- प्लास्टिक भले ही सस्ता और सुविधाजनक हो, लेकिन इसका उत्पादन करने वाली रिफाइनरियों के पास रहने वाले लोगों को नुकसान उठाना पड़ रहा है।
- जीवाश्म ईंधन का दोहन और प्लास्टिक स्रोत यानी पॉलिमर को तैयार करने की प्रक्रिया वायु प्रदूषण, हाइड्रोकार्बन के रिसाव और पर्यावरण में जहरीले रसायनों के उत्सर्जन से जुड़े हुए हैं।
- पिछले साल जिनेवा में हुई वैश्विक प्लास्टिक संधि वार्ता में प्लास्टिक उत्पादन पर असहमति के चलते किसी एक ठोस समझौते पर आम सहमति नहीं बन पाई।
पिछले साल अगस्त में जिनेवा में 10 दिनों तक चले वैश्विक प्लास्टिक संधि वार्ता के दौरान यवेट अरेलानो को दो बार नाक से खून आया। टेक्सास के ह्यूस्टन शहर में रहने वाली मैक्सिकन-अमेरिकी अरेलानो ने बताया, “यह अक्सर होता है। इसके अलावा मुझे एक्जिमा और हार्मोनल असुंतलन की भी समस्या है। अगर मैं बहुत अधिक संसाधन और पैसा खर्च न करूं, तो मैं कभी मां नहीं बन सकती हूं।” उन्होंने आगे कहा, “दरअसल, मेरी त्वचा की बीमारी की वजह से ही मेरी अपने पड़ोसियों से बात शुरू हुई और तब मुझे पता चला कि वे भी इन्हीं परेशानियों से जूझ रहे हैं।”
हजारों मील दूर, भारत के पश्चिमी तट पर भी हालात कुछ ऐसे ही हैं। साल 2024 के मध्य में किए गए एक सर्वे में पाया गया कि गुजरात के भरूच जिले में दहेज के पास स्थित लखीगाम गांव में सांस, त्वचा और सुनने से जुड़ी बीमारियां आम हैं। यहां की 5000 की आबादी में कैंसर के कम से कम 50 मामले सामने आए हैं। मछुआरों के अधिकारों के लिए लड़ने वाली संस्था ‘समस्त भरूच जिला मछीमार समाज’ के अध्यक्ष और वकील कमलेश माधीवाला कहते हैं, “यह सब कोयला ले जाने वाली खुली कन्वेयर बेल्ट के कारण हो रहा है। पूरा गांव कालिख से ढका रहता है और शोर व बदबू इतनी ज्यादा है कि दरवाजा बंद किए बिना सोना नामुमकिन है।”
ह्यूस्टन शिप चैनल (जहां अरेलानो रहती हैं) और वहां से 14,000 किलोमीटर दूर स्थित लखीगाम के लोगों के बीच एक बात समान है- इन दोनों ही जगहों पर लोगों की सेहत खराब होने का बड़ा कारण प्लास्टिक बनाने वाली फैक्ट्रियों से निकलने वाला प्रदूषण है।
समुद्र में कछुओं का गला घोंटती प्लास्टिक की थैलियों की तस्वीरों ने प्लास्टिक कचरे के मुद्दे पर भले ही काफी ध्यान आकर्षित किया है, लेकिन प्लास्टिक का स्रोत यानी प्लास्टिक पॉलिमर बनाने वाली फैक्ट्रियां और उनके द्वारा फैलाया गया प्रदूषण लोगों की नजरों से दूर रहा है।
नॉर्वे के एक गैर-लाभकारी संगठन ‘ग्रिड अरेन्डाल’ की वरिष्ठ विशेषज्ञ इवा रुसेवस्का ने प्लास्टिक के कचरे और उत्सर्जन के दोहरे प्रभाव का जिक्र करते हुए कहा, “प्लास्टिक हमारे रोजमर्रा के जीवन के लगभग हर पहलू में समाया हुआ है, हवाई जहाजों से लेकर टूथब्रश तक। हालांकि, प्लास्टिक से बनने वाली वस्तुओं और सेवाओं का एक पूरा जीवनचक्र होता है जो न सिर्फ कूड़े के जरिए, बल्कि ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के जरिए भी पर्यावरण को प्रभावित करता है और जलवायु परिवर्तन में योगदान देता है।” आंकड़ों के मुताबिक, कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में लगभग 3.7% हिस्सा प्लास्टिक बनाने वाली फैक्ट्रियों का है। अगर मौजूदा रफ्तार जारी रही, तो अनुमान है कि 2060 तक यह बढ़कर 4.5% हो जाएगा।
प्लास्टिक कैसे बनता है?
