- लाल किले की बलुआ पत्थर की दीवारों के साथ प्रदूषक रसायनिक प्रतिक्रिया कर रहे हैं, जिससे काली परतें बन रही हैं और इससे ऐतिहासिक स्मारक बदरंग हो रहा है।
- इसकी वजह वाहनों, सीमेंट के कारखानों और कोयला आधारित बिजली संयंत्रों से निकलने वाला धुआं है।
- हालांकि, संरक्षण से जुड़े उपाय नुकसान की गति को धीमा कर सकते हैं, लेकिन जानकार प्रदूषण नियंत्रण उपायों के कमजोर अमल को बड़ी नाकामी मानते हैं।
हर बार ठंड के मौसम में जब उत्तर भारत में सांस लेना दूभर हो जाता है, तो वायु प्रदूषण से सेहत, शिक्षा और काम करने की क्षमता पर पड़ने वाले असर की खबरें सुर्खियों में रहती हैं। लेकिन, नए शोध से पता चला है कि ये प्रदूषक धीरे-धीरे हमारे अतीत की निशानियों को भी नुकसान पहुंचा रहे हैं और हमारी विरासत को खतरे में डाल रहे हैं।
लाल किले पर किए गए एक वैज्ञानिक अध्ययन में वैज्ञानिकों ने पाया है कि प्रदूषक और स्मारक के पत्थरों की सतह के बीच रासायनिक प्रतिक्रिया धीरे-धीरे इसके खास लाल रंग को काला कर रहे हैं।
यह इस बात की पुष्टि करता है खराब हवा किस तरह किसी स्मारक को नुकसान पहुंचाता है और इस बारे में पहले से पता है। कुछ दशकों पहले यह पता चला था कि ताजमहल के बदरंग होने के पीछे की असली वजह प्रदूषण ही है। संरक्षण उपायों के बावजूद, यह “विश्व धरोहर” आज भी दुर्गंध और इसके संगमरमर के हरा होने की खबरों के कारण सुर्खियों में बना रहता है।
सदियों से लाल किला स्थायी राजनीतिक प्रतीक रहा है। 1947 से सभी प्रधानमंत्रियों ने यहीं से स्वतंत्रता दिवस पर देश को संबोधित किया है। लेकिन वायु प्रदूषण के दुष्प्रभावों से लाल किले और क्षेत्र के सैकड़ों अन्य स्मारकों को बचाने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति विफल होती दिख रही है। लाल किले पर किए गए इस अध्ययन में पहली बार इसकी सतह पर बनने वाली काली परतों के लिए सीमेंट कारखानों, ताप बिजली संयंत्रों और वाहनों से होने वाले उत्सर्जन को जिम्मेदार ठहराया गया है।
यूनेस्को पुरस्कार से सम्मानित संरक्षण वास्तुकार आभा नारायण लांबा कहती हैं, “भारतीय स्मारक पहले से ही बेतहाशा अतिक्रमण और गैर-कानूनी निर्माण से अपनी पहचान खो रहे हैं। यह देखकर दुख होता है कि नीतियां बनाने वालों को लगता है कि कोई दूसरी धरती भी है। अगर ऐसा नहीं होता, तो वायु प्रदूषण को कम करने के लिए कुछ ठोस कदम उठाए गए होते।”
हालांकि, ऐसा भी नहीं है कि सब कुछ खत्म हो चुका है। लाल किला पर अध्ययन करने वाले शोधकर्ताओं का कहना है कि शुरुआती उपाय करके इन ऐतिहासिक इमारतों को वायु प्रदूषण से हो रहे नुकसान को रोका जा सकता है।

कई तरह की रासायनिक प्रतिक्रिया
दुनिया के ज्यादातर ऐतिहासिक स्मारक चूना पत्थर और संगमरमर से बने हैं। अध्ययनों के अनुसार इन्हें स्थानीय उपलब्धता, टिकाऊपन और आसानी से निकाले जा सकने के कारण पसंद किया गया था। दिल्ली में इनमें लाल किला, कुतुब मीनार और हुमायूं का मकबरा जैसे ऐतिहासिक मुगलकालीन स्मारक शामिल हैं। ये सभी बलुआ पत्थर और मकराना के संगमरमर से बने हैं।
