- भारत के शहरों में जैसे-जैसे जलवायु से जुड़ी चरम स्थितियां तेज होती जा रही हैं, प्रवासी मजदूर जलवायु और सामाजिक सुरक्षा नीतियों में बड़े पैमाने पर गायब हैं, जिससे वे असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।
- वैसे जलवायु परिवर्तन को पलायन की बड़ी वजह मानकर व्यापक चर्चा की जाती है, लेकिन प्रवासी काम की तलाश में जहां पहुंचते हैं, वहां जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों को अब भी ठीक से समझा नहीं गया है या इससे पार पाने के उपाय नहीं किए गए हैं।
- भारत में सामाजिक सुरक्षा की कई बड़ी योजनाएं मौजूद हैं, लेकिन एक से दूसरी योजना में शामिल होना (पोर्टेबिलिटी), जागरूकता और क्रियान्वयन में खामियों से प्रवासी अक्सर उनका लाभ नहीं उठा पाते।
कर्नाटक के रायचूर से दस साल पहले रेखा (40) और रत्नम्मा टी (50) ने अपने तीन-तीन बच्चों के साथ अपना गांव छोड़ दिया था। दोनों बहनों के पास घर के आसपास कोई काम नहीं था। उन्हें भरोसा था कि बेंगलुरु में उन्हें कोई काम मिल जाएगा। इस शहर की आबादी 2001 और 2011 के बीच आबादी 40% बढ़कर 85 लाख हो गई। आज, शहर में लगभग करीब डेढ़ करोड़ लोग रहते हैं।
दोनों बहनें घरेलू सहायक बन गईं और उत्तर बेंगलुरु के जक्कूर इलाके में अंचेपाल्या झील के किनारे मारुति लेआउट में उन्हें रहने के लिए घर मिला गया। आठ बाय आठ फुट का यह मकान तीनों तरफ ईंट से बना है और इसकी छत तिरपाल, टिन की चादरों और सीमेंट शीट जैसी सामग्री से बनी है।
इसी तरह के घर उनकी घनी आबादी वाले मोहल्ले के चारों ओर बने हुए हैं। दोनों बहनों को न तो ठंडी हवा पसंद है और न ही मानसून। सर्दियों में उन्हें बहुत ठंडी लगती है और गर्मियां बहुत असहनीय होती हैं। जब तेज बारिश होती है, तो अंचेपाल्या झील का पानी नीचे बसे मरुति लेआउट की धूल भरी गलियों में भर जाता है। साफ पानी, सीवेज और कीचड़ आपस में मिल जाते हैं। मच्छर पनपते हैं और फिर संक्रमण व बीमारियां फैलती हैं।
कर्नाटक राज्य जलवायु परिवर्तन कार्ययोजना के अनुसार, जलवायु परिवर्तन का मतलब है कि बेंगलुरु में गर्मियां और अधिक गर्म होंगी, बारिश ज्यादा तेज होगी और शहर में बार-बार सूखा पड़ेगा।
रत्नम्मा इन दुष्प्रभावों को पहले से ही झेल रही हैं। वह कहती हैं, “गर्मियों में हम सो नहीं पाते। आधी रात तक बाहर बैठे रहते हैं, इस उम्मीद में कि हवा का झोंका आए और हमें राहत मिले। बारिश के दौरान भी हम सो नहीं पाते, क्योंकि हर जगह पानी और मच्छर होते हैं।”
क्लाइमेट इनोवेशन, माइग्रेंट्स रेजिलिएंस कोलैबोरेटिव (MRC) के सिजी चाको कहते हैं, “हम सब प्रवासी हैं।” “लेकिन जो चीज हमें अलग करती है, वह है जोखिम।” MRC जमीनी स्तर की पहल है जो पलायन और जलवायु परिवर्तन के असर को झेलने पर काम करती है। पीपल्स करेज इंटरनेशनल (PCI) के 2024 के एक अध्ययन से पता चलता है कि भारत के प्रवासी मजदूरों के लिए उनके गंतव्य पर गर्मी (77%) और मूसलाधार बारिश (59%) मौसम के सबसे बड़े जोखिमों में शामिल हैं।
इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर एनवायरनमेंट एंड डेवलपमेंट (IIED) की ओर से अक्टूबर 2025 में प्रकाशित एक रिपोर्ट बताती है कि प्रवासी भारत के विकास को गति देते हैं, लेकिन जलवायु-जनित झटकों से बचाव के लिए बनाए गए कार्यक्रमों में वे अक्सर शामिल नहीं हो पाते हैं। शहरों में प्रवासियों के पास ऐसे सामाजिक सुरक्षा कवच (सेफ्टी नेट) नहीं होते जो उन्हें प्रतिकूल मौसम के अनुसार ढलने में मदद कर सकें। विशेषज्ञों ने मोंगाबे-इंडिया को बताया कि गंतव्य जगहों पर जलवायु परिवर्तन का प्रवासियों पर क्या प्रभाव पड़ता है, इसे समझने की कोशिश अभी शुरुआती चरण में हैं।
शहर में दस साल से रहने के बावजूद रेखा कहती हैं, “हमारी गिनती बेंगलुरु के लोगों में नहीं होती? कोई हमारी बातें नहीं सुनता।”

नकद हस्तांतरण काफी नहीं
आईआईईडी में क्लाइमेट रेजिलिएंस, फाइनेंस और लॉस एंड डैमेज की निदेशक ऋतु भारद्वाज कहती हैं कि सरकारों को “सबसे पहले यह स्वीकार करना चाहिए कि प्रवासी शहरों में आते हैं और शहरी अर्थव्यवस्था में उनका योगदान बहुत उपयोगी है। शहर उनके बिना चल ही नहीं सकते।”
आंकड़ों से पता चलता है कि दिल्ली में 43%, बेंगलुरु में 42% और मुंबई में 43% आबादी बाहर से आए लोगों की है। बेंगलुरु और मुंबई में बाहर से आए अधिकांश लोग एक ही राज्य से हैं। भारद्वाज कहते हैं, “गिग अर्थव्यवस्था के कामगारों से लेकर ड्राइवर, गार्ड और घरेलू सहायक तक कोई भी शहर प्रवासियों के बिना काम नहीं कर सकता। लेकिन वे कभी भी शहर में पूरी तरह घुल-मिल नहीं पाते और वे हाशिये पर रहते हैं।”
इंडियन इंस्टीट्यूट फॉर ह्यूमन सेटलमेंट्स (IIHS) की शोधकर्ता अदिति अप्पराजू जोड़ती हैं, “नीतियों में आम तौर पर प्रवासियों का जिक्र ही नहीं होता। अगर होता भी है, तो जलवायु की बात नहीं होती है। इन दोनों का साथ में उल्लेख बिरले मामलों में ही होता है।” अप्पराजू उस रिपोर्ट की सह-लेखक हैं, जिसमें राष्ट्रीय, राज्य और शहर स्तर पर किए गए हस्तक्षेपों की सामाजिक सुरक्षा और अनुकूलन क्षमता के संदर्भ में समीक्षा की गई। इस विश्लेषण में कर्नाटक (बेंगलुरु) और केरल (कोच्चि) की नीतियों और कार्यक्रमों का अध्ययन किया गया। विकास, श्रम और जलवायु परिवर्तन पर केंद्रित 94 नीतियों और योजनाओं में से महज पांच ने स्पष्ट रूप से जलवायु और प्रवासन दोनों को साथ में रखा। अगस्त 2025 में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, कुछ ही नीतियां आंतरिक प्रवासियों की जरूरतों पर बात करती हैं और उनकी अनुकूलन क्षमता को मजबूत करने में मदद करती हैं।
ओडिशा अपनी नीतियों में जलवायु की वजह से होने वाले पलायन को शामिल करने के लिए सक्रिय तौर पर काम कर रहा है और केरल में प्रवासी मजदूरों के लिए खास प्रोग्राम हैं। कर्नाटक, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में भी कमजोर समूहों को शामिल करने के लिए नकद हस्तांतरण योजना हैं।
माइग्रेंट्स रेज़िलिएंस कोलैबोरेटिव (MRC) में शोध की अगुवाई कर रहीं अमीना किदवई बताती हैं कि मौसम की चरम घटनाओं के समय नकद हस्तांतरण योजनाओं से मदद मिल सकती है। उदाहरण के लिए, कर्नाटक की अन्न भाग्य योजना (अतिरिक्त राशन) और गृह लक्ष्मी योजना (गरीब परिवारों की महिला मुखियाओं को नकद सहायता) प्रवासी परिवारों को ऐसे मुश्किल समय से उबरने में सहायता कर सकती हैं।
अप्पराजू जोर देते हुए कहती हैं, “जलवायु के हिसाब से योजनाओं को मजबूत करके और नई योजनाएं बनाकर, प्रवासी समुदायों की क्षमता बढ़ाई जा सकती है, ताकि वे जलवायु दुष्प्रभावों आने वाले संकटों का सामना कर सकें।”
