- असम के पर्यावरण और मूलनिवासी अधिकार कार्यकर्ता प्रणब डोले को काजीरंगा में बन रहे एक रिसोर्ट के विरोध में किए गए प्रदर्शन के बाद 12 जुलाई को गिरफ्तार किया गया था।
- 29 जुलाई को जमानत मिलने के ठीक अगले दिन असम सरकार ने उन पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून लगाकर फिर गिरफ्तार किया।
- मानवाधिकार समूहों ने इस गिरफ़्तारी को “उनकी गैर कानूनी हिरासत को बढ़ाने” का एक तरीका बताया है।
भारत के 60 से अधिक मानवाधिकार संगठनों ने असम के पर्यावरण और मूलनिवासी अधिकार कार्यकर्ता प्रणब डोले को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत गिरफ्तार किए जाने की निंदा की है। उन्होंने इस गिरफ़्तारी को “सामाजिक कार्यकर्ताओं को उनके संवैधानिक अधिकार का इस्तेमाल करने की सज़ा देने और उनकी छवि खराब करने की कोशिश” बताया है। डोले ने असम के काजीरंगा नेशनल पार्क और टाइगर रिजर्व में बनने वाले एक फाइव-स्टार लग्जरी रिसॉर्ट के खिलाफ प्रदर्शनों का नेतृत्व किया था। काजीरंगा एक यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज साइट है, जहाँ दुनिया के सबसे ज़्यादा एक सींग वाले गैंडे पाए जाते हैं।
डोले को 12 जुलाई को 28 जून को रिसोर्ट के प्रोजेक्ट के विरोध में किए गए प्रदर्शन का “मास्टरमाइंड” होने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था और उन पर पुलिसकर्मियों पर हमला करने का आरोप लगाया गया था। एक सत्र न्यायालय ने 29 जुलाई को उन्हें यह कहते हुए जमानत दे दी कि पुलिस के खिलाफ हिंसा का कोई सबूत नहीं मिला, और इसके विपरीत यह पाया गया कि उनकी गिरफ्तारी का नोटिस बहुत देर से दिया गया था।
“जिन मामलों में पारिस्थितिकी का बचाव और मूल निवासियों का जीवन यापन एक-दूसरे से जुड़ा है, वहां आपराधिक कानून का इस्तेमाल स्थानीय चिंताओं को दबाने के लिए नहीं किया जा सकता। असली कानून व्यवस्था प्रभावित लोगों को चुप कराकर नहीं, बल्कि उनकी बात सुनकर हासिल होती है।” जमानत मिलने के ठीक अगले दिन, 30 जुलाई को असम सरकार ने डोले पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून या एनएसए लगा दिया, जिसके तहत किसी आरोपी को बिना ट्रायल या फॉर्मल चार्ज के 12 महीने तक हिरासत में रखा जा सकता है।
एनएसए नोटिस में दावा किया गया है कि डोले ने “संदिग्ध विदेशी ट्रांज़ैक्शन” में शामिल होकर फॉरेन कंट्रीब्यूशन (रेगुलेशन) एक्ट (FCRA) का उल्लंघन किया है।
मानवाधिकार समूहों ने इस गिरफ़्तारी को “उनकी गैर कानूनी हिरासत को बढ़ाने” का एक तरीका बताया है।
एनएसए हटाने के साथ-साथ, इन समूहों ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस की ज्यादतियों की निष्पक्ष जांच, असम में जमीन के लिए संघर्ष करने वाले सभी कार्यकर्ताओं की रिहाई, और काज़ीरंगा नेशनल पार्क में जमीन के आवंटन व पर्यटन परियोजनाओं की पूरी और पारदर्शी जानकारी देने की मांग की है।
विवादों में घिरा यह लग्ज़री होटल हयात ग्रुप से जुड़ी कंपनी, जुनिपर होटल्स, असम टूरिज्म डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन से लीज़ पर ली गई ज़मीन पर बना रही है। इस बात के सुर्खियों में आने के बाद हयात ग्रुप ने खुद को इस प्रोजेक्ट से अलग कर लिया है। इस प्रोजेक्ट की वजह से बेदखली का सामना कर रहे चाय बागानों के आदिवासी लोगों ने गुवाहाटी हाई कोर्ट में अर्जी दी है कि प्रोजेक्ट के लिए उनसे ज़बरदस्ती ज़मीन ली गई थी।
“विकास नीतियों को लेकर असहमति और विरोध को सरकारें राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा नहीं बना सकतीं। अपनी ज़मीन के हक और पर्यावरण व प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहे आदिवासी और मूल निवासी समुदाय देश के दुश्मन नहीं हैं,” मानवाधिकार संगठनों के बयान में कहा गया है।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने X पर एक पोस्ट में कहा, “डोले के खिलाफ एनएसए का इस्तेमाल बीजेपी सरकारों के बढ़ते पैटर्न का हिस्सा है, जिसमें वे असहमति को दबाने के लिए खास कानूनों को हथियार बना रही हैं। उत्तर प्रदेश में भी ऐसी ही कोशिशें देखी गई हैं, जहां नोएडा में खराब कामकाजी हालात के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे लेबर एक्टिविस्ट के खिलाफ एनएसए लगाया गया था।”
हाल के सालों में डेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स का विरोध करने पर कई पर्यावरण संस्थाओं को FCRA निरस्त किया गया है।
यह खबर मोंगाबे-इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 6 अगस्त, 2026 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: असम के काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान में घास चरता हुआ एक गैंडा। तस्वीर- विष्णु के/विकिमीडिया कॉमन्स (CC BY-SA 4.0)