- नई पहलें स्वास्थ्य सेवा, सामाजिक सुरक्षा, जलवायु जागरूकता और प्रवासन सहायता को सीधे प्रवासी श्रमिकों और उनके परिवारों तक पहुंचाती हैं। इससे दूरी, समय और पहुंच जैसी बाधाएं दूर होती हैं।
- जानकारों का कहना है कि जलवायु की वजह से प्रवासन तब होता है जब अन्य कारकों के साथ मिलकर गर्मी से जुड़ी दिक्कतें, बाढ़, असुरक्षित आजीविका और सामाजिक बहिष्कार लोगों को पलायन करने के लिए मजबूर करते हैं। इसके लिए सामाजिक सुरक्षा के ऐसे तरीके जरूरी होते हैं जो जलवायु से जुड़े जोखिमों को ध्यान में रखें।
- कई भाषाओं वाले अलर्ट, सामुदायिक आयोजक, मोबाइल क्लीनिक और स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल मददगार तरीके प्रवासियों को स्वास्थ्य सेवाएं, आपदा संबंधी चेतावनियां, अधिकार और शिक्षा पाने में मदद करते हैं। ऐसा वहां होता है जहां पारंपरिक तरीके काम नहीं करते।
मार्च की एक शाम और केरल के एर्नाकुलम जिले का व्यस्त पाथलम जंक्शन। यहां कार पार्किंग वाली जगह के पास एम्बुलेंस-नुमा मोबाइल क्लिनिक आकर रुकता है। वैन के पीछे चालक एक डेस्क लगाता है। यह दो ‘बंधु क्लीनिक’ में से एक है। यह गैर-लाभकारी संगठन दूसरे राज्यों से आने वाले प्रवासी मजदूरों और कमजोर समुदायों को सीधे उनके काम करने की जगहों या उनके घरों पर ही प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराता है। इसे कोच्चि स्थित गैर-लाभकारी संगठन ‘सेंटर फॉर माइग्रेशन एंड इंक्लूसिव डेवलपमेंट’ (CMID) और नेशनल हेल्थ मिशन (NHM) चलाते हैं। यह नया मॉडल प्रवासी मजदूरों के गंतव्य स्थलों पर ही स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराता है।
पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद के रहने वाले 40 साल के मोहम्मद मिजानुर रहमान मुफ्त में परामर्श के लिए क्लिनिक के बाहर अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं। वह कहते हैं, “यह क्लिनिक हर सोमवार को आता है। मैं जानता हूं कि यहां मेरा मुफ्त में चेक-अप हो सकता है।”
रहमान हर साल 10 महीने केरल में निर्माण मजदूर के तौर पर बिताते हैं। पिछले दस साल से वह ऐसा कर रहे हैं। वह दर्जन-भर लोगों के साथ टिन से बनी छोटी-सी कोठरी में रहते हैं। यह जगह घनी आबादी वाली झुग्गी में है, जहां साल के अधिकतर समय गर्मी रहती है। रहमान कहते हैं कि यह गर्मी उन्हें थका देती है। उन्हें उम्मीद है कि डॉक्टर उनकी मदद कर पाएंगे।

जलवायु प्रवासियों तक पहुंच
वैसे तो भारत में प्रवासी मजदूरों को भोजन, रियायती शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा जैसी सामान्य मदद देने के लिए कई कार्यक्रम हैं। लेकिन, IIHS यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ एनवायरनमेंट एंड सस्टेनेबिलिटी की एसोसिएट प्रोफेसर चांदनी सिंह बताती हैं, “ऐसी अतिरिक्त व्यवस्था को शामिल करना बहुत जरूरी है जो खास तौर पर जलवायु संबंधी जोखिमों से निपटने की क्षमता बढाए।”