विशेषज्ञों ने मोंगाबे-इंडिया से कहा कि सामाजिक सुरक्षा कवच को जलवायु के हिसाब से बनाने का मतलब है मौजूदा कल्याण और सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रमों को फिर से बनाना, ताकि लू, बाढ़, सूखा और बीमारी फैलने जैसे जलवायु झटकों को कभी-कभार होने वाली आपदाओं के बजाय नियमित खतरा माना जा सके।
यह तरीका रोजमर्रा के शासन तंत्र में ही सुरक्षा को शामिल करता है, यानी जब जलवायु से जुड़े तय मानक (थ्रेशहोल्ड) पार हो जाएं, तो सहायता अपने-आप मिलने लगे और यह भी पक्का किया जाए कि प्रवासियों के लिए लाभ बदले जा सकने वाले हों। भारद्वाज समझाती हैं कि सामाजिक सुरक्षा पक्की करने के दो तरीके हैं: लंबी अवधि का लचीलापन बनाना और संकट आने पर तुरंत मदद देना। वे कहती हैं, “सामाजिक सुरक्षा सिर्फ नकद हस्तांतरण नहीं है; इसमें शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, आवास और गरिमा भी शामिल हैं।”
गांव में ग्रामीण परिवारों को सरकार की ओर से कई लाभ मिलते हैं — जैसे दोपहर में मुफ्त भोजन, बच्चों की देखभाल और पोषण सेवाएं, स्वास्थ्य सुविधाएं और ग्रामीण रोजगार गारंटी वगैरह। लेकिन जैसे ही कोई व्यक्ति रोजगार के अवसरों की तलाश में गांव छोड़ता है, ये सामाजिक सुरक्षा कवच लगभग खत्म हो जाते हैं। इन योजनाओं की पोर्टेबिलिटी (स्थान बदलने पर भी लाभ मिलना) बड़ी चिंता का विषय है।

किदवई कहती हैं कि भारत में कई सामाजिक सुरक्षा योजनाएं हैं, जो आबादी के बड़े हिस्से के लिए बनाई गई हैं। इसलिए यह जरूरी है कि मौजूदा योजनाओं को जलवायु के हिसाब से बनाया जाए और आखिरी पायदान तक प्रभावी पहुंच पक्की की जाए। रेखा और रत्नम्मा जैसे जो लोग राज्य के भीतर ही प्रवास करते हैं, वे कई योजनाओं के लिए योग्य बने रहते हैं, लेकिन जो लोग राज्य की सीमाओं से बाहर जाते हैं, उन्हें अक्सर ये लाभ नहीं मिल पाते हैं।
कोच्चि स्थित सेंटर फॉर माइग्रेशन एंड इंक्लूसिव डेवलपमेंट (CMID) के कार्यकारी निदेशक बेनॉय पीटर ने 2018 की बाढ़ के बाद केरल में प्रवासी मजदूरों का उदाहरण दिया।
केरल इन मजदूरों के लिए बड़ा गंतव्य है, क्योंकि अनौपचारिक क्षेत्र में यहां उम्मीदों से ज्यादा वेतन मिलता है। राज्य उनके कल्याण के लिए कई कार्यक्रम और योजनाएं भी चलाता है। फिर भी, 2018 की केरल बाढ़ के दौरान वे बहुत हद तक बाहर रहे और इसके कारण सिर्फ योजनाओं के होने से कहीं ज्यादा थी।
बेनॉय पीटर बताते हैं कि कई राहत शिविरों में प्रवासियों के साथ भेदभाव किया गया; भोजन, रहने की जगह, परिवहन और जानकारी तक उनकी पहुंच सीमित रही और कई मजदूर पैसे, दस्तावेज या परिवहन विकल्पों की जानकारी नहीं होने से घर नहीं लौट पाए। उन्होंने यह भी बताया कि मजदूरों को उनके काम का पैसा नहीं मिला, नौकरशाही और दस्तावेजी बाधाओं के कारण नकद राहत से वंचित रहे और सुरक्षित सफाई, स्वास्थ्य सुरक्षा या बीमारी की रोकथाम के लिए उन्हें बहुत कम मदद मिली।
