- भारत और यूरोपीय संघ (ईयू) के बीच मुक्त व्यापार समझौते से बाजार तक पहुंच बढ़ेगी और निर्यात के मौके मिलेंगे।
- भारत और ईयू अपने-अपने तरीकों से बौद्धिक संपदा प्रावधानों का का विश्लेषण कर रहे हैं जिससे चिंताएं पैदा हो गई हैं।
- हालांकि, इस समझौते में सस्टेनेबिलिटी को लकेर पक्के वादे शामिल हैं, लेकिन कार्बन टैक्स, जंगलों की कटाई के नियम और पर्यावरण से जुड़े अन्य विनियमों के अनसुलझे मुद्दे भारतीय निर्यातकों के लिए बाधा खड़ी करते हैं।
भारत और यूरोपीय संघ के बीच 27 जनवरी को व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर हुए। भारत के वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने इसे “वैश्विक व्यापार और आपूर्ति श्रृंखला में हो रहे अहम बदलावों वाले मुश्किल समय में” बड़ी कामयाबी बताया।
मुक्त व्यापार समझौते का मकसद शुल्क और व्यापार से जुड़ी बाधाओं को कम करके भारत और ईयू के बीच कारोबार और निवेश बढ़ाना है। दोनों बड़ी अर्थव्यवस्थाएं मिलकर वैश्विक जीडीपी का लगभग एक-चौथाई और वैश्विक व्यापार का लगभग एक-तिहाई हिस्सा हैं।
दोनों पक्षों ने इस समझौते को अपनी-अपनी जीत के रूप में प्रचारित किया।
भारत ने एक प्रेस विज्ञप्ति में बताया कि लगभग सभी भारतीय निर्यात को ईयू में तरजीही प्रवेश मिलेगा। कपड़ा, चमड़ा, समुद्री उत्पाद, इंजीनियरिंग के सामान और खाने-पीने की तैयार चीजों जैसे सेक्टर को कम शुल्क से फायदा होगा। इसमें कहा गया है कि चाय, कॉफी, मसाले, फल, सब्जियां और प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थ की वैश्विक मार्केट में पहुंच बढ़ेगी। वहीं डेयरी, अनाज, पोल्ट्री और सोयामील जैसे रोजी-रोटी से जुड़े कई घरेलू संवेदनशील सेक्टर विदेशी प्रतिस्पर्धा से सुरक्षित रहेंगे। भारत ने कहा कि व्यापार समझौते से सूक्ष्म, लघु, मध्यम उद्यमों के लिए नए अवसर बनेंगे। महिलाओं, कारीगरों, युवाओं और पेशेवरों के लिए नौकरियां पैदा होंगी और ₹6.41 ट्रिलियन ($75 बिलियन) के निर्यात को बढ़ावा मिलेगा।
दूसरी तरफ, ईयू ने कहा कि इस करार से उसके कृषि-खाद्य उत्पादों के निर्यात पर शुल्क खत्म हो जाएगा या कम हो जाएगा, जिससे यूरोपीय संघ के किसानों के लिए बड़ा मार्केट खुल जाएगा। उसने यह भी कहा कि ईयू में नौकरियों से जुड़े बीफ, चिकन, चावल और चीनी जैसे संवेदनशील सेक्टर को उदारीकरण से बाहर रखा जाएगा। साथ ही, उसने इस बात पर जोर दिया है कि ईयू में आने वाले भारतीय आयात को सख्त स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा मानकों का पालन करना होगा।

जानकारों का कहना है कि यह समझौता भारतीय उद्योग को बड़े अवसर देता है। लेकिन, उन्होंने चेतावनी दी कि नियामक बाधाएं इसके फायदों को कम कर सकती हैं। इनमें से कुछ नियम इतने नए हैं कि व्यापार पूर्वानुमान में उन पर विचार नहीं किया जा सकता।
जब यह पूछा गया कि क्या सरकार के निर्यात पूर्वानुमानों में कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) और ईयू डिफॉरेस्टेशन रेगुलेशन (EUDR) जैसे यूरोपीय संघ के नियमों को ध्यान में रखा गया था, तो भारतीय विदेश व्यापार संस्थान (IIFT) के सेंटर फॉर डब्ल्यूटीओ स्टडीज के पूर्व प्रमुख अभिजीत दास ने कहा कि मुक्त व्यापार समझौते के कई पुराने मूल्यांकन में हाल के इन नीतिगत बदलावों को ध्यान में नहीं रखा गया था। उन्होंने कहा, “अधिकतर अनुमान CBAM लागू होने या EUDR की योजना बनने से पहले लगाए गए थे। जंगलों की कटाई से जुड़ा कानून इस साल दिसंबर से लागू होगा, इसलिए पहले के अध्ययन में इसका ध्यान रखने की संभावना नहीं है।”