जैसे-जैसे दुनिया ऊर्जा के लिए कोयला और कच्चे तेल जैसे जीवाश्म ईंधन को छोड़कर नवीकरणीय स्रोतों की ओर बढ़ रही है, परिवहन के लिए इलेक्ट्रिक वाहनों को अपना रही है, पेट्रोलियम रिफाइनरियां अब प्लास्टिक, उर्वरक, टायर और सिंथेटिक फाइबर जैसे पेट्रोकेमिकल्स को अपने ‘प्लान बी’ के रूप में देखने लगी हैं।
दुनिया का लगभग 99% प्लास्टिक जीवाश्म ईंधन से ही बनाया जाता है। इसका उत्पादन दहेज और ह्यूस्टन शिप चैनल जैसी बड़ी रिफाइनरियों में होता है।
कच्चा तेल असल में हाइड्रोकार्बन का मिश्रण है, जो सिर्फ हाइड्रोजन और कार्बन परमाणुओं से बने यौगिक होते हैं। जमीन या समुद्र से निकाले जाने के बाद, इसे रिफाइनरी में ले जाया जाता है जहां इसे भट्टी में गर्म किया जाता है। फिर इस मिश्रण को आंशिक आसवन (फ्रैक्शनल डिस्टिलेशन) नामक प्रक्रिया से गुजारा जाता है, जिससे हाइड्रोकार्बन विभिन्न उत्पादों में अलग हो जाते हैं। इनमें गैसोलीन, केरोसीन, नेफ्था, हल्का तेल और भारी तेल शामिल हैं।
प्लास्टिक मुख्य रूप से दो कच्चे माल, नेफ्था (कच्चे तेल का एक उत्पाद) और प्राकृतिक गैस से बनाई जाती हैं। इन पर प्रक्रिया करने से एथिलीन, प्रोपिलीन और स्टाइरीन जैसी हल्की गैसें प्राप्त होती हैं। फिर इन गैसों को रासायनिक प्रक्रिया द्वारा एक साथ मिलाकर पॉलीप्रोपिलीन, पॉलीइथिलीन, पीईटी और पॉलीस्टाइरीन सहित विभिन्न पदार्थ बनाए जाते हैं। ये पदार्थ हमारे रोजमर्रा के जीवन में दिखने वाले अधिकांश प्लास्टिक के निर्माण में उपयोग होने वाले मूल घटक हैं।
दुनिया भर में प्लास्टिक का वार्षिक उत्पादन 1950 में दो मिलियन टन था, जो 2025 में बढ़कर 400 मिलियन टन हो गया। आज तक जितना भी प्लास्टिक का उत्पादन हुआ है, उसका लगभग आधा हिस्सा 2002 के बाद तैयार किया गया है।

कौन भुगतेगा खामियाजा?