देश की सामाजिक सुरक्षा व्यवस्थाएं अधिवास की स्थिति (domicile status) से जुड़ी हुई हैं। इसका मतलब है कि आधार कार्ड के अनुसार जन्म स्थान या निवास स्थान। इस वजह से 60 करोड़ आंतरिक प्रवासियों को बुनियादी जरूरतों, लाभों और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का फायदा उठाने के लिए खासी मशक्कत करनी पड़ती है। यह तबका आबादी का लगभग 40% है। सिंह बताती हैं कि जो लोग जलवायु संबंधी दिक्कतों के कारण पलायन करते हैं और जो लोग अपने गंतव्य पर जलवायु के दुष्प्रभावों का सामना करते हैं, उनकी स्थिति बहुत दयनीय है।
CMID के सह-संस्थापक और कार्यकारी निदेशक बिनॉय पीटर कहते हैं कि जलवायु परिवर्तन प्रवासियों के लिए कई तरह की मुश्किलें पैदा करता है। इसमें उनके मूल स्थान या गंतव्य पर पर्यावरण का दबाव, रहने की असुरक्षित स्थितियां, अनियमित रूप से मिलने वाला ज्यादा जोखिम वाला काम और सामाजिक बहिष्कार जैसी समस्याएं मिलकर उनकी मुश्किलें और बढ़ा देती हैं।
क्लाइमेट एक्शन नेटवर्क साउथ एशिया का अनुमान है कि 2050 तक भारत में 4.5 करोड़ लोगों को जलवायु आपदाओं के कारण पलायन करने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है।
मोंगाबे-इंडिया ने जिन जानकारों से बात की, उनका कहना है कि स्वास्थ्य, शिक्षा और श्रम विभागों द्वारा दी जाने वाली सेवाओं के लाभार्थियों से उम्मीद की जाती है कि वे संस्थानों और केंद्रों तक पहुंचें, जो आमतौर पर शहर के बीचोंबीच होते हैं और अक्सर उनके रहने की जगह से बहुत दूर होते हैं।
सिंह कहते हैं, “पलायन के अलग-अलग तरीकों के हिसाब से सामाजिक सुरक्षा योजनाओं को तैयार करने के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। जो लोग अपने परिवार के साथ पलायन करते हैं, उनकी जरूरतें उन परिवारों से अलग हो सकती हैं, जिनमें सिर्फ कमाने वाला सदस्य पलायन करता है जबकि बाकी सदस्य पीछे रह जाते हैं।” हालांकि, CMID की बंधु क्लीनिक जैसी कुछ पहलें प्रवासी समुदायों को इस हिसाब से तैयार करने के अलग-अलग तरीकों को आजमा रही हैं। इन पहलों के तहत सेवाओं को लोगों तक पहुंचाने की कोशिश की जा रही है।

सुविधाजनक समय
रहमान को कई बार गर्मी से जुड़ी समस्या हुई है। इसके लक्षणों में जी मिचलाना, उल्टी, सिरदर्द, त्वचा के संक्रमण और थकान वगैरह शामिल हैं। लेकिन किसी निजी डॉक्टर के पास जाने का मतलब है एक दिन की दिहाड़ी गंवाना। वह इतना बोझ नहीं उठा सकते।
सरकारी सेवाएं अक्सर प्रवासी आबादी और दिहाड़ी मजदूरों की पहुंच से दूर होती हैं, क्योंकि उनका समय और प्रवासियों की मजदूरी का समय एक ही होता है और ये सेवाएं शहरों के बीच में होती हैं।
पीटर कहते हैं कि बुनियादी सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाएं “प्रवासी मजदूरों के लिए असुविधाजनक जगहों पर हैं और उनका समय भी सही नहीं है। सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्रों का बाह्य रोगी विभाग शाम 6 बजे के बाद काम नहीं करता। आदर्श रूप से, ऐसा नहीं होना चाहिए; क्योंकि ज्यादातर मजदूरों का काम उसी समय खत्म होता है।”
