- एक हालिया अध्ययन में यह पता लगाया गया है कि स्पाइनी-टेल लिजार्ड (सांडा या कांटेदार पूंछ वाली छिपकली) थार रेगिस्तान की मुश्किल परिस्थितियों में जीवित रहने के लिए अपने आहार में किस तरह बदलाव करती है।
- अध्ययन में पाया गया कि खाने-पीने की चीजों की कमी होने पर प्रजनन के मौसम से पहले यह प्रजाति कीटों को भी खाती है जिससे इस धारणा को चुनौती मिलती है कि सांडा शाकाहारी होते है।
- हालांकि, थार क्षेत्र में खेती का रकबा बढ़ने से शिकार, आवास का बंट जाना और जमीन के इस्तेमाल में बदलाव से यह छिपकली खतरे में है।
भारत के कठोर रेगिस्तानी हालात में एक छिपकली सिर्फ उपलब्ध भोजन ही नहीं खाती है। वह मौसम के अनुसार पोषक तत्वों का सटीक चयन करती है। प्रजनन, वृद्धि और जीवित रहने की बदलती जरूरतों के हिसाब से अपने आहार को संतुलित करती है। वैसे, उष्णकटिबंधीय और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्रों में पोषण संबंधी जरूरतों के हिसाब से खान-पान में बदलाव का व्यापक अध्ययन हुआ है, लेकिन सूखे आवासों में रहने वाले जीव बहुत ज्यादा तापमान और भोजन की सीमित उपलब्धता से कैसे निपटते हैं, इस बारे में अभी बहुत कम जानकारी उपलब्ध है।
रॉयल सोसाइटी ओपन साइंस में हाल ही में प्रकाशित एक अध्ययन में थार रेगिस्तान में पाए जाने वाले सांडा (Saara hardwickii) में सूक्ष्म पोषक तत्वों के सेवन और उन्हें शरीर में बनाए रखने में होने वाले मौसमी बदलावों की जांच की गई। यह अध्ययन ‘जोरबीर-गाढ़वाला संरक्षण रिजर्व में किया गया था। यह ऐसा रेतीला मैदानी इलाका है जहां साल भर पौधों की उपलब्धता घटती-बढ़ती रहती है। शाकाहारी प्रजाति के तौर पर मशहूर सांडा को प्रजनन काल के दौरान कीड़े-मकोड़े खाते हुए भी पाया गया। इससे पता चलता है कि मौसम में बदलाव और शारीरिक जरूरतें किस तरह इस जीव के भोजन खोजने के व्यवहार को प्रभावित करती हैं।
बदलता खान-पान
सांडा उत्तर-पश्चिमी भारत के थार रेगिस्तान के साथ ही पाकिस्तान और अफगानिस्तान के कुछ हिस्सों में पाया जाता है। इस अध्ययन के मुख्य लेखक मिहिर जोशी बताते हैं, “हालांकि, यह छिपकली इसी क्षेत्र की मूल निवासी है और मुख्य रूप से थार और कच्छ क्षेत्रों तक सीमित है, फिर भी यह बड़ी संख्या में वहां भी पाई जाती है। इससे पता चलता है कि इसमें कुछ खास अनुकूलन हैं, जिनकी मदद से यह इस कठोर मौसम में भी फल-फूल पाती है।”
ये अनुकूलन जैविक प्रक्रियाओं से गहराई से जुड़े होते हैं जिनमें वृद्धि, प्रजनन और ठंड के मौसम में सुप्तावस्था (हाइबरनेशन) शामिल हैं। यही प्रक्रियाएं किसी प्रजाति की पोषण संबंधी जरूरतों व चयापचय गतिविधियों को तय करती हैं। पोषण संबंधी बदलती जरूरतों को पूरा करने और मौसमी उतार-चढ़ावों का सामना करने के लिए सूक्ष्म पोषक तत्वों का सेवन और उनका शरीर में बने रहना बहुत जरूरी है।

वैसे यह प्रजाति फरवरी से अक्टूबर तक सक्रिय रहती है। नवंबर से फरवरी तक यह बिलों में सुप्तावस्था में रहती है। ये छिपकलियां अप्रैल और मई के दौरान प्रजनन करती हैं और मई के आखिर से जुलाई तक अंडे देती हैं। इस प्रजाति के पोषण सेवन में होने वाले बदलावों को समझने के लिए शोधकर्ताओं ने चार अलग-अलग मौसमों का प्रतिनिधित्व करने वाले चार महीनों के दौरान खाए गए भोजन की मात्रा और प्रकार को दर्ज किया।