पीटर ‘लीविंग नो वन बिहाइंड: लेसन्स फ्रॉम केरला डिज़ास्टर्स’ रिपोर्ट के लेखक हैं। वह कहते हैं कि केरल में आई आपदाओं से जो सबक मिले, वे इस प्रकार थे — 1) प्रवासियों के प्रति संवेदनशील और सबको साथ लेकर चलने वाली आपदा तैयारी और प्रतिक्रिया की पहल करना; 2) उनकी सामाजिक सुरक्षा के लिए खास संस्थागत तंत्र बनाना; 3) सामाजिक सुरक्षा उपायों तक सार्वभौमिक और पोर्टेबल ऐक्सेस पक्का करना, प्रवासियों की शिकायतें दूर करने वाला तंत्र बनाना; 4) प्रवासी जहां रहते और काम करते हैं, वहां तक पहुंचने के लिए नागरिक संगठनों के साथ सक्रिय साझेदारी करना और 5) प्रवासी की भाषाओं, साक्षरता के स्तर और गतिशीलता के हिसाब से कई भाषाओं वाली, आसानी से मिलने वाली संचार रणनीति बनाना।
IIHS की रिपोर्ट में क्रांतिकारी बदलाव लाने वाली सामाजिक सुरक्षा पर जोर दिया गया है, जो सिर्फ सहायता देने वाली नीतियों से हटकर, दूसरी खासियतों के साथ अधिकार-आधारित तरीके के जरिए सामाजिक सत्ता असंतुलन को दूर करती। इसे संभव बनाने के लिए कानून में बदलाव की जरूरत है—जैसे “सम्मानजनक काम, काम के समय पर नीतिगत और नियामक नियंत्रण या जलवायु बीमा”—लेकिन रिपोर्ट में जिन नीतियों का विश्लेषण किया गया, उनमें सिर्फ छह प्रतिशत ही इस तरह के बदलाव को शामिल करती थीं।
अप्पराजू कहती हैं, “सामाजिक सुरक्षा के बारे में सोच वास्तव में अभी तक बचाव से बड़े बदलाव की तरफ विकसित नहीं हुई है… अभी यह अधिकतर केवल झटकों का तुरंत हल खोजने तक सीमित है।”

जलवायु आधारित तरीका
कम वेतन और काम न मिलने की वजह से 40 साल की कानाबाई बी को दस साल पहले बेंगलुरु आना पड़ा। कर्नाटक के यादगीर जिले में अपने घर पर वह हर दिन लगभग 100-200 रुपए तक कमाती थीं, लेकिन बेंगलुरु में वह निर्माण मजदूर के तौर पर हर दिन 500 रुपए कमाती हैं। उनके पति भी मजदूर हैं। निर्माण क्षेत्र में में लगभग चार करोड़ प्रवासी मज़दूर काम करते हैं।
वह अपने तीन बच्चों के साथ रहती हैं। रेखा की तरह, उन्होंने बेहतर वेतन के लिए अपने रहने के हालात बदल लिए। निर्माण स्थल पर उन्हें दोपहर का खाना खाने के लिए सिर्फ एक घंटे की छुट्टी मिलती है, जिसमें वे भोजन करती हैं और आराम करती हैं। बाकी छह से आठ घंटे वह भारी सामान उठाती हैं, चाहे बारिश हो या धूप। वह कहती हैं, “हां, मेरे गांव में गर्मी ज्यादा है, लेकिन यहां मुझे गर्मियों में बहुत थकावट महसूस होती है। मेरा शरीर और सिर दर्द करता है।” उनके पास आराम करने या मनोरंजन के लिए समय नहीं है।
गांधीनगर स्थित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान और अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के शोधकर्ताओं द्वारा 2025 में किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि प्रवासी मजदूर भारत के उत्तरी, पूर्वी और दक्षिणी हिस्सों के शहरी केंद्रों की ओर जा रहे हैं, जहां गर्मी बढ़ती जा रही है। शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि इन केंद्रों में आंतरिक और बाहरी गर्मी मजदूरों की उत्पादकता को प्रभावित कर रही है। गर्मी के बढ़ते दबाव ने मजदूरों के काम करने की क्षमता को लगभग 10 प्रतिशत तक कम कर दिया है। अध्ययन के लेखक शहरी विस्तार और बढ़ते तापमान के बीच प्रवासी मजदूरों को गर्मी के बढ़ते जोखिम से बचाने के लिए तत्काल अनुकूलन पहल पर जोर देते हैं।
कर्नाटक में निर्माण मजदूर बिल्डिंग एंड अदर कंस्ट्रक्शन वर्कर्स (BOCW) कानून के तहत 18 से ज्यादा कल्याण योजनाओं के लिए योग्य हैं जो स्वास्थ्य देखभाल, दुर्घटना बीमा और उनके बच्चों के लिए छात्रवृत्तियां जैसी महत्वपूर्ण जरूरतों को पूरा करती हैं। MRC के चाको के अनुसार, भले ही कानून में जलवायु का खास उल्लेख न हो, ये योजनाएं मजदूरों को इस हिसाब से ढलने में मदद कर सकती हैं। हालांकि, 2021 के एक अध्ययन में पाया गया कि 98% से अधिक मजदूर BOCW में पंजीकृत ही नहीं हैं।
