- हरियाणा और मध्य प्रदेश में कार्बन खेती से जुड़े किसानों को लगभग कोई मौद्रिक लाभ नहीं मिला है, एक नए अध्ययन में यह पाया गया है।
- अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति समुदायों से आने वाले हाशिए के किसानों की खेती योग्य भूमि में हिस्सेदारी कार्बन कोर परियोजनाओं में केवल 5% थी, जबकि गैर-कार्बन किसानों में यह आंकड़ा 17% था।
- हाशिए पर मौजूद किसानों का अनजाने में हुआ बहिष्करण, समावेशी विकास लक्ष्यों को हासिल करने में कार्बन बाजारों की भूमिका पर सवाल खड़ा करता है, अध्ययन में कहा गया है।
करीब डेढ़ साल पहले केंद्रीय कृषि मंत्रालय की ओर से दिशानिर्देश जारी किए गए, जिसमें बताया गया कि कृषि क्षेत्र किस तरह कार्बन न्यूनीकरण तकनीकों को अपनाकर कार्बन बाजार का लाभ उठा सकता है। तत्कालीन कृषि मंत्री अर्जुन मुंडा ने कहा था कि किसानों को कार्बन बाजार से जोड़ना न केवल किसानों के लिए फायदेमंद होगा, बल्कि इससे पर्यावरण के अनुकूल कृषि पद्धतियों को अपनाने की गति भी तेज होगी।
हालांकि, भारत में कार्बन खेती की स्थिति पर हुए एक नए अध्ययन में इससे उलट बात कही गई है।
इंटरनेशनल मेज़ एंड व्हीट इम्प्रूवमेंट सेंटर (CIMMYT) के शोधकर्ताओं द्वारा सैकड़ों किसानों के बीच किए गए एक सर्वेक्षण में पाया गया कि कार्बन खेती, जिसमें खेती का उद्देश्य उत्सर्जन को कम करना या कार्बन अवशोषण को बढ़ाना होता है, में अनजाने में छोटी जोत वाले किसान इस प्रक्रिया से बाहर हो जाते हैं। सर्वेक्षण के समय तक इस योजना से जुड़े अधिकांश किसानों को कोई वित्तीय लाभ नहीं मिला था।
“हालांकि ये परियोजनाएं अभी अपने शुरुआती दौर में हैं, लेकिन हम यह बताना चाहते थे कि ये न तो हाशिए पर मौजूद जातीय समूहों, छोटे और सीमांत किसानों के लिए सामाजिक रूप से समावेशी हैं, और न ही महिलाओं के लिए,” CIMMYT के पर्यावरण और संसाधन अर्थशास्त्री तथा अध्ययन के प्रमुख लेखक ए. जी. अदीत करिअप्पा ने कहा।
इस अध्ययन में उल्लेख किया गया है कि कार्बन खेती में जलवायु परिवर्तन की गति को कम करने की क्षमता है, साथ ही यह किसानों को कार्बन क्रेडिट के माध्यम से अतिरिक्त आय के साधन भी प्रदान कर सकती है।
कार्बन ऑफसेट खरीदना उन कंपनियों के लिए एक लोकप्रिय विकल्प बना हुआ है जो अपने कार्बन उत्सर्जन के प्रभाव को कम करना चाहती हैं। भारत के कृषि क्षेत्र से देश के वार्षिक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का 13% हिस्सा आता है, और यह क्षेत्र अब भारत में कार्बन क्रेडिट उत्पादन के लिए एक संभावनाशील विकल्प के रूप में उभर रहा है। इस अध्ययन के अनुसार, भारत में लगभग 1.65 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र में फैली 50 से अधिक कृषि आधारित कार्बन क्रेडिट परियोजनाएं हैं।
