- ब्राज़ील, जो इथेनॉल के मामले में एक परिपक्व अर्थव्यवस्था है, के अनुभव से पता चलता है कि इथेनॉल ब्लेंडिंग का मतलब सिर्फ़ ब्लेंडेड फ़्यूल बेचना नहीं है, बल्कि ग्राहकों का भरोसा जीतने के लिए एक बेहतर इकोसिस्टम बनाना भी है।
- ब्राज़ील में इंडस्ट्री से जुड़े लोगों का कहना है कि देश के सामने अभी चुनौती सिर्फ़ इथेनॉल का उत्पादन करना नहीं है, बल्कि उत्पादन वाले इलाकों से दूर के बाज़ारों तक स्थिर कीमतों पर इथेनॉल पहुँचाना और साथ ही स्टोरेज और लॉजिस्टिक्स इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार करना भी है।
- इसी तरह, भारत के इथेनॉल से जुड़े लक्ष्य भी उत्पादन और ब्लेंडिंग के लक्ष्यों के साथ-साथ लॉजिस्टिक्स, इंफ्रास्ट्रक्चर और क्वालिटी कंट्रोल पर भी निर्भर करेंगे।
यह रिपोर्ट भारत और ब्राज़ील में इथेनॉल की ओर बढ़ने की प्रक्रिया की तुलना करने वाली सीरीज़ का दूसरा भाग है। ब्राज़ील के कई दशकों के अनुभव से पता चलता है कि इथेनॉल का उत्पादन करना एक बड़ी चुनौती का आधा हिस्सा ही है। यह रिपोर्ट असली चुनौती पर बात करती है, जो खरीद, भण्डारण, ट्रांसपोर्ट और क्वालिटी कंट्रोल से जुड़ी है — ये वे सिस्टम हैं जो तय करते हैं कि इथेनॉल असल में भरोसेमंद तरीके से पंप तक पहुँचेगा या नहीं। इस सीरीज के पहले भाग में यह देखा गया था कि दोनों देशों में गाड़ी मालिकों के लिए इस अंतर का क्या मतलब है।
भोपाल के कटारा हिल्स में एक पेट्रोल पंप पर काम करने वाले 40 साल के एक पंप अटेंडेंट से जब पूछा गया कि क्या उन्होंने ग्राहकों को इथेनॉल-ब्लेंडेड पेट्रोल के बारे में बात करते हुए सुना है? तो उन्होंने हँसते हुए E20 पेट्रोल का ज़िक्र करते हुए कहा, “लोग आकर मज़ाक करते हैं, ‘गन्ने का जूस भर दो’।” भारत में, इथेनॉल बनाने के लिए गन्ना मुख्य स्रोतों में से एक है।
E20 पेट्रोल 20% इथेनॉल और 80% पेट्रोल का मिश्रण है और ‘गन्ने के जूस’ वाला यह ताना E20 के तेज़ी से बढ़ने के बाद हुई लोगों की बातचीत को दिखाता है। इंटरनेट पर मिलने वाले कई वीडियो और सोशल मीडिया पोस्ट में ईंधन के रंग और क्वालिटी, पुरानी गाड़ियों के साथ इसकी कम्पैटिबिलिटी, और माइलेज या परफॉर्मेंस में आए संभावित बदलावों पर सवाल उठाए गए हैं। सरकारी एजेंसियों और ऑटोमोबाइल कंपनियों ने इनमें से कई दावों को गलत ठहराया है। फिर भी, इस बहस ने इस बात पर ध्यान खींचा है कि ईंधन के पेट्रोल पंप तक पहुंचने से पहले इथेनॉल को कैसे ट्रांसपोर्ट, स्टोर, ब्लेंड और टेस्ट किया जाता है।
ऐसा लगता है कि ब्राज़ील के इथेनॉल मिशन ने भारत को काफी हद तक प्रेरित किया है क्योंकि इस दक्षिण अमेरिकी देश का जिक्र अक्सर भारत की इथेनॉल बहस में आता है, आमतौर पर उच्च मिश्रणों की सफलता की कहानी के रूप में।
ब्राज़ील की इथेनॉल प्रणाली में शामिल लोगों के साथ बातचीत से भारत के लिए कुछ महत्वपूर्ण सबक सामने आते हैं। ब्राज़ील के लिए, जहां डिफ़ॉल्ट पेट्रोल में अब 32% इथेनॉल (E30) होता है, इथेनॉल का उत्पादन कोई चुनौती नहीं थी। उनके लिए चुनौती पंप के पीछे सब कुछ तैयार करने की थी: खरीद अनुबंध, डिपो, भंडारण टैंक, ट्रक, पाइपलाइन और गुणवत्ता जांच। इन सभी को एक साथ काम करना होगा ताकि इथेनॉल उपभोक्ताओं तक विश्वसनीय रूप से, उचित मूल्य पर, एक ईंधन के रूप में पहुंच सके जिस पर वे भरोसा कर सकें।
