- उत्तर बिहार की 2024 की बाढ़ ने घरेलू स्तर पर भारी नुकसान किया, मेघ पाईन अभियान की रिपोर्ट के अनुसार सात जिलों में 2,290 परिवारों को कुल ₹126.3 करोड़ की क्षति हुई, जिसमें भूमि और आवासीय नुकसान सबसे अधिक रहा।
- जमीनी अनुभव दिखाते हैं कि बाढ़ का असर तात्कालिक नहीं रहता, बल्कि घर, जमीन, आजीविका और सामाजिक सुरक्षा के नुकसान के रूप में लंबे समय तक बना रहता है।
- रिपोर्ट के अनुसार बाढ़ का स्वरूप बदल रहा है, तटबंध टूटने, लंबे जलभराव और असामान्य बारिश के कारण जोखिम अब केवल नदी किनारे तक सीमित नहीं है।
29 सितंबर 2024 की रात दरभंगा जिले के किरतपुर प्रखंड की नरकटिया भंडारिया पंचायत में रहने वाले नूर मोहम्मद की जिंदगी बदल गई। कोसी नदी का पश्चिमी तटबंध टूटते ही पानी उनके मोहल्ले में घुस आया और कुछ ही घंटों में उनका पक्का घर और उससे जुड़ी जमीन पूरी तरह नष्ट हो गई। बाढ़ के बाद परिवार को रिश्तेदारों के यहां शरण लेनी पड़ी।
नूर मोहम्मद का अनुभव मेघ पाईन अभियान की रिपोर्ट “हाउसहोल्ड-लेवल फ्लड लॉस असेसमेंट 2024” में दर्ज उन 2,290 परिवारों की वास्तविकताओं में से एक है, जिनका उत्तर बिहार के सात जिलों में सर्वे किया गया। रिपोर्ट के अनुसार, 2024 की बाढ़ में घरेलू स्तर पर कुल ₹126.3 करोड़ का नुकसान हुआ, जिसमें भूमि और आवासीय क्षति का हिस्सा सबसे अधिक रहा।
नूर बताते हैं कि संयुक्त परिवार के 14 सदस्य एक पक्के घर में रहते थे, लेकिन बाढ़ में न सिर्फ मकान बल्कि उसकी जमीन भी कटकर चली गई। दिल्ली में मजदूरी कर रहे नूर जब लौटे, तो उनके पास देखने के लिए कुछ भी नहीं था। बेटी की शादी के लिए जुटाया गया सामान और परिवार की आमदनी का सहारा बनी भाई की छोटी दुकान भी बर्बाद हो गई। सरकारी सर्वे और आश्वासन के बावजूद, जुलाई 2025 में मुआवजा और जमीन देने से इनकार कर दिया गया।
इसी गांव के 30 वर्षीय अशोक पासवान की कहानी भी अलग नहीं है। बटाईदार किसान अशोक का फूस का घर, जो पुनर्वास योजना के तहत बना था, उसी रात ढह गया। चार बीघा में लगी धान की फसल बह गई और तीन मवेशियों की मौत हो गई। बाढ़ के बाद परिवार को महीनों तक तटबंध पर रहना पड़ा और घर दोबारा बनाने में अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ा।
अगस्त 2025 में फिर आई बाढ़ के कारण लगातार दूसरे साल खेती नहीं हो सकी। अशोक बताते हैं कि मकान और एक मवेशी का कुछ मुआवजा मिला, लेकिन फसल का कोई मुआवजा नहीं मिला। स्कूल बंद रहने से बच्चों की पढ़ाई भी प्रभावित हुई।
नूर और अशोक की कहानियां दिखाती हैं कि कोसी के तटवर्ती इलाकों में बाढ़ अब एक अस्थायी आपदा नहीं रही है। बार-बार आने वाली बाढ़, अधूरा पुनर्वास और अपर्याप्त मुआवजा इन परिवारों को हर साल उसी असुरक्षा में वापस धकेल देता है, जहां से निकलने का रास्ता लगातार कठिन होता जा रहा है।

126.3 करोड़ का नुकसान