शोध संस्थान ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) के संस्थापक अजय श्रीवास्तव ने कहा, “यूरोपीय संघ बड़ा बाजार है, इसलिए यह अवसर है। लेकिन, छोटी कंपनियों के लिए नियमों से जुड़ी जरूरतों को पूरा करना मुश्किल हो सकता है।”
उन्होंने ईयू के REACH विनियमन (केमिकल का रजिस्ट्रेशन, इवैल्यूएशन, ऑथराइजेशन और रिस्ट्रिक्शन) का ज़िक्र किया, जो रासायनिक पदार्थों के उत्पादन और इस्तेमाल और इंसानों व पर्यावरण पर उनके संभावित असर से जुड़ा है। उन्होंने कहा, “जब 2007 में REACH आया, तो कई छोटे निर्यातक ज्यादा पंजीकरण लागत नहीं दे सकते थे। उनका ईयू को निर्यात लगभग बंद हो गया। सिर्फ मध्यम और बड़ी कंपनियां ही बची रहीं। नई व्यवस्था में मत्स्य और दूसरे क्षेत्र में भी (नए समझौते के साथ) ऐसी ही स्थिति बन सकती है।”
श्रीवास्तव ने कहा कि ईयू की आय ज्यादा है इसी से उसका नियामक फ्रेमवर्क बनता है। उन्होंने कहा, “CBAM और EUDR जैसे नियम मानकों के नाम पर कारोबार में बाधा बन रहे हैं और वे बाजार तक पहुंच को सीमति कर सकते हैं।”

बौद्धिक संपदा पर अलग-अलग सुर
भारत और यूरोपीय संघ भले ही अपने मुक्त व्यापार समझौते को बड़ी आर्थिक सफलता के तौर पर पेश कर रहे हैं, लेकिन बौद्धिक संपदा प्रावधानों को लेकर दोनों पक्षों की व्याख्या में फर्क पहले से ही साफ दिख रहा हैं।
भारत सरकार ने समझौते पर जारी प्रेस विज्ञप्ति में कहा कि यह मुक्त व्यापार समझौता TRIPS (ट्रेड-रिलेटेड आस्पेक्ट्स ऑफ इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स) के तहत उपलब्ध बौद्धिक संपदा के लिए मिले संरक्षण को मजबूत करता है। TRIPS में कॉपीराइट, ट्रेडमार्क, डिजाइन, ट्रेड सीक्रेट, वनस्पतियों की किस्में और आईपीआर प्रवर्तन से जुड़े प्रावधान शामिल हैं। सरकार ने यह भी कहा कि समझौता दोहा घोषणा की पुष्टि करता है, जो स्पष्ट करता है कि बौद्धिक संपदा नियम सदस्य देशों को सार्वजनिक स्वास्थ्य की रक्षा के उपाय अपनाने से नहीं रोक सकते। दूसरी ओर, यूरोपीय संघ ने कहा कि यह समझौता आईपी अधिकारों के उच्च स्तर के संरक्षण और सख्ती से लागू करने का प्रावधान करता है, जो भारत और ईयू दोनों के बौद्धिक संपदा कानूनों के मुताबिक है।
व्यापार के जानकारों का कहना है कि “ज्यादा स्तर की सुरक्षा” शब्द अक्सर कूटनीतिक शब्दावली होती है, जिसका संकेत आम तौर पर सख्ती से लागू करने, कठोर बौद्धिक संपदा नियमों को लागू करने और कभी-कभी, अधिकारों की लंबी अवधि या व्यापक दायरे की ओर होता है। कुछ मामलों में, इससे TRIPS-Plus की जिम्मेदारियां भी शामिल हो सकती हैं, जिसका मतलब है कि शर्तें बौद्धिक संपदा के व्यापारिक पहलुओं पर डब्ल्यूटीओ के समझौते में तय न्यूनतम मानकों से आगे निकल जाती हैं।
श्रीवास्तव ने कहा कि इसका प्रभाव समझौते के कानूनी पाठ पर निर्भर करेगा। उन्होंने कहा, “भारत सरकार कहती है कि यह TRIPS के हिसाब से है, जिसका मतलब है कि कोई बड़ी नई जिम्मेदारी नहीं जुड़ेगी। लेकिन ईयू का बयान TRIPS-Plus का सुझाव देता है, जो भारत को यूरोपीय बौद्धिक संपदा कानूनों के करीब ले जा सकता है।”