फेंसलाइन वॉच की फाउंडर अरेलानो ने कहा, “2017 तक, मुझे कोई अंदाजा नहीं था कि मेरा पूरा जीवन प्लास्टिक से प्रभावित है। मैं अपने समुदाय को नुकसान पहुंचाने वाले रसायनों और आस-पास के एथिलीन प्लांट से आने वाली गंध और वहां होने वाले विस्फोटों के खिलाफ लड़ाई लड़ रही थी, लेकिन मुझे यह नहीं पता था कि इसका संबंध प्लास्टिक से है। मुझे लगता था कि वे वहां ईंधन/पेट्रोल बना रहे हैं।” उनका यह संगठन ह्यूस्टन शिप चैनल के आस-पास जीवाश्म ईंधन से जुड़े ढांचों के जहरीले प्रभावों के खिलाफ काम करता है। ह्यूस्टन शिप चैनल को दुनिया की “ऊर्जा राजधानी” के रूप में भी जाना जाता है।
अरेलानो ने कहा, “यह जानकर बहुत गुस्सा आया कि इतनी भारी मात्रा में कच्चे तेल का इस्तेमाल प्लास्टिक बनाने के लिए किया जा रहा है।” ह्यूस्टन शिप चैनल अमेरिका का सबसे बड़ा पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स है, जहां एक्सॉनमोबिल, शेल और डॉव जैसी 600 कंपनियां मौजूद हैं। टेक्सास से लुइसियाना जाने वाली सड़क ‘कैंसर एली’ से जाकर जुड़ती है, जो वहां मौजूद 200 पेट्रोकेमिकल प्लांटों के कारण होने वाली इस बीमारी की उच्च दर के लिए बदनाम है।
एमनेस्टी इंटरनेशनल की 2024 की एक रिपोर्ट में इस क्षेत्र की हवा में बेंजीन और टोल्यूनि जैसे वोलेटाइल ऑर्गेनिक कंपाउंड (वीओसी), मीथेन और कार्बन डाइऑक्साइड जैसी ग्रीनहाउस गैसें और प्रदूषण फैलाने वाले पार्टिकुलेट मैटर पाए गए। साल 2021 के बाद से ह्यूस्टन शिप चैनल में कम से कम 15 रासायनिक विस्फोट, आग लगने और जहरीले पदार्थों के रिसाव की सूचना मिली है। एक अलग अध्ययन में सिरदर्द, थकान, मतली और नाक से खून आने से लेकर अस्थमा, एनीमिया, बच्चों में होने वाले ल्यूकेमिया, कैंसर, गुर्दे और लीवर की खराबी, बांझपन और यहाँ तक कि मौत जैसे गंभीर खतरों का उल्लेख किया गया है।
हालांकि अमेरिका के प्रभावित समुदायों का जिनेवा में हुई संधि वार्ता में कुछ प्रतिनिधित्व था, लेकिन भारत और ग्लोबल साउथ के लोग अनुपस्थित थे, ठीक वैसे ही जैसे इस क्षेत्र में प्लास्टिक उत्पादन के स्वास्थ्य प्रभावों पर किए गए अध्ययन अनुपस्थित हैं। माधीवाला ने कहा, “लखीगाम सर्वे तब हुआ जब दहेज में 9.8 किमी लंबी खुली कन्वेयर बेल्ट से होने वाले वायु प्रदूषण से तंग आकर लोगों ने मुकदमा दर्ज करने का फैसला किया। यह बेल्ट कोयला, जिप्सम, पॉलीप्रोपाइलीन और प्रोपलीन को ढोने का करती है।”
पारंपरिक आजीविका, मुख्य रूप से कृषि और मछली पकड़ने के काम में नुकसान साफतौर पर देखा जा सकता है। खेत खारे होते जा रहे हैं और रसायन रिसने से समुद्र प्रदूषित हो रहे हैं। माधीवाला ने कहा, “दहेज से भड़भूत (एक प्रस्तावित बैराज) तक के 10 तटीय गांवों में पगड़िया मछुआरों (पैदल मछुआरों) की संख्या पिछले 10-12 वर्षों में आधी हो गई है। पहले 10,000 से ज्यादा ग्रामीण गहरे समुद्र में जाए बिना ही मछली पकड़कर अच्छी कमाई कर लेते थे। लेकिन अब दहेज बंदरगाह तक का पानी (जहां तक वे मछली पकड़ने जाते थे) दूषित पदार्थों से भरा हुआ है, जिससे उनकी आय प्रभावित हो रही है।”
