बिहार News

हरसिद्धि प्रखंड के सोनवरसा गांव में 400 साल पुराने बरगद के पेड़ की पहचान की गई और स्थानीय लोगों के सहयोग से इसे संरक्षित किया गया है। तस्वीर- शशि शेखर

चंपारण के गार्डियन: पुराने पेड़ों को बचाने की एक अनोखी पहल

दुनियाभर में पेड़ों को बचाने के लिए कई अभियान चल रहे हैं। लेकिन बिहार के पूर्वी चंपारण जिले में पुराने दरख्तों को सहेजने का एक अनोखा अभियान चल रहा है।…
हरसिद्धि प्रखंड के सोनवरसा गांव में 400 साल पुराने बरगद के पेड़ की पहचान की गई और स्थानीय लोगों के सहयोग से इसे संरक्षित किया गया है। तस्वीर- शशि शेखर
कहलगांव के 65 वर्षीय दशरथ सहनी डॉल्फिन मित्र के तौर पर संरक्षण का काम करते हैं। वह हर दिन नाव से आठ से दस किमी की गश्त करके संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखते हैं। तस्वीर- राहुल सिंह/मोंगाबे

[वीडियो] गंगा डॉल्फिन को बचाने की डगर में कई मुश्किलें, प्रदूषण और बांध बड़ी समस्या

कोरोना के दौरान लगे लॉकडाउन के बाद मीडिया ने गंगा में इंसानी गतिविधियों में कमी के चलते नदी के स्वच्छ होने की खबरें दीं। कहा गया कि इससे देश के…
कहलगांव के 65 वर्षीय दशरथ सहनी डॉल्फिन मित्र के तौर पर संरक्षण का काम करते हैं। वह हर दिन नाव से आठ से दस किमी की गश्त करके संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखते हैं। तस्वीर- राहुल सिंह/मोंगाबे
अररिया जिले की वृक्षवाटिका का जंगल। बिहार सरकार ने इस जंगल को खुला चिड़ियाघर के रूप में विकसित करने का निर्णय लियाहै। तस्वीर- उमेश कुमार राय

बिहार: एक तरफ हरियाली बढ़ाने का दावा, दूसरी ओर काटे जा रहे वन

पिछले साल बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने लोगों से पर्यावरण की रक्षा की अपील की थी और इसके लिए हरियाली बचाने और जल संरक्षण पर जोर दिया था। उन्होंने…
अररिया जिले की वृक्षवाटिका का जंगल। बिहार सरकार ने इस जंगल को खुला चिड़ियाघर के रूप में विकसित करने का निर्णय लियाहै। तस्वीर- उमेश कुमार राय
कोसी अपने साथ भारी मात्रा में गाद लाती है, जिसकी वजह से यह नदी बहुत तेजी से अपना रास्ता बदलती है और किसानों के खेतों से होकर बहने लगती है। तस्वीर- उमेश कुमार राय/मोंगाबे

बिहारः कोसी क्षेत्र के किसान क्यों कर रहे भू-सर्वेक्षण का विरोध?

60 वर्षीय सत्यनारायण यादव ने पिछले साल जिस 2.75 एकड़ खेत में खेती की थी, उस जमीन पर कोसी नदी की धारा बह रही है। “खेत में नदी बह रही…
कोसी अपने साथ भारी मात्रा में गाद लाती है, जिसकी वजह से यह नदी बहुत तेजी से अपना रास्ता बदलती है और किसानों के खेतों से होकर बहने लगती है। तस्वीर- उमेश कुमार राय/मोंगाबे
पटना पक्षी अभयारण्य के पास उड़ते पक्षी। तस्वीर- विराग शर्मा/विकिमीडिया कॉमन्स