दूसरी तरफ, भारत ने अपेक्षाकृत कम समय में इथेनॉल ब्लेंडिंग का दायरा तो बढ़ाया है, लेकिन आंकड़ों और लक्ष्यों की होड़ में इंफ्रास्ट्रक्चर और सप्लाई चेन के पहलू को नजरअंदाज कर दिया है।

पंप के पीछे की कवायद
ब्राज़ील में फ़्यूल और लुब्रिकेंट वितरण में शामिल कंपनियों के राष्ट्रीय संगठन, ‘सिंडिकॉम’ का कहना है कि उनके देश की इथेनॉल सप्लाई चेन कई चरणों में बनी है। पहला चरण 1975 से 2000 तक चला और यह ब्राज़ील के नेशनल अल्कोहल प्रोग्राम ‘प्रोअल्कोल’ से जुड़ा था, जिसमें सब्सिडी वाला क्रेडिट और केंद्रीकृत वितरण शामिल था। इस दौरान, सरकारी कंपनी पेट्रोब्रास ने मिलों से इथेनॉल खरीदा और उसे प्राथमिक वितरण केंद्रों पर पेट्रोल के साथ मिलाया। इससे टर्मिनल इंफ्रास्ट्रक्चर, खास तौर पर इथेनॉल के लिए भण्डारण और क्वालिटी-कंट्रोल सिस्टम बनाने में मदद मिली।
दूसरा चरण 2003 में बाज़ार खुलने और फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों के चलन में आने के साथ शुरू हुआ। इथेनॉल की खरीद सरकारी कॉन्ट्रैक्ट से हटकर वितरकों यानी डिस्ट्रीब्यूटरों और मिलों के बीच आपसी बातचीत के ज़रिए होने लगी।
तीसरा चरण 2018 में शुरू हुआ, जिसमें ब्राज़ील की राष्ट्रीय बायोफ्यूल पॉलिसी ‘रेनोवाबायो‘ के ज़रिए नियमों और कानूनों का ढांचा तैयार हुआ। रेनोवाबायो के तहत, सरकार फ्यूल सेक्टर या ईंधन क्षेत्र के लिए उत्सर्जन कम करने के लक्ष्य तय करती है और ईंधन वितरकों को ज़रूरी लक्ष्य सौंपती है। वहीं दूसरी और वितरक, प्रमाणित बायोफ्यूल उत्पादकों द्वारा बनाए गए डीकार्बोनाइज़ेशन क्रेडिट खरीदकर इन लक्ष्यों को पूरा करते हैं।
इस पूरी प्रक्रिया में भारत के लिए सबक यह है कि इथेनॉल ब्लेंडिंग का मतलब सिर्फ़ ब्लेंडेड ईंधन बेचना नहीं है, बल्कि ग्राहकों का भरोसा जीतने और उनकी संतुष्टि के लिए एक बेहतर इकोसिस्टम बनाना भी है।
इथेनॉल का गलत जगह पर होना
ब्राज़ील इथेनॉल के ज़्यादा मिश्रण के लक्ष्य को लेकर बहुत सोच-समझकर कदम उठा रहा है। इसकी वजह इथेनॉल का उत्पादन नहीं, बल्कि उसकी सप्लाई और स्टोरेज का इंफ्रास्ट्रक्चर है।
सिंडिकॉम के अनुसार, ब्राज़ील के सामने एक बड़ी चुनौती देश के मध्य-पश्चिम और मध्य-दक्षिण में मौजूद लगभग 360 प्लांट से इथेनॉल को देश भर की 5,500 से ज़्यादा नगर पालिकाओं तक पहुँचाना, उसका भंडारण करना, मिश्रण करना और वितरित करना है।
ब्राज़ील में ईंधन वितरकों के फ़ेडरेशन, ब्राज़ीलकॉम, ने मोंगाबे-इंडिया को एक लिखित जवाब में बताया कि ब्राज़ील के सामने अभी सस्ती और भरोसेमंद वितरण और भण्डारण व्यवस्था की चुनौती है। फ़ेडरेशन ने कहा, “समस्या अब यह नहीं रही कि ‘क्या काफ़ी इथेनॉल है?’, बल्कि यह है कि ‘क्या हम इसे वहाँ पहुँचा सकते हैं जहाँ इसकी ज़रूरत है, सही समय पर पहुँचा सकते हैं, और तब तक इसे स्टोर करके रख सकते हैं?'”