पीटर और उनके सहयोगियों ने साल 2020 में ‘बंधु क्लीनिक’ की शुरुआत की। ये क्लीनिक राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, केरलम सरकार और अलग-अलग दानदाताओं के सहयोग से चलाए जाते हैं। 2024 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने ‘बंधु क्लीनिक’ को शरणार्थियों और प्रवासी समुदायों के बीच बेहतर स्वास्थ्य को बढ़ावा देने वाले दुनिया के 140 प्रमुख अनुभवों में शामिल किया था। ये दोनों क्लीनिक हर महीने 80 स्थानों को कवर करते हैं और पिछले पांच सालों में दो लाख सेवाएं दे चुके हैं। इसमें कोविड वैक्सीन के 70,000 डोज भी शामिल हैं।
CMID के कर्मचारियों का कहना है कि प्रवासी अक्सर लक्षणों को नजरअंदाज़ कर देते हैं या बिना डॉक्टर की पर्ची के दवाएं ले लेते हैं। ये क्लीनिक स्वास्थ्य व्यवस्था की अहम कमी को पूरा करते हैं; ये बुनियादी स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराते हैं और मरीजों को अस्पतालों में भेजते हैं।

जलवायु जोखिमों पर जागरूकता
अंतर्राष्ट्रीय प्रवासन संगठन (आईओएम) और खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) जैसी संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियां ओडिशा और तेलंगाना के जलवायु परिवर्तन से प्रभावित जिलों में इसी तरह की एक परियोजना को आजमा रही हैं। मोबाइल प्रवासी संसाधन केंद्र (MMRC) चलते-फिरते सहायता केंद्र हैं जो श्रम, कृषि और ग्रामीण विकास विभागों को लोगों के घरों तक पहुंचाते हैं। MMRC आजीविका के विविधीकरण, मानसिक स्वास्थ्य सहायता और सुरक्षित प्रवास पर ध्यान केंद्रित करते हैं। यह खासकर उन परिवारों के पास पहुंचता है जो पीछे रह जाते हैं। इनमें मुख्य रूप से महिलाएं और बुजुर्ग शामिल हैं जो घर और खेत संभालते हैं, साथ ही बच्चों और बुजुर्गों की देखभाल की जिम्मेदारी भी निभाते हैं। यह संभावित प्रवासी श्रमिकों और उनके परिवारों को सुरक्षित प्रवास के बारे में जानकारी भी देता है।
तेलंगाना के सूखा पीड़ित जिलों निजामाबाद और नारायणपेट में, ‘वलसा सहायता केंद्रम’ नामक एक रंग-बिरंगी मिनीवैन उन गांवों का दौरा करती है, जहां से लोगों के बड़े पैमाने पर पलायन की खबरें आती हैं। वैन के पिछले हिस्से में लगी बड़ी टेलीविजन स्क्रीन के चारों ओर महिलाएं, पुरुष और बच्चे इकट्ठा हो जाते हैं।
MMRC तेलुगू भाषा के वीडियो और नाटकों के जरिए जलवायु प्रभावों और प्रवासी मजदूरों के अधिकारों के बारे में जागरूकता फैलाता है। इसमें कई अलग-अलग क्षेत्र की टीमें काम करती हैं, जिनमें कम्युनिटी मोबिलाइजर और कम्युनिकेशन स्पेशलिस्ट शामिल हैं; ये टीमें यात्रा से पहले की जानकारी, सुरक्षित प्रवास के बारे में जानकारी और कौशल प्रमाणन के अवसर उपलब्ध कराती हैं। IOM के लिए भारत में नेशनल प्रोजेक्ट ऑफिसर अमित चौधरी कहते हैं, “MMRC उन लोगों तक पहुंचता है जो अक्सर सरकारी व्यवस्थाओं से बाहर रह जाते हैं।” “ये मोबाइल सेंटर सरकार और ऐसे लोगों को जोड़ने का काम करते हैं।”