इसी तरह, समझौते में जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल किया गया है, उसे लेकर नागरिक समूहों ने भी चिंता जताई है। थर्ड वर्ल्ड नेटवर्क के वरिष्ठ शोधकर्ता और वर्किंग ग्रुप के सह-संयोजक के. एम. गोपाकुमार ने कहा, “ईयू के बयान में बौद्धिक संपदा अधिकार के ‘उच्च स्तर’ के संरक्षण और प्रवर्तन की बात कही गई है जिसमें वनस्पतियों की किस्में भी शामिल हैं। जब आप ‘उच्च संरक्षण’ की बात करते हैं, तो आमतौर पर इसका मतलब TRIPS से आगे जाना होता है।”
उन्होंने आगे कहा, “इससे यह चिंता पैदा होती है कि क्या भारतीय बीज कंपनियां किफायती दामों पर बीज उपलब्ध करा पाएंगी। इसी तरह की चिंताएं दवा क्षेत्र के लिए भी हैं।”
वर्किंग ग्रुप ऑन एक्सेस टू मेडिसिन्स एंड ट्रीटमेंट ने 27 जनवरी के अपने बयान में कहा कि ईयू की भाषा “स्पष्ट रूप से दिखाती है कि भारत ने बौद्धिक संपदा संरक्षण और प्रवर्तन के जिन मानकों पर सहमति जताई है, वे TRIPS में तय न्यूनतम जिम्मेदारियों से आगे जाते हैं।”
दोनों जानकारों ने इस बात पर जोर दिया कि किसी भी नतीजे पर पहुंचने से पहले आखिरी पाठ को देखा जाना चाहिए, क्योंकि दोनों पक्षों ने अलग-अलग शब्दों का इस्तेमाल किया है।
इस बीच, 29 जनवरी को भारत सरकार ने अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ) जारी कर स्पष्ट किया कि समझौते का बौद्धिक संपदा अध्याय भारत को अपने बौद्धिक संपदा कानूनों में संशोधन करने के लिए बाध्य नहीं करता और ना ही इससे TRIPS-Plus डेटा एक्सक्लूसिविटी से जुड़ी जिम्मेदारियां लागू होती है।

गोपकुमार ने कहा कि भले ही वे कहते हैं कि कानून बदलने की कोई जरूरत नहीं है, फिर भी नियमों में बदलाव किया जा सकता है, जैसा कि पिछले समझौतों में देखा गया है। उन्होंने कहा, “ट्रेड सीक्रेट्स और वनस्पति की किस्मों की सुरक्षा पर ईयू का जोर मजबूत सुरक्षा उपायों का सुझाव देता है, जो बीज और दवा दोनों सेक्टर पर असर डाल सकता है। इसीलिए, यह जरूरी है कि सरकार पूरे पाठ को सार्वजनिक करे, ताकि इस पर बेहतर बहस हो सके।”
दास भी ऐसी ही चिंता जताते हैं और इसे संभावित जोखिम बताते हैं। उन्होंने नीतिगत गुंजाइश को लेकर चिंता जताई। उन्होंने कहा, “भले ही सरकार कहे कि भारत के बौद्धिक संपदा कानूनों को बदलने की जरूरत नहीं है, लेकिन समस्या यह है कि एक बार जब हमारे घरेलू कानूनों और नियमों के कुछ हिस्से मुक्त व्यापार समझौते में आ जाते हैं, तो हम भविष्य में उन्हें बदलने का लचीलापन खो देते हैं। एक बार जब वे प्रतिबद्धता बन जाते हैं, तो हमारे हाथ बंध जाते हैं।”
भारत और यूरोपीय संघ के बीच वार्ताएं 2007 में शुरू हुई थीं और 2013 में स्थगित हो गई थीं। इसकी वजह बौद्धिक संपदा को लेकर मतभेद थे। ये वार्ताएं 2022 में फिर से शुरू हुई थी।
पर्यावरण से जुड़े वादे, सीमित राहत
भारत-ईयू व्यापार समझौते में कारोबार और सतत विकास पर एक अध्याय शामिल है, जिसके तहत दोनों पक्ष पर्यावरण से जुड़े उन बहुपक्षीय समझौतों (MEAs) को लागू करने के लिए प्रतिबद्ध हैं जिन्हें उन्होंने मंज़ूरी दी है। इसमें जिसमें पेरिस समझौता, जैव-विविधता पर संधि और वन्यजीव और वनस्पतियों की लुप्तप्राय प्रजातियों संबंधी अंतरराष्ट्रीय व्यापार संबंधी संधि शामिल हैं।