तेजी से औद्योगीकरण के बीच ये चीजें अब अपनी सहनशीलता के मुश्किल इम्तिहान से गुजर रही हैं। अध्ययन में सामने आया है कि यातायात और कारखानों से निकलने वाले धुएं के कारण वातावरण में मौजूद सूक्ष्म कणों (पार्टिकुलेट मैटर) और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड के उच्च स्तर से लाल किले की बलुआ पत्थर की सतह पर सल्फेशन प्रक्रिया शुरू हो गई है। इससे जिप्सम (कैल्शियम सल्फेट) की पतली परत बनती है, जो समय के साथ काली पपड़ी में बदल जाती है और धूल व अन्य कणों को अपने भीतर फंसा लेती है।
अध्ययन में कहा गया है, “वातावरण में सामान्य स्तर पर भी नाइट्रोजन डाइऑक्साइड की मौजूदगी सल्फेशन की प्रक्रिया को तेज करती है, क्योंकि यह ऑक्सीकारक (ऑक्सीडाइजिंग) एजेंट के तौर पर काम करती है।” अध्ययन में यह भी कहा गया है कि दिखने वाले नुकसान के अलावा इससे विरासत स्थलों से जुड़ी संस्कृति और सुंदरता भी कम होती है।
हालांकि, समय रहते किए गए संरक्षण उपाय नुकसान को रोकने में काफी मददगार साबित हो सकते हैं। लांबा ने समझाया, “हम हमेशा संरक्षण प्रक्रिया की शुरुआत ऐसे तरीकों से करते हैं, जो पत्थर की मूल संरचना को नुकसान न पहुंचाएं। इसके तहत नियंत्रण के साथ पानी की हल्की फुहारें या मुल्तानी मिट्टी और पेपर पॉल्टिस जैसी तकनीकें भी अपनाई जाती हैं। रासायनिक पीलिंग का इस्तेमाल सिर्फ तब किया जाता है जब गंदगी लगातार बनी रहती है और ऐसा सख्त निगरानी में किया जाता है।”
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के अतिरिक्त महानिदेशक और लाल किले पर किए गए अध्ययन के लेखकों में शामिल संजय कुमार मंजुल का कहना है कि एएसआई ने किले में नुकसान को रोकने का काम पहले ही शुरू कर दिया है। वह कहते हैं, “हर उत्पाद में कोई न कोई रासायनिक यौगिक होता है। हमें इस बात को लेकर सावधान रहना होता है कि रसायन की मात्रा कितनी हो, हम कितना रसायन इस्तेमाल कर रहे हैं और वह मात्रा सतह के साथ किस तरह प्रतिक्रिया करेगी। मुल्तानी मिट्टी जैसी सुरक्षित मानी जाने वाली सामग्री में भी खनिज यौगिक होते हैं।”
ASI अब ओडिशा के कोणार्क सूर्य मंदिर पर वायु प्रदूषण के दुष्प्रभावों का अध्ययन कर रहा है, जो क्लोराइट, लेटराइट और खोंडालाइट पत्थरों से बना है।

लाल किले पर अध्ययन करने वाला भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) अब ओडिशा के कोणार्क सूर्य मंदिर पर वायु प्रदूषण के प्रभावों का अध्ययन कर रहा है, जो क्लोराइट, लैटराइट और खोंडालाइट पत्थरों से बना है। तस्वीर: Subham9423\विकिमीडिया कॉमन्स (CC BY-SA 4.0)।
ताज की हिफाजत
ताजमहल को प्रदूषण से बचाने की कानूनी लड़ाई लड़ने वाले एम.सी. मेहता का कहना है कि अगर प्रदूषण के स्त्रोत पर सख्ती नहीं बरती गई, तो रख-रखाव का बहुत ज्यादा असरदार नहीं दिखेगा। उन्होंने मोंगाबे-इंडिया को बताया, “मैंने 40 साल पहले प्रदूषण के कारण स्मारक को धीरे-धीरे हो रहे नुकसान को उजागर किया था। 40 साल बीत जाने और कई सुनवाइयों के बाद भी बहुत कुछ नहीं बदला है।” 1996 में उनकी मेहनत से ही ताज ट्रैपेजियम जोन (टीटीजेड) का गठन हुआ था, जो स्मारक को प्रदूषण से बचाने के लिए इसके आसपास एक तय क्षेत्र है।