हालांकि, 2024 में क्लाइमेट पॉलिसी नामक जर्नल में प्रकाशित हुआ यह अध्ययन बताता है कि इन परियोजनाओं के क्रियान्वयन में आ रही अड़चनें किसानों को प्रत्यक्ष लाभ मिलने से रोक रही हैं। वित्तीय लाभों की कमी, जानकारी और जागरूकता का अभाव, और फसल उत्पादन में गिरावट जैसी वजहों से किसान कार्बन खेती की पद्धतियों को जारी रखने का निर्णय नहीं ले रहे हैं।
कार्बन खेती और सामाजिक दायरे
कार्बन खेती में खेती की ऐसी पद्धतियाँ शामिल हैं जो या तो ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करती हैं या कार्बन अवशोषण (कार्बन सीक्वेस्ट्रेशन) को बेहतर बनाती हैं। इसके उदाहरणों में डायरेक्ट सीडेड राइस (DSR) शामिल है, जिसमें धान के बीजों को सीधे मिट्टी में 2–3 सेंटीमीटर गहराई तक बोया जाता है, जिससे पानी और ऊर्जा की खपत कम होती है। इसी तरह, ऑल्टरनेट वेटिंग एंड ड्रायिंग (AWD) तकनीक में धान के खेतों को बारी-बारी से पानी से भरा और सुखाया जाता है।
कार्बन खेती की अन्य पद्धतियों में जुताई रहित (ज़ीरो टिलेज) खेती, रासायनिक उर्वरकों का कम उपयोग, और फसल अवशेषों का प्रबंधन (जैसे पराली जलाने के बजाय उसका पुनः उपयोग) भी शामिल हैं।

शोधकर्ताओं ने मध्य प्रदेश और हरियाणा में सात कार्बन खेती परियोजनाओं का चयन किया, जो वेरा (Verra) नामक संस्था के साथ सत्यापन, पंजीकरण या विकास की प्रक्रिया में थीं। वेरा कार्बन क्रेडिट के लिए मानक निर्धारित करने वाली एक अंतरराष्ट्रीय संस्था है। इन परियोजनाओं के अंतर्गत कुल 814 किसानों का सर्वेक्षण किया गया ताकि यह समझा जा सके कि कार्बन खेती के क्या परिणाम हैं, और यह गैर-कार्बन खेती करने वाले किसानों की तुलना में कैसे हैं।
“हमने पाया कि परियोजना को लागू करने वाले डेवलपर का प्रभाव किसानों के कार्बन खेती छोड़ने (डिसएडॉप्शन) की दर पर पड़ता है,” अध्ययन के मुख्य लेखक, करिअप्पा ने कहा।
परियोजना डेवलपर्स को तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया — कार्बन कोर कंपनियां (वे व्यवसाय जो केवल कार्बन क्रेडिट के उत्पादन और बिक्री पर केंद्रित हैं), कार्बन ब्रांच कंपनियां (बड़ी कंपनियों की सहायक इकाइयां या कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व [CSR] शाखाएं, जिनका मूल व्यवसाय किसी अन्य क्षेत्र से जुड़ा होता है), और कार्बन ब्लेंड कंपनियां (ऐसी कृषि कंपनियां जो कार्बन क्रेडिट उत्पादन को एक अतिरिक्त उद्यम के रूप में देखती हैं)।
अध्ययन के अनुसार, कार्बन कोर कंपनियां, जिनका व्यवसाय कार्बन क्रेडिट उत्पादन पर निर्भर करता है, दूसरे वर्ष तक कार्बन खेती को जारी रखने के मामले में सबसे अच्छा प्रदर्शन करती हैं, “संभावित रूप से किसानों के साथ बेहतर संवाद और सहभागिता रणनीतियों” के कारण। इन कंपनियों की प्रवृत्ति होती है कि वे “जमीनी स्तर पर अधिक सक्रिय होती हैं, उनके पास अधिक स्टाफ होता है, वे अधिक सुलभ होती हैं, और उनका NGOs या कृषि मशीनरी सेवा प्रदाताओं जैसे अन्य साझेदारों के साथ सहयोग होता है,” जो कि अन्य दो डेवलपर श्रेणियों की तुलना में बेहतर होता है।