खंभात की खाड़ी के पास स्थित ‘दहेज’ भारत सरकार द्वारा 2007 में योजनाबद्ध चार पेट्रोलियम, रसायन और पेट्रोकेमिकल निवेश क्षेत्रों (पीसीपीआईआर) में से पहला कार्यरत क्षेत्र है। इसमें सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी ओएनजीसी के साथ रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड और अदानी पेट्रोनेट जैसी निजी कंपनियों सहित लगभग 180 मौजूदा और 650 निर्माणाधीन औद्योगिक इकाइयां हैं। गुजरात के मछुआरों के संगठन समस्त मछिमार समाज के सचिव उस्मानगनी शेरासिया ने दावा किया, “कंपनियों के डिसेलिनेशन प्लांट से निकलने वाला बेहद खारा अपशिष्ट दहेज के दलदली इलाकों में पाई जाने वाली मुख्य मछली झींगा को मार रहा है।”

भारत अपने कच्चे तेल का 85% से अधिक आयात करता है, इसलिए ज्यादातर पेट्रोकेमिकल कॉम्पलेक्स तटीय क्षेत्रों में स्थित हैं। गुजरात के तटीय क्षेत्रों में जैसे-जैसे आप उत्तर की तरफ बढ़ते हैं, कच्छ की खाड़ी के एक हिस्से में पेट्रोकेमिकल जेटी की कतारें दिखने लगेंगी। इसकी शुरुआत जामनगर में रिलायंस इंडस्ट्रीज से होती है, जो दुनिया की सबसे बड़ी एकल-साइट रिफाइनरी है। इसके बाद वाडिनार में स्थित नायरा एनर्जी लिमिटेड है, जो भारत की दूसरी सबसे बड़ी रिफाइनरी है और फिर सलाया में स्थित एस्सार पोर्ट है। जामनगर जिले के पर्यावरण कार्यकर्ता जयेंद्रसिंह केर कहते हैं, “इन कंपनियों ने मिलकर सिक्का से लेकर सलाया तक पूरे तट को कवर कर लिया है। छोटे पगड़िया मछुआरों के लिए बीच में आने-जाने के लिए शायद ही कोई रास्ता बचा हो। इनमें से ज्यादातर मछुआरे अब मजदूर बन गए हैं, या तो वे उन बड़ी नावों पर काम करते हैं जो कई दिनों तक समुद्र में रहती हैं या फिर इन्हीं पेट्रोकेमिकल कंपनियों में मजदूरी करते हैं।”
केर ने बताया कि बंदरगाह पर आने वाले जहाजों से जब ‘बैलस्ट वॉटर’ (जहाज को संतुलित रखने के लिए टैंक में भरा गया पानी) समुद्र में छोड़ा जाता है, तो तटीय पानी का तापमान बदल जाता है और भारी संख्या में मछलियां मर जाती हैं। दूसरी ओर, इन फैक्ट्रियों से निकलने वाले रसायनों के रिसाव ने खेती को पूरी तरह घाटे का सौदा बना दिया है। केर का दावा है कि वाडिनार के पास के गांवों में भूजल प्रदूषित हो चुका है। “मानसून के दौरान लोग एक फसल तो उगा लेते हैं, लेकिन उसके बाद अगर सिंचाई के लिए इस पानी का इस्तेमाल किया जाए, तो फसलें जल जाती हैं।”
इनमें से अधिकांश रिफाइनरियां ‘कच्छ की खाड़ी मरीन नेशनल पार्क’ के करीब हैं, जहां कोरल की 52 प्रजातियां पाई जाती हैं। केर के मुताबिक, तेल के रिसाव से ‘टार बॉल्स’ बन जाती हैं, जो समुद्र के पर्यावरण को नुकसान पहुंचा सकती हैं।
लेकिन जामनगर में कोई विरोध नहीं कर रहा है। नई दिल्ली स्थित ‘सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट’ के प्रोग्राम मैनेजर (सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट और सर्कुलर इकोनॉमी) सिद्धार्थ घनश्याम सिंह ने कहा, “गुजरात में डॉक्टर स्थानीय आबादी की सेहत पर रिफाइनरियों के पड़ने वाले असर के बारे में बात करने को तैयार नहीं हैं, क्योंकि उन्हें डर है कि बड़ी कंपनियां उन पर मानहानि का मुकदमा कर देंगी। हालांकि, उन्होंने पेट्रोकेमिकल प्लांटों के बुरे प्रभावों से पूरी तरह इनकार भी नहीं किया है।”