उन्होंने इस प्रजाति के आहार में शामिल पौधों और कीड़ों में मौजूद कार्बन और नाइट्रोजन की मात्रा का भी विश्लेषण किया, जिनका इस्तेमाल कार्बोहाइड्रेट और प्रोटीन के संकेतक के तौर पर किया जाता है। साथ ही, उनके मल में भी इनकी जांच की गई। खास बात यह रही कि उस आवास में पौधों की प्रजातियों की बहुतायत, छिपकलियों के मल के नमूनों में उनकी मौजूदगी से मेल नहीं खाती थी। यह इस बात की ओर इशारा करता है कि वे मौसम के हिसाब से चुनिंदा आहार का तरीका अपनाते हैं।
जोशी याद करते हैं कि वे चिलचिलाती गर्मी में छिपकलियों के बिलों के पास घंटों बिताते थे, ताकि उनके भोजन खोजने के व्यवहार को देख सकें और नमूने इकट्ठा कर सकें। ये सभी आकलन मिलकर इस बात को समझने में मदद करते हैं कि यह प्रजाति अलग-अलग मौसमों में अपने सूक्ष्म पोषक तत्वों का सेवन और मेटाबॉलिज्म में किस तरह बदलाव करती है।
पोषण के लिए कीट
अध्ययन के नतीजों में पाया गया कि अप्रैल और अक्टूबर में सांडा के आहार में सिर्फ पौधे शामिल होते हैं। जबकि जून और अगस्त में प्रजनन काल के दौरान यह अपने आहार में कीटों को भी शामिल करती है। इसी व्यवहार के अनुसार, अक्टूबर और अप्रैल में इसके आहार में कार्बन की मात्रा ज्यादा पाई गई, जबकि जून और अगस्त में नाइट्रोजन की मात्रा अधिक थी। इससे संकेत मिलता है कि यह प्रजाति सुप्तावस्था से पहले ऊर्जा और प्रजनन से पहले प्रोटीन का भंडार तैयार करती है। आहार में नाइट्रोजन की बढ़ी हुई मात्रा संभवतः प्रजनन काल से पहले कीटों के सेवन के कारण होती है। जोशी कहते हैं, “प्रजनन और सुप्तावस्था के लिए अलग-अलग प्रकार के सूक्ष्म पोषक तत्वों की जरूरत होती है। जानवर इन बदलावों को कैसे महसूस करते हैं और उसी के अनुसार अपने आहार को किस तरह बदलते हैं, यह अब भी स्पष्ट नहीं है।”


“यह बहुत कमाल की छिपकली है,” सुमित डूकिया बताते हैं जो वन्यजीव जीवविज्ञानी हैं और इस अध्ययन से जुड़े नहीं हैं। “अपने शुरुआती जीवन में यह तेजी से बढ़ने के लिए जरूरी प्रोटीन पाने के मकसद से कीड़े-मकोड़े खाती है, लेकिन कुछ महीनों बाद इसका भोजन लगभग पूरी तरह से पौधों पर आधारित हो जाता है।” वह आगे बताते हैं कि सुप्तावस्था के बाद फरवरी में, वे सर्दियों की बारिश और वसंत के मौसम से हरे-भरे हुए घास के मैदानों में जी-भरकर भोजन करती हैं।
नर छिपकलियां अक्सर भोजन की सबसे अच्छी जगहों की रखवाली करते हैं और उन्हें सिर्फ अपने संभावित साथियों के साथ ही साझा करते हैं। डुकिया बताते हैं, “मानसून के दौरान अक्सर छोटी छिपकलियों को बड़ों के साथ भोजन करते देखा जाता है; यह दिखाता है कि संसाधनों की उपलब्धता और सामाजिक व्यवहार दोनों से आहार किस तरह प्रभावित होता है।”
मल के नमूनों के विश्लेषण से मौसम के अनुसार बड़े बदलाव सामने आए, जिससे यह पता चलता है कि न सिर्फ सेवन में, बल्कि सूक्ष्म पोषक तत्वों के चयापचय और उन्हें शरीर में बनाए रखने की प्रक्रिया में भी बदलाव होते हैं। जून में मल में कार्बन और नाइट्रोजन का अनुपात अधिक था, जबकि अप्रैल में यह कम था; इससे यह संकेत मिलता है कि प्रजनन काल के दौरान छिपकलियां कार्बन को अधिक मात्रा में शरीर से बाहर निकालती हैं, जबकि नाइट्रोजन को प्राथमिकता के साथ शरीर में बनाए रखती हैं।