लेकिन कार्बन कोर कंपनियों की परियोजनाओं में छोटे जोत वाले हाशिए पर मौजूद समुदायों के किसानों के बीच सामाजिक बहिष्करण की दर सबसे अधिक देखी गई। हरियाणा और मध्य प्रदेश में कार्बन कोर कंपनियों के साथ जुड़े किसानों ने गैर-कार्बन किसानों की तुलना में क्रमशः 51% और 32% अधिक भूमि पर खेती की, जो यह दर्शाता है कि उनके पास बड़े भूखंड थे।
ये किसान ज्यादातर गैर-हाशिए के जातीय समूहों से थे। रिपोर्ट के अनुसार, कार्बन कोर कंपनियों के साथ जुड़े 83% किसान सामान्य, गैर-हाशिए की जातियों से थे। यह प्रवृत्ति कार्बन ब्रांच परियोजनाओं में भी बनी रही, जहां 69% किसान गैर-हाशिए की जातियों से संबंधित थे।
अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) समुदायों से आने वाले हाशिए के किसानों की हिस्सेदारी कार्बन कोर परियोजनाओं में कुल खेती योग्य भूमि का केवल 5% थी, जबकि गैर-कार्बन किसानों के बीच यह आंकड़ा 17% था। अध्ययन के अनुसार, यह “बड़े भू-स्वामियों के पक्ष में संभावित पक्षपात” को दर्शाता है, “जो संसाधनों तक बेहतर पहुंच या अधिक जोखिम उठाने की क्षमता के कारण भागीदारी में अधिक सक्षम या इच्छुक हो सकते हैं।”
मनन भान, जो कि अशोक ट्रस्ट फॉर रिसर्च इन इकोलॉजी एंड द एनवायरनमेंट (ATREE) में रेजिडेंट फेलो हैं और इस अध्ययन का हिस्सा नहीं थे, ने कहा कि कृषि क्षेत्र से कार्बन क्रेडिट उत्पन्न करने के लिए बड़े पैमाने पर काम करना आवश्यक होता है। उन्होंने कहा, “क्रेडिट की कीमत हमेशा उन लेन-देन लागतों को नहीं दर्शाती जो इसके साथ जुड़ी होती हैं, खासकर भारत जैसे देशों में।” उन्होंने आगे कहा, “डेवलपर्स के लिए मध्यम और बड़े भू-स्वामियों के साथ काम करना ज्यादा तर्कसंगत हो सकता है, क्योंकि इससे उन्हें आवश्यक स्केल तो मिलेगा ही, साथ ही क्रेडिट उत्पन्न करने में आने वाली लेन-देन लागत भी कम होगी।”

इस अध्ययन में कहा गया है कि हाशिए के किसानों का यह अनजाने में हुआ बहिष्करण “समावेशी विकास लक्ष्यों को हासिल करने में कार्बन बाजारों की भूमिका पर सवाल खड़ा करता है।”
यह अध्ययन यह भी दर्शाता है कि कुछ कृषि पद्धतियाँ “ऐडिशनल” (अतिरिक्त) नहीं थीं, यानी उन्होंने उत्सर्जन में कोई अतिरिक्त कमी नहीं की, क्योंकि ये तकनीकें परियोजनाओं के शुरू होने से पहले से ही कई वर्षों से लागू की जा रही थीं।
उदाहरण के लिए, हरियाणा के किसान पहले से ही कवर क्रॉपिंग (मिट्टी को ढकने वाले पौधे उगाना) और लेज़र लैंड लेवलिंग तकनीकों का उपयोग कर रहे थे, जबकि बाद में इन कार्यों को ही कार्बन परियोजनाओं का हिस्सा बनाया गया।
भान ने कहा कि यह अध्ययन “बेहद उपयोगी” है क्योंकि यह इस बात को उजागर करता है कि कृषि-आधारित कार्बन परियोजनाएं वास्तव में जमीनी स्तर पर कैसे काम करती हैं। उन्होंने कहा, “अगर किसान साल दर साल इसमें सम्मिलित नहीं रहते, तो इन परियोजनाओं की दीर्घकालिक जलवायु कार्रवाई क्षमता पर सवाल खड़े होते हैं।”
