- यह ढोल पुणे के आबासाहेब गरवारे कॉलेज की एक टीम को फील्ड सर्वे से लौटते समय दिखा।
- ढोल इससे पहले पास के भीमाशंकर वाइल्डलाइफ़ सैंक्चुअरी और ताम्हिनी में देखे गए हैं।
- पुणे के पास पानशेत में एक गैर संरक्षित इलाके में इसका दिखना इस क्षेत्र में एक वन्यजीव गलियारे की ज़रूरत को दिखाता है।
पिछले साल 6 सितंबर की दोपहर को पुणे ज़िले के पानशेत के पास एक ढोल (जंगली कुत्ता) देखा गया। पानशेत में इस जंगली कुत्ते (क्यूऑन एल्पिनस) को पहली बार देखा गया है। यह इलाका मुख्य रूप से एक बाँध का कैचमेंट ज़ोन है, जहाँ छोटे-छोटे भागों में बचे कुछ जंगल हैं। इन जंगलों को बनाने का मुख्य मकसद पानी की आपूर्ति और पर्यटन को बढ़ावा देना है ना कि इस इलाके की जैव-विविधता को बचाना।
इस ढोल को तब देखा गया जब पुणे के आबासाहेब गरवारे कॉलेज में बायोडायवर्सिटी और एनवायर्नमेंटल साइंस डिपार्टमेंट की हेड सोनाली शिंदे अपने डिपार्टमेंट के विद्यार्थियों और पुणे की इकोलॉजिकल सोसाइटी की फील्ड रिसर्चर चिन्मय सोनवणे के साथ एक फील्ड सर्वे से लौट रही थीं। फील्ड सर्वे से लौटते समय इस टीम को यह एक अकेला ढोल जंगल की ढलानों पर मिला।
“पहली नज़र में, वह ढोल हमें देख रहा था और हम ढोल को। हम एकदम खड़े हो गए, और उस पल को कैप्चर करना भी भूल गए। जैसे ही वह छिपने के लिए पेड़ों की तरफ बढ़ा, हम उसकी फ़ोटो लेने में कामयाब रहे। जंगल में जाने से पहले उसने हमारी तरफ़ ऐसे देखा जैसे अलविदा कह रहा हो,” टीम ने उस वाक्ये को याद करते हुए कहा।
इस ढोल का इस तरह दिखना जैव-विविधता की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह एक संरक्षित क्षेत्र के बाहर दिखाई दिया है। ढोल पहले पास के भीमाशंकर वाइल्डलाइफ़ सैंक्चुअरी और ताम्हिनी में देखे गए हैं और पुणे शहर से 50 km से भी कम दूरी पर पानशेत के पास उनका दिखना, संरक्षित और गैर संरक्षित जगहों को जोड़ने वाले एक गलियारे की ज़रूरत को दिखाता है।
वाइल्डलाइफ बायोलॉजिस्ट पल्लवी घसकदबी ने इस टीम द्वारा देखे जानवर की पहचान ढोल के तौर की। पल्लवी कई सालों से इस प्रजाति पर काम करती आ रही हैं। महाराष्ट्र वन विभाग के असिस्टेंट कंजर्वेटर ऑफ फॉरेस्ट मंगेश टेट ने भी टीम के सामने इस इलाके में ढोल की मौजूदगी की संभावना को माना।
शिंदे ने कहा, “यह रिकॉर्ड इकोलॉजिकल तौर पर बहुत ज़रूरी है। यह दिखाता है कि पुणे के लैंडस्केप में अब भी अप्रत्याशित जैव-विविधता मौजूद है।” उन्होंने आगे कहा कि बायोडायवर्सिटी के छात्रों को ऐसी फील्ड स्टडीज़ और वन्यजीवों से रूबरू कराने से उनकी पढाई के साथ-साथ इस क्षेत्र की चुनौतियों के बारे में उनकी समझ भी बेहतर होती हैं।
सोनवणे ने कहा कि यह नज़ारा पश्चिमी घाट के महत्व को दिखाता है, जो कई तरह के जानवरों के लिए एक सुरक्षित जगह है और इस इलाके में मांसाहारी जानवरों की आवाजाही पर लगातार नज़र बनाए रखने की ज़रूरत है।
दुनिया भर में, ढोल को IUCN रेड लिस्ट में ‘खतरे में’ बताया गया है और CITES अपेंडिक्स II में शामिल किया गया है, जिससे इसका व्यापार रुक गया है। दुनिया भर में लगभग 2,000 वयस्क ढोल होने का अनुमान है, और इनकी कम होती आबादी पर इसकी रहने की जगह में होती कमी, इनके खाने (शिकार) की कमी, और इंसानों और जानवरों से बढ़ते टकराव जैसे कारणों का गहरा प्रभाव पड़ रहा है।
इसलिए, पुणे में ढोल का देखा जाना सिर्फ़ एक वन्यजीव की मौजूदगी के रिकॉर्ड से कहीं ज़्यादा है। इसे देखने वाली टीम का कहना है कि यह प्रजाति के हैबिटैट को बचाने, शोध को बढ़ाने और इकोलॉजिकल एजुकेशन को बढ़ावा देने की ज़रूरत की याद दिलाता है। यह टीम इस घटना के आधार पर एक साइंटिफिक जर्नल में एक रिसर्च नोट जमा करने की प्रोसेस में है।
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 22 सितम्बर, 2025 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: पुणे जिले के पानशेत में पहली बार दिखाई दिया ढोल। तस्वीर – सोनाली शिंदे द्वारा।