ब्राज़ीलकॉम के अनुसार, गन्ने से बनने वाला इथेनॉल मुख्य रूप से मध्य-दक्षिण के साओ पाउलो और मिनास गेरैस में बनता है, जबकि मक्के से बनने वाला इथेनॉल मध्य-पश्चिम के माटो ग्रोसो और गोइआस में बनता है। ये दोनों ही उत्पादन क्षेत्र ब्राज़ील के उन इलाकों से काफी दूर हैं जहाँ इथेनॉल की कमी है, जैसे कि उत्तर, पूर्वोत्तर और दक्षिण। फेडरेशन के मुताबिक, इथेनॉल की डिलीवरी लागत में ट्रांसपोर्ट का खर्च 20% से 40% तक हो सकता है। ब्राज़ीलकॉम ने कहा, “अक्सर इथेनॉल गलत समय पर गलत जगह पर होता है और इसे ग्राहकों तक स्थिर कीमत पर पहुँचाने के लिए महंगे और कम उपलब्ध इंफ्रास्ट्रक्चर की ज़रूरत होती है।”

सिंडिकॉम ने ब्राज़ील के E30 अपनाने के कदम के बारे में भी ऐसी ही बात कही। उसने कहा कि E30 से इथेनॉल की मांग लगभग 11% बढ़ जाती है। सिंडिकॉम ने मोंगाबे-इंडिया को बताया कि ब्राज़ील में इस मांग को पूरा करने की क्षमता है, लेकिन “सबसे बड़ी चुनौती लॉजिस्टिक्स की है, न कि उत्पादन की।”
भारत के लिए, जहाँ अलग-अलग इलाकों में इथेनॉल का उत्पादन और ईंधन की मांग एक जैसी नहीं है, यही सवाल अहम हो जाता है: इथेनॉल उत्पादक राज्यों से दूर के बाज़ारों तक कैसे पहुँचेगा, और इसका खर्च कौन उठाएगा?
ब्राज़ील में 1989-90 का इथेनॉल आपूर्ति संकट देश के इथेनॉल इतिहास में एक अहम चेतावनी बना हुआ है। सिंडिकॉम ने कहा कि जब तेल की गिरती कीमतों की वजह से मिलों ने इथेनॉल का उत्पादन कम कर दिया था उस वक्त इस संकट ने लगभग एक दशक तक इथेनॉल की छवि को नुकसान पहुँचाया। सिंडिकॉम ने कहा, “इससे मिलने वाला मुख्य सबक सीधा है: मैंडेट (अनिवार्य नियम) का दायरा बढ़ाने से पहले इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करें, बाद में नहीं।”
भारत में समस्या उत्पादन तक सीमित नहीं
भारत में इस उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि इथेनॉल के विस्तार का अगला चरण उत्पादन क्षमता बढ़ाने पर कम और मौजूदा क्षमता का बेहतर इस्तेमाल करने पर ज़्यादा निर्भर करेगा।
जुआरी इंडस्ट्रीज लिमिटेड के मैनेजिंग डायरेक्टर अथर शहाब ने कहा कि भारत का E20 लक्ष्य हासिल करना “पब्लिक पॉलिसी की एक शानदार कामयाबी” है। जुआरी इंडस्ट्रीज चीनी और इथेनॉल समेत कई तरह के कारोबार संभालती है। शहाब ने कहा, “आज सवाल यह नहीं है कि क्या भारत काफ़ी मात्रा में इथेनॉल बना सकता है। सवाल यह है कि क्या इस इकोसिस्टम को इस तरह से और बढ़ाया जा सकता है जो आर्थिक रूप से फ़ायदेमंद हो, पर्यावरण के लिहाज़ से ज़िम्मेदार हो और सभी हितधारकों के लिए निष्पक्ष हो।”
