना, पालतू याकों के साथ क्रॉस-ब्रीडिंग, उनके भोजन के स्रोतों जैसे कि यार्त्साबुम्बू का अत्यधिक दोहन और चारागाहों की घटती गुणवत्ता कुछ ऐसे बड़े खतरे हैं, जिनसे उनकी मूल नस्ल और अस्तित्व को नुकसान पहुंच सकता है।
यंगडुदुग झामा लामा ने अपना बचपन पश्चिमी नेपाल के डोल्पो क्षेत्र के दुर्गम पहाड़ों के बीच विशाल पहाड़ी चारागाहों में ‘नागतोन’ (पालतू याक) चराते हुए बिताया है। लेकिन इन दो दशकों में घूम-घूमकर मवेशियों को चराने का यह तरीका काफी बदल चुका है। नेपाल के सबसे बड़े और सुदूर जिले डोल्पा के विजेर (त्रा) गांव की रहने वाली 24 वर्षीय लामा बताती हैं, “अब हमारे पास सिर्फ चार याक बचे हैं।”
लामा जैसे पारंपरिक पशुपालकों के लिए याक (बोस ग्रुनिएन्स) पालना अब बहुत मुश्किल हो गया है। याक का इस्तेमाल परिवहन, मांस और ऊन के लिए किया जाता रहा है, लेकिन बढ़ती लागत, जलवायु परिवर्तन, स्थानीय स्तर पर याक के उत्पादों के लिए बाज़ार न होना, बार-बार फैलने वाली बीमारियां और अन्य सामाजिक-आर्थिक दबावों के कारण यह काम मुश्किल होता जा रहा है। इससे न सिर्फ पालतू याकों के लिए, बल्कि उनके जंगली वंशजों (बोस म्यूटस) के लिए भी चुनौतियां बढ़ गई हैं।
लामा ने कहा, “मेरे परिवार ने पिछले साल ही शरद ऋितु में पड़ोसी मुस्ताङ जिले में अपने दर्जनों याक बेचे थे। उन्हें पालने में बहुत ज्यादा मेहनत और खर्चा हो रहा था। हमारे पास उन्हें चराने के लिए ‘खर्क’ (चारागाह/घास के मैदान) भी बहुत कम बचे हैं।”
हिमालय क्षेत्रों से बहुत से युवा बेहतर अवसरों की तलाश में बड़े शहरों या विदेशों की ओर पलायन कर रहे हैं। वहां कामगारों की भारी कमी हो गई है। नेपाल में आंतरिक प्रवासन पर राष्ट्रीय जनसंख्या और आवास जनगणना 2021 की रिपोर्ट के अनुसार, देश के पहाड़ी इलाकों में बाहर से आकर बसने वाले लोगों की संख्या 1971 में 9,698 (2.2%) थी, जो 2021 में बढ़कर 75,542 (2.4%) हो गई। लेकिन, पहाड़ों को छोड़कर बाहर जाने वाले लोगों की संख्या इतनी ज्यादा थी कि 2021 तक कुल मिलाकर यहां के प्रवासन का आंकड़ा नकारात्मक (-543,966) दर्ज किया गया (यानी आने वालों से कहीं ज्यादा लोग पहाड़ों से बाहर चले गए)।
इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट के मुताबिक, जलवायु परिवर्तन अब हिमालय के ऊंचाई पर स्थित चरागाहों के पारिस्थितिकी तंत्र को भी प्रभावित कर रहा है। साथ ही यह इन भू-भागों में जल चक्र को भी बदल रहा है, जिससे मिट्टी में नमी बने रहने के समय और उसकी मात्रा में बदलाव आ रहा है।
इन बदलावों का असर वहां के पेड़-पौधों, मिट्टी में जमा कार्बन की मात्रा और जैविक पदार्थों के सड़ने-गलने की गति पर साफतौर पर देखा जा सकता है। साथ ही, पीटभूमि और आर्द्रभूमियों के सूखने से आग लगने का खतरा बढ़ रहा है, तो वहीं कुछ चरागाह ग्लेशियरों में हो रहे बदलावों के कारण जलमग्न होने के खतरे का भी सामना कर रहे हैं।

चरवाहों का मानना है कि अब याकों में बीमारियां पहले के मुकाबले तेजी से फैल रही हैं। “ये बीमारियां जानलेवा होती हैं। डॉक्टर को बुलाने के लिए हमें कई दिनों तक पैदल चलना पड़ता है और अगर याक की मौत हो जाए, तो बीमा की रकम इतनी कम है कि चरवाहे उसे क्लेम करने के लिए ग्रामीण नगरपालिका कार्यालय तक जाने की जहमत भी नहीं उठाते।” हालाँकि, बीमारियों के फैलने और जलवायु परिवर्तन के बीच सीधा संबंध अभी पूरी तरह साबित नहीं हुआ है, लेकिन शोधकर्ताओं ने पाया है कि बढ़ती गर्मी और बदलते मौसम के कारण याकों के पारंपरिक भोजन में कमी आ रही है। यह उनके स्वास्थ्य, काम करने की क्षमता और उत्पादकता को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर रहा है, साथ ही बीमारियों का खतरा भी बढ़ रहा है।