रिपोर्ट उत्तर बिहार में सितंबर–अक्टूबर 2024 की फेज़-2 बाढ़ का एक विस्तृत घरेलू-स्तरीय आकलन प्रस्तुत करती है। सात जिलों की 21 पंचायतों में 2,290 परिवारों के सर्वे के आधार पर रिपोर्ट में कुल ₹126.3 करोड़ के आर्थिक नुकसान का अनुमान लगाया गया है।
रिपोर्ट के अनुसार, कुल नुकसान में सबसे बड़ा हिस्सा भूमि क्षति का है, जो 47.2 प्रतिशत रहा। इसमें नदी कटाव, खेतों में बालू जमना और लंबे समय तक खेती न हो पाना शामिल है। इसके बाद 36.2 प्रतिशत नुकसान आवासीय क्षति से जुड़ा है, जिसमें कच्चे और अर्ध-पक्के घरों को हुए नुकसान और मरम्मत लागत शामिल हैं। बड़ी संख्या में परिवारों को महीनों तक अस्थायी आश्रयों में रहना पड़ा।
सर्वे में शामिल अधिकांश परिवार पहले से ही कमजोर स्थिति में थे। करीब 87 प्रतिशत परिवार कच्चे घरों में रहते थे। बाढ़ के दौरान 91 प्रतिशत परिवारों ने भोजन की मात्रा घटाई और 82 प्रतिशत से अधिक परिवार अस्थायी रूप से विस्थापित हुए। शेष नुकसान पानी, स्वच्छता, पशुधन और आजीविका से जुड़ा रहा, जिससे आय के स्रोत लंबे समय तक प्रभावित हुए।
रिपोर्ट के मुताबिक, प्रति परिवार औसत नुकसान ₹5.51 लाख रुपये रहा। कम आय वाले परिवारों के लिए यह नुकसान कई वर्षों तक कर्ज और असुरक्षा का कारण बन सकता है। इसके अलावा, 80 प्रतिशत परिवार किसी भी तरह के बाढ़ बीमा से अनजान थे, जिससे रिकवरी और कठिन हो गई।

सीतामढ़ी, सुपौल और किशनगंज जैसे जिलों का लगभग 90 प्रतिशत क्षेत्र हर साल बाढ़ से प्रभावित होता है। वहीं भागलपुर, दरभंगा, खगड़िया, मधेपुरा और सहरसा, ये पांच जिले ऐसे हैं, जहां करीब 70 प्रतिशत भूभाग बाढ़ की जद में आता है। शेष जिलों में बाढ़-प्रभावित क्षेत्र 25 से 55 प्रतिशत के बीच रहता है। कुल मिलाकर, बिहार के लगभग 56 प्रतिशत क्षेत्र पर बाढ़ का सीधा प्रभाव पड़ता है।
बाढ़ के नए प्रकार और बदलता पैटर्न
रिपोर्ट का एक अहम निष्कर्ष यह है कि 2024 की बाढ़ पारंपरिक नदी से जुड़ी बाढ़ तक सीमित नहीं रही। अध्ययन में बाढ़ के कई नए रूप सामने आए हैं, जिनमें तटबंध टूटने से आई बाढ़, दो नदियों के बीच फंसे इलाकों में होने वाली कंपाउंड फ्लडिंग, बिना तटबंध वाली नदियों में अचानक आने वाली फ्लैश फ्लड और तेज नदी कटाव, साथ ही लंबे समय तक जलभराव वाली शहरी और ग्रामीण बाढ़ शामिल हैं। ये पैटर्न इस ओर संकेत करते हैं कि बाढ़ का खतरा अब केवल नदी किनारे रहने वाले समुदायों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि दूर-दराज के और पहले अपेक्षाकृत सुरक्षित माने जाने वाले इलाकों को भी प्रभावित कर रहा है।
रिपोर्ट बताती है कि मेघ पाईन अभियान ने वर्षों की फील्ड रिसर्च के आधार पर बाढ़ की आठ मूल टाइपोलॉजी विकसित की हैं। इसका उद्देश्य सभी बाढ़ों को एक ही श्रेणी में रखने के बजाय उनके कारणों, उनकी गति और उनके प्रभावों को अलग-अलग समझना है। अध्ययन के अनुसार, बाढ़ के ये नए प्रकार मौजूदा नीतियों के लिए चुनौती पेश करते हैं, क्योंकि ये जलवायु परिवर्तनशीलता और तटबंध आधारित प्रबंधन के अनपेक्षित प्रभावों से जुड़े हुए हैं।