उन्होंने कहा कि इथेनॉल सप्लाई ईयर 2025-26 के लिए ऑयल मार्केटिंग कंपनियों ने लगभग 10.5 बिलियन (1,050 करोड़) लीटर इथेनॉल के लिए बोलियां मंगवाई थीं, जबकि इंडस्ट्री ने इससे कहीं ज़्यादा की पेशकश की। इथेनॉल सप्लाई ईयर नवंबर से अक्टूबर का वह चक्र है जिसका इस्तेमाल भारत में इथेनॉल की सप्लाई और ब्लेंडिंग को निर्धारित करने के लिए किया जाता है। शहाब ने कहा, “मौजूदा क्षमता का इस्तेमाल, अनुमान के मुताबिक खरीद, कुशल लॉजिस्टिक्स और पॉलिसी को लेकर निश्चितता – ये कुछ ऐसी चुनौतियां हैं जिनसे तुरंत निपटना ज़रूरी है।”
उनके अनुसार, इंफ्रास्ट्रक्चर भी एक बड़ी रुकावट है। शहाब ने कहा, “एथेनॉल का उत्पादन कई राज्यों में होता है, लेकिन इसकी ब्लेंडिंग देश भर में फैले तेल कंपनियों के डिपो में की जाती है। ज़्यादा ब्लेंडिंग के लिए स्टोरेज टैंक, ट्रांसपोर्टेशन नेटवर्क, खास हैंडलिंग सिस्टम, क्वालिटी एश्योरेंस सिस्टम और डिपो-लेवल पर ब्लेंडिंग इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश की ज़रूरत होती है।” उन्होंने कहा, “अगर एथेनॉल का उत्पादन तो होता है लेकिन तेल कंपनी उसे उठाती नहीं है, तो इससे न तो एनर्जी सिक्योरिटी में मदद मिलती है और न ही डीकार्बोनाइज़ेशन में।”
शहाब ने यह भी कहा कि कमर्शियल निश्चितता ज़रूरी है क्योंकि इंडस्ट्री ने राष्ट्रीय नीति के लक्ष्यों को ध्यान में रखकर निवेश किया है। उन्होंने कहा कि लंबे समय के निवेश के लिए खरीद के स्थिर सिस्टम, कीमतों के अनुमानित ढांचे और भविष्य के ब्लेंडिंग लक्ष्यों के बारे में ज़्यादा स्पष्टता की ज़रूरत होती है।
मोदी बायोटेक प्राइवेट लिमिटेड के मैनेजिंग डायरेक्टर अक्षय मोदी ने कहा कि भारत में अनाज से इथेनॉल बनाने का काम अब परिपक्व हो गया है, लेकिन इसके बड़े पैमाने पर उत्पादन में चुनौतियां आती हैं, खासकर कच्चे माल की खरीद, स्टोरेज और क्वालिटी के मामले में।
मोदी, जिनकी कंपनी अनाज से इथेनॉल बनाती है, ने कहा, “कच्चे माल की खरीद शायद सबसे मुश्किल काम है। गन्ने के उलट, मक्के के लिए कोई एक खास सप्लाई चेन नहीं है। इथेनॉल उत्पादक उसी अनाज के लिए स्टार्च और पशु आहार उद्योगों से मुकाबला करते हैं, जिससे कीमतों में उतार-चढ़ाव होता है और इससे निपटना मुश्किल होता है, खासकर ऑफ-सीजन के दौरान।” उन्होंने आगे कहा, “सभी तरह के इस्तेमाल के लिए अनाज काफी मात्रा में, या ज़रूरत से ज़्यादा भी उपलब्ध है।”
मोदी ने यह भी बताया कि गन्ने के उलट, अनाज को साल भर इथेनॉल बनाने के लिए स्टोर करके रखा जा सकता है। हालाँकि, इसकी क्वालिटी बनाए रखने के लिए सही स्टोरेज इंफ्रास्ट्रक्चर की ज़रूरत होती है। उन्होंने कहा, “मक्के में ज़्यादा नमी स्टोरेज और प्रोसेसिंग के लिए नुकसानदायक होती है। खेती के तरीकों में सुधार की ज़रूरत है ताकि किसान कटाई के तुरंत बाद मक्के को सुखा सकें और कीड़ों, फंगस और ज़हरीले तत्वों को पनपने से रोक सकें।”

गुणवत्ता से बनता भरोसा
इथेनॉल की मात्रा बढ़ने के साथ, ब्राज़ील का अनुभव दर्शाता है कि गुणवत्ता नियंत्रण उपभोक्ता के भरोसे के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है।
