- भारत में शहरी पेड़ों की डाइवर्सिटी या विविधता को दर्शाने वाले एक नए डेटाबेस में कम से कम 742 पेड़ों की प्रजातियां दर्ज की गईं।
- यह डेटाबेस शहरी इलाकों में पौधों की डाइवर्सिटी के डेटा का एक शुरुआती संग्रह है, जिसे उनके गुणों, IUCN रेड लिस्ट स्टेटस और प्रजातियों के फैलाव को डॉक्यूमेंट करने के मकसद से एक साथ जोड़ा गया है।
- यह डेटाबेस 1,250 प्रकाशित लिटरेचर सोर्स को देखकर बनाया गया था, जिसमें से 39 आर्टिकल शहरी इलाकों के खास पेड़ों की प्रजातियों की लिस्ट बनाने के लिए शामिल किए गए थे।
भारत में जंगलों की स्थिति बताने वाली ‘इंडिया स्टेट ऑफ़ फ़ॉरेस्ट्स’ रिपोर्ट के अनुसार, देश के कुल भूभाग का 3.41% हिस्सा जंगल के बाहर के पेड़ों से ढका है। ये पेड़ फुटपाथ, बगीचों और खेतों में लगे हैं। हालाँकि, इन पेड़ों की विविधता के बारे में बहुत कम जानकारी है, खासकर उन इलाकों में जहाँ तेज़ी से शहरीकरण हो रहा है और गर्मियों में ‘अर्बन हीट आइलैंड इफ़ेक्ट्स’ होने का खतरा है।
भारत में शहरी पेड़ों की डाइवर्सिटी या विविधता को दर्शाने वाला एक नया डेटाबेस इस अंतर को कम करने की कोशिश करता है। मौजूदा सर्वे और पुराने रिकॉर्ड का इस्तेमाल करके बनाए गए इस डेटाबेस में कम से कम 742 पेड़ों की प्रजातियां दर्ज की गईं, जो “ग्लोबल अर्बन ट्री इन्वेंटरी असेसमेंट में रिपोर्ट की गई विश्व भर में शहरी पेड़ों की 4,734 प्रजातियों का लगभग 15.7% हैं,” स्टडी में कहा गया है। यह डेटाबेस शहरी इलाकों में पौधों की डाइवर्सिटी के डेटा का एक शुरुआती संग्रह है, जिसे उनके गुणों, IUCN रेड लिस्ट स्टेटस और प्रजातियों के फैलाव को डॉक्यूमेंट करने के मकसद से एक साथ जोड़ा गया है।
बसे हुए इलाकों में पाए जाने वाले मशहूर पेड़ों की प्रजातियों में सिडियम गुआवा (अमरूद), रिकिनस कम्युनिस (अरंडी का तेल), और एज़ाडिरेक्टा इंडिका (नीम) प्रजातियाँ शामिल हैं। इससे यह भी पता चला कि ज़्यादातर टैक्सा IUCN रेड लिस्ट लीस्ट कंसर्न यानी कि कम चिंताजनक वाली लिस्ट में थे। रिकॉर्ड किए गए लगभग 41% पेड़ बाहरी प्रजातियों के थे, जबकि 58% सदाबहार थे।
मिज़ोरम यूनिवर्सिटी के फॉरेस्ट्री डिपार्टमेंट में प्रोफेसर और डेटाबेस के को-क्रिएटर और को-ओनर श्याम एस. फरत्याल ने कहा, “शहरी इलाकों में, पेड़ों की जो किस्में आखिर में उगाने के लिए चुनी जाती हैं, वे अक्सर इस बात से तय होती हैं कि वे कितनी तेज़ी से बढ़ते हैं और उनकी देखभाल करना कितना आसान है, ज़रूरी नहीं कि यह उनके इकोलॉजिकल महत्व या इकोसिस्टम सर्विस की क्षमता के आधार पर हो।” “यही वजह है कि हम देखते हैं कि नगर पालिकाओं और शहरी लोकल बॉडीज़, जो इन पेड़ों को रखने के लिए ज़िम्मेदार हैं, विदेशी किस्मों को पसंद करती हैं।”
यह डेटाबेस 1,250 प्रकाशित लिटरेचर सोर्स को देखकर बनाया गया था, जिसमें से 39 आर्टिकल शहरी इलाकों के खास पेड़ों की प्रजातियों की लिस्ट बनाने के लिए शामिल किए गए थे। इस डेटाबेस को ग्लोबल बायोडायवर्सिटी इन्फॉर्मेशन फैसिलिटी (GBIF) के डेटा से और बेहतर बनाया गया, जिसमें 32 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के कुल 380 शहरी इलाके शामिल हैं। इन इलाकों में हैदराबाद, पुणे और बेंगलुरु जैसे बड़े शहर और रेवाड़ी (हरियाणा), बाड़मेर (राजस्थान) और बठिंडा (पंजाब) जैसे छोटे, उभरते हुए शहर शामिल हैं।
और पढ़ेंः भारत में पेड़ लगाने की रफ्तार तेज, फिर भी कमजोर असर
पेड़ों से मिलने वाली इकोसिस्टम सर्विस जैसे छाया और ठंडक बहुत हद तक माहौल और प्रजातियों पर निर्भर करती हैं, जिससे शहर के स्तर पर डेटा इकट्ठा करना प्लानिंग के लिए बहुत ज़रूरी हो जाता है। “बहुत सारा डेटा ग्रे लिटरेचर में है, जैसे म्युनिसिपल या इंस्टीट्यूशनल रिपोर्ट और रिकॉर्ड, जो पब्लिश नहीं होते या जिन्हें हासिल नहीं किया जा सकता। अगले कदम के तौर पर, हम डेटा इकट्ठा करने के लिए और लोगों को बुलाने की उम्मीद करते हैं, ताकि डेटाबेस ज़्यादा बेहतर हो,” फर्त्याल ने कहा।
यह खबर मोंगाबे-इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 27 अप्रैल, 2026 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: केरला के कोच्चि के एक पार्क में पेड़। तस्वीर – दिव्या किलिकर/मोंगाबे।