कोविड-19 के बाद डोल्पा-चीन सीमा पर स्थित मोरीमला और काटो नाका बंद होने से स्थिति और भी खराब हो गई। चरवाहे सालों से इन रास्तों का इस्तेमाल अपने याकों को सीमा के उस पार चराने और पनीर व ऊन बेचने के लिए करते आए हैं।
लामा ने बताया, “इन रास्तों के बंद होने के बाद अब हम अपने याकों को सीमा के उस पार नहीं ले जा पा रहे हैं। कुछ लोगों ने तो याक पालना छोड़कर गाय और बकरियां पालना शुरू कर दिया है। याकों के विपरीत ये जानवर साल भर चरते हैं, जिससे चारागाहों में ज़रूरत से ज़्यादा चराई (ओवर-ग्रेजिंग) होने लगी है।”
वहीं ऊन और पनीर जैसे उत्पादों के लिए बाज़ार की स्थिति भी ठीक नहीं है। उन्होंने कहा, “इन चीज़ों को बेचने के लिए स्थानीय स्तर पर कोई बाज़ार नहीं है। इन्हें काठमांडू या अन्य जिलों के बड़े बाज़ारों तक पहुंचाना बहुत महंगा पड़ता है।”
नेपाल के हिमालयी क्षेत्रों में जंगली याकों का अध्ययन करने वाले पशु चिकित्सा सेवा विभाग के पशु चिकित्सक अधिकारी कृष्ण प्रसाद आचार्य का कहना है कि ये चुनौतियां सिर्फ पालतू याकों तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि उनके जंगली साथियों को भी प्रभावित कर रही हैं। उन्होंने तिब्बती पठार पर फैली याक की आबादी का हवाला देते हुए यह बात कही, क्योंकि हिमालय के इन दोनों क्षेत्रों में जंगली याक की प्रजाति एक जैसी ही है।
जंगली याकों की कुल संख्या के बारे में कोई सटीक आंकड़ा तो उपलब्ध नहीं है, लेकिन अनुमानों के अनुसार दुनिया भर में इनकी संख्या 10,000 से भी कम है। हालाँकि, शोधकर्ताओं ने नेपाल के सबसे सुदूर इलाकों में से एक, ‘अपर हुमला’ में दो जंगली याकों को देखा है, जिससे डोल्पा जैसे पहाड़ी जिलों में भी इनके मौजूद होने की संभावना बढ़ गई है।


जैसे-जैसे नमी और पानी की कमी के कारण चारागाह खराब और छोटे होते जा रहे हैं, उस हिसाब से जंगली याकों के चरने की जगहें भी कम हो सकती हैं। इससे उनके पालतू याकों के इलाकों के साथ ओवरलैप होने की आशंका है। शोधकर्ताओं का मानना है कि इससे दोनों के बीच क्रॉस-ब्रीडिंग हो सकती है।
पशु चिकित्सा अधिकारी आचार्य ने मोंगाबे को बताया, “मौजूदा प्रभावों के बीच जंगली याकों की पालतू याकों के साथ क्रॉस-ब्रीडिंग का एक और खतरा पैदा हो गया है।”
वह आगे कहते हैं, “जंगली याक बहुत दुर्लभ हैं और उनकी आनुवंशिक बनावट अनोखी होती है, इसलिए क्रॉस-ब्रीडिंग के कारण होने वाला यह मिश्रण उनकी मूल नस्ल के लिए खतरा बन सकता है।” शोध के मुताबिक, क्रॉस-ब्रीडिंग से याकों के उन विशेष गुणों में भी बदलाव आता है जो उन्हें ऊंचाइयों पर जीवित रहने में मदद करते हैं। ऐसे में उनके अस्तित्व और संरक्षण के लिए जोखिम बढ़ सकता है।
यंगडुंग के पिता कर्मा रिकजिन लामा बताते हैं कि दोंग (नर और मादा जंगली याक) लंबे समय से उनके इलाकों में चरते आए हैं, लेकिन पिछले दो दशकों में इनका दिखना काफी कम हो गया है। वह आगे कहते हैं, “भले ही क्रॉस-ब्रीडिंग को जंगली याकों के लिए एक बड़े खतरे के रूप में देखा जाता हो, लेकिन कुछ याक चरवाहे खुद ही अपनी ‘द्री’ (पालतू मादा याक) का जंगली याक के साथ प्रजनन कराना पसंद करते हैं, ताकि उन्हें ज्यादा मजबूत नस्ल के बच्चे मिल सकें।”
रिगज़िन ने कहा, “ये बछड़े आम पालतू याक के मुकाबले शारीरिक रूप से अधिक मजबूत होते हैं और बीमारियों से बेहतर लड़ सकते हैं। लेकिन समस्या यह है कि अक्सर ये बछड़े जंगली झुंडों के साथ घुल-मिल जाते हैं और पालतू बनकर नहीं रहना चाहते। यह हमारे लिए तभी फायदेमंद है, जब वे वे हमारे पास रहना चाहें।”