ईयू का कहना है कि इस मुक्त व्यापार समझौते में प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और प्रबंधन पर खास प्रावधान शामिल हैं। इनमें वन संरक्षण, जैव विविधता की रक्षा, अवैध वन्यजीव व्यापार और अवैध कटाई से निपटने और अवैध, बिना बताए व अनियमित (IUU) मछली पकड़ने पर रोक लगाने से जुड़ी प्रतिबद्धताएं शामिल हैं।
इस समझौते का मकसद ग्रीन उत्पादों पर शुल्क कम करके और ग्रीन ट्रांज़िशन से जुड़ी सेवाओं को उदार बनाकर कम कार्बन उत्सर्जन वाली वस्तुओं, सेवाओं और तकनीकों में व्यापार और निवेश को बढ़ावा देना भी है। दोनों पक्षों के बीच जलवायु कार्रवाई पर सहयोग के लिए एक ईयू-भारत प्लेटफॉर्म बनाने के लिए समझौता ज्ञापन पर भी हस्ताक्षर होने की उम्मीद है, जिसे 2026 की पहली छमाह में लॉन्च किया जाएगा।
हालांकि, यह व्यापार समझौता कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) के बारे में भारत को कोई खास राहत नहीं देता है, जो खास आयात पर कार्बन से जुड़े शुल्क लगाता है।
भारत ने कहा है कि उसे CBAM के तहत “भावी विकास में सर्वाधिक पसंदीदा राष्ट्र” का भरोसा मिला है, जो उसे नियमों के तहत तीसरे देशों को दी गई कोई भी सुविधा देगा।

यूरोपीय संघ द्वारा 2021 में पेश किया गया CBAM 2023 से आंशिक तौर पर और जनवरी 2026 से पूरी तरह लागू हो गया। यह ईयू एमिशन ट्रेडिंग सिस्टम के तहत आने वाले क्षेत्रों पर लागू होता है, जिनमें सीमेंट, लोहा और इस्पात, एल्युमिनियम, उर्वरक, हाइड्रोजन और बिजली शामिल हैं।
CBAM भारतीय निर्यातकों के लिए बड़ी चिंता बना हुआ है, क्योंकि इसके लिए उन्हें अपने उत्पादों में मौजूद कार्बन उत्सर्जन के लिए सर्टिफिकेट खरीदने होंगे, जिससे लागत बढ़ेगी और मुनाफा कम होगा। भारत ने इस मुद्दे को कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाया है, जिसमें जलवायु वार्ताएं और मुक्त व्यापार समझौते पर बातचीत शामिल हैं। EUDR को लेकर भी ऐसी ही चिंताएं जताई गई हैं, लेकिन अब तक कोई ठोस रियायत मिलती नहीं दिख रही है।
दास ने कहा कि CBAM का असर इस बात पर निर्भर करेगा कि ईयू दूसरे देशों को और किन क्षेत्रों में छूट देता है। उन्होंने कहा, “यह इस बात पर निर्भर करेगा कि E.U. कोई छूट देता है या नहीं और क्या वे उन सेक्टर पर लागू होती हैं जिनसे भारत को फायदा हो सकता है। मेरे हिसाब से, E.U. के CBAM पर बड़ी छूट देने की संभावना काफी कम है।”
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अजय श्रीवास्तव ने बताया कि नियामक दबाव बढ़ने की संभावना है और यह व्यापार में बाधा डालेगा।
ईयू के बयान में कहा गया है कि वह अगले दो सालों में भारत को ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कम करने और उद्योगों में पर्यावरण के अनुकूल बदलाव को तेज करने की उसकी कोशिशों में मदद के लिए 500 मिलियन यूरो की मदद देगा। हालांकि, यह उसके बजट और फाइनेंशियल प्रोसेस के तहत ही होगा।
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 6 फरवरी, 2026 को प्रकाशित हुई थी।
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