[कमेंट्री] स्वच्छ ऊर्जा का लक्ष्य: सिर्फ मंजिल नहीं रास्तों की भी करनी होगी परवाह

तेलंगाना स्थित एक सोलर प्लांट का दृश्य। केंद्रीय विद्युत नियामक आयोग के एक अनुमान के अनुसार सौर फोटोवोल्टिक के प्रत्येक मेगावाट  में 2.5 हेक्टेयर भूमि की आवश्यकता होती है। पवन ऊर्जा और बायोमास के लिए भी अधिक भूमि की आवश्यकता होती है। वर्ष 2007 में आए केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण की एक गणना के अनुसार, स्वदेशी कोयले का उपयोग करने वाले 1,000 मेगावाट  थर्मल पावर प्लांट को 574 हेक्टेयर (1,420 एकड़) भूमि की आवश्यकता होगी। ऐसे में अगर सावधानी नहीं बरती गयी तो भूमि-विवाद जारी रहेंगे। तस्वीर– थॉमस लॉयड ग्रुप/विकिमीडिया कॉमन्स

नई चुनौतियों पर ध्यान नहीं दिया गया तो भविष्य की चमक फीकी रहेगी

एनर्जी ट्रांजिशन की सामान्य समझ यह है कि जीवाश्म-ईंधन आधारित ऊर्जा कम होती जाती है और अक्षय ऊर्जा उसका स्थान लेती जाती है। यह एक सकारात्मक पर्यावरण से जुड़ा परिवर्तन माना जाता है। लेकिन यह बस एक पक्ष को दर्शाता है। दूसरा पक्ष यह है कि इस परिवर्तन में कुछ पुरानी चुनौतियां सामने आती रहती हैं तो कुछ नई चुनौती भी देखने को मिलती है। इस तरह जब भारत वैश्विक स्तर पर हो रहे एनर्जी ट्रांजिशन के मुहाने पर खड़ा है तो यह प्रयास होना चाहिए कि इस परिवर्तन में पर्यावरण के साथ-साथ समाज के सब तबके का ख्याल रखा जाए।

यह स्पष्ट है कि आने वाले दशकों में सौर ऊर्जा थर्मल पावर को पछाड़ कर शीर्ष पर आ जाएगी। ऐसे में अगर सावधानी नहीं बरती गयी तो भूमि-विवाद जारी रहेंगे। वर्ष 2007 में आए केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण की एक गणना के अनुसार, स्वदेशी कोयले का उपयोग करने वाले 1,000 मेगावाट थर्मल पावर प्लांट को 574 हेक्टेयर (1,420 एकड़) भूमि की आवश्यकता होगी। अगर पॉवर प्लांट आयात किए गए कोयले का इस्तेमाल करने लगें तो कम भूमि की जरूरत पड़ती है।

वहीं केंद्रीय विद्युत नियामक आयोग के एक अनुमान के अनुसार सौर फोटोवोल्टिक के प्रत्येक मेगावाट (MW) में 2.5 हेक्टेयर भूमि की आवश्यकता होती है। पवन ऊर्जा और बायोमास के लिए अधिक भूमि की आवश्यकता होती है। हाल ही में प्रकाशित नेचर ग्रुप की एक रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि अगर 2050 तक ऐसी स्थिति बने जिसमें कुल ऊर्जा उत्पादन का 54 प्रतिशत सौर ऊर्जा से आए तो इसके लिए देश के 0.7% से 0.9%  भूमि की आवश्यकता होगी।

भारत के ऊर्जा संबंधित बदले परिदृश्य में थर्मल ऊर्जा की तुलना में भूमि की अधिक आवश्यकता होगी। तात्पर्य यह है कि इसके लिए कृषि भूमि,  जैव विविधता से समृद्ध भूमि या अन्य विकास गतिविधियों के लिए सुरक्षित भूमि का भी इस्तेमाल होगा। मतलब भूमि से जुड़े विवाद बढ़ेंगे। घरों की छत पर सोलर पैनल के अधिक से अधिक इस्तेमाल करने पर इसको कुछ हद तक सुलझाया जा सकता है। लेकिन तब नई चुनौतियां होंगी। जैसे ऊर्जा का वरीकेंद्रीकृत स्वरूप और इसका वितरण। इसमें प्रबंधन संबंधी जटिलताएं आएंगी।

हाल में जलाशयों में सौर फोटोवोल्टिक पैनलों के इस्तेमाल की बात की जा रही है। इससे भी कई पर्यावरण संबंधी चिंताएं उभरेंगी।


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सबको साथ लेकर विकास करने का एक मौका

भारत की ऊर्जा विकास की कहानी अभी भी प्रगति पर है।  नवीकरणीय ऊर्जा की तरफ बढ़ने से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन की गति को कम करने में मदद मिलेगी। अगर ऐसा हुआ तो भारतीय उपमहाद्वीप में औसत तापमान में कम वृद्धि होगी। इससे खेती-किसानी पर भी कम प्रभाव पड़ेगा, मौसम की अनियमित मार भी लोगों पर कम पड़ेगी।

कहने की जरूरत नहीं कि इसी लक्ष्य को पाने के लिए प्रयासरत रहना है। पर ऊर्जा क्षेत्र में परिवर्तन का तरीका भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना की इसके तहत हासिल किया जाने वाला लक्ष्य। अगर पर्यावरण और अन्य मुद्दों की परवाह किए बिना सिर्फ लक्ष्य हासिल करने पर ध्यान दिया गया तो हो सकता है कि भविष्य वैसा न हो जैसा देश चाहता है।  चुनौती यह है कि लक्ष्य के साथ-साथ समाधान के तरीकों पर भी नजर रखी जाए। यह एक मौका है जब देश के विकास को स्थायी और सबको साथ लेकर चलने वाला बनाया जाए।

 

बैनर तस्वीरः ओडिशा की मीनाक्षी दीवान यूनाइटेड किंगडम के अंतर्राष्ट्रीय विकास विभाग (डीएफआईडी) की मदद से अपने गांव में बिजली लेकर आई। वह सौर ऊर्जा की मदद से गांव को रोशन कर रही हैं। तस्वीर– एब्बी टायलर-स्मिथ / पैनोस पिक्चर्स/अंतर्राष्ट्रीय विकास विभाग (डीएफआईडी), यूके/फ्लिकर 

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