आर्थिक लाभ की कमी और कम पैदावार
इस सर्वेक्षण में शामिल लगभग हर किसान ने कहा कि उन्हें अब तक कार्बन परियोजनाओं से कोई मौद्रिक लाभ नहीं मिला है। यही कारण किसानों द्वारा पहले वर्ष के बाद “अतिरिक्त” कार्बन खेती पद्धतियों को अपनाने से इनकार करने की सबसे बड़ी वजह के रूप में सामने आया।
दूसरी सबसे आम वजह फसल पैदावार में कमी के कारण आय में हुई गिरावट (yield penalties) थी, जिससे किसानों को आर्थिक नुकसान हुआ।
इन परियोजनाओं से मौद्रिक लाभ मिलने में हो रही देरी किसानों को कार्बन बचत पद्धतियों को जारी रखने के लिए प्रेरित करने में एक बड़ी चुनौती है, करिअप्पा ने कहा। उन्होंने कहा, “चूंकि ये परियोजनाएं अभी विकास के विभिन्न चरणों में थीं, इसलिए कार्बन क्रेडिट्स की बिक्री शुरू नहीं हुई थी। लेकिन किसानों के लिए यह दोहरी मार जैसा है। वे कार्बन खेती अपना रहे हैं, लेकिन उन्हें कोई आर्थिक लाभ नहीं मिल रहा है और ऊपर से पैदावार में नुकसान झेलना पड़ रहा है। यह एक क्रियान्वयन से जुड़ी चुनौती है, जिसे यदि नहीं सुलझाया गया तो कार्बन क्रेडिट की आपूर्ति पर असर पड़ेगा।”
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के फसल स्वास्थ्य और नीति समर्थन अनुसंधान विभाग के संयुक्त निदेशक ए. अमरेंदर रेड्डी ने कहा कि भारत में प्रस्तावित कार्बन अनुपालन बाजार को ध्यान में रखते हुए ये निष्कर्ष बहुत उपयोगी हैं।
“जब सरकार अपनी नीतियां तैयार करे, तो उसे 30 से 40 पायलट स्टडीज़ करनी चाहिए ताकि यह स्पष्ट हो सके कि कार्बन क्रेडिट की गणना कैसे की जाती है, और कार्यक्रमों को कैसे लागू किया जाता है, ताकि किसानों को आय और पैदावार दोनों में नुकसान न हो,” उन्होंने मोंगाबे इंडिया को बताया।
रेड्डी के अनुसार, कृषि क्षेत्र से कार्बन क्रेडिट को बड़े पैमाने पर उत्पन्न करने के लिए छोटे जोत वाले किसानों को शामिल करना बेहद ज़रूरी है, क्योंकि भारत में अधिकांश कृषि जोत का आकार दो हेक्टेयर से भी कम है।
उन्होंने कहा, “किसानों को एकजुट कर भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी, चाहे वह फार्मर प्रोड्यूसर ऑर्गनाइज़ेशन (FPO) के ज़रिये हो या अन्य सहकारी संगठनों के माध्यम से।”
“इससे किसानों में आत्मविश्वास बढ़ेगा और समावेशन (इन्क्लूज़न) को भी बल मिलेगा,” उन्होंने आगे कहा।
यह खबर मोंगाबे-इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 23 जनवरी 2025 प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: हाशिए पर मौजूद जातियों से आने वाले किसान, साथ ही महिलाएं भी, अनजाने में कार्बन खेती परियोजनाओं से बाहर रह गईं। तस्वीर: juggadery द्वारा Wikimedia Commons (CC BY-SA 2.0) के माध्यम से।