प्रकृतिवादी मकरंद केतकर (जो इस अध्ययन से जुड़े नहीं हैं) कहते हैं कि यह बदलाव शायद अंडे बनने के दौरान प्रोटीन, कैल्शियम और दूसरे खनिजों की बढ़ी हुई जरूरत को पूरा करता है। साथ ही, इससे सुप्तावस्था से पहले ऊर्जा का संतुलन बनाए रखने की जरूरत भी पता चलती है। वह आगे कहते हैं, “आहार में इस तरह के बदलाव सिर्फ रेंगने वाले जीवों में ही नहीं बल्कि पक्षियों, कीड़ों और मछलियों जैसी दूसरी प्रजातियों में भी देखे जाते हैं।”

पर्यावरण से जुड़े बदलाव
मौसम में होने वाले बदलाव जानवरों के खान-पान पर तो असर डालते ही हैं। साथ ही, इससे यह भी तय होता है कि वे पोषक तत्वों को किस तरह पचाते और शरीर में रखते हैं। इस तरह ये बदलाव पर्यावरण से जुड़े परिवर्तनों को शरीर की आंतरिक शारीरिक प्रतिक्रियाओं से जोड़ते हैं। जोशी कहते हैं कि प्रजनन और सुप्तावस्था का हार्मोनल नियंत्रण भी मौसमी बदलावों से गहराई से जुड़ा हुआ है, जो अलग-अलग कारकों के बीच जटिल आपसी तालमेल का संकेत देता है।
यह अध्ययन भोजन खोजने के व्यवहार, खास आहार चुनने की प्रवृत्ति और भोजन के पचने के बाद होने वाली शारीरिक प्रक्रियाओं में मौसमी बदलावों के बारे में बताता है। साथ ही इससे यह भी पता चलता है कि ये पैटर्न इस प्रजाति के जीवनचक्र में होने वाली घटनाओं से कितनी गहराई से जुड़े हुए हैं। जोशी बताते हैं, “यह पहला अध्ययन है जिसमें किसी रेगिस्तानी छिपकली में इन बदलावों को देखा गया है और पोषण संबंधी नजरिए से उसके अनुकूलनों का मूल्यांकन किया गया है।” वह आगे कहते हैं कि इस प्रजाति का कभी इसके तेल और मांस के लिए बड़े पैमाने पर शिकार किया जाता था। हालांकि, वन्यजीव संरक्षण कानून लागू होने के बाद यह खतरा कम हुआ है, लेकिन इसके आवास के कुछ हिस्सों में अब भी शिकार जारी है।
“शिकार के अलावा, प्राकृतिक आवास का बंट जाना और खेती में विस्तार के कारण जमीन के इस्तेमाल में आए बदलाव थार क्षेत्र में इस प्रजाति के लिए लगातार खतरा बने हुए हैं,” जोशी कहते हैं।
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यह अध्ययन आहार, शरीर-क्रिया विज्ञान और मौसमी बदलावों को आपस में जोड़ता है, ताकि उन पोषण रणनीतियों के बारे में जानकारी मिल सके जो बेहद मुश्किल माहौल में जीवन को बनाए रखने में मदद करती हैं। केतकर कहते हैं, “हालांकि, सूखे पारिस्थितिकी तंत्र में अलग-अलग मौसम के दौरान आहार पर वास्तविक समय में नजर रखना अब भी चुनौती है।” वह आगे बताते हैं कि पौधों और कीड़ों के बीच पोषण की बनावट में काफी अंतर हो सकता है और जलवायु में हो रहे तेजी से बदलाव पौधों के विकास, कीड़ों के निकलने और उनके प्रजनन चक्रों पर असर डालते हैं; ये सभी कारक किसी प्रजाति के आहार संबंधी अनुकूलन को प्रभावित कर सकते हैं।
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 4 मई, 2026 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: थार रेगिस्तान की रेतीली जमीन पर धूप सेंकती हुई सांडा। यहां वह भीषण गर्मी और भोजन की कमी के बीच जीवित रहने के लिए अपने मौसमी आहार में बदलाव पर निर्भर रहती है। तस्वीर: मिहिर जोशी।