दुनिया भर के शोध भी इस डर को सही साबित करते हैं। लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन की रिसर्च फेलो और ‘साइंटिस्ट्स कोएलिशन फॉर एन इफेक्टिव प्लास्टिक ट्रीटी’ की सदस्य मेगन डीनी ने कहा, “यूरोप, ताइवान, अमेरिका और ब्रिटेन में हुए अध्ययनों से पता चलता है कि पेट्रोकेमिकल फैक्ट्रियों के पास रहने वाले लोगों में ल्यूकेमिया होने का खतरा 30% ज्यादा होता है।” एक और अध्ययन बताता है कि साल 2015 में प्लास्टिक बनाने और उसे नष्ट करने के दौरान निकलने वाले प्रदूषणकारी सूक्ष्म कणों की वजह से दुनिया भर में लगभग 1,59,000 मौतें हुई थीं।

विवाद की जड़
‘ग्लोबल प्लास्टिक ट्रीटी’ (वैश्विक प्लास्टिक संधि) की वार्ता में, प्लास्टिक पर सख्त कानून बनाने की कोशिशें बिना किसी नतीजे या सहमति के खत्म हो गई। इसका मुख्य कारण देशों के बीच प्लास्टिक के उत्पादन को लेकर आपसी मतभेद था। ‘इंटरगवर्नमेंटल नेगोशिएटिंग कमेटी’ (INC 5.2) की बैठक के आखिरी सत्र से ठीक पहले वाले सत्र में अध्यक्ष लुइस वायस वाल्डिविइसो ने एक मसौदा पेश किया। इस मसौदे में प्लास्टिक के उत्पादन को सीमित करने के लिए किसी भी कानूनी रूप से बाध्यकारी उपाय का जिक्र नहीं किया गया था।
जहां एक तरफ सऊदी अरब, रूस, कुवैत, ईरान और भारत जैसे तेल और पेट्रोकेमिकल से समृद्ध देशों ने इस कदम का समर्थन किया, वहीं 100 से अधिक देशों ने इस पर नाराजगी जताई। उन्होंने इसे “अस्वीकार्य, असंतुलित और कमजोर” बताया। अमेरिका ने प्लास्टिक उत्पादन पर सीमा लगाने का विरोध किया और खबरों के मुताबिक, कुछ देशों को ज्ञापन भेजकर उनसे उत्पादन सीमा वाले समझौते को अस्वीकार करने का आग्रह किया था। अरेलानो ने कहा, “अमेरिका ने एक दबंग की तरह व्यवहार किया। हम साफ देख सकते थे कि वे रुकावटें पैदा कर रहे थे।”
और पढ़ेंः मैक्रोप्लास्टिक कचरे से होने वाला उत्सर्जन भारत में सबसे ज्यादा
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण सभा ने नवंबर 2022 में INC (समिति) बनाने की बात कही थी। उनका मकसद था कि प्लास्टिक के “पूरे जीवनचक्र” (यानी उसके उत्पादन (अपस्ट्रीम) से लेकर, उसके डिजाइन और इस्तेमाल (मिडस्ट्रीम) और आखिर में कचरा प्रबंधन (डाउनस्ट्रीम) तक) के दौरान प्रदूषण कम किया जाए। हालांकि जिन देशों के व्यावसायिक हित प्लास्टिक से जुड़े हैं, वे प्लास्टिक प्रदूषण को सिर्फ “वेस्ट मैनेजमेंट” की समस्या के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहे हैं।
सेंटर फॉर इंटरनेशनल एनवायर्नमेंटल लॉ (सीआईईएल) के सीनियर कैंपेनर (प्लास्टिक ट्रीटी) धर्मेश शाह ने कहा, “जलवायु लक्ष्यों को हासिल करने के लिए प्लास्टिक के उत्पादन पर सीमा लगाना बेहद जरूरी है। अगर प्लास्टिक इसी रफ्तार से बनता रहा, तो तापमान बढ़ोतरी को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक रोकने के लिए हमारे पास जो ‘कार्बन बजट’ बचा है, उसका एक-तिहाई हिस्सा यह अकेला ही खत्म कर देगा।” उन्होंने आगे कहा, “इस समझौते का मुख्य लक्ष्य प्लास्टिक की सफाई नहीं हो सकता। हम नल खुला रखकर फर्श पर पोछा नहीं लगा सकते।” सम्मेलन के दौरान सीआईईएल के एक विश्लेषण से पता चला कि वहां जीवाश्म ईंधन उद्योग की तरफदारी करने वाले 234 से ज्यादा लोग मौजूद थे, जो इस बात का इशारा है कि वहां ‘हितों का टकराव’ था।