मेघ पाईन अभियान के प्रबंध न्यासी और रिपोर्ट के प्रमुख लेखक एकलव्य प्रसाद ने कहा, “मानसून के भीतर ही अलग-अलग चरणों में आने वाली तीव्र बारिश, तटबंधों पर बढ़ता दबाव और नदी तंत्र में आए बदलाव उत्तर बिहार को एक नए तरह के बाढ़ जोखिम की ओर धकेल रहे हैं।” उन्होंने जोर देकर कहा, “पिछले कुछ सालों में बिहार में बाढ़ का एक नया ट्रेंड देखने को मिला है, अनिश्चित बारिश के कारण बाढ़ अब सितंबर के अंत में आ रही है। बिहार में बारिश हो जाए तो भी बाढ़ आ जाती है या नेपाल में बारिश हो तो भी बिहार में बाढ़ आती है। इसके साथ ही बाढ़ का मैनेजमेंट कैसे करते हैं, यह भी एक बड़ा फैक्टर है।”

प्रसाद ने रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष पर प्रकाश डालते हुए कहा, “हमने इस रिपोर्ट में यह देखा है कि जिन लोगों के पास कम हानि हुई है, उनके पास उतने ही कम संसाधन हैं। ऐसा इसलिए हुआ है क्योंकि गरीब परिवारों के पास पहले से ही कम संपत्ति होती है। नुकसान का आंकड़ा कम दिखता है, लेकिन उनके लिए यह पूरी आजीविका का अंत होता है। यह ‘वल्नरेबिलिटी पैराडॉक्स’ है, संपत्ति वाले परिवारों में नुकसान बड़ा दिखता है, लेकिन गरीबों पर असर अधिक गहरा पड़ता है।”
उन्होंने चेतावनी दी, “2024 की बाढ़ इसी टूटते हुए संतुलन की चेतावनी थी, एक ऐसी चेतावनी, जो बताती है कि भविष्य में उत्तर बिहार के लिए बाढ़ न केवल अधिक अनियमित होगी, बल्कि उससे उबरना भी पहले से कहीं ज़्यादा कठिन होता जाएगा।”
आपदा प्रबंधन विशेषज्ञ कुलभूषण के अनुसार, बाढ़ की चुनौती अब केवल उसकी तीव्रता तक सीमित नहीं है, बल्कि उसके बदलते समय-चक्र से भी जुड़ी है। वे बताते हैं कि पहले अक्टूबर तक बाढ़ मॉनिटरिंग खत्म मान ली जाती थी, लेकिन अब बाढ़ का दौर लंबा हो गया है, जबकि सरकारी तैयारी अब भी पुराने कैलेंडर पर आधारित है।
कुलभूषण का कहना है कि बाढ़ का सबसे ज्यादा असर गरीब और हाशिए पर रहने वाले समुदायों पर पड़ता है, जो अक्सर समय पर सूचना और तैयारी से वंचित रह जाते हैं। वे यह भी रेखांकित करते हैं कि फ्लैश फ्लड जैसी स्थितियों में समय पर चेतावनी से नुकसान काफी हद तक रोका जा सकता है।
आंकड़ों और हकीकत के बीच का अंतर
डेवलपमेंट मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट के निदेशक देवीप्रसाद मिश्रा के अनुसार, बाढ़ के बाद किया जाने वाला क्षति आकलन अक्सर वास्तविक नुकसान को पूरी तरह नहीं दर्शाता। वे कहते हैं कि बिहार में बाढ़ के कई अलग-अलग रूप सामने आ रहे हैं, लेकिन नीतियां अब भी उन्हें एक ही ढांचे में समझती हैं। हर तरह की बाढ़ को अलग-अलग पहचानने और उसके अनुरूप रणनीति बनाने की जरूरत है।
मिश्रा यह भी बताते हैं कि पक्के घरों का आर्थिक नुकसान राशि में अधिक दिखता है, जबकि कच्चे घरों वाले परिवारों का अनुपातिक नुकसान कहीं ज्यादा होता है, जिसे नीतियों में अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। उनके अनुसार, इसी कारण मुआवजा और आपदा प्रबंधन की मौजूदा नीतियों पर नए सिरे से विचार करना जरूरी है।