IOM के साथ मिलकर स्थानीय साझेदार राज्य के विभागों के साथ मिलकर काम करते हैं, ताकि दूरदराज के इलाकों में सेवाओं को मजबूत किया जा सके और जानकारी बढ़ाई जा सके, अलग-अलग विभागों के बीच बेहतर तालमेल स्थापित किया जा सके और सभी नीतियों में जलवायु संबंधी नजरिए को शामिल करने पर जोर दिया जा सके।

आखिरी छोर तक मदद
कर्नाटक के बेंगलुरु स्थित बेलंदूर में बहुराष्ट्रीय कंपनियों की कांच की ऊंची-ऊंची इमारतों और दफ्तरों से परे, ‘करियम्मा अग्रहारा’ बसा है। यहां हजारों झोपड़ियां हैं, जिनकी छतें नीली तिरपाल और टीन की चादरों से बनी हैं और जो दूर तक फैली हुई हैं। कूड़े-कचरे से अटा हुआ ऊबड़-खाबड़ और टूटा-फूटा रास्ता इन झुग्गियों तक जाता है, जहां मुख्य रूप से उत्तरी कर्नाटक और पूर्वोत्तर भारत से आए परिवार रहते हैं।
गुब्बाची लर्निंग सेंटर नाम के गैर-लाभकारी संगठन में सामुदायिक आयोजक केएस माला एक-एक झुग्गी में जाकर लोगों के दस्तावेजों की जांच करती हैं, उनकी चिकित्सा जरूरतों का ध्यान रखती हैं और यह देखती हैं कि बच्चे स्कूल गए थे या नहीं। माला बताती हैं कि वह लोगों की मदद सरकारी योजनाओं को स्थानीय भाषाओं में समझाने और डिजिटल फॉर्म भरने में करती हैं। गुब्बाची उन प्रवासी परिवारों की समस्याओं को हल करने पर ध्यान देता है, जो कई तरह की मुश्किलों का सामना करते हैं। इसमें जलवायु परिवर्तन के असर से पैदा हुई मुश्किलें भी शामिल हैं।
इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ माइग्रेशन एंड डेवलपमेंट के चेयरमैन इरुदया राजन कहते है कि जरूरी सेवाओं का फायदा उठाने में भाषा सबसे बड़ी बाधा बनी हुई है। गुब्बाची की सह-संस्थापक और ऑपरेशंस लीड सौम्या नंद बताती हैं कि डिजिटलीकरण दूसरी समस्या है।
गुब्बाची छह सरकारी अस्पतालों में प्रवासी परिवारों को भाषा संबंधी मदद भी देता है। नंद कहते हैं, “यह एक प्रकार के नियंत्रण और संतुलन की व्यवस्था है, ताकि हमारे सामने मौजूद अधिकारी, डॉक्टर, शिक्षक या प्रधानाचार्य भाषा की वजह से प्रवासी परिवारों से मुंह नहीं मोड़ें या उन्हें लाभ से से वंचित ना करें।”

जलवायु-जनित पलायन पर ध्यान
जलवायु परिवर्तन को अक्सर पलायन का मुख्य कारण नहीं माना जाता। यह अनेक वजहों में से एक है। पीटर कहते हैं, “यह जलवायु-प्रेरित पलायन नहीं है, बल्कि इस पलायन में जलवायु आग में घी जैसा है।”
चौधरी कहते हैं कि यही वजह है कि आईओएम-एफएओ प्रोजेक्ट ओडिशा और तेलंगाना के चार जिलों में ऐसे क्षेत्र पर ध्यान देता है जहां से पलायन ज्यादा होता है। MMRC आखिरी छोर पर खड़े प्रवासियों को सेवा और सामाजिक सुरक्षा योजना की जानकारी देता है; जमीन पर काम करने वाले उनके कर्मचारी उन दूरदराज के गांवों में जाते हैं जहां से पलायन बहुत होता है और परिवारों को पैसों का हिसाब-किताब रखने में मदद करते हैं। इस मदद में पैसों को ऐसे कामों में लगाने में सहायता करना भी शामिल है जो फायदेमंद हों और जिससे जलवायु परिवर्तन का सामना किया जा सके।
चौधरी कहते हैं, “इससे परिवारों को भविष्य में जलवायु से जुड़ी दिक्कतों का सामना करने के लिए बचत की संस्कृति विकसित करने में मदद मिलती है।” यह सब स्थानीय भाषाओं में किया जाता है।