टीटीजेड 10,400 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में कोयला और कोक पर आधारित उद्योगों को चलाने पर रोक लगाता है, जिसमें उत्तर प्रदेश का आगरा, मथुरा, एटा, हाथरस व फिरोजाबाद और राजस्थान का भरतपुर जिला शामिल है। इसका मकसद उद्योगों को इस सीमा से बाहर करके ताजमहल पर वायु प्रदूषण के दुष्प्रभाव को कम करना था।
आगरा के कमिश्नर की अगुवाई में, टीटीजेड की मुख्य समिति में कई विभागों के सदस्य शामिल हैं, जिनमें सभी टीटीजेड शहरों के जिला मजिस्ट्रेट, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारी, एएसआई के प्रतिनिधि और पर्यावरण और पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालयों के अधिकारी हैं। टीटीजेड प्राधिकरण के पास ईंधन की गुणवत्ता से जुड़े मानकों का पालन करवाने और इस जोन में पर्यावरण को बेहतर बनाए रखने के लिए प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों की बिजली और पानी की आपूर्ति रोकने जैसे उपाय करने जैसे अधिकार हैं।
इसमें हर महीने जिला स्तर पर एक बैठक आयोजित करने का प्रावधान है, जिसमें वाहन और औद्योगिक प्रदूषण, निर्माण गतिविधियों और अन्य संबंधित मुद्दों का आकलन किया जाता है। इसके अलावा, आयुक्त की अगुवाई में हर तीन महीने पर टीटीजेड की बैठकें होती हैं, जिसमें फैसले लिए जाते हैं और समन्वय स्थापित किया जाता है। इसके बावजूद, ताजमहल के आसपास प्रदूषण का स्तर बढ़ता रहा है। हाल ही में एक आरटीआई से पता चला कि लगभग दो दशकों से मकबरे के आसापस सस्पेंडेड पार्टिकुलेट मैटर के ऊंचे स्तर से संगमरमर में पीलापन बढ़ रहा है।
उत्तर प्रsदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (यूपीपीसीबी) के क्षेत्रीय अधिकारी अमित मिश्रा ने कहा, “हमारे सामने ताजमहल के आसपास तेजी से हो रहा विकास बड़ी चुनौती है।” यूपीपीसीबी भी टीटीजेड का सदस्य है। “हमारे निगरानी तंत्र से पता चलता है कि PM2.5 के स्तर में तेजी से बढ़ोतरी हुई है, जिसका मुख्य कारण वाहनों से निकलने वाला धुआं है। पिछले कुछ सालों में वाहनों की संख्या बढ़ी है। इस बोझ को कम करने के लिए आगरा मेट्रो का निर्माण जारी है, लेकिन इससे धूल से जुड़ा प्रदूषण भी बढ़ रहा है।”
मई में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने आगरा में वायु प्रदूषण को रोकने के उपायों को लागू करने में खामियां पाईं। ट्रिब्यूनल के मुताबिक पेड़ लगाने, इलेक्ट्रिक बसें चलाने और रिंग रोग बनाने जैसे उपाय इस क्षेत्र में सिर्फ कागजों तक ही सीमित हैं।
मेहता ने कहा, “क्रियान्वयन के लिए दो काम अहम हैं: एक तो कानून का पालन पक्का करना और दूसरा, अधिकारियों को चाहिए कि वे स्मारकों की सुरक्षा सुनिश्चित कराने के लिए प्रतिबद्ध रहें। इसमें सिर्फ ताजमहल ही नहीं बल्कि पूरा टीटीजेड शामिल हैं।”

वाहनों से उत्सर्जन पर लगाम जरूरी
दिल्ली में भी वाहनों से बढ़ता उत्सर्जन चुनौती साबित हो रहा है। राजधानी में 2024 में सात लाख से ज्यादा नई कारें पंजीकृत हुईं। देशभर में ज्यादा प्रदूषण फैलाने वाली एसयूवी ग्राहक की पसंद बनकर उभरे हैं। इंजन से निकलने वाले धुएं से लाल किले पर बनने वाली काली परतों में भारी धातुओं का जमाव भी होने लगा है, जिनमें सीसा, टाइटेनियम और निकल शामिल हैं।
सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) के विश्लेषण में पाया गया कि दिल्ली में वाहनों का सालाना PM2.5 स्तर में योगदान 20 से 41 प्रतिशत के बीच है। अन्य स्रोतों में उद्योग, कोयला आधारित बिजली उत्पादन, निर्माण और कचरा शामिल हैं। यह विश्लेषण भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान कानपुर, द एनर्जी रिसर्च इंस्टीट्यूट, इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ ट्रॉपिकल मीटेरोलॉजी और अन्य डेटा स्रोतों के अध्ययनों पर आधारित है।
एनवायरोकैटलिस्ट के संस्थापक और प्रमुख विश्लेषक सुनील दहिया के अनुसार, “राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में उपभोग, आबादी और ऊर्जा की मांग में बढ़ोतरी के बावजूद प्रदूषण का स्तर स्थिर बना हुआ है। इसका मतलब है कि कुछ न कुछ उपाय किए गए हैं, लेकिन स्वास्थ्य आपातकाल से निपटने के लिए पर्याप्त आक्रामकता के साथ ऐसा नहीं किया गया है।” दिल्ली में ज्यादा प्रदूषण की वजह इसकी भौगोलिक स्थिति भी है, जो प्रदूषकों के फैलाव को मुश्किल बनाती है। वह आगे कहते हैं, “यह स्पष्ट है कि अगर प्रदूषण के स्तर को कम करना है, तो हमें उत्सर्जन में बड़ी कटौती के लिए कदम उठाने होंगे। आज तक इस पहलू पर केंद्रित कोई दिशा-निर्देश या नीति नहीं बनी है। प्रदूषण निगरानी निकायों के पास सभी डेटा और उपकरण हैं, लेकिन इसे प्रभावी तरीके से लागू नहीं किया गया है।”
टीटीजेड की तरह, लाल किले के आसपास की हवा की गुणवत्ता भी अंतरराज्यीय निकाय कमीशन फॉर एयर क्वालिटी मैनेजमेंट (सीएक्यूएम) के जिम्मे है। चार साल से ज्यादा समय से लागू होने के बावजूद सीएक्यूएम के निर्देशों से प्रदूषण में कोई खास कमी नहीं आई है। एक मीडिया रिपोर्ट में पाया गया कि सीएक्यूएम ने वाहनों से होने वाले उत्सर्जन पर सबसे कम ध्यान दिया, जबकि यह पूरे साल प्रदूषण का सबसे बड़ा स्त्रोत बना रहता है।
लाल किला और दूसरे ऐतिहासिक स्मारकों पर हेरिटेज वॉक आयोजित कराने वाले जाने-माने इतिहासकार सोहेल हाशमी कहते हैं कि प्रदूषण कम करने और भारत के साझा इतिहास को बढ़ावा देने के लिए जनभागीदारी बहुत जरूरी है। वह कहते हैं, “अगर हम अपनी विरासत की कद्र करना सीख जाएं, तो सरकार और लोगों दोनों को प्रदूषण रोकने के लिए संगठित तरीके से काम करना होगा। सस्ता, कुशल सार्वजनिक परिवहन नेटवर्क जरूरी है और साथ ही कारपूलिंग अपनाने की इच्छाशक्ति भी होनी चाहिए।”
सोहैल हाश्मी सवाल उठाते हैं, “जब तक हमें यह पता नहीं है कि हम कहां से आए हैं, तो हम किस तरह योजना बना पाएंगे कि हमें कहां जाना है? अगर हमें अपनी स्थापत्य परंपरा का कोई ज्ञान नहीं है, जो हजारों सालों में विकसित हुई है, तो हम अपने वर्तमान को अपनी परंपरा से किस तरह जोड़ पाएंगे?”
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 23 दिसंबर, 2025 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: दिल्ली में लोधी वंश का मकबरा। उस समय अधिकतर स्मारक चूना पत्थर और संगमरमर से बनाए गए थे, जिन्हें उनकी उपलब्धता, टिकाऊपन और आसानी से निकालने की वजह से पसंद किया जाता था। ये सामग्रियां अब तेजी से हो रहे औद्योगीकरण के बीच अपनी मजबूती की परीक्षा दे रही हैं। हालांकि, शुरुआती मरम्मत के उपाय गिरावट को रोकने में बहुत मददगार हो सकते हैं। तस्वीर- Dipanshusingh583\पिक्साबे।