भूदान ने बदली ज़िंदगी, बहेलिये बन गए पक्षियों के पैरोकार

‘बहेलिया आएगा, जाल बिछाएगा, दाना डालेगा..।’ हिन्दी क्षेत्र में कौन होगा जिसने यह कहानी न सुनी होगी! इस कहानी में जिस बहेलिया समुदाय को पक्षियों के लिए खतरा बताया गया…
पटना पक्षी अभयारण्य के पास उड़ते पक्षी। तस्वीर- विराग शर्मा/विकिमीडिया कॉमन्स
वैशाली जिले के रूसुलपुर तुर्की गांव में 414 एकड़ खेत जैविक कॉरिडोर का हिस्सा है और इसमें कुल 351 किसान जुड़े हुए हैं।। फोटो: उमेश कुमार राय

बिहार की जैविक कॉरिडोर योजना हो रही है फेल, केंद्र के लिए भी सबक

बीते फरवरी महीने में आम बजट पेश करते हुए केंद्र सरकार ने देशभर में खासकर गंगा नदी की धारा के पांच किलोमीटर के दायरे में जैविक खेती को प्रोत्साहित करने…
वैशाली जिले के रूसुलपुर तुर्की गांव में 414 एकड़ खेत जैविक कॉरिडोर का हिस्सा है और इसमें कुल 351 किसान जुड़े हुए हैं।। फोटो: उमेश कुमार राय
बिहार के दरभंगा स्थित नेहरा में चन्दियार पक्षियों का एक समूह। तस्वीर- Vaibhavcho/विकिमीडिया कॉमन्स

बिहार में शिकारियों की बहार, प्रवासी पक्षियों का हो रहा कारोबार

प्रवासी पक्षियों के लिए स्वर्ग माने जाने वाले बिहार में अब इन मेहमानों की तादाद घटती जा रही है। बिहार के वन और पर्यावरण मंत्रालय की ओर से प्रकाशित 'बर्ड्स…
बिहार के दरभंगा स्थित नेहरा में चन्दियार पक्षियों का एक समूह। तस्वीर- Vaibhavcho/विकिमीडिया कॉमन्स
मोतिहारी शहर स्थित रघुनाथपुर पुल से धनौती नदी कुछ इस तरह की दिखती है। तस्वीर- सीटू तिवारी

चंपारण के धनौती नदी को मिला राष्ट्रीय पुरस्कार पर स्थानीय लोग असमंजस में, आखिर क्यों?

बिहार के मोतिहारी शहर के बीचोंबीच होकर बहती धनौती एक बड़े नाले में तब्दील हो गई है। नदी के ऊपर बने रघुनाथपुर पुल से, गंदगी से बजबजाती इस नदी से…
मोतिहारी शहर स्थित रघुनाथपुर पुल से धनौती नदी कुछ इस तरह की दिखती है। तस्वीर- सीटू तिवारी
सुखेत मॉडल के तहत गांव के किसानों से 1200 किलो गोबर और खेतों-घरों से निकलने वाला कचरा लिया जाता है। इन किसानों को बदले में रसोई गैस सिलेंडर के लिए पैसे दिए जाते हैं। तस्वीर- राहुल कुमार गौरव

जैविक खेती में बिहार के सुखेत मॉडल से कैसा दिखता है भविष्य?

बिहार के जैविक पंचायत के नाम से मशहूर सुखेत पंचायत के रहने वाले सत्तन यादव खेत खाली होने के बाद भी कई दिनों तक गेंहू की बुआई नहीं कर पाये…
सुखेत मॉडल के तहत गांव के किसानों से 1200 किलो गोबर और खेतों-घरों से निकलने वाला कचरा लिया जाता है। इन किसानों को बदले में रसोई गैस सिलेंडर के लिए पैसे दिए जाते हैं। तस्वीर- राहुल कुमार गौरव

दशरथ मांझी के गांव से समझिए बिहार में सौर ऊर्जा की हकीकत

बिहार के गया जिले में स्थित एक पहाड़ी गांव गहलौर को दशरथ मांझी की वजह से जाना जाता है। वही दशरथ मांझी जिन्होंने दो दशक तक अथक परिश्रम से पहाड़…