प्रदूषण, नियमों की अनदेखी और भूमि रूपांतरण की वजह बनते रामेश्वरम के झींगा फार्म

रामेश्वरम में एक पारंपरिक मछुआरा।

इंसाफ के लिए संघर्ष जारी

लेकिन सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियंस (सीटू) के सचिव और रामेश्वरम के निवासी करुणामूर्ति और उनके समुदाय के कई लोग इससे असहमत हैं। उनका कहना है कि जब तक रामेश्वरम में बढ़ते झींगा फार्म से संबंधित पर्यावरणीय और सामाजिक-आर्थिक मुद्दों पर ध्यान नहीं दिया जाता, तब तक वे चैन की सांस नहीं ले सकते।

जब तक प्रदूषण के लिए जिम्मेदार झींगा फार्म बंद नहीं हो जाते, तब तक हम और अधिक मजबूत विरोध की योजना बना रहे हैं। इतने सारे लोग अपने गाँवों से पलायन कर रहे हैं; पर्यावरणीय क्षति बहुत बड़ी है। हम जागरूकता पैदा करना चाहते हैं और राजनीतिक बदलाव लाना चाहते हैं और कृषि के लिए जगह बनाना चाहते हैं।”

करुणामूर्ति कहते हैं, “हम जानते हैं कि सरकार जल निकायों की रक्षा करना चाहती है, लेकिन यह आर्थिक हितों को भी संतुलित करना चाहती है। दामोदिरापट्टिनम में  हमने कड़ा विरोध किया और वहां के झींगा फार्मों को बंद कर दिया गया। हम रामेश्वरम में कुछ प्रदूषण फैलाने वाले फार्म के लिए भी ऐसा ही करना चाहते हैं।”

 

यह स्टोरी इंटरन्यूज़ के अर्थ जर्नलिज़्म नेटवर्क के सहयोग से तैयार की गई है।

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बैनर तस्वीर: रामेश्वरम के मछुआरे पकड़ी हुई मछलियों को किनारे पर लाते हुए। तस्वीर- नारायण स्वामी सुब्बारमन/मोंगाबे 

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