इनलैंड नॉर्वे यूनिवर्सिटी के पीएचडी स्कॉलर नरेश कुसी (जिन्होंने अपर हुमला में जंगली याकों पर शोध किया है) का मानना है कि क्रॉस-ब्रीडिंग की प्रक्रिया किसी भी लिहाज से सही नहीं है।
कुसी ने बताया कि कुछ साल पहले जब अपर हुमला में पालतू याकों ने जंगली याकों के साथ प्रजनन किया था, तो चरवाहों को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। बछड़े शारीरिक रूप से काफी बड़े थे, जिससे मादा याकों को उन्हें जन्म देने में बहुत मुश्किलें आई। लिमी घाटी के कुछ चरवाहे तो अपनी मादा याकों को खोने के डर से ऐसा प्रजनन कराना ही नहीं चाहते। कुसी ने कहा, “अपनी आनुवंशिक भिन्नता के कारण, ये बछड़े अधिक आक्रामक होते हैं और चरवाहों के लिए इन्हें पालतू बनाना बहुत मुश्किल हो जाता है।”
लामा के अनुसार, भेड़ों और बकरियों जैसे जानवर, जिन्हें पालना आसान होता है, हाल के दिनों में याक पालन के लिए नई चुनौती बनकर उभरे हैं।
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जलवायु परिवर्तन के अलावा, इंसानी गतिविधियों का दखल भी याकों की आबादी पर असर डाल रहा है। लामा ने मोंगाबे को बताया, “जंगली याक इंसानों से दूर रहना पसंद करते हैं, इसलिए वे इंसानी इलाकों में कम ही दिखते हैं। लेकिन समस्या यह है कि व्यापारी यार्सा गुनबू (ओफियोकॉर्डिसेप्स साइनेंसिस) की अंधाधुंध कटाई कर रहें हैं, जिससे इनके अस्तित्व पर खतरा मंडराने लगा है। गुनबू एक कीमती फंगस होने के साथ-साथ जंगली याकों के भोजन का एक मुख्य स्रोत भी है।”
लामा का कहना है कि ऐसे समय में पारंपरिक तरीके से पशुपालन बहुत जरूरी हो जाता है। “हम अपने पुराने अनुभवों के आधार पर याक चराते हैं (बारी-बारी से अलग-अलग जगहों पर)। हम अपने चरागाहों और आसपास के पूरे वातावरण में होने वाले हर छोटे-बड़े बदलाव पर भी नज़र रखते हैं।”

हालांकि, चरागाहों की खराब स्थिति और बछड़ों की मृत्यु दर बढ़ाने वाली बीमारियों के कारण देश भर के पर्वतीय क्षेत्रों में पारंपरिक पशुपालन में गिरावट आई है, जिससे पशुपालकों की लागत बढ़ गई है और साथ ही, चारागाह पारिस्थितिकी तंत्र को बनाए रखने वाला पारंपरिक ज्ञान भी धीरे-धीरे खत्म हो रहा है।
आचार्य ने इस बात पर जोर दिया कि संरक्षण का काम अकेले नहीं किया जा सकता। स्थानीय समुदाय और चरवाहों की भूमिका इस ज्ञान को बचाए रखने और जंगली याक के संरक्षण के लिए सबसे जरूरी है। भले ही याक घास के मैदानों को बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, फिर भी वे राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उतना ध्यान आकर्षित नहीं कर पाते जिसके वे हकदार हैं।
कुसी का कहना है कि स्थानीय लोगों का ज्ञान संरक्षण के प्रयासों में काफी मदद करता है, लेकिन जंगली याक की आबादी पर मंडरा रहे कई खतरों को देखते हुए, याक जैसी महत्वपूर्ण प्रजातियों के बचाव के लिए स्थानीय और राष्ट्रीय, दोनों स्तरों पर ठोस कदम उठाए जाने चाहिए।
इस पहल की शुरुआत वन्यजीव अभयारण्य बनाकर की जा सकती है, जहां जंगली याक जैसे जानवर बिना किसी रोक-टोक के घूम सकें और वहां पशुपालन पर पाबंदी हो। कुसी ने मोंगाबे को बताया, “जंगली याक पर मंडराते कई खतरों को देखते हुए, उनके संरक्षण के लिए यह एक मुख्य समाधान हो सकता है।”
यह खबर मोंगाबे टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी ग्लोबल वेबसाइट पर 27 मार्च 2026 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीरः डोल्पो के विजेर (त्रा) गांव में एक याक के बछड़े के साथ यंगडुंग। तस्वीर: यंगडुंग झामा लामा।