हीना खौसर जैसे MRC संस्थाओं के फील्ड वर्कर ऐसी योजनाओं के प्रति जागरूकता और पंजीकरण बढ़ाने में अहम भूमिका निभाते हैं। चाको के अनुसार, MRC ने Resilience Connect नामक मोबाइल एप्लिकेशन विकसित किया है, जो फील्ड टीम के सदस्यों को संवेदनशील परिवारों का पंजीकरण करने, उन्हें सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के लिए योग्यता का आकलन करने और उनके आवेदन की स्थिति का पता लगाने में मदद करता है। चाको बताते हैं कि इस ऐप के जरिए फील्ड अधिकारी यह देख सकते हैं कि कोई विशेष व्यक्ति या आंतरिक प्रवासी किन योजनाओं के लिए योग्य है। अब तक लगभग 75 लाख प्रवासी मजदूरों को सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का लाभ उठाने में मदद मिली है।
जब फील्ड वर्क के दौरान खौसर ने कनाबाई से पूछा कि क्या उसे या उसके पति को कार्यस्थल बीमा मिला है, तो कनाबाई निश्चित नहीं थी। इसके बाद खौसर ने अपना फोन निकाला, ऐप में लॉगिन किया, कनाबाई की जानकारी अपलोड की और कुछ ही मिनटों में उसे दिखा दिया कि वह किन योजनाओं के लिए योग्य हैं और किनका लाभ वह फिलहाल ले रही हैं।
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बेनॉय पीटर बताते हैं कि एक हद तक राज्य की भी सीमाएं होती हैं: “प्रवासी मजदूरों के कल्याण के लिए मुख्य जिम्मेदारी नियोक्ताओं की होती है, क्योंकि उन्हें श्रम की उपलब्धता से सबसे अधिक लाभ मिलता है।” फिर भी अधिकांश नियोक्ता इस दिशा में कदम नहीं उठाते।
फील्ड अधिकारी नियोक्ताओं द्वारा छोड़ी गई जगह को भरते हैं और दस्तावेजों में कमियां पहचानने में मदद करते हैं, प्रवासी मजदूरों को रिकॉर्ड हासिल करने, आवेदन जमा करने और अन्य प्रक्रियाओं में सलाह देते हैं।
जांच में पता चला कि कनाबाई और उनके पति BOCW के तहत योजनाओं के लिए पंजीकृत थे, लेकिन उन्होंने इनमें से कई योजनाओं, जैसे उनके बच्चों के लिए मिलने वाली संभावित छात्रवृत्तियों का लाभ नहीं उठाया था।
अप्पराजू कहती हैं कि गैर-सरकारी संगठन आमतौर पर प्रवासी मजदूरों के लिए जलवायु और पोर्टेबिलिटी को ध्यान में रखते हुए सबसे समग्र हस्तक्षेप करते हैं। वे उन क्षेत्रीय और विभागीय जुड़ाव को बना सकते हैं, जो प्रवासी मजदूरों के साथ काम करने में जरूरी होते हैं। लेकिन इसके अलावा, सबसे संवेदनशील श्रमिक सरकारी हस्तक्षेप से अक्सर बाहर रह जाते हैं। उनका कहना है कि नीतिगत और जमीनी स्तर पर बड़ा अंतर है। फिर भी, शहरों में जलवायु कार्रवाई और प्रवासियों की अनुकूलन क्षमता पर ध्यान देना अनिवार्य है।
लेखक एशियन कॉलेज ऑफ जर्नलिज्म के क्लाइमेट चेंज मीडिया हब में रेजिडेंट फेलो हैं।
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 10 फरवरी, 2026 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर इमेज: रेखा (बाएं) और रत्नम्मा. टी (दाएं) बहनें हैं और घरेलू सहायक के तौर पर काम करती हैं। दोनों बेंगलुरु में जहां रहती हैं जहां कई प्रवासी परिवार रहते हैं। जब भारी बारिश होती है, तो पास की झील में बाढ़ आ जाती है। तस्वीर – महिमा जैन।