सिंडिकॉम ने कहा कि वितरकों के सामने यह सुनिश्चित करने की चुनौती है कि मिश्रण विनिर्देशों के अनुरूप हों। इसने यह भी चेतावनी दी कि मेथनॉल, पानी और विलायकों की मिलावट सहित परिचालन और कर धोखाधड़ी के लिए कड़े सरकारी निरीक्षण की आवश्यकता है।
ऐसे जोखिमों को कम करने के लिए, वितरक टर्मिनल के प्रवेश और निकास बिंदुओं पर प्रयोगशाला परीक्षण करते हैं। ये परीक्षण अल्कोहल की मात्रा, विद्युत चालकता, पीएच मान और संदूषकों की जाँच करते हैं, और ब्राज़ील की राष्ट्रीय पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस और जैव ईंधन एजेंसी (एएनपी) द्वारा निर्धारित विनिर्देशों के तहत ट्रेस करने योग्य रिपोर्ट प्रदान करते हैं।
सिंडिकॉम के अनुसार, ब्राज़ील में आ रही रुकावटों में स्टोरेज का विस्तार (खासकर देश के उत्तर और पूर्वोत्तर इलाकों में), उत्पादन केंद्रों से दूर के इलाकों के लिए कैबोटेज (इंटरनेशनल रूट से ट्रांसपोर्टेशन) और इन्वेस्टमेंट प्लानिंग के लिए रेगुलेटरी स्पष्टता शामिल हैं। उसने कहा कि ब्लेंड लेवल में कोई भी बढ़ोतरी अनुमान के मुताबिक होनी चाहिए।
भारत के मामले में, जहाँ ज़्यादा इथेनॉल ब्लेंड के लिए ज़्यादा स्टोरेज, ब्लेंडिंग और ट्रांसपोर्ट नोड्स की ज़रूरत होगी, ब्राज़ील का अनुभव बताता है कि फ्यूल-क्वालिटी रेगुलेशन कोई मामूली तकनीकी मुद्दा नहीं है। यह कंज्यूमर के भरोसे का हिस्सा है। फ्यूल में बदलाव की ऐसी प्रक्रिया, जिसमें कंज्यूमर के पास कोई साफ़ विकल्प नहीं होता, उसमें इस बात का भरोसा भी होना चाहिए कि जो फ्यूल दिया जा रहा है, वह कैसा है।
ब्राज़ीलकॉम ने कहा कि देश में क्षेत्रीय डिस्ट्रीब्यूटर्स को बड़ी इंटीग्रेटेड कंपनियों से अलग-अलग तरह के दबाव का सामना करना पड़ता है। बड़ी कंपनियाँ लंबे समय के कॉन्ट्रैक्ट, रेल टर्मिनल, स्टोरेज और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क का इस्तेमाल कर सकती हैं। क्षेत्रीय वितरक अक्सर स्पॉट पर खरीदारी, थर्ड-पार्टी ट्रकों और साझा स्टोरेज पर निर्भर रहते हैं। वे कम मार्जिन पर काम करते हैं और उन पर माल ढुलाई के खर्च में अचानक बढ़ोतरी और स्टोरेज की दिक्कतों का ज़्यादा असर पड़ता है।

ईंधन सुरक्षा और उसका क्रम
इथेनॉल के पक्ष में भारत की सबसे मज़बूत दलीलों में से एक ईंधन आयात में कमी लाना है। सरकार का दावा है कि 2014-15 से इथेनॉल की सप्लाई शुरू होने के बाद से, भारत ने लगभग 95 मिलियन मीट्रिक टन तेल आयात कम करके ₹1 ट्रिलियन से ज़्यादा की बचत की है। हालाँकि, इस बचत के हिसाब में में इथेनॉल की खरीद पर किए गए भुगतान को शामिल नहीं किया गया है।