समय पर सूचना, समय पर तैयारी
बिहार राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, राज्य में बाढ़ प्रबंधन अब केवल राहत तक सीमित नहीं है, बल्कि बाढ़-पूर्व तैयारी और क्षमता निर्माण इसका मुख्य आधार बन चुके हैं। बाढ़ को अब एक मौसमी घटना के बजाय साल भर बनी रहने वाली चुनौती के रूप में देखा जा रहा है, जिसके लिए स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप तैयारी पर जोर दिया जा रहा है।

इसी क्रम में 2015 से मुख्यमंत्री स्कूल सुरक्षा कार्यक्रम चलाया जा रहा है, जिसके तहत बच्चों और शिक्षकों को बाढ़ से पहले, दौरान और बाद की तैयारियों का प्रशिक्षण दिया जाता है। अब तक करीब 10,000 स्वयंसेवक तैयार किए जा चुके हैं, 20,000 युवाओं को तैराकी का प्रशिक्षण मिला है और लगभग 2.5 करोड़ बच्चों तक आपदा जागरूकता पहुंचाई गई है। पशुधन की अहम भूमिका को देखते हुए पशु चिकित्सकों को भी बाढ़ प्रबंधन के लिए प्रशिक्षित किया गया है।
बाढ़ के बदलते समय-चक्र को ध्यान में रखते हुए अर्ली वार्निंग सिस्टम अब अप्रैल–मई से सक्रिय कर दिया जाता है। अधिकांश प्रखंडों में ऑटोमैटिक वेदर स्टेशन लगाए गए हैं और सैटेलाइट डेटा की मदद से संभावित जलभराव का आकलन किया जाता है। अधिकारी के मुताबिक, समय पर सूचना और समय पर तैयारी ही बाढ़ से होने वाले नुकसान को कम करने की सबसे प्रभावी रणनीति है।
राहत से आगे रिकवरी और पुनर्निर्माण
राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के सदस्य कृष्ण वत्स कहते हैं कि यह रिपोर्ट बाढ़ के बाद होने वाले वास्तविक नुकसान की जटिलता को सामने लाती है। उनके अनुसार, नुकसान का आकलन आम तौर पर दो चरणों में होता है, पहला तात्कालिक राहत के लिए और दूसरा विस्तृत आकलन, जिसके आधार पर रिकवरी और पुनर्निर्माण की योजना बनाई जाती है। इसी आकलन से यह तय होता है कि किन क्षेत्रों में किस तरह के हस्तक्षेप और कितनी निधि की आवश्यकता है।
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डॉ. वत्स बताते हैं कि हाल के वर्षों में SDRF के तहत रिकवरी और पुनर्निर्माण के लिए अलग फंडिंग विंडो बनाई गई है, हालांकि इसे पूरी तरह प्रभावी बनाने में अभी समय लग रहा है। NDMA का बाढ़ प्रबंधन दृष्टिकोण समुदाय-आधारित है, जिसमें समय पर चेतावनी, सुरक्षित निकासी और जान-माल के नुकसान को कम करने पर जोर दिया जाता है।
उनके अनुसार, बदलते मानसून पैटर्न के कारण सितंबर और अक्टूबर में भी भारी बारिश हो रही है, जिससे बाढ़ का जोखिम बढ़ा है। ऐसे में आपदा प्रबंधन को केवल राहत तक सीमित रखने के बजाय बाढ़-पूर्व तैयारी, नदियों को उनके प्राकृतिक विस्तार का स्थान देने और पारंपरिक जल संरचनाओं को पुनर्जीवित करने जैसे उपायों पर गंभीर निवेश जरूरी है।
बैनर तस्वीर- कोसी तटबंध के बाहर सुपौल जिले में जलभराव। तस्वीर साभार- एकलव्य प्रसाद, मेघ पाईन अभियान