गलत दिशा में दौड़
साल 2024 के आंकड़ों के मुताबिक, दुनिया का 66% प्लास्टिक सिर्फ सात देशों में बनता है। चीन, अमेरिका और सऊदी अरब मिलकर आधे से ज्यादा प्लास्टिक बनाते हैं, जबकि इसमें भारत का हिस्सा महज 4% है। ग्रीनपीस की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2022 में जब से प्लास्टिक समझौते की प्रक्रिया शुरू हुई है, तब से सात सबसे बड़ी पेट्रोकेमिकल कंपनियों ने अपनी उत्पादन क्षमता 1.4 मिलियन टन और बढ़ा दी है। एक और अध्ययन बताता है कि 2024 में कम से कम 15 देशों ने पेट्रोकेमिकल कंपनियों को कुल 45 बिलियन डॉलर की सब्सिडी दी है।
भारतीय कानून के तहत, रिलायंस जैसी कंपनियों के ‘स्पेशल इकोनॉमिक जोन’ को कई विशेष फायदे मिलते हैं। इनमें 10 साल तक टैक्स हॉलिडे और एक्साइज व कस्टम ड्यूटी से छूट शामिल है।

‘इंस्टीट्यूट फॉर एनर्जी इकोनॉमिक्स एंड फाइनेंशियल एनालिसिस’ (आईईईएफए) की पेट्रोकेमिकल विशेषज्ञ स्वाति शेषाद्रि ने कहा, “घुमा-फिराकर देखें तो करदाताओं को ही उस काम के लिए पैसा देना पड़ रहा है जिससे प्रदूषण फैलता है। जबकि, कंपनियां उस प्रदूषण से लोगों की सेहत को होने वाले नुकसान का खर्च उठाने की कोई जिम्मेदारी नहीं लेती हैं।”
आईईईएफए के एक विश्लेषण के मुताबिक, 2020 से दुनिया भर में आई आर्थिक मंदी के कारण पेट्रोकेमिकल बाजारों में ‘ओवर-सप्लाई’ की स्थिति बन गई है। विश्लेषण में कहा गया है कि पेट्रोकेमिकल उद्योग, जिसे कभी जीवाश्म ईंधन कंपनियों के लिए “भविष्य का सहारा” या मुनाफे की गारंटी के तौर पर देखा जाता था, वह अब खुद बड़ी चुनौतियों का सामना कर रहा है।
ट्रेड के आकड़े बताते हैं कि अब पॉलीमर का उत्पादन एशिया-पैसिफिक क्षेत्र की तरफ शिफ्ट हो रहा है। इसकी मुख्य वजह यहां पर्यावरण के नियमों का कमजोर होना और भारत जैसे बड़े बाजारों में इसकी भारी मांग है। रिपोर्ट में कहा गया है, “कच्चे प्लास्टिक के दुनिया भर के व्यापार में एशिया का दबदबा है, जिसमें 11 निर्यातक और 18 आयातक देश शामिल हैं। सिकुड़ते बाजारों और पॉलिमर के बढ़ते भंडार के कारण, इस पर निर्भर विकासशील देश एक बड़े वित्तीय जोखिम का सामना कर रहे हैं।”
प्लास्टिक का इस्तेमाल इसलिए नहीं बढ़ रहा है क्योंकि इसकी मांग ज्यादा है, बल्कि इसलिए बढ़ रहा है क्योंकि इसकी सप्लाई बहुत ज्यादा है। कंपनियां पेट्रोल और डीजल की रुकी हुई बिक्री से होने वाले घाटे की भरपाई के लिए बहुत आक्रामक तरीके से नए बाजार तलाश रही हैं। शेषाद्रि ने कहा, “अगर प्राइमरी प्लास्टिक पॉलीमर के उत्पादन, खपत और व्यापार को विनियमित नहीं किया जाता है और प्रस्तावित अंतरराष्ट्रीय कानूनी समझौता सिर्फ उत्पाद की बनावट और कचरा प्रबंधन पर ही केंद्रित रहा, तो इसका नतीजा केवल समस्या का रूप बदलना होगा, उसे पूरी तरह खत्म करना नही।”
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 19 सितंबर 2025 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: मुंबई के पास एक औद्योगिक क्षेत्र के पीछे जमा प्लास्टिक कचरा। प्लास्टिक उत्पादन वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में लगभग 3.7% का योगदान देता है। तस्वीर- रवलीन कौर।