राजन बताते हैं कि कोई भी ऐसा तरीका नहीं है जो सब पर एक जैसा लागू हो। वह कहते हैं, “आपको (योजनाओं में) राज्य के सामाजिक-सांस्कृतिक माहौल, साक्षरता दर और प्रवासी आबादी के हिसाब से बदलाव करने होंगे।”

भाषा की समस्या को दूर करना
गुब्बाची और अजीम प्रेमजी फाउंडेशन की ओर से संचालित एक क्लिनिक ‘करियम्मा अग्रहारा से पैदल पांच मिनट की दूरी पर है, जहां हमेशा ऐसी स्टाफ नर्स मौजूद रहती है जो हिंदी, बंगाली या असमिया में बात कर सकती है। ये भाषाएं इस क्षेत्र में अक्सर दूसरे राज्यों से आए प्रवासी बोलते हैं।
बंधु क्लीनिकों में इस्तेमाल होने वाली सामग्री और साइनबोर्ड भी कई भाषाओं में होते हैं। CMID स्वास्थ्य और मौसम से जुड़े अलर्ट भी बंगाली, असमिया, ओडिया, हिंदी और तमिल भाषाओं में जारी करता है। ये भाषाएं वे हैं जिन्हें एर्नाकुलम में रहने वाले 80% से अधिक प्रवासी बोलते हैं।
CMID की स्वास्थ्य चेतावनियों को उपयोगी पाते हुए, केरल सरकार ने इस संस्था से गर्मी से जुड़ी और आपदा की चेतावनियों के लिए कुछ सामग्री तैयार करने को कहा। नंद बताते हैं कि खराब मौसम ने मूल स्थानों के साथ-साथ बेंगलुरु जैसे गंतव्यों पर भी रोजमर्रा की मुश्किलों को और बढ़ा दिया है। “स्वास्थ्य हमेशा खतरे में रहता है, साफ-सफाई भी खतरे में रहती है और आजीविका पर भी असर पड़ता है। अगर बाढ़ आ जाए, तो वे अपने घरों से बाहर नहीं निकल पाते। रोजगार भी सुरक्षित नहीं होता और मौसम की स्थितियों से उस पर बहुत अधिक असर पड़ता है।”
नंद कहते हैं, “जलवायु परिवर्तन के कारण बिगड़ी स्थितियों के साथ मौसम की स्थितियों में कोई भी बदलाव सबसे पहले उन्हीं पर असर डालता है।” मौसम से जुड़ी आपदाओं के बारे में प्रवासी समुदायों को ऐसी भाषाओं में जानकारी देना बेहद जरूरी है, जिन्हें वे समझते हों।
और पढ़ेंः बिना सुरक्षा के जलवायु जोखिम से लड़ रहे प्रवासी मजदूर
रहमान को 2018 की केरल बाढ़ की याद आती है, जब वह इडुक्की में एक निर्माण साइट पर फंस गए थे। वह बताते हैं कि उन्हें समय पर कोई चेतावनी नहीं मिली थी। “हम 20-30 लोग उस इमारत में बिना खाने-पानी के रह रहे थे। बाहर की सड़क पूरी तरह से डूबी हुई थी।”
आज भी, रहमान को असमिया या बंगाली भाषा में शुरुआती चेतावनी वाले संदेश सिर्फ ‘बंधु क्लीनिक’ पर ही दिखाई देते हैं। राजन आगे कहते हैं, “प्रवासन नीति के मामले में हमारा रवैया आग बुझाने जैसा है, यानी अधिकारी रोकथाम पर काम करने के बजाय, सिर्फ संकट आने पर ही प्रतिक्रिया देते हैं।”
महिमा जैन एशियन कॉलेज ऑफ जर्नलिज्म के क्लाइमेट चेंज मीडिया हब में रेजिडेंट फेलो हैं।
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 1 मई, 2026 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: केरल के एर्नाकुलम जिले में पाथलम जंक्शन पर मोबाइल बंधु क्लीनिक। 2024 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने बंधु क्लीनिक को उन 140 वैश्विक अनुभवों में से एक के रूप में मान्यता दी जो शरणार्थियों और प्रवासियों के स्वास्थ्य को बेहतर करने में मदद करते हैं। तस्वीर: महिमा जैन।