ब्राज़ील के बायोएनर्जी एक्सपर्ट और ब्राज़ील की ऑयल एजेंसी के पूर्व डायरेक्टर, लुइज़ ऑगस्टो होर्टा नोगुएरा ने इथेनॉल को सीधे एनर्जी सिक्योरिटी से जोड़ा। उन्होंने कहा, “अगर इथेनॉल का प्रोडक्शन स्थानीय स्तर पर किया जाए, तो इथेनॉल से बदले जाने वाले हर लीटर तेल को आयात करने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।” होर्टा ने इसे क्रूड ऑयल इम्पोर्टर के तौर पर भारत के जियो-पॉलिटिकल हालात से भी जोड़ा। उन्होंने कहा, “आजकल तेल को होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से गुज़रना पड़ता है।” उन्होंने याद दिलाया कि कैसे ब्राज़ील ने इस स्थिति का इस्तेमाल एक एडवरटाइज़िंग पंचलाइन के तौर पर किया था: “आपका इथेनॉल इस जलडमरूमध्य से नहीं गुज़रा।”
ब्राज़ील में रहने वाले एनर्जी जर्नलिस्ट निकोला पैम्प्लोना ने कहा कि इथेनॉल की वजह से ब्राज़ील में पेट्रोल पर निर्भरता काफी कम हुई है। उन्होंने कहा, “आज, ब्राज़ील में पेट्रोल से चलने वाली गाड़ियों में इस्तेमाल होने वाले कुल ईंधन का लगभग आधा हिस्सा इथेनॉल का है।” इसमें सीधे स्टेशनों पर बिकने वाला इथेनॉल और पेट्रोल में मिलाया जाने वाला इथेनॉल, दोनों शामिल हैं। उन्होंने आगे कहा कि पेट्रोल के आयात पर ब्राज़ील की निर्भरता अब बाज़ार के 10% से भी कम हो गई है।
ब्राज़ील के गन्ना और बायो-एनर्जी इंडस्ट्री एसोसिएशन, युनिका के प्रमुख इवांड्रो हेरेरा गस्सि का कहना है कि इथेनॉल की मांग से घरेलू सप्लाई बनाने में मदद मिल सकती है। उन्होंने बताया कि ब्राज़ील कभी अमेरिका से लगभग 5% इथेनॉल आयात करता था, लेकिन इस सेक्टर ने ब्लेंडिंग की अनिवार्य शर्त को कम करने का विरोध किया था। उनके अनुसार, स्थिर मांग ने ब्राज़ील को इथेनॉल बनाने के नए घरेलू तरीके विकसित करने में मदद की, जिसमें मक्के से इथेनॉल बनाना भी शामिल है।
ब्राज़ील से पता चलता है कि इथेनॉल प्रोग्राम सिर्फ़ उत्पादन क्षमता या ब्लेंडिंग लक्ष्यों पर निर्भर नहीं रह सकता। सिंडिकॉम ने कहा कि इथेनॉल के क्षेत्र में ब्राज़ील का नेतृत्व दशकों तक लगातार नीतियों, तकनीकी इनोवेशन, रेगुलेटरी मैच्योरिटी और प्राइवेट लॉजिस्टिक्स क्षमता के ज़रिए बना है। उसने कहा कि इनमें से कोई भी आधार अकेले या रातों-रात नहीं बना। सिंडिकॉम ने कहा, “इस प्रोसेस में डिस्ट्रीब्यूटर की अहम भूमिका होती है, क्योंकि डिस्ट्रीब्यूटर ही ब्लेंडिंग के नियम को अंतिम उपभोक्ता के लिए सुरक्षित, नियमित और अच्छी क्वालिटी की सप्लाई में बदलता है।”
यह खबर मोंगाबे-इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 24 जुलाई, 2026 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: आंध्र प्रदेश में किसान इथेनॉल बनाने वाली डिस्टिलरी को बेचने के लिए ज्वार को एक ट्रैक्टर पर लादते हुए। गन्ने के उलट, अनाज को साल भर इथेनॉल बनाने के लिए स्टोर करके रखा जा सकता है। तस्वीर: ILRI/स्टीवी मान, फ़्लिकर (CC BY-NC-ND 